श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2142, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 4/159–166 चौथा अध्याय 125
श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुकी प्रचुर
कृपा-गौरवपूर्ण उक्ति :-
व्यवहारे-परमार्थे तुमि-तार गुरुतुल्य।
तोमारे उपदेश करे, ना जाने आपन-मूल्य ?? 159 ॥
अनुवाद-व्यवहारमें हो अथवा परमार्थमें हो, इन
दोनों विषयोंमें तुम उसके गुरुके समान हो। वह अपने
मूल्यको नहीं जानकर तुम्हें उपदेश देता है ? 159 ॥
आमार उपदेष्टा तुमि-प्रामाणिक आर्य।
तोमारेह उपदेशे, बालका करे ऐछे कार्य ॥” 160 ॥
अनुवाद-तुम तो मुझे भी परामर्श देनेके
अधिकारी-प्रामाणिक आर्य हो और वह जगा तुम्हें
उपदेश देता है। वह तो नादान बालकके जैसे कार्य
कर रहा है॥” 160 ॥
श्रीसनातनके द्वारा श्रीजगदानन्दके सौभाग्य
और अपने दुर्भाग्यका वर्णन :-
शुनि' सनातन पाये धरि' प्रभुरे कहिल।
“जगदानन्देर सौभाग्य आजि से जानिल ॥ 161 ॥
आपणार 'असौभाग्य' आजि हैल ज्ञान।
जगते नाहि जगदानन्द-सम भाग्यवान् ॥ 162 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दकी भर्त्सना
सुनकर श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुके चरणोंमें गिरकर
उनसे कहा,-“आज ही मुझे श्रीजगदानन्दके सौभाग्यका
पता चला है। और साथ ही आज मुझे अपने
'दुर्भाग्य'का ज्ञान हुआ है। इस जगत्में जगदानन्द
पण्डितके समान अन्य कोई भाग्यशाली नहीं है॥ 161–162 ॥
अनुभाष्य- 'आपणार असौभाग्य', - अर्थात् अपना
दुर्भाग्य ॥ 162 ॥
अपने और श्रीजगदानन्दके प्रति
महाप्रभुके स्नेहकी तुलना :-
जगदानन्दे पियाओ आत्मीयता-सुधारस।
मोरे पियाओ गौरवस्तुति-निम्ब-निशिन्दा-रस ॥ 163 ॥
अनुवाद-आप जगदानन्द पण्डितको आत्मीयतारूपी
अमृतरसका पान कराते हो और मुझे सम्मान-स्तुतिरूपी
नीम-निर्गुण्डी* के कड़वा रसका पान कराते हो ॥ 163 ॥
अनुभाष्य-नीमका और निर्गुण्डीका रस कड़वा
होता है, इसलिये आस्वादनके समय वह सुखकर नहीं
होता। स्नेह और कृपाके पात्र लालनीय व्यक्तिके लिये
उनके सेव्य और पूज्य लालक-व्यक्तिसे गौरव और
वन्दना आदि सम्मानकी प्राप्ति भी वैसे ही असुखकर
होती है ॥ 163 ॥
सेवकको सेव्यके निजजन-मानकर प्रेमके
कारणरूप सम्बन्धकी अनुभूति; श्रीसनातनके
गम्भीर हृदयव्यथा-सूचक वचन :-
आजिह नहिल मोरे आत्मीयता-ज्ञान !
मोर अभाग्य, तुमि-स्वतन्त्र भगवान् ! !” 164 ॥
अनुवाद-आज तक आपने मुझे अपना आत्मीय
नहीं समझा। यह तो मेरा दुर्भाग्य ही है, क्योंकि आप
तो स्वतन्त्र भगवान् हैं !” 164 ॥
महाप्रभुकी लज्जा और श्रीसनातनके
प्रति सान्त्वना-वाक्य :-
शुनि' महाप्रभु किछु लज्जित हैला मने।
ताँरे सन्तोषिते किछु बलेन वचने ॥ 165 ॥
श्रीजगदानन्द और श्रीसनातनके प्रति महाप्रभुकी
स्नेह-प्रीतिके वैशिष्ट्यका वर्णन; श्रीजगदानन्दके
प्रति तिरस्कारका कारण :-
“जगदानन्द प्रिय आमार नहे तोमा हैते।
मर्यादा-लङ्घन आमि ना पारों सहिते ॥ 166 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीकी बात सुनकर महाप्रभु
मन-ही-मन कुछ लज्जित हुए। फिर श्रीसनातन गोस्वामीको
सन्तुष्ट करनेके लिये कहने लगे, - “जगदानन्द मुझे
- निर्गुण्डी अथवा सम्भालु अथवा सिन्दुवार पौधेमें एक
साथ पाँच पत्तियाँ होती हैं और इसका स्वाद बहुत
कसैला होता है। इसका प्रयोग औषधि बनानेमें होता
है।