सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

118 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/103-112 ]
हैं, क्योंकि वे एक ही साथ स्वयं दीक्षित ब्राह्मणके
रूपमें शुद्धनाम ग्रहण करके 'आचार्य' और उच्चकीर्तन
करके समस्त जगतवासियोंको नाम-यज्ञमें दीक्षित करवाकर
'प्रचारक' हैं—यही उनका 'आचार और प्रचार' है॥ 103 ॥
श्रीहरिदास और श्रीसनातनका परस्पर कृष्णकथाकी
चर्चामें समय व्यतीत करना :-
एइमत दुइजन नाना-कथा-रङ्गे।
कृष्णकथा आस्वाद्य रहिं एकसङ्गे ॥ 104 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन
गोस्वामी एकसाथ रहकर अनेक प्रकारकी कृष्णकथाके
आनन्दका आस्वादन करते ॥ 104 ॥
रथयात्राके समय गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें
आगमन और दर्शन :-
यात्राकाले आइला सब गौड़ेर भक्तगण।
पूर्ववत् कैला सबे रथयात्रा दरशन ॥ 105 ॥
अनुवाद—रथयात्राके समय गौड़देशके समस्त भक्त
आये तथा पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति सभीने रथयात्राके
दर्शन किये ॥ 105 ॥
रथके आगे महाप्रभुके नृत्यको देखकर
श्रीसनातनका विस्मय :-
रथ-अग्रे प्रभु तैछे करिला नर्त्तन।
देखिं चमत्कार हैल सनातनेर मन ॥ 106 ॥
अनुवाद—रथके सामने महाप्रभुने पहलेकी भाँति
नृत्य किया। उसे देखकर श्रीसनातन गोस्वामीके मनमें
बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 106 ॥
चातुर्मास्यके समय गौड़ीय और उड़िया
भक्तोंके साथ श्रीसनातनका मिलन :-
वर्षार चारिमास रहिला सब निज-भक्तगणे।
सबा-सङ्गे प्रभु मिलाइला सनातने ॥ 107 ॥
अनुवाद—वर्षा ऋतुके चार मास तक गौड़देशसे
आये सभी भक्त श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे। महाप्रभुने श्रीसनातन
गोस्वामीको उन सब भक्तोंसे मिलवाया ॥ 107 ॥
अद्वैत, नित्यानन्द, श्रीवास, वक्रेश्वर।
वासुदेव, मुरारि, राघव, दामोदर ॥ 108 ॥
पुरी, भारती, स्वरूप, पण्डित-गदाधर ।
सार्वभौम, रामानन्द, जगदानन्द, शङ्कर ॥ 109 ॥
काशीश्वर, गोविन्दादि यत भक्तगण।
सबा-सने सनातनेर कराइला मिलन ॥ 110 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीवास
पण्डित, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीवासुदेव दत्त, श्रीमुरारि
गुप्त, श्रीराघव पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीपरमानन्द
पुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीगदाधर
पण्डित, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरामानन्द राय, श्रीजगदानन्द
पण्डित, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीगोविन्द
आदि जितने भक्त थे, महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीकी
उन सबसे भेंट करवायी ॥ 108-110 ॥
श्रीसनातन सभीकी ही प्रीतिके पात्र :-
यथायोग्य सबार कैला चरण वन्दन।
ताँरे कराइला सबार कृपार भाजन ॥ 111 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने यथायोग्य सभी भक्तोंके
चरणोंकी वन्दना की। महाप्रभुकी कृपाके कारण श्रीसनातन
उन सभीकी कृपाके पात्र बन गये ॥ 111 ॥
अपने गुणोंके द्वारा विष्णु-वैष्णवके स्नेह-प्रीतिके पात्र :-
सद्गुणे, पाण्डित्ये, सबार प्रिय-सनातन।
यथायोग्य कृपा-मैत्री-गौरव-भाजन ॥ 112 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी अपने सद्गुणों तथा
पाण्डित्यके कारण सबके प्रिय थे। वे महाप्रभुके
भक्तोंमें-से यथायोग्य किसीकी कृपा, किसीकी मित्रता
और अन्य किसीके गौरवके पात्र थे ॥ 112 ॥

[ 4/113-121 चौथा अध्याय 119
गौड़ीय भक्तोंका गौड़देशमें लौटना और महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनका आह्वान,
श्रीसनातनका पुरीमें अवस्थान :- श्रीसनातनका आनन्द :-
सकल वैष्णव यबे गौड़देशे गेला। मध्याह्न-भिक्षाकाले सनातने बोलाइल।
सनातन महाप्रभुर चरणे रहिला ॥ 113 ॥ प्रभु बोलाइला, ताँर आनन्द बाड़िल ॥ 117 ॥
अनुवाद-जब सभी वैष्णव गौड़देश लौट गये, तब अनुवाद-महाप्रभुने मध्याह्न भोजनके समय श्रीसनातन
भी श्रीसनातन महाप्रभुके चरणकमलोंके आश्रयमें ही गोस्वामीको भी बुलवाया। महाप्रभुने मुझे बुलाया है-इससे
रहे ॥ 113 ॥ श्रीसनातन गोस्वामीका आनन्द बहुत बढ़ गया ॥ 117 ॥
महाप्रभुके साथ श्रीसनातनका दोलयात्राका दर्शन :-
दोलयात्रा-आदि प्रभुर सङ्गेते देखिल। महाप्रभुकी प्रीतिके वशीभूत आत्म-विस्मृत श्रीसनातनका
दिने-दिने प्रभुसङ्गे आनन्द बाड़िल ॥ 114 ॥ देहस्मृतिकी लुप्त-अवस्थामें प्रखर तप्त तीक्ष्ण बालूके
पथपर महाप्रभुके समीप गमन :-
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके साथ दोलयात्रा मध्याह्ने समुद्र-बालु हञाछे अग्नि-सम।
आदिका दर्शन किया। इस प्रकार महाप्रभुके साथ रहते सेइपथे सनातन करिला गमन ॥ 118 ॥
हुए दिन-प्रतिदिन उनका आनन्द बढ़ने लगा ॥ 114 ॥ 'प्रभु बोलाञाछे'-एइ आनन्दित मने।
ज्येष्ठ मासमें श्रीसनातनकी परीक्षा-विषयक तप्त-बालुकाते पा पोड़े, ताहा नाहि जाने ॥ 119 ॥
वृत्तान्तका वर्णन :- दुइ पाये फोस्का हैल, तबु गेला प्रभुस्थाने।
पूर्व वैशाखमासे सनातन यबे आइला। भिक्षा करि' महाप्रभु करियाछेन विश्रामे ॥ 120 ॥
ज्येष्ठमासे प्रभु ताँरे परीक्षा करिला ॥ 115 ॥ महाप्रभुके भुक्त-अवशिष्ट प्रसादकी प्राप्ति :-
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी पहले जब वैशाख-मासमें भिक्षा-अवशेष-पात्र गोविन्द तारे दिला।
जगन्नाथपुरीमें आये थे, तब महाप्रभुने ज्येष्ठमासमें उनकी प्रसाद पाञा सनातन प्रभुपाशे आइला ॥ 121 ॥
परीक्षा ली थी ॥ 115 ॥
अनुवाद-दोपहरके समय समुद्रकी बालू आगकी
यमेश्वर-टोटामें महाप्रभुके द्वारा दोपहरमें भिक्षा :- भाँति तप रही थी, परन्तु श्रीसनातन गोस्वामी उसी
ज्येष्ठमासे प्रभु यमेश्वर-टोटा आइला। पथसे गये। 'महाप्रभुने बुलाया है' - इस बातसे उनके
भक्त-अनुरोधे ताँहा भिक्षा ये करिला ॥ 116 ॥ मनमें इतना आनन्द हो रहा था कि तपती बालूसे
अनुवाद-ज्येष्ठ मासमें महाप्रभु यमेश्वर तोटा उनके पाँव जल रहे हैं, इस बातका उन्हें अनुभव ही
आये तो भक्तोंके अनुरोधपर उन्होंने वहींपर भिक्षा नहीं हुआ। उनके दोनों पाँवोंमें फफोले पड़ गये, तब
(भोजन) ग्रहण करना स्वीकार किया ॥ 116 ॥ भी वे महाप्रभुके पास गये। उस समय महाप्रभु भोजन
अनुभाष्य- 'यमेश्वर-टोटा,'-यमेश्वर-शिवके बगीचेवाली करनेके बाद विश्राम कर रहे थे। श्रीगोविन्दने श्रीसनातन
गलीमें; तोटा-शब्दका अर्थ उड़िया भाषामें 'बगीचा' होता गोस्वामीको महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रदान किया। वे प्रसाद
है ॥ 116 ॥ पाकर महाप्रभुके पास आ गये ॥ 118-121 ॥

120 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/122-127 ]
स्नेहपूर्वक महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके उपायकी
जिज्ञासा, श्रीसनातनका दैन्यसहित उत्तर :-
प्रभु कहे,—“कोन पथे आइला सनातन?”
तँह कहे,—“समुद्र-पथे, करिलुँ आगमन॥”122॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, तुम कौनसे
मार्गसे आये हो?” उन्होंने उत्तर दिया,—“मैं समुद्रतटके
मार्गसे आया हूँ॥”122॥
प्रभु कहे,—“तप्त-बालुकाते केमने आइला?
सिंहद्वारेर पथ—शीतल, केने ना आइला??123॥
तप्त-बालुकाय तोमार पाय हैल व्रण।
चलिते ना पार, केमने करिला सहन??”124॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम तपती बालूपर
कैसे चलकर आये? सिंहद्वारका मार्ग तो शीतल है,
तुम वहाँसे क्यों नहीं आये? तपती बालूपर चलकर
आनेसे तुम्हारे पाँवोंमें फफोले पड़ गये हैं। अब तो तुम
चल भी नहीं पा रहे हो, तुमने यह सब कैसे सहन
किया?”123-124॥
अनुभाष्य—‘सिंहद्वार’,—जगन्नाथमन्दिरके मूल
पूर्वदिशावाले द्वारको सिंहद्वार कहते हैं॥123॥
सनातन कहे,—“दुःख बहुत ना पाइलुँ।
पाये व्रण हञाछे ताहा ना जानिलुँ॥125॥
स्वयं रागमार्गीय परमहंस होनेपर भी आदर्श मानप्रदाता
वैष्णवाचार्यके रूपमें श्रीसनातन प्रभुके द्वारा साधकोंको
शिक्षा प्रदान करनेके लिये वैध अर्चन-मार्गके प्रति
यथोचित मर्यादाका प्रदर्शन :-
सिंहद्वारे याइते मोर नाहि अधिकार।
विशेषे—ठाकुरेर ताँहा सेवकेर प्रचार॥126॥
सेवक गतागति करे, नाहि अवसर।
तार स्पर्श हैले, सर्वनाश हवे मोर॥”127॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मुझे कुछ
अधिक कष्ट नहीं हुआ। पैरोंमें फफोले पड़ गये हैं,
मुझे पता ही नहीं चला। सिंहद्वारकी ओरसे आनेका
मेरा अधिकार नहीं है, विशेषकर उस मार्गपर
श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंका निरन्तर आना-जाना लगा
रहता है। श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंके सब समय उस
मार्गपर आने-जाने-से मार्ग कभी भी खाली नहीं रहता।
इसलिये उनसे मेरा स्पर्श होनेपर तो मेरा सर्वनाश हो
जायेगा॥”125-127॥
अमृतानुकणिका—ज्येष्ठ-मासमें दोपहरके समय सूर्यके
प्रखर तापसे गोवर्धनकी शिलाएँ तप्त हो रही थीं।
श्रीकृष्ण गोचारण करते-करते गोवर्धनकी तलहटीमें
पहुँचे और राधाजी पर्वतके ऊपर खड़ी होकर वहाँसे
श्रीकृष्णको देख रही थीं। ऊपरसे सूर्यका ताप आ रहा
था और नीचेसे शिलाके तप्त होनेके कारण उनके
चरणोंके तलवोंमें फफोले पड़ रहे थे। राधाजीके
चरणकमल तो अत्यन्त कोमल हैं, किन्तु श्रीकृष्णके
दर्शनसे उनको इतना आनन्द हो रहा था कि उन्हें कोई
कष्ट ही नहीं अनुभव हो रहा था। इसी प्रकार गिरिराज
गोवर्धनको इन्द्रके वज्रके प्रहारका पता ही नहीं चल
रहा था। (श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्तीकृत श्रीश्रीगोवर्धनाष्टकम्
2)—
स्वप्रेष्ठहस्ताम्बुज सौकुमार्य सुखानुभूते रतिभुमम्नि वृत्ते।
महेन्द्र-वज्राहतिमपजानन्न् गोवर्धनो मे दिशतामभीष्टम्॥
अर्थात् “जो अपने प्रियतमके करकमलोंकी सुकुमारताके
द्वारा अनुभूत अतिशय सुखके कारण महेन्द्रके असंख्य
वज्रके आघातको भी नहीं जान पा रहे हैं, वे श्रीगोवर्धन
मुझे समस्त अभीष्ट प्रदान करें।”
शुद्धभक्तोंके साथ भी ऐसा ही होता है। उनको
अपने शरीरकी भी सुधबुध नहीं होती। उनका शरीर
प्राकृत नहीं होता, किन्तु यदि उसे प्राकृत भी मान लें,
तो भी उनका भजनमें इतना आवेश होता है कि
संसारका कोटि-कोटि दुःख भी उनको प्रतीत नहीं
होता। तप्त बालूके ऊपर चलते हुए श्रीसनातन
गोस्वामीके चरणोंमें फफोले पड़ रहे थे, किन्तु महाप्रभुके
साथ मिलन होगा, इस परमानन्दके साथ वे चले जा

[ 4/125-133 चौथा अध्याय 121
रहे थे। इसी प्रकारसे जब कोई मध्यम अधिकारसे
धीरे-धीरे ऊपर उठता है, तो उत्तम-कनिष्ठ अवस्थामें
आनेपर उसको कोई भी कष्ट अनुभव नहीं होता।
साधनावस्थामें ही भक्ति क्लेशघ्नी है, अर्थात् उस
अवस्थामें ही क्लेश दूर हो जाते हैं। भावावस्थामें अति
अल्प मात्रामें क्लेश रहनेपर भी भक्तको उनकी प्रतीति
नहीं होती और प्रेमावस्थामें क्लेश उपस्थित ही नहीं
होते और न ही भक्तको क्लेशादिकी अनुभूति होती है।
यही प्रेमका लक्षण है। (भःरःसिः 2/1/280)—
अविज्ञाताखिलक्लेशाः सदा कृष्णाश्रितक्रियाः।
सिद्धाः स्युः सन्ततप्रेमसौख्यास्वादपरायणाः ॥
अर्थात् “जो सर्वदा कृष्ण-सम्बन्धी क्रियाओंमें
पूर्णरूपसे निमग्न रहते हैं तथा किसी भी प्रकारके
क्लेश या विघ्नसे अपरिचित रहते हैं, वे सिद्ध भक्त
हैं।”
यदि श्रीसनातन गोस्वामीको महाप्रभुका नित्य परिकर
न भी मानें, तो भी सभी उनको उत्तम भक्त तो अवश्य
ही मानेंगे। इसलिये श्रीसनातन गोस्वामीको कष्टकी
प्रतीति नहीं हुई। जब कोई भक्त मध्यम अधिकारसे
ऊपर उठ जाता है, तब वह कष्टको कष्ट ही नहीं
मानता। श्रीकृष्णके दर्शनमें और उनकी कथाओंको
सुननेमें यदि कोई दुःख भी है, तो उसको वह सुख
ही मानता है। रागात्मिका भक्तोंमें (यथा अन्त्य,
20/52—‘ना गणि आपन दुःख------सेइ दुःख-मोर
सुखवर्य॥’) और रागानुगा भक्तोंमें भी ऐसा ही होता
है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज”॥ 125 ॥
श्रीसनातनकी उक्ति और मान देनेवाले
व्यवहारके श्रवणसे महाप्रभुको आनन्द :—
शुनि' महाप्रभु मने सन्तोष पाइला।
तुष्ट हञा ताँरे किछु कहिते लागिला ॥ 128 ॥
भगवान्के द्वारा भक्तकी स्तुति :—
“यद्यपिओ तुमि हओ जगत्पावन।
तोमा-स्पर्शे पवित्र हय देव-मुनिगण ॥ 129 ॥
स्वयं महाप्रभुके द्वारा भक्त अथवा साधुकी
रीति और गुणके वैशिष्ट्यका वर्णन :—
तथापि भक्त-स्वभाव-मर्यादा-रक्षण।
मर्यादा-पालन हय साधुर भूषण ॥ 130 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीका विचार सुनकर
महाप्रभुके मनमें प्रसन्नता हुई। प्रसन्न होकर महाप्रभु कुछ
कहने लगे,—“हे सनातन ! यद्यपि तुम जगत्को पवित्र
करनेवाले हो और तुम्हें स्पर्श करनेसे तो देवता और
मुनिगण भी पवित्र होते हैं, तथापि मर्यादाकी रक्षा करना
ही भक्तोंका स्वभाव होता है। मर्यादाका पालन करना
ही साधुका भूषण है॥ 128-130 ॥
साधकके द्वारा मर्यादाके उल्लङ्घनका फल :—
मर्यादा-लङ्घने लोक करे उपहास।
इहलोक, परलोक-दुइ हय नाश ॥ 131 ॥
अनुवाद—मर्यादाका उल्लङ्घन करनेसे लोग उसका
उपहास करते हैं और उसका यह लोक और
परलोक-दोनों ही नष्ट हो जाते हैं॥ 131 ॥
जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा वैध-मर्यादाके पालनमें
आदरका प्रदर्शन और श्रीसनातनके आचरणको देखकर
उन्हें आचार्यके रूपमें अङ्गीकार करना :—
मर्यादा राखिले, तुष्ट हय मोर मन।
तुमि ऐछे ना करिले करे कोन् जन??”132 ॥
अनुवाद—मर्यादाका पालन करनेसे मेरा मन सन्तुष्ट
होता है। यदि तुम ऐसा आचरण नहीं करोगे, तो फिर
कौन करेगा ?”132 ॥
अप्राकृत देहवाले अपने श्रेष्ठ भक्तको
भगवान्के द्वारा आलिङ्गन :—
एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैल।
ताँर कण्डुरसा प्रभुर श्रीअङ्गे लागिल ॥ 133 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने ऐसा कहकर श्रीसनातन गोस्वामीको
आलिङ्गन किया तो उनके शरीरका पीब महाप्रभुके
श्रीअङ्गपर लग गया॥ 133 ॥

122 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/134-141 ]
आलिङ्गनके फलसे महाप्रभुके शरीरमें अपने
पीबके स्पर्शके कारण दैन्यविग्रह
श्रीसनातनके द्वारा वेदनाका अनुभव :-
बार बार निषेधेन, तबु करे आलिङ्गन।
अङ्गे रसा लागे, दुःख पाय सनातन ॥ 134 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीसनातन गोस्वामीने बार बार
महाप्रभुको आलिङ्गन करनेके लिये मना किया, तथापि
महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। ऐसा करनेसे महाप्रभुके
अङ्गोंमें पीब लग गया जिससे श्रीसनातन गोस्वामीको
बहुत दुःख हुआ ॥ 134 ॥
श्रीसनातन-जगदानन्द-संवाद :-
एइमते सेवक-प्रभु दुँहे घर गेला।
आर दिन जगदानन्द सनातनेरे मिलिला ॥ 135 ॥
अनुवाद—तत्पश्चात् सेवक (श्रीसनातन गोस्वामी)
और महाप्रभु, दोनों अपने-अपने वासस्थानपर चले
गये। अगले दिन श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीसनातन
गोस्वामीसे मिलने आये ॥ 135 ॥
अनुभाष्य— 'सेवक-प्रभु', - श्रीसनातन और
श्रीमन्महाप्रभु ॥ 135 ॥
पण्डितके साथ कृष्णकथाका संलाप और प्रसङ्गवशतः
श्रीसनातनके द्वारा अपने दुःखका ज्ञापन :-
दुइजन बसि' कृष्णकथा-गोष्ठी कैला।
पण्डितेरे सनातन दुःख निवे दिला ॥ 136 ॥
“इँहा आइलाङ प्रभुरे देखि' दुःख खण्डाइते।
येबा मने, ताहा प्रभु ना दिला करिते ॥ 137 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीसनातन
गोस्वामी, दोनों बैठकर श्रीकृष्णकथा-गोष्ठी करने लगे।
श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीजगदानन्द पण्डितसे अपना
दुःख निवेदन करते हुए कहा, - "मैं अपने दुःखको दूर
करनेके लिये यहाँ मनमें एक सङ्कल्प लेकर आया था,
किन्तु महाप्रभुने मुझे वैसा करने नहीं दिया ॥ 136-137 ॥
अनुभाष्य— 'दुःख', - सर्वदा महाप्रभु और श्रीजगन्नाथदेवके
दर्शनरूपी 'सेवाके अभाव'से उत्पन्न कष्ट; 'येबा मने', -
श्रीजगन्नाथ-रथके आगे महाप्रभुके नृत्यके समय अपनी
देहत्याग ॥ 137 ॥
महाप्रभुकी देहमें अपने पीबके स्पर्श-हेतु दैन्यविग्रह
श्रीसनातनमें लज्जा, वेदना और अपराधकी आशङ्का :-
निषेधिते प्रभु आलिङ्गन करेन मोरे।
मोर कण्डुरसा लागे प्रभुर शरीरे ॥ 138 ॥
अनुवाद-मेरे मना करनेपर भी महाप्रभु मेरा
आलिङ्गन करते हैं जिससे मेरे शरीरका पीब महाप्रभुके
शरीरपर लग जाता है॥ 138 ॥
अपराध हय मोर, नाहिक निस्तार।
जगन्नाथेह ना देखिये, -ए दुःख अपार ॥ 139 ॥
अनुवाद-इससे मेरा अपराध होता है, जिसके
कारण मेरा कभी भी निस्तार नहीं होगा। मैं भगवान्
श्रीजगन्नाथका दर्शन भी नहीं कर पाता - यह एक और
अपार दुःख है ॥ 139 ॥
हित-निमित्त आइलाङ आमि, हैल विपरीते।
कि करिले हित हय नारि निर्धारिते ॥"140॥
अनुवाद-मैं तो यहाँ अपने हितके लिये आया था,
किन्तु सब कुछ उसके विपरीत हो गया। क्या करनेसे
मेरा हित होगा, यह मैं निर्धारित नहीं कर पा रहा
हूँ॥" 140 ॥
अमङ्गलकी आशङ्कासे पण्डितके द्वारा श्रीसनातनको
वृन्दावन-गमनका परामर्श देना :-
पण्डित कहे, - "तोमार वासयोग्य 'वृन्दावन' ।
रथयात्रा देखि' ताँहा करह गमन ॥ 141 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा, - "आपके
रहने योग्य स्थान 'वृन्दावन' है। रथयात्रा देखकर आप
वृन्दावन चले जाओ ॥ 141 ॥

[ 4/142-149 चौथा अध्याय 123
प्रभुर आज्ञा हञाछे तोमा' दुइ भाये।
वृन्दावने बैस, ताँहा सर्वसुख पाइये ॥ 142 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी आप और श्रीरूप, दोनों
भाइयोंके लिये यही आज्ञा हुई है कि आप दोनों
वृन्दावनमें ही रहो, वहींपर आपको सब प्रकारके
सुखोंकी प्राप्ति होगी ॥ 142 ॥
ये-कार्ये आइला, प्रभुर देखिला चरण।
रथे जगन्नाथ देखि' करह गमन॥”143 ॥
अनुवाद—आप जिस कार्यसे आये थे, वह तो पूर्ण
हो गया, क्योंकि आपको महाप्रभुके चरणकमलोंके
दर्शन हो गये हैं। अब आप रथपर विराजमान भगवान्
श्रीजगन्नाथके दर्शन करके वृन्दावनकी ओर प्रस्थान
कीजिये ॥”143 ॥
श्रीसनातनकी सम्मति, श्रीवृन्दावनधामको अप्राकृत कृष्णधाम
जाननेपर भी महाप्रभुके द्वारा निर्वाचित देश मानकर
श्रीसनातनका अतुलनीय गौरप्रेम :—
सनातन कहे,—“भाल कैला उपदेश।
ताँहा याब, सेइ मोर 'प्रभुदत्त देश' ॥”144 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“आपने बहुत
अच्छा परामर्श दिया है। मैं वृन्दावन ही जाऊँगा, वही
महाप्रभुके द्वारा प्रदत्त मेरा वासस्थान है ॥”144 ॥
अनुभाष्य—'प्रभुदत्त देश',—तात्पर्य यह है कि
जीवके नित्य-आराध्य श्रीहरि-गुरु-वैष्णवके द्वारा निर्वाचित
और निर्धारित स्थान ही उसका नित्य-वाञ्छनीय
श्रीकृष्णसेवाका आधार श्रीवृन्दावन है; उसमें वास
करके उनका सुख-विधान करनेसे ही जीवको
नित्य-मङ्गलकी प्राप्ति होती है ॥ 144 ॥
एकदिन महाप्रभुका आगमन :—
एत बलि' दुँहे निज-कार्ये उठि' गेला।
आर दिन महाप्रभु मिलिवारे आइला ॥ 145 ॥
अनुवाद—इस प्रकार वार्तालाप करनेके बाद
श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीसनातन गोस्वामी अपनी-अपनी
सेवाओंके लिये उठ गये। अगले दिन महाप्रभु श्रीहरिदास
ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामीसे मिलनेके लिये
आये ॥ 145 ॥
श्रीहरिदासके द्वारा प्रणाम, महाप्रभुके
द्वारा श्रीहरिदासका आलिङ्गन :—
हरिदास कैला प्रभुर चरण वन्दन।
हरिदासे कैला प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥ 146 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुके चरणोंकी
वन्दना की। महाप्रभुने श्रीहरिदास ठाकुरको प्रेमपूर्वक
आलिङ्गन किया ॥ 146 ॥
आलिङ्गन करनेके लिये महाप्रभुके द्वारा
श्रीसनातनको अपने निकट बुलाना :—
दूर हैते दण्ड-परणाम करे सनातन।
प्रभु बोलाय बार बार करिते आलिङ्गन ॥ 147 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने दूरसे ही महाप्रभुको
दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीको
आलिङ्गन करनेके लिये बार बार बुलाने लगे ॥ 147 ॥
श्रीसनातनको अपराधकी आशङ्का; महाप्रभुका
शीघ्रतासे उनके निकट आगमन :—
अपराध-भये तैं ह मिलिते ना आइल।
महाप्रभु मिलिवारे सेइ ठाञि आइल ॥ 148 ॥
अनुवाद—अपराधके भयसे श्रीसनातन गोस्वामी
महाप्रभुसे मिलनेके लिये नहीं आये, तो महाप्रभु स्वयं
उनसे मिलनेके लिये उनके पास चले आये ॥ 148 ॥
श्रीसनातनका भागना, महाप्रभुके द्वारा
बलपूर्वक आलिङ्गन :—
सनातन भागि' पाछे करेन गमन।
बलात्कारे धरि' प्रभु कैला आलिङ्गन ॥ 149 ॥

124 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/149-158 ]
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी दौड़कर पीछेकी ओर
जाने लगे, किन्तु महाप्रभुने उन्हें बलपूर्वक पकड़कर
उनका आलिङ्गन किया॥ 149 ॥
महाप्रभु और दोनों भक्तोंका बैठना; दैन्यविग्रह
श्रीसनातनके द्वारा स्वयंको अपवित्र बद्धजीव मानकर
महाप्रभुके निकट गम्भीर दैन्योक्ति और महाप्रभुके
स्पर्शके कारण अपने अपराधकी आशङ्का :—
दुइ जन लञा प्रभु बसिला पिण्डाते।
निर्विण्ण सनातन लागिला कहिते ॥ 150 ॥
अनुवाद—महाप्रभु उन दोनोंको अपने साथ लेकर
चबूतरेपर जाकर बैठे। परम वैरागी श्रीसनातन गोस्वामी
कहने लगे॥ 150 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'निर्विण्ण',—निर्वेद अर्थात्
विरागयुक्त ॥ 150 ॥
“हित लागि' आइनु मुञि, हैल विपरीत।
सेवायोग्य नहि, अपराध करौँ निति नित ॥ 151 ॥
अनुवाद—“मैं तो यहाँ अपने हितके लिये आया
था, किन्तु सब कुछ उसके विपरीत हो गया। मैं सेवा
करने योग्य तो हूँ नहीं, अपितु दिन-प्रतिदिन अपराध
ही कर रहा हूँ॥ 151 ॥
सहजे नीच-जाति मुञि, दुष्ट, ‘पापाशय’।
मोरे तुमि धुँइले मोर अपराध हय ॥ 152 ॥
अनुवाद—मैं स्वभावसे ही नीच जातिका, दुष्ट और
पापवासनायुक्त हृदयवाला हूँ। आप मुझे स्पर्श करते हैं
तो इससे मेरा अपराध होता है॥ 152 ॥
ताहाते आमार अङ्गे कण्डुरसा-रक्त चले।
तोमार अङ्गे लागे, तबु स्पर्शह तुमि बले ॥ 153 ॥
अनुवाद—उसपर भी मेरे शरीरसे जो पीब और
रक्त बहता है, वह आपके श्रीअङ्गपर लगता है, किन्तु
तब भी आप बलपूर्वक मुझे स्पर्श करते हैं॥ 153 ॥
अनुभाष्य—'बले',—बलपूर्वक ॥ 153 ॥
वीभत्स स्पर्शिते ना कर घृणा-लेशे।
एइ अपराधे मोर हबे सर्वनाशे ॥ 154 ॥
अनुवाद—आप घिनौने शरीरको स्पर्श करनेमें
लेशमात्र भी घृणा नहीं करते हैं, इस अपराधसे मेरा
सर्वनाश अवश्य ही होगा ॥ 154 ॥
अपराधकी आशङ्कासे उसके मोचनके लिये वृन्दावन
जानेकी अनुमति देनेकी प्रार्थना :—
ताते इँहा रहिले मोर ना हय 'कल्याण'।
आज्ञा देह'–रथ देखि' याङ वृन्दावन ॥ 155 ॥
अनुवाद—इसलिये यहाँ रहनेपर मेरा 'कल्याण' नहीं
होगा। कृपा करके आप मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं
रथयात्राका दर्शन करके वृन्दावन लौट जाऊँ ॥ 155 ॥
श्रीजगदानन्द पण्डितसे वृन्दावन जानेके
परामर्शकी प्राप्तिके विषयमें बतलाना :—
जगदानन्द-पण्डिते आमि युक्ति पुछिल।
वृन्दावन याइते तेंह उपदेश दिल ॥ ”156 ॥
अनुवाद—मैंने श्रीजगदानन्द पण्डितसे भी इस विषयमें
उनका विचार पूछा था। उन्होंने मुझे वृन्दावन जानेका
ही परामर्श दिया है॥ ”156 ॥
क्रोधसे भरकर महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दकी भर्त्सना :—
एत शुनि' महाप्रभु सरोष-अन्तरे।
जगदानन्दे क्रुद्ध हञा करे तिरस्कारे ॥ 157 ॥
“कालिकार पड़ुया जगा ऐछे गर्वी हैल।
तोमा-सबारेह उपदेश करिते लागिल ??158 ॥
अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुके भीतर रोष आ
गया और वे श्रीजगदानन्द पण्डितपर क्रोधित होकर
कहने लगे,—“कलका छात्र जगा (जगदानन्द) इतना
अभिमानी हो गया है कि वह तुम सबको भी उपदेश
करने लगा है? 157–158 ॥

[ 4/159–166 चौथा अध्याय 125
श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुकी प्रचुर
कृपा-गौरवपूर्ण उक्ति :-
व्यवहारे-परमार्थे तुमि-तार गुरुतुल्य।
तोमारे उपदेश करे, ना जाने आपन-मूल्य ?? 159 ॥
अनुवाद-व्यवहारमें हो अथवा परमार्थमें हो, इन
दोनों विषयोंमें तुम उसके गुरुके समान हो। वह अपने
मूल्यको नहीं जानकर तुम्हें उपदेश देता है ? 159 ॥
आमार उपदेष्टा तुमि-प्रामाणिक आर्य।
तोमारेह उपदेशे, बालका करे ऐछे कार्य ॥” 160 ॥
अनुवाद-तुम तो मुझे भी परामर्श देनेके
अधिकारी-प्रामाणिक आर्य हो और वह जगा तुम्हें
उपदेश देता है। वह तो नादान बालकके जैसे कार्य
कर रहा है॥” 160 ॥
श्रीसनातनके द्वारा श्रीजगदानन्दके सौभाग्य
और अपने दुर्भाग्यका वर्णन :-
शुनि' सनातन पाये धरि' प्रभुरे कहिल।
“जगदानन्देर सौभाग्य आजि से जानिल ॥ 161 ॥
आपणार 'असौभाग्य' आजि हैल ज्ञान।
जगते नाहि जगदानन्द-सम भाग्यवान् ॥ 162 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दकी भर्त्सना
सुनकर श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर
उनसे कहा,-“आज ही मुझे श्रीजगदानन्दके सौभाग्यका
पता चला है। और साथ ही आज मुझे अपने
'दुर्भाग्य'का ज्ञान हुआ है। इस जगत्में जगदानन्द
पण्डितके समान अन्य कोई भाग्यशाली नहीं है॥ 161–162 ॥
अनुभाष्य- 'आपणार असौभाग्य', - अर्थात् अपना
दुर्भाग्य ॥ 162 ॥
अपने और श्रीजगदानन्दके प्रति
महाप्रभुके स्नेहकी तुलना :-
जगदानन्दे पियाओ आत्मीयता-सुधारस।
मोरे पियाओ गौरवस्तुति-निम्ब-निशिन्दा-रस ॥ 163 ॥
अनुवाद-आप जगदानन्द पण्डितको आत्मीयतारूपी
अमृतरसका पान कराते हो और मुझे सम्मान-स्तुतिरूपी
नीम-निर्गुण्डी* के कड़वा रसका पान कराते हो ॥ 163 ॥
अनुभाष्य-नीमका और निर्गुण्डीका रस कड़वा
होता है, इसलिये आस्वादनके समय वह सुखकर नहीं
होता। स्नेह और कृपाके पात्र लालनीय व्यक्तिके लिये
उनके सेव्य और पूज्य लालक-व्यक्तिसे गौरव और
वन्दना आदि सम्मानकी प्राप्ति भी वैसे ही असुखकर
होती है ॥ 163 ॥
सेवकको सेव्यके निजजन-मानकर प्रेमके
कारणरूप सम्बन्धकी अनुभूति; श्रीसनातनके
गम्भीर हृदयव्यथा-सूचक वचन :-
आजिह नहिल मोरे आत्मीयता-ज्ञान !
मोर अभाग्य, तुमि-स्वतन्त्र भगवान् ! !” 164 ॥
अनुवाद-आज तक आपने मुझे अपना आत्मीय
नहीं समझा। यह तो मेरा दुर्भाग्य ही है, क्योंकि आप
तो स्वतन्त्र भगवान् हैं !” 164 ॥
महाप्रभुकी लज्जा और श्रीसनातनके
प्रति सान्त्वना-वाक्य :-
शुनि' महाप्रभु किछु लज्जित हैला मने।
ताँरे सन्तोषिते किछु बलेन वचने ॥ 165 ॥
श्रीजगदानन्द और श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुकी
स्नेह-प्रीतिके वैशिष्ट्यका वर्णन; श्रीजगदानन्दके
प्रति तिरस्कारका कारण :-
“जगदानन्द प्रिय आमार नहे तोमा हैते।
मर्यादा-लङ्घन आमि ना पारों सहिते ॥ 166 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीकी बात सुनकर महाप्रभु
मन-ही-मन कुछ लज्जित हुए। फिर श्रीसनातन गोस्वामीको
सन्तुष्ट करनेके लिये कहने लगे, - “जगदानन्द मुझे

  • निर्गुण्डी अथवा सम्भालु अथवा सिन्दुवार पौधेमें एक
    साथ पाँच पत्तियाँ होती हैं और इसका स्वाद बहुत
    कसैला होता है। इसका प्रयोग औषधि बनानेमें होता
    है।

126 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/165-173 ]
तुमसे अधिक प्रिय नहीं है, किन्तु मैं मर्यादाका
उल्लङ्घन सहन नहीं कर पाता हूँ॥ 165-166॥
अनुभाष्य-जिसकी जो मर्यादा है, उस मर्यादाका
अतिक्रम करके स्वयंको गुरु मानकर अपने सम्माननीय
पात्रको परामर्श देनेके कार्यमें महाप्रभुने उत्साह प्रदान
नहीं किया, साथ ही, श्रीजगदानन्द जैसे आयुमें छोटे
व्यक्तिके वैसे व्यवहारका भी अनुमोदन नहीं किया॥ 166॥
दोनोंके गुणोंके वैशिष्ट्यका वर्णन :-
काँहा तुमि-प्रामाणिक, शास्त्रे प्रवीण!
काँहा जगा-कालिकार वटु नवीन!! 167॥
अनुवाद-कहाँ तो तुम शास्त्रमें प्रवीण प्रामाणिक
व्यक्ति हो, और कहाँ जगा कलका नया ब्राह्मण
है! 167॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनके गुण-गौरवकी स्तुति :-
आमाकेह बुझाइते तुमि धर शक्ति।
कत ठाञि बुझाञाछ व्यवहार-भक्ति॥ 168॥
अनुवाद-तुम तो मुझे भी परामर्श देनेकी शक्ति
रखते हो। तुमने तो मुझे कितने स्थानोंपर मर्यादाके
विषयमें बतलाया है॥ 168॥
अनुभाष्य-'कत ठाञिं',-मध्यलीला 1/222-224 संख्या
अथवा मध्यलीला 16/266 संख्या देखें; 'व्यवहार-भक्ति,'-
मर्यादा अथवा शिष्टाचार प्रदर्शन॥ 168॥
तोमारे उपदेश करे, ना याय सहन।
अतएव तारे आमि करिये भर्त्सन॥ 169॥
अनुवाद-जगा तुम्हें उपदेश प्रदान करे, यह मैं
सहन नहीं कर सकता, इसलिये मैंने उसकी भर्त्सना
की है॥ 169॥
भक्तके गुणोंसे आकृष्ट भगवान्‌का भक्तगुण-वर्णन :-
बहिरङ्ग-ज्ञाने तोमारे ना करि स्तवन।
तोमार गुणे स्तुति कराय यैछे तोमार गुण॥ 170॥
अनुवाद-मैं तुम्हें बाहरी व्यक्ति मानकर औपचारिक
रूपसे तुम्हारी स्तुति नहीं करता हूँ, तुम्हारे गुण ही ऐसे
हैं कि वे मुझसे तुम्हारा स्वाभाविक रूपसे गुणगान
करवाते हैं॥ 170॥
ममताके पात्र बहुतसे 'आश्रय' रहनेपर भी किसी विशेष
पात्रके प्रति 'विषय'की प्रीतिका वैशिष्ट्य :-
यद्यपि काहार 'ममता' बहुजने हय।
प्रीति-स्वभावे काँहा कोन भावोदय॥ 171॥
अनुवाद-यद्यपि किसीकी ममता बहुतसे लोगोंमें
होती है, किन्तु प्रीतिके तारतम्यके अनुसार उनके प्रति
पृथक्-पृथक् भाव उदित होता है॥ 171॥
अमानी भक्तके द्वारा दैन्यवशतः स्वयंको प्राकृत जीव
मानकर सुनीच समझनेपर भी वास्तवमें वह-चित्-दर्शनमें
भगवान्‌के द्वारा आलिङ्गित अप्राकृत ब्रह्मवस्तु :-
तोमार देह तुमि कर वीभत्स-ज्ञान।
तोमार देह आमारे लागे अमृत-समान॥ 172॥
अनुवाद-तुम अपनी देहको घृणित मानते हो,
किन्तु तुम्हारी देह मुझे अमृतके समान लगती है॥ 172॥
अप्राकृत देह तोमार प्राकृत कभु नय।
तथापि तोमार ताते प्राकृत-बुद्धि हय॥ 173॥
अनुवाद-तुम्हारी देह अप्राकृत है, वह कभी भी
प्राकृत नहीं हो सकती। तथापि तुम्हारी उसके प्रति
प्राकृत बुद्धि होती है॥ 173॥
अनुभाष्य-श्रीकृष्णोन्मुख भक्त अपने सुखकी प्राप्ति
रूपी भोग-वासनाकी तृप्तिके लिये किसी दैहिक
काम-आचरणको स्वीकार नहीं करते; वे श्रीकृष्णके
सुखके अभिलाषी होकर एकमात्र श्रीकृष्णप्रेम-सेवाके
उद्देश्यसे ही समस्त अप्राकृत भजनके अनुष्ठानोंको
किया करते हैं। कर्मीगण कर्मफलके भोगके आधार
प्राकृत-देहको नश्वर-फलभोगके उद्देश्यसे नियुक्त करते
हैं। भक्तोंकी वैसी चेष्टा नहीं है,-वे सब प्रकारसे सदैव

[ 4/173-174 चौथा अध्याय 127
हरिसेवाके उद्देश्यसे ही अपनी देहके अस्तित्वको
स्वीकार और समस्त प्रकारके दैहिक कार्योंके द्वारा
श्रीकृष्णकी सेवाका अनुष्ठान किया करते हैं। प्रकृतिके
प्रति अभिनिवेश-वशतः प्राकृत-फलभोग-कामनाके कारण
ही कर्मीकी देह-प्राकृत है। पुनः श्रीकृष्णसेवाकी
एकान्तिक निष्ठावशतः देहका अस्तित्व अथवा दैहिक-
क्रियादि सब कुछ ही श्रीकृष्णकी अप्राकृत-सेवापरायण
होनेके कारण भक्तकी चिन्मय देह अवश्य ही अप्राकृत
है। श्रीकृष्ण-विमुख कर्मीगण निज-भोग-तात्पर्यपरक
अपनी देहको प्राकृत मानते हैं, उसी प्रकार वे शुद्ध
भक्तोंकी देहको भी 'प्राकृत' मानते हैं। परन्तु शुद्धभक्त
और उनके दास उस प्रकार शुद्धभक्तोंकी देहको कभी
भी 'प्राकृत' नहीं समझते। अर्थात् वे चित् और अचित्,
अप्राकृत और प्राकृत, विधिके अतीत और विधिके
अधीन वस्तुको अथवा श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णसे इतर
मायाको 'समान' अथवा 'एक' मानकर कृत्रिम उदारता
अथवा निरपेक्षताके छलसे चित् और जड़ीय वस्तुके
समन्वयवाद (एक समान माननेवाले वाद)का आवाहन
करके कभी भी नामापराधी नहीं बनते। अपितु वे
शुद्धभक्तोंकी चिदानन्दमय देहको अप्राकृत-स्वरूप जानकर
श्रीकृष्णसेवाके उपयोगी समझते हैं।
उत्तमाधिकारी भक्त अपनी अनुभूतिको श्रीकृष्णप्रेम
रहित जानकर स्वयंको दरिद्र और प्राकृत जीव मानते
हैं। प्राकृत-सहजिया आदि अप-सम्प्रदायोंमें श्रीकृष्ण-
बहिर्मुख व्यक्ति मूर्खतावशतः अपनी प्राकृत देहको
'अप्राकृत वैष्णवदेह' मानकर शुद्ध वैष्णवोंके अप्राकृत
आचार अथवा भक्तिसे बहुत दूर जा पड़ते हैं। इसे
लक्ष्य करके ही लोक-शिक्षाके लिये ठाकुर भक्तिविनोदने
स्व-रचित 'कल्याण-कल्पतरु'-ग्रन्थमें लिखा है-
“आमि त' वैष्णव, ए बुद्धि हइले, अमानी ना हब आमि।
प्रतिष्ठाशा आसि' हृदय दूषिबे, हइब निरयगामी॥
निजे श्रेष्ठ जानि', उच्छिष्टादि-दाने, अभिमान हबे भार।
ताइ शिष्य तब, थाकिया सर्वदा, ना लइब पूजा कार॥”
[अर्थात् “ 'मैं वैष्णव हूँ'-मेरी ऐसी बुद्धि होनेपर
मैं कभी भी अमानी नहीं रह पाऊँगा और दूसरोंसे
प्रतिष्ठा पानेकी आशासे मेरा हृदय दूषित हो जायेगा,
जिसके फलस्वरूप मैं नरकगामी हो जाऊँगा। स्वयंको
श्रेष्ठ (गुरु) जानकर यदि मैं अपने उच्छिष्टादिको
दूसरोंको प्रदान करूँगा, तो मेरे ऊपर मिथ्या अभिमानका
भार आ जायेगा और उसके द्वारा मैं डूब जाऊँगा।
इसलिये हे वैष्णव ठाकुर ! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये
कि मैं सदा आपका शिष्य बनकर रहूँ और किसीसे
अपनी पूजा स्वीकार नहीं करूँ।”]
श्रीकृष्णराज गोस्वामीने भी लिखा है, (अन्त्यलीला
20/28 संख्यामें)-
“प्रेमेर स्वभाव-याँहा प्रेमेर सम्बन्ध।
सेइ माने कृष्णे मोर नाहि भक्तिगन्ध॥”
[अर्थात् “जहाँ श्रीकृष्णप्रेमका सम्बन्ध होता है, उस
प्रेमका स्वभाव ही ऐसा है कि भक्त यह मानता है कि
मुझमें श्रीकृष्णके प्रति भक्तिकी गन्ध भी नहीं है।”] ॥ 173 ॥
निर्गुण अप्राकृत-राज्यमें गौण अचित्-दर्शनसे उत्पन्न
मनोधर्मसुलभ जड़ीय विधि-निषेधके विचारका अभाव :-
'प्राकृत' हैलेह तोमार वपु नाहि उपेक्षिते।
भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि 'अप्राकृते' ॥ 174 ॥
अनुवाद-यदि तुम्हारी देह प्राकृत भी हो, तो भी
मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि अप्राकृत
स्वरूप मुझ संन्यासीमें भद्राभद्रका (भले और बुरेका)
कोई विचार होना उचित नहीं है॥ 174 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने श्रीसनातनसे कहा-तुम
वैष्णव हो, तुम्हारी देह अप्राकृत है, उसके प्रति
'भले-बुरे'की बुद्धि करना उचित नहीं है। उसपर भी
मैं संन्यासी हूँ, इसलिये यदि तुम्हारी देह प्राकृत भी
होती, तो भी मैं उसकी उपेक्षा नहीं कर पाता, क्योंकि
अप्राकृतस्वरूप संन्यासीके लिये भली-बुरी-वस्तुरूपी
ज्ञान रहना कभी भी उचित नहीं है ॥ 174 ॥

128 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/175-178 ]
गौण अचिद्-दर्शनसे उत्पन्न जड़ीय भेद-ज्ञानमूलक
मनोधर्ममें पवित्रता-अपवित्रता अथवा विधि-निषेध
सब कुछ ही एक समान और अवास्तव :-
श्रीमद्भागवत (11/28/4) में-
किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्।
वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥ 175 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- (अद्वयज्ञान कृष्णप्रतीतिके अतिरिक्त
उनसे भिन्न मायिक-प्रतीतिसे युक्त) द्वैत-वस्तुओंकी
अवास्तविकता-हेतु वाक्यके द्वारा उदित (कथित) और
मनके द्वारा ध्यान की गयीं (जो कुछ भी हैं, वे) सब
'नश्वर' हैं; अतएव उनमें भद्र और अभद्र कैसा?
(अर्थात् उनमें 'भद्र' अथवा 'अभद्र' ऐसा जड़ीय) भेद
तो है, किन्तु अद्वयज्ञान वस्तुकी प्रतीतिमें वैसा कुछ भी
नहीं है॥ 175 ॥
अनुभाष्य-भगवान् उद्धवजीको पहले विस्तारपूर्वक
वर्णित शुद्ध भगवद्-ज्ञान-वर्णनके प्रसङ्गमें अक्षज-दर्शनकी
[इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानकी] निन्दा कर रहे हैं-
[यतः] वाचा [यत्] उदितं (कथितं, चक्षुरादिभिश्च यत्
दृश्यं, यच्च) मनसा ध्यातः, तत् [सर्वम्] एव च अनृतं
(नश्वरं न सर्वकालसत्यम्; अतः) अवस्तुनः (अद्वयज्ञानेतर-
वस्तुनः पृथक्सत्त्वाभावेन वस्तुत्वेन स्वीकर्त्तुमशक्यस्य) द्वैतस्य
(प्रपञ्चस्य मध्ये) किं (कियत् किं परिमाणं) भद्रं, किं
(कियत्) वा अभद्रम्?
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥
श्लोकका सरल अर्थ :-
द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब-'मनोधर्म' ।
'एइ भाल, एइ मन्द',-एइ सब 'भ्रम' ॥ 176 ॥
अनुवाद-प्राकृत वस्तुमें भले और बुरेका ज्ञान
करना-यह सब मनोधर्म है। इसलिये यह कहना कि
यह अच्छा है, यह बुरा है-यह सब तो भ्रम है ॥ 176 ॥
अनुभाष्य-अद्वयज्ञान श्रीव्रजेन्द्रनन्दनमें अनश्वर-
सत्य नित्य ही विराजमान है। द्वितीय-अभिनिवेशके
कारण श्रीकृष्णसे भिन्न मायाके हाथमें पतित जीवके
अपने मङ्गल अथवा अमङ्गलके निर्णय आदि सभी
सङ्कल्प ही विकल्पात्मक मनके धर्म हैं। स्व-स्वरूप
और श्रीकृष्णको भूलकर जीवके भोक्ता-अभिमानसे
इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा भले-बुरेके विचारका प्रयास
अनेक प्रकारके भ्रम उत्पन्न करता है ॥ 176 ॥
श्रीमद्भगवद्गीता (5/18) में-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ 177 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 177 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो विद्या और विनयसे सम्पन्न
ब्राह्मणमें, चण्डालमें, गायमें, हाथीमें और कुत्तेमें समान
दृष्टिवाले हैं, वे ही पण्डित हैं ॥ 177 ॥
अनुभाष्य-
विद्या-विनयसम्पन्ने (विद्याविनयाभ्यां सम्पन्ने संयुक्ते
सर्वब्रह्मण्यविराजिते, न तु मूर्खे दुर्विनीते) ब्राह्मणे श्वपाके
(चण्डाले सर्वाधमे) गवि (पवित्रायां धेनौ) शुनि (अपवित्रे
कुक्कुरे) हस्तिनि (शुद्धाशुद्धविचार-रहिते गजे) पण्डिताः
(बन्धमोक्षविदः) समदर्शिनः (समं ब्रह्मैव द्रष्टुं शीलं येषां ते,
तुल्यबुद्धयः इत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-जो विद्या और विनयसे युक्त
समस्त ब्राह्मणोंमें देदीप्यमान (मूर्ख अथवा दुष्ट नहीं)-ऐसे
ब्राह्मणमें, सर्वाधम चण्डालमें, पवित्र गायमें, अपवित्र
कुत्तेमें और शुद्धि-अशुद्धिके विचारसे रहित हाथीमें
समानरूपमें ब्रह्मको देखनेवाले हैं अर्थात् सभीमें समबुद्धिवाले
हैं, वे (बन्धन और मोक्षको जाननेवाले) पण्डित
हैं॥ 177 ॥
युक्तवैरागी शुद्धभक्त गोस्वामीका ही सर्वत्र
कृष्ण-सम्बन्धके कारण समदर्शन :-
श्रीमद्भगवद्गीता (6/8) में-
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्र

[ 4/178-181 चौथा अध्याय 129
अनुवाद—जिनका चित्त ज्ञान और विज्ञानसे तृप्त
है, जो विकाररहित और जितेन्द्रिय हैं तथा मिट्टी, पाषाण
और स्वर्णमें समदर्शी हैं, वे योगारूढ़ पुरुष योगी
कहलाते हैं॥ 178॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो ज्ञान-विज्ञानके द्वारा परितृप्त
हैं, कूटस्थ अर्थात् चित्-स्वभावमें स्थित हैं, जितेन्द्रिय
हैं एवं मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णमें समान
बुद्धिवाले हैं, उन्हें ही 'योगी' अर्थात् 'योगारूढ़' कहा
जाता है॥ 178॥
चौथे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा (ज्ञानम् औपदेशिकं, 'विज्ञानम्'
अपरोक्षानुभवः, ताभ्यां तृप्तः निराकाङ्क्षः आत्मा चित्तं यस्य
सः अतः) कूटस्थः (एकेनैव स्वभावेन सर्वकालं व्याप्य
स्थितः निर्विकारः वा, अतएव) विजितेन्द्रियः (विजितानि
इन्द्रियाणि येन सः, अतएव) समलोष्ट्र
मृत्पिण्डपाषाणखण्ड-सुवर्णानि यस्य सः, लोष्ट्र
बुद्धिशून्यः इत्यर्थः) योगी युक्तः (योगारूढ़ः) उच्यते।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 178॥
जड़़ीय विधि-निषेधसे परे नैष्कर्म्यको प्राप्त संन्यासी अथवा
महाभागवतके लिये ही सर्वत्र विष्णुप्रतीतिके कारण जड़़ीय
भेदज्ञानसे उत्पन्न विषमता-रहित सुदर्शन :-
आमि त'-संन्यासी, आमार 'सम-दृष्टि' धर्म।
चन्दन-पङ्केते आमार ज्ञान हय 'सम'॥ 179॥
अनुवाद—मैं तो संन्यासी हूँ, सभीके प्रति सम-दृष्टि
रखना ही मेरा धर्म है। चन्दन तथा कीचड़में मेरा सम
ज्ञान है॥ 179॥
अनुभाष्य—सभी वस्तुओंके प्रति समदृष्टियुक्त होना
ही संन्यासी, पण्डित अथवा वैष्णवका धर्म है; क्योंकि
उनमें प्राकृत अभिनिवेश नहीं है। उनकी इन्द्रिय-तर्पणके
लिये चन्दनकी सुगन्धको ग्रहण करनेकी आसक्ति
अथवा इन्द्रियोंके सुखके लिये कीचड़की दुर्गन्धको
त्यागनेकी इच्छा नहीं है। युक्तवैराग्यशील 'वैष्णव' प्राकृत
वस्तुका ग्रहण और त्याग—इन दोनों प्रकारकी प्रवृत्तियोंके
दास होने अर्थात् उनके वशीभूत होनेके लिये अग्रसर
नहीं होते। वे प्राकृत भोग और त्याग, दोनोंके प्रति
उदासीन होकर सुदर्शन अथवा चित्-विलास-दर्शनसे
युक्त होते हैं॥ 179॥
अपने धर्मसे च्युत होनेकी आशङ्काके कारण
अप्राकृत-वैष्णवमें प्राकृत बुद्धि करनेका निषेध :-
एड् लागि' तोमा त्याग करिते ना युयाय।
घृणा-बुद्धि करि यदि, निज-धर्म याय॥"180॥
अनुवाद—इसलिये मैं तुम्हारा त्याग नहीं कर
सकता। यदि मैं तुम्हारे प्रति घृणा-बुद्धि करूँ, तो मेरा
अपना धर्म नष्ट होता है॥"180॥
अनुभाष्य—श्रीरूपप्रभु रचित उपदेशामृतका छठा
श्लोक—
“दृष्टैः स्वभावजनितैर्वपुषश्च दोषैः
न प्राकृतत्वमिह भक्तजनस्य पश्येत्।
गङ्गाम्भसां न खलु बुद्बुदफेनपङ्कै-
र्ब्रह्मद्रवत्वमपगच्छति नीरधर्मैः॥”
[अर्थात् “इस जगत्में अवस्थित भक्तजनोंमें नीचवर्ण,
कठोरता और आलस्यादि दिखायी पड़नेवाले स्वाभाविक
दोषोंके द्वारा अथवा कुरूपता और ज्वर आदि पीड़ाओंसे
विकृत दिखायी पड़नेवाले शारीरिक दोषोंके द्वारा भक्तजनोंका
प्राकृतत्व नहीं देखना चाहिये अर्थात् उन्हें प्राकृत जीव
नहीं समझना चाहिये, जैसे बुलबुलों, फेन और कीचड़
आदिके सम्बन्धसे गङ्गाजल जलधर्मको अङ्गीकार करके
भी अपना द्रवीभूत-ब्रह्म होनेका धर्म त्याग नहीं करता
अर्थात् अप्राकृत धर्म नहीं छोड़ता; वैसे ही आत्मस्वरूप
प्राप्त वैष्णवोंमें प्राकृत दोषोंका आरोप नहीं करना
चाहिये।]॥ 180॥
अमानी दोनों भक्तोंका महाप्रभुके द्वारा की
गयी प्रशंसाको अस्वीकार करना :-
हरिदास कहे,—“प्रभु, ये कहिला तुमि।
एइ 'बाह्य प्रतारणा', नाहि मानि आमि॥ 181 ॥

130 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/181–188 ]
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“हे महाप्रभो!
आपने हमें वैष्णव मानकर जो सब कहा है, मैं उसे
स्वीकार नहीं करता हूँ॥ 181 ॥
अनुभाष्य—'बाह्य प्रतारणा',—वैष्णव मानकर गौरव
पूर्ण स्तुति ॥ 181 ॥
स्वयंको दीन-मानकर दोनोंके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति :—
आमा-सब अधमे ये करियाछ अङ्गीकार।
दीनदयालु-गुण तोमार ताहाते प्रचार ॥” 182 ॥
अनुवाद—हम सब अधम हैं, परन्तु आपने हमें
अङ्गीकार किया है, क्योंकि आपमें दीनोंके प्रति दयालु
होनेका गुण है। इस बातको सारा जगत् जानता
है॥” 182 ॥
दोनोंके प्रति महाप्रभुके द्वारा यथार्थ
हृदयके भावको व्यक्त करना :—
प्रभु हासि' कहे,—“शुन, हरिदास, सनातन।
तत्त्व कहि तोमा-विषये आमार यैछे मन ॥ 183 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने मुस्कुराते हुए कहा,—“हे हरिदास!
हे सनातन ! मेरी बात सुनो। यथार्थमें मेरे मनमें तुम
दोनोंके प्रति जो भाव है, अब मैं उसके विषयमें
बतलाता हूँ॥ 183 ॥
भक्त और भगवान्‌का परस्पर व्यवहार :—
तोमारे 'लाल्य', आपनाके 'लालक'-अभिमान।
लालकेर लाल्ये नहे दोष-परिज्ञान ॥ 184 ॥
अनुवाद—मैं तुम दोनोंको अपना लालनीय
(लालन-पालनके योग्य) और स्वयंको लालक (दुलार
करनेवाला) मानता हूँ। लालक कभी भी लालनीयके
दोषोंपर ध्यान नहीं देता ॥ 184 ॥
अनुभाष्य—जो लालक होते हैं, वे लाल्य (लालनीय)के
प्रति वात्सल्यके कारण अपने लालनीयमें किसी दोषके
रहनेपर भी उसे समझ नहीं पाते ॥ 184 ॥
शुद्धभक्तवात्सल्य होनेके कारण सुदर्शनधारी
भगवान्में भक्तके दोष दर्शनका अभाव :—
आपणारे हय मोर अमान्य-समान।
तोमा सबारे करों मुञि बालक-अभिमान ॥ 185 ॥
अनुवाद—यद्यपि मैं स्वयंको सम्मानके अयोग्य
मानता हूँ, तथापि तुम सबको मैं अपने बालकके समान
मानता हूँ॥ 185 ॥
अनुभाष्य—मैं तुम्हारे गौरव अथवा सम्मान अर्थात्
पूजाका पात्र हूँ,—यह बात भक्तप्रेमवत्सल मेरे मनमें
नहीं रहती ॥ 185 ॥
मातार यैछे बालकेर 'अमेध्य' लागे गाय।
घृणा नाहि जन्मे, आर महासुख पाय ॥ 186 ॥
आत्मसात् किये अपने प्रिय श्रीसनातनको
महाप्रभुके द्वारा अपने समान मानना :—
'लाल्यामेध्य' लालकेर चन्दन-सम भाय।
सनातनेर क्लेदे आमार घृणा ना उपजाय ॥” 187 ॥
अनुवाद—माताको जैसे बालकके मल-मूत्र लगनेपर
भी उसमें घृणा उत्पन्न नहीं होती, अपितु महासुखकी
प्राप्ति होती है। जिस प्रकार लाल्यका मल-मूत्र
लालकको चन्दनकी भाँति लगता है, उसी प्रकार
सनातनके शरीरसे निकलनेवाली पीबके लगनेपर मुझमें
किसी प्रकारकी कोई घृणा उत्पन्न नहीं होती ॥” 186–187 ॥
अनुभाष्य—'लाल्यामेध्य',—लाल्यकी [मल-मूत्र] अपवित्र
वस्तु ॥ 187 ॥
विविध घटनाओंके द्वारा श्रीहरिदासके द्वारा महाप्रभुकी
अतुल कृपा और भक्तवात्सल्यका वर्णन :—
हरिदास कहे,—“तुमि ईश्वर दयामय।
तोमार गम्भीर हृदय बुझन ना याय ॥ 188 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“आप ईश्वर
हैं और हमारे प्रति दयामय हैं। आपके गम्भीर हृदयको
कोई नहीं समझ सकता ॥ 188 ॥

[ 4/189-193 चौथा अध्याय 131
कोढ़ग्रस्त वासुदेव ब्राह्मणकी घटना :-
वासुदेव—गलत्कुष्ठी, ताते अङ्ग—कीड़ामय।
तारे आलिङ्गन कैला हञा सदय ॥ 189 ॥
आलिङ्गिया कैला तार कन्दर्प-सम अङ्ग ।
बुझिते ना पारि तोमार कृपार तरङ्ग ॥" 190 ॥
अनुवाद-वासुदेव नामक एक ब्राह्मण थे जिनके
पूरे शरीरमें कोढ़का रोग था और उनके अङ्ग गल रहे
थे तथा उसपर उनके अङ्गोंमें कीड़े भी भरे हुए थे,
परन्तु आपने दयावान होकर उसे भी आलिङ्गन किया
था। आलिङ्गन करके आपने उसके अङ्गोंको कामदेवके
समान सुन्दर बना दिया था, मैं आपकी कृपाकी
तरङ्गको समझ नहीं पाता हूँ॥"189-190 ॥
अनुभाष्य- 'वासुदेवका गलित्कुष्ठ', - मध्यलीला
7/136-148 संख्या देखें; 'कीड़ामय', - कीड़ोंसे पूर्ण ॥ 189 ॥
महाप्रभुके द्वारा वैष्णवोंके अप्राकृत स्वरूपका वर्णन :-
प्रभु कहे,- "वैष्णव-देह 'प्राकृत' कभु नय।
'अप्राकृत' देह भक्तेर 'चिदानन्दमय' ॥ 191 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "वैष्णवकी देह कभी
भी 'प्राकृत' नहीं होती, भक्तोंकी 'अप्राकृत' देह चिदानन्दमय
होती है॥ 191 ॥
अनुभाष्य-श्रीगौरसुन्दरने अपने पदाश्रित जनोंको
यही समझाया कि कर्मी, ज्ञानी अथवा अन्याभिलाषी
व्यक्तियोंकी भोगमय जड़ानन्दयुक्त प्राकृत-देहकी भाँति
वैष्णवोंकी देह कभी भी भोगपरक प्राकृत नहीं है।
भक्त-देह-चिदानन्दमय अर्थात् श्रीकृष्णकी सेवाके उपयोगी
और प्रकृतिसे अतीत भावमय है, उसमें सच्चिदानन्दत्व
विराजित है॥ 191 ॥
वैष्णव विष्णुके द्वारा अङ्गीकार किये गये 'आश्रय'
होनेके कारण उनके अभिन्न चिद्विलास; गुरुके द्वारा
ब्राह्मण जानकर दीक्षित व्यक्तिकी अच्युतात्मता :-
दीक्षाकाले भक्त करे आत्मसमर्पण।
सेइकाले कृष्ण तारे करे आत्मसम ॥ 192 ॥
दीक्षित अथवा भगवत्-सम्बन्धज्ञान प्राप्त ब्राह्मणोंका ही
अभिधेय विष्णुभक्तियोगमें वैष्णव कहलाना, इसलिये
वैष्णवतामें ब्राह्मणता ग्रथित :-
सेइ देह करे तार चिदानन्दमय।
अप्राकृत-देहे ताँर चरण भजय ॥ 193 ॥
अनुवाद-दीक्षाके समय भक्त आत्मसमर्पण करता
है, उसी समयसे ही श्रीकृष्ण उसे अपने समान मानकर
उसे स्वीकार कर लेते हैं। जब श्रीकृष्ण भक्तकी उसी
देहको ही चिदानन्दमय बना देते हैं, तब भक्त अपनी
अप्राकृत देहसे श्रीकृष्णके चरणकमलोंका भजन करता
है॥ 192-193 ॥
अनुभाष्य-दीक्षाके समय भक्त अपनी प्राकृत-
अनुभूतियोंको समर्पित करके अप्राकृत-सम्बन्धज्ञानसे
युक्त होते हैं। अप्राकृत दिव्यज्ञान प्राप्त करके वे
अप्राकृत स्वरूपमें श्रीकृष्णकी सेवाके अधिकारको प्राप्त
करते हैं। श्रीकृष्णसे भिन्न मायाके आश्रयको त्याग
करनेपर ही श्रीकृष्ण शरणागत भक्तको आत्मसात् करते
हैं। तब उनका मायिक जगत्के 'भोक्ता' होनेका जड़ीय
अभिमान दूर होता है और उन्हें अपने शुद्ध अभिमानमें
नित्य-कृष्णदास्य-स्फूर्तिकी प्राप्ति होती है। तब भक्त
सच्चिदानन्दमय अपने स्वरूपमें नित्य-सेवक-विग्रह होनेकी
उपलब्धि करके अप्राकृत देहमें श्रीकृष्णचन्द्रकी सेवाके
अधिकारी होते हैं। भक्तकी तत्कालोचित अप्राकृत-देहके
द्वारा अप्राकृत-भावसे की गयी सेवाको भी प्राकृत-बुद्धिके
दोषके कारण कर्मीगण अपनी ही भाँति भोगपरायण
प्राकृत-कर्मानुष्ठान समझते हैं; इसी अपराधके फलस्वरूप
वे अप्राकृत-गुरुकी कृपाकी प्राप्तिसे वञ्चित हो जाते
हैं। इस सम्बन्धमें बृहद्भागवतामृतमें 1/3/45 एवं 2/3/139
संख्यामें श्रीसनातनप्रभुका विचार इस प्रकार है-
(बृहद्भागवतामृतमें 1/3/45में श्रीनारदके प्रति
श्रीशिव-वाक्य)-
तत्र ये सच्चिदानन्ददेहाः परमवैभवम्।
संप्राप्तं सच्चिदानन्दं हरेर्साङ्घ्रिंश्च नाभजन्॥

132 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/193-198 ]
[अर्थात् "उस वैकुण्ठलोकमें जो वास करते हैं,
उन सभीकी सच्चिदानन्द देह है। वे उस स्थानमें
रहनेपर भी सच्चिदानन्दमय परम वैभव स्वरूप श्रीहरिके
समान ऐश्वर्यको प्राप्तकर उस वैभवका तनिक भी
आदर नहीं करते।"]
(बृहद्भागवतामृतमें 2/3/139में श्रीगोपकुमारके प्रति
भगवद्-पार्षदोंका वाक्य)—
भक्तानां सच्चिदानन्दरूपेष्वङ्गेन्द्रियात्मसु।
घटते स्वानुरूपेषु वैकुण्ठेऽन्यत्र च स्वतः॥
[अर्थात् "भक्त वैकुण्ठमें वास करें अथवा अन्य
किसी स्थानपर, उनकी सच्चिदानन्दघनरूपा भक्तिके
अनुरूप सच्चिदानन्दरूप देह-इन्द्रियादि स्वतः ही प्रकाशित
होती हैं।"] ॥193॥
श्रीमद्भागवत (11/29/34) में—
मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा
निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे।
तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो
मयात्मभूयाय च कल्पते वै॥194॥
अनुवाद—मरणशील जीव जब समस्त कर्मोंका
परित्याग करके स्वयंको मेरे (भगवान्के) प्रति सम्पूर्णरूपसे
निवेदन करके मेरी इच्छासे क्रिया करता है, तब वह
अमृतत्वको (मोक्षको) प्राप्त करता है। इस प्रकार वह
मेरे साथ मेरे समान चित्स्वरूप रस-भोग करनेके योग्य
होता है॥194॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 22/100 संख्या देखें॥194॥
प्राकृत अक्षजदर्शन और सम्पूर्ण श्रीकृष्णकी
इच्छासे परिचालित अप्राकृत वैष्णवाचार :-
सनातनेर देहे कृष्ण कण्डु उपजाञा।
आमा परीक्षिते इँहा दिला पाठाञा॥195॥
अनुवाद—श्रीकृष्णने सनातनकी देहमें पीबको उत्पन्न
करके उसे मेरी परीक्षाके लिये यहाँ भेजा है॥195॥
मर्त्यबुद्धिसे गुणातीत गुरु-वैष्णवोंके किसी प्रकारके
दोषदर्शनसे अपराध होनेके कारण नरककी प्राप्ति :-
घृणा करि' आलिङ्गन ना करिताम यबे।
कृष्ण-ठाञि अपराधी हइताम तबे॥196॥
अनुवाद—मैं यदि घृणा करके सनातनको आलिङ्गन
नहीं करता, तब मैं कृष्णके प्रति अपराधी बनता॥196॥
भगवत्पार्षद गुरु-वैष्णव-गौण इन्द्रिय
धर्मसे अतीत वैकुण्ठ-वस्तु :-
पारिषद-देह एइ, ना हय दुर्गन्ध।
प्रथम दिवसे पाइलुँ चतुःसम-गन्ध॥"197॥
अनुवाद—सनातन तो कृष्णका पार्षद है, उसकी
पार्षद-देहमें दुर्गन्ध हो ही नहीं सकती। पहले दिन ही
आलिङ्गन करते समय मुझे सनातनकी देहसे चतुःसमकी
सुगन्ध प्राप्त हुई थी॥"197॥
अनुभाष्य—पारिषद-देह ही श्रीकृष्णसेवामय देह है;
प्राकृत भोगपरायण मनके द्वारा चलायमान नाकके द्वारा
महाभागवत परमहंसकुलचूड़ामणि श्रीसनातन गोस्वामीकी
देह दुर्गन्धयुक्त जैसे प्रतीत होनेपर भी स्वयं महाप्रभु कह
रहे हैं कि,—'कृष्णसेवापरायणताके कारण सनातनकी
इस अप्राकृत पारिषद-देहमें मुझे पहले दिन ही चतुःसम
अर्थात् चन्दन, कर्पूर अथवा अगरु, कस्तूरी और
कुङ्कुम मिश्रित द्रव्यकी गन्ध आयी थी।' चतुःसम,–(गरुड़
पुराणमें)—
“कस्तूरिकाया द्वौ भागौ चत्वारश्चन्दनस्य तु।
कुङ्कुमस्य त्रयश्चैकः शशिनः स्यात् चतुःसमम्॥”
अर्थात् “दो भाग कस्तूरी, चार भाग चन्दन, तीन
भाग कुङ्कुम अथवा केसर और एक भाग शशी अर्थात्
कर्पूर एकत्रित करके 'चतुःसम'-नामक सुगन्धित द्रव्य
बनता है।" हरिभक्तिविलासमें 6/115 संख्या देखें॥197॥
महाप्रभुके आलिङ्गन-स्पर्शसे श्रीसनातनके
अङ्गोंकी सुगन्ध :-
वस्तुतः प्रभु यबे कैला आलिङ्गन।
ताँर स्पर्शे गन्ध हैल चन्दनेर सम॥198॥

[ 4/198–207 चौथा अध्याय 133
अनुवाद—वास्तवमें महाप्रभुने जब पहले दिन श्रीसनातन
गोस्वामीको आलिङ्गन किया था, उन्हींके स्पर्शसे श्रीसनातनके
शरीरकी गन्ध चन्दन जैसी हो गयी थी ॥ 198 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको सान्त्वना देना,
श्रीसनातनके स्पर्शसे महाप्रभुको सुख :—
प्रभु कहे,—“सनातन, ना मानिह दुःख।
तोमार आलिङ्गने आमि पाइ बड़ सुख ॥ 199 ॥
उस वर्ष श्रीसनातनको अपने निकट रखनेके बाद अगले
वर्ष वृन्दावन जानेकी आज्ञा प्रदान :—
एइ–वत्सर तुमि इँहा रह आमा–सने।
वत्सर रहिं' तोमारे आमि पाठाइमु वृन्दावने ॥"200 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन ! तुम दुःखी
मत होओ, तुम्हें आलिङ्गन करके मुझे बहुत अधिक
सुखकी प्राप्ति होती है। तुम इस वर्ष यहाँ मेरे पास
रहो। एक वर्ष यहाँ रहनेके बाद मैं तुम्हें वृन्दावन भेज
दूँगा॥" 199–200 ॥
महाप्रभुके आलिङ्गन-स्पर्शके फलसे
श्रीसनातनकी देहकी स्वर्णकान्ति :—
एत बलि' पुनः ताँरे कैला आलिङ्गन।
कण्डु गेल, अङ्ग हैल सुवर्णेर सम ॥ 201 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने पुनः श्रीसनातन
गोस्वामीको आलिङ्गन किया। श्रीसनातन गोस्वामीकी
देहसे खाज-पीब नष्ट हो गये और उनके सभी अङ्ग
स्वर्णकी भाँति उज्ज्वल हो गये ॥ 201 ॥
ऐसा देखकर श्रीहरिदासका विस्मय और सम्पूर्णरूपसे
महाप्रभुकी इच्छासे परिचालित श्रीसनातनकी देहमें
जड़ेन्द्रियोंसे दिखलायी देनेवाले खाज-पीबके कष्टको
प्रदर्शित करनेकी लीलाके वास्तविक मर्मार्थका वर्णन :—
देखि' हरिदास मने हैल चमत्कार।
प्रभुरे कहेन, —“एइ भङ्गी ये तोमार ॥ 202 ॥
सेइ झारिखण्डेर पानी तुमि खाओआइला।
सेइ पानी–लक्ष्ये इँहार कण्डु उपजिला ॥ 203 ॥
कण्डु करि' परीक्षा कराइले सनातने।
एइ लीला–भङ्गी तोमार केह नाहि जाने ॥" 204 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीकी देहमें परिवर्तनको
देखकर श्रीहरिदास ठाकुरके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ।
श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुसे कहा, —“यह आपकी
लीला है। आपने ही सनातनको झारिखण्डके जलका
पान कराया तथा उसी जलके द्वारा इनकी देहमें
खाज-पीबको उत्पन्न कराया। खाज-पीब उत्पन्न कराके
आपने ही सनातनकी परीक्षा ली। आपकी इस लीलाकी
रीतिको कोई नहीं जान सकता ॥”202–204 ॥
अनुभाष्य—'पानी-लक्ष्ये',—झारिखण्डके पानीय जलको
उपलक्ष्य करके ॥ 203 ॥
महाप्रभुका प्रस्थान और दोनों भक्तोंके द्वारा
भगवान्की कृपापर विचार :—
दुँहे आलिङ्गिया प्रभु गेला निजालय।
प्रभुर गुण कहे दुँहे हञा प्रेममय ॥ 205 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामी,
उन दोनोंको आलिङ्गन करके महाप्रभु अपने वासस्थानपर
लौट गये। वे दोनों प्रेममय होकर महाप्रभुके गुणोंका
गान करने लगे ॥ 205 ॥
प्रतिदिन श्रीसनातनके द्वारा श्रीहरिदासके
साथ महाप्रभुकी कथाकी चर्चा :—
एइमत सनातन रहे प्रभु–स्थाने।
कृष्णचैतन्य–गुण–कथा हरिदास–सने ॥ 206 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके
आश्रयमें श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे। उनकी श्रीहरिदास ठाकुरके
साथ निरन्तर श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके गुणोंकी चर्चा
चलती रहती ॥ 206 ॥
दोलयात्राके बाद श्रीसनातनको वृन्दावन भेजना :—
दोलयात्रा देखि' प्रभु ताँरे विदाय दिला।
वृन्दावने ये करिबेन, सब शिखाइला ॥ 207 ॥

134 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/207-215 ]
अनुवाद-दोलयात्राके दर्शन करनेके पश्चात् महाप्रभुने
श्रीसनातनको वृन्दावनमें जाकर उनको क्या-क्या करना
है, वह सब सिखलाकर विदायी दी ॥ 207 ॥
विदायीके समय भक्त और भगवान्‌का
तीव्र विरह-दुःख :-
ये-काले विदाय हैला प्रभुर चरणे।
दुइजनार विच्छेद-दशा ना याय वर्णने ॥ 208 ॥
अनुवाद-जिस समय श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके
चरणकमलोंसे विदा हुए, उस समय उन दोनोंकी कैसी
विच्छेद-दशा हुई उसका वर्णन करना सम्भव नहीं
है ॥ 208 ॥
महाप्रभुके पथका अनुगमन करते हुए वृन्दावन-यात्रा :-
येइ वन-पथे प्रभु गेला वृन्दावन।
सेइपथे याइते मन कैला सनातन ॥ 209 ॥
अनुवाद-जिस वनमार्गसे महाप्रभु वृन्दावन गये थे,
श्रीसनातन गोस्वामीने भी उसी मार्गसे वृन्दावन जानेकी
इच्छा की ॥ 209 ॥
बलभद्रसे जानेवाले मार्गकी सूचना सङ्कलित करना :-
ये-पथे, ये-ग्राम-नदी-शैल, याँहा येइ लीला।
बलभद्रभट्ट-स्थाने सब लिखि' निला ॥ 210 ॥
अनुवाद-जिस मार्गपर, जिस ग्राममें, जिस नदीमें,
जिस पर्वतपर-महाप्रभुने जहाँपर जो-जो लीला की थी,
श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीबलभद्र भट्टाचार्यसे पूछकर सब
लिख लिया ॥ 210 ॥
मार्गमें भक्तोंके साथ मिलनके बाद यात्रा :-
महाप्रभुर भक्तगणे सबारे मिलिया।
सेइपथे चलि' याय से-स्थान देखिया ॥ 211 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके समस्त
भक्तोंसे मिले तथा तत्पश्चात् महाप्रभु जिस मार्गसे गये
थे, उस मार्गपर चलते हुए उन्होंने उन स्थानोंके दर्शन
किये जहाँ महाप्रभुने अद्भुत लीलाएँ कीं थीं ॥ 211 ॥
महाप्रभुके लीला-स्थानोंके दर्शनसे
श्रीसनातनमें प्रेमावेश :-
ये-ये-लीला प्रभु पथे कैला ये-ये-स्थाने।
ताहा देखि' प्रेमावेश हय सनातने ॥ 212 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने जो-जो लीला जिस-जिस स्थानपर
की थी, उस उस स्थानको देखकर श्रीसनातन गोस्वामी
प्रेममें आविष्ट हो गये ॥ 212 ॥
पहले श्रीसनातनका, बादमें श्रीरूपका
वृन्दावनमें आगमन :-
एमते सनातन वृन्दावने आइला।
पाछे आसि' रूप-गोसाञि ताँहारे मिलिला ॥ 213 ॥
अनुवाद-इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी श्रीवृन्दावन
आ गये। बादमें श्रीरूप गोस्वामी भी वृन्दावनमें आकर
उनसे मिले ॥ 213 ॥
श्रीरूपके वृन्दावन आगमनमें विलम्बका कारण :-
एकवत्सर रूपगोसाञिर गौड़े विलम्ब हैल।
कुटुम्बरे 'स्थिति'-अर्थ विभाग करि' दिल ॥ 214 ॥
अनुवाद-उनके परिवारवालोंको कोई असुविधा न
हो, इसलिये श्रीरूप गोस्वामीने भू-सम्पत्ति और अर्थका
विभाजन करके उन्हें प्रदान किया। इस कार्यके लिये
वे गौड़देशमें एक वर्ष रहे और उनको वृन्दावन जानेमें
विलम्ब हुआ ॥ 214 ॥
अनुभाष्य- 'स्थिति-अर्थ', - भू-सम्पत्ति और अर्थ
अथवा सञ्चित धन। [श्रीरूप गोस्वामीने] चल और
अचल सम्पत्तिको कुटुम्बियोंके बीच उनकी योग्यताके
अनुसार विभाजित कर दिया ॥ 214 ॥
गौड़े ये अर्थ छिल, ताहा आनाइला।
कुटुम्ब-ब्राह्मण-देवालये बाँटि दिला ॥ 215 ॥
अनुवाद-गौड़देशमें जिस स्थानपर उनका जो भी

[ 4/215-221 चौथा अध्याय 135

धन था, श्रीरूप गोस्वामीने वहाँसे एकत्रित करके उसे
अपने कुटुम्बियों, ब्राह्मणों और मन्दिरोंमें विभाजित कर
दिया ॥ 215 ॥
नित्यसिद्धकुलशिरोमणि श्रीरूपके द्वारा विषय-विभाग करनेके
बाद निश्चिन्त मनसे व्रजवास तथा अनर्थयुक्त साधकका
गृहव्रत-बुद्धिसे उत्पन्न जनशैथिल्य 'एक' नहीं :-
सब मनःकथा गोसाञि करि' निर्वाण।
निश्चिन्त हञा शीघ्र आइला वृन्दावन ॥ 216 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने अपने मनमें जिन सब
कार्योंका सङ्कल्प किया था, उन्हें पूर्ण करके वे
निश्चिन्त होकर शीघ्र वृन्दावन लौट आये ॥ 216 ॥
अनुभाष्य—'मनःकथा',—जो-जो उनकी इच्छा
थी ॥ 216 ॥
दोनों भाइयोंका व्रजवास और महाप्रभुकी
चार प्रकारकी आज्ञारूपी सेवाका पालन :-
दुइ भाइ मिलि' वृन्दावने वास कैला।
प्रभुर ये आज्ञा, दुँहे सब निर्वाहिला ॥ 217 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामी—ये
दोनों भाई वृन्दावनमें मिले और वहाँ वास करके
महाप्रभुने जो आज्ञा दी थी, उसका उन दोनोंने
सम्पूर्णरूपसे पालन किया ॥ 217 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 1/31-45 संख्या और अनुभाष्य
एवं भक्तिरत्नाकर प्रथम तरङ्ग देखें ॥ 217-231 ॥
नाना शास्त्र आनि' लुप्त-तीर्थ उद्धारिला।
वृन्दावने कृष्णसेवा प्रकाश करिला ॥ 218 ॥
अनुवाद—उन दोनोंने अनेक शास्त्रोंको एकत्रित
करके उन्हींके आधारपर लुप्त तीर्थोंका पुनः प्रकाश
किया। इस प्रकार उन्होंने वृन्दावनमें मन्दिरोंकी स्थापना
करके श्रीकृष्णकी सेवाको प्रकाशित किया ॥ 218 ॥
अनुभाष्य—'नाना शास्त्र',—भक्तिरत्नाकर ग्रन्थमें इन
समस्त शास्त्रोंकी प्रमाणावली उद्धृत हुई है। वृन्दावनमें
श्रीरूप गोस्वामीने श्रीगोविन्दकी सेवा एवं श्रीसनातन
गोस्वामीने श्रीमदनमोहनकी सेवाको प्रकाशित किया ॥ 218 ॥
श्रीसनातनके द्वारा ग्रन्थ-रचनादि कार्य :-
सनातन ग्रन्थ कैला 'भागवतामृते' ।
भक्त-भक्ति-कृष्ण-तत्त्व जानि याहा हैते ॥ 219 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने 'बृहद्भागवतामृत' नामक
ग्रन्थकी रचना की। इस ग्रन्थके द्वारा भक्त, भक्ति तथा
कृष्णतत्त्वके विषयमें जाना जा सकता है ॥ 219 ॥
अनुभाष्य—'भागवतामृत',—बृहद्भागवतामृत; मध्यलीला
1/35 संख्या देखें ॥ 219 ॥
सिद्धान्तसार ग्रन्थ कैला 'दशम-टिप्पणी' ।
कृष्णलीलारस-प्रेम याहा हैते जानि ॥ 220 ॥
अनुवाद—उन्होंने सिद्धान्तके सार-स्वरूप 'दशम-
टिप्पणी' अर्थात् श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धकी
बृहद्-वैष्णवतोषणी-टीकाकी रचना की जिसके द्वारा
हम श्रीकृष्णलीलारस तथा प्रेमके विषयमें जान सकते
हैं ॥ 220 ॥
अनुभाष्य—'दशम-टिप्पणी',—बृहद्वैष्णवतोषणी
टीका ॥ 220 ॥
'हरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ कैला वैष्णव-आचार।
वैष्णवेर कर्त्तव्य याँहा पाइये पार ॥ 221 ॥
अनुवाद—उन्होंने हरिभक्तिविलास नामक ग्रन्थकी
रचना की, जिसके द्वारा वैष्णवोंके आचारको समझा जा
सकता है और वैष्णवोंके कर्त्तव्योंको पूर्णरूपमें जाना
जा सकता है ॥ 221 ॥
अनुभाष्य—'हरिभक्तिविलास',—इस ग्रन्थका बादमें
श्रीमद्गोपाल-भट्ट-गोस्वामी प्रभुने श्रील सनातन-गोस्वामी
प्रभुके द्वारा संगृहीत 'दिग्दर्शिनी-टीका' सहित सङ्कलन
किया। कोई-कोई जिज्ञासा करते हैं कि कर्मी स्मार्त्तगणोंने
'हरिभक्तिविलास'में उद्धृत सात्वत शास्त्रोंके मतको ग्रहण
नहीं करके उन-उन शास्त्रोंसे ही किस प्रकार अन्य

136 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 4/221-229 ]
मतोंकी कल्पना की? उसका उत्तर यह है कि
हरिभक्तिविलासका मत शास्त्र-सम्मत और पूर्ण विशुद्ध
होनेपर भी कर्मी लोग शुद्ध शास्त्रीय मतको त्याग
करके केवलमात्र अपने-अपने प्राकृत-अशुद्ध विष्णुभक्ति
विरोधी मतोंके प्रमाणोंको ही स्वीकार करते हैं।
मध्यलीला 1/35 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 221 ॥
आर यत ग्रन्थ कैला, ताहा के करे गणन।
'मदनगोपाल-गोविन्देर सेवा'-प्रकाशन ॥ 222 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने अन्य जितने ग्रन्थोंकी
रचना की, उनकी गणना कौन कर सकता है? ये ग्रन्थ
श्रीमदनगोपाल-श्रीगोविन्ददेवकी सेवाकी पद्धतिको प्रकाशित
करते हैं ॥ 222 ॥
श्रीरूपका ग्रन्थ-रचना आदि कार्य :-
रूप-गोसाञि कैला 'रसामृतसिन्धु' सार।
कृष्णभक्ति-रसेर याँहा पाइये विस्तार ॥ 223 ॥
अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसके सारस्वरूप
'भक्तिरसामृतसिन्धु' ग्रन्थकी रचना की, जिसमें कृष्णभक्तिरसका
विस्तारसे वर्णन प्राप्त होता है ॥ 223 ॥
अनुभाष्य- 'रसामृतसिन्धु',- भक्तिरसामृतसिन्धु;
उज्ज्वलनीलमणि, विदग्धमाधव और ललितमाधव-
मध्यलीला 1/38 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 223 ॥
'उज्ज्वलनीलमणि'-नाम ग्रन्थ आर।
राधाकृष्ण-लीलारस ताँहा पाइये पार ॥ 224 ॥
अनुवाद-उन्होंने उज्ज्वलनीलमणि नामक एक और
ग्रन्थकी रचना की जिसके द्वारा श्रीराधाकृष्णकी लीलाओंके
रसको पूर्णरूपसे समझा जा सकता है ॥ 224 ॥
'विदग्धमाधव', 'ललितमाधव',-नाटकयुगल।
कृष्णलीला-रस ताँहा पाइये सकल ॥ 225 ॥
अनुवाद-उन्होंने विदग्धमाधव तथा ललितमाधव
नामक दो नाटकोंकी रचना भी की जिसके द्वारा
कृष्णलीला-रसको सम्पूर्ण रूपसे समझा जा सकता
है ॥ 225 ॥
'दानकेलिकौमुदी' आदि लक्षग्रन्थ कैल।
सेइ सब ग्रन्थे व्रजेर रस विचारिल ॥ 226 ॥
अनुवाद-उन्होंने दानकेलि-कौमुदी आदि ग्रन्थोंमें
एक लाख श्लोकोंकी रचना की। उन्होंने उन समस्त
ग्रन्थोंमें व्रजरसकी ही विस्तृत व्याख्या की है ॥ 226 ॥
अनुभाष्य- 'लक्षग्रन्थ',-श्रीरूप-रचित ग्रन्थसमूहमें प्राय
एक लाख श्लोक हैं; पद्यकी संख्याके अतिरिक्त गद्यकी
गणना करनेकी भी प्रणाली है। लिपिकार अपने-अपने
परिश्रमके परिमाणके निर्णयके समय गद्य और पद्यके
श्लोकग्रन्थ (अर्थात् श्लोकों)की संख्याकी गणना करते
हैं। कोई भ्रममें पड़कर ऐसा न सोचे कि श्रीरूप प्रभुने
एक लाख पुस्तकोंकी रचना की थी। भक्तिरत्नाकरकी
प्रथम तरङ्गमें- “श्रीरूप-गोस्वामी ग्रन्थ षोड़श करिल।”
[अर्थात् श्रीरूप गोस्वामीने सोलह ग्रन्थोंकी रचना की।]
आदिलीला 10/84 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 226 ॥
श्रीजीवका परिचय और ग्रन्थ-रचनादि-कार्य :-
ताँर लघुभ्राता-श्रीवल्लभ-अनुपम।
ताँर पुत्र महापण्डित-श्रीजीव-नाम ॥ 227 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीके
छोटे भाई श्रीवल्लभ अथवा अनुपमके पुत्र श्रीजीव
गोस्वामी महापण्डित थे ॥ 227 ॥
सर्व त्यजि' तँहो पाछे आइला वृन्दावन।
तँह भक्तिशास्त्र बहु कैला प्रचारण ॥ 228 ॥
अनुवाद-सब कुछ त्यागकर श्रीजीव गोस्वामी भी
श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीके पीछे वृन्दावनमें
आये। उन्होंने भी अनेक भक्तिशास्त्रोंकी रचना की और
उनका प्रचार किया ॥ 228 ॥
'भागवत-सन्दर्भ'-नाम कैला ग्रन्थ-सार।
भागवत-सिद्धान्तेर ताँहा पाइये पार ॥ 229 ॥

[ 4/229-237 चौथा अध्याय 137

[बायाँ स्तम्भ]
अनुवाद—श्रीजीव गोस्वामीने 'भागवत-सन्दर्भ' नामक
ग्रन्थकी रचना की जो समस्त शास्त्रोंका सार है। उसके
द्वारा भक्ति और भगवान्के तत्त्वका पूर्ण ज्ञान प्राप्त
होता है॥ 229॥
अनुभाष्य—'भागवत-सन्दर्भ',—इसका दूसरा नाम
'षट्सन्दर्भ' है; मध्यलीला 1/43 संख्याका अनुभाष्य
देखें॥ 229॥
'गोपालचम्पू' आर नाना ग्रन्थ कैला।
व्रज-प्रेम-लीला-रससार देखाइला॥ 230॥
अनुवाद—उन्होंने गोपालचम्पू और अन्य अनेक
ग्रन्थोंकी रचना की, जिनमें उन्होंने व्रज-प्रेम-लीला-रसके
सारको प्रदर्शित किया॥ 230॥
'षट्सन्दर्भे' कृष्णप्रेम-तत्त्व प्रकाशिला।
चारिलक्ष ग्रन्थ तैं हो विस्तार करिला॥ 231॥
अनुवाद—उन्होंने 'षट्सन्दर्भ'में कृष्णप्रेमतत्त्वको
प्रकाशित किया, इस प्रकार उन्होंने कुल मिलाकर चार
लाख श्लोकोंमें इन समस्त तत्त्वोंकी व्याख्या की॥ 231॥
श्रीजीवगोस्वामीका पूर्व-वृत्तान्त; मथुरा जानेसे पहले
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा और आज्ञाकी प्राप्ति :-
जीव-गोसाञि गौड़ हैते मथुरा चलिला।
नित्यानन्दप्रभु-ठाञि आज्ञा मागिला॥ 232॥
अनुवाद—श्रीजीव गोस्वामी जब गौड़देशसे मथुराकी
ओर जाना चाह रहे थे, तब उन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे
आज्ञा माँगी॥ 232॥
प्रभु प्रीत्ये ताँर माथे धरिला चरण।
रूप-सनातन-सम्बन्धे कैला आलिङ्गन॥ 233॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने प्रसन्न होकर
श्रीरूप-सनातन गोस्वामीके सम्बन्धसे श्रीजीव गोस्वामीके
सिरपर अपने चरणकमल रखे और उनका आलिङ्गन
किया॥ 233॥

[दायाँ स्तम्भ]
श्रीसनातनसे युक्त श्रीरूपानुग गणोंका
ही वृन्दावन-वासमें अधिकार :-
आज्ञा दिला, —"शीघ्र तुमि याह वृन्दावने।
तोमार वंशे प्रभु दियाछेन सेइस्थाने॥" 234॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीजीव गोस्वामीको
आज्ञा दी,—"तुम शीघ्र वृन्दावन जाओ, महाप्रभुने
तुम्हारे वंशको वही स्थान प्रदान किया है॥" 234॥
श्रीनित्यानन्दकृपा और आज्ञा-प्राप्तिके
फलस्वरूप श्रीजीवका आचार्यत्व :-
ताँर आज्ञाय आइला, आज्ञा-फल पाइला।
शास्त्र करि' कतकाल 'भक्ति' प्रचारिला॥ 235॥
अनुवाद—श्रीजीव गोस्वामी श्रीनित्यानन्द प्रभुसे आज्ञा
प्राप्तकर वृन्दावनमें आये। वहाँ उन्हें उस आज्ञाके
फलकी प्राप्ति हुई अर्थात् उन्होंने बहुत समय तक
वृन्दावनमें रहकर अनेक शास्त्रोंकी रचना की और
भक्तिका प्रचार किया॥ 235॥
ग्रन्थकारके तीन शिक्षागुरु :-
एइ तिनगुरु, आर रघुनाथदास।
इँहा-सबार चरण वन्दौँ, याँर मुञि 'दास'॥ 236॥
अनुवाद—मैं इन तीन गुरुओं (श्रीसनातन गोस्वामी,
श्रीरूप गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी) तथा श्रीरघुनाथदास
गोस्वामीके चरणोंकी वन्दना करता हूँ, मैं इन सबका
दास हूँ॥ 236॥
अनुभाष्य—'एइ तिनगुरु',—(1) श्रीरूप, (2) श्रीसनातन
और (3) श्रीजीव-गोस्वामी प्रभु॥ 236॥
चौथे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभु-श्रीसनातन-मिलन-संवादको सुनकर महाप्रभुके द्वारा
दी गयी लोकशिक्षाके अभिप्रायका अनुभव :-
एइ त' कहिलुँ पुनः सनातन-सङ्गमे।
प्रभुर आशय जानि याहार श्रवणे॥ 237॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास