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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2154, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2154

[ 4/229-237 चौथा अध्याय 137

[बायाँ स्तम्भ]
अनुवाद—श्रीजीव गोस्वामीने 'भागवत-सन्दर्भ' नामक
ग्रन्थकी रचना की जो समस्त शास्त्रोंका सार है। उसके
द्वारा भक्ति और भगवान्के तत्त्वका पूर्ण ज्ञान प्राप्त
होता है॥ 229॥
अनुभाष्य—'भागवत-सन्दर्भ',—इसका दूसरा नाम
'षट्सन्दर्भ' है; मध्यलीला 1/43 संख्याका अनुभाष्य
देखें॥ 229॥
'गोपालचम्पू' आर नाना ग्रन्थ कैला।
व्रज-प्रेम-लीला-रससार देखाइला॥ 230॥
अनुवाद—उन्होंने गोपालचम्पू और अन्य अनेक
ग्रन्थोंकी रचना की, जिनमें उन्होंने व्रज-प्रेम-लीला-रसके
सारको प्रदर्शित किया॥ 230॥
'षट्सन्दर्भे' कृष्णप्रेम-तत्त्व प्रकाशिला।
चारिलक्ष ग्रन्थ तैं हो विस्तार करिला॥ 231॥
अनुवाद—उन्होंने 'षट्सन्दर्भ'में कृष्णप्रेमतत्त्वको
प्रकाशित किया, इस प्रकार उन्होंने कुल मिलाकर चार
लाख श्लोकोंमें इन समस्त तत्त्वोंकी व्याख्या की॥ 231॥
श्रीजीवगोस्वामीका पूर्व-वृत्तान्त; मथुरा जानेसे पहले
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा और आज्ञाकी प्राप्ति :-
जीव-गोसाञि गौड़ हैते मथुरा चलिला।
नित्यानन्दप्रभु-ठाञि आज्ञा मागिला॥ 232॥
अनुवाद—श्रीजीव गोस्वामी जब गौड़देशसे मथुराकी
ओर जाना चाह रहे थे, तब उन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे
आज्ञा माँगी॥ 232॥
प्रभु प्रीत्ये ताँर माथे धरिला चरण।
रूप-सनातन-सम्बन्धे कैला आलिङ्गन॥ 233॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने प्रसन्न होकर
श्रीरूप-सनातन गोस्वामीके सम्बन्धसे श्रीजीव गोस्वामीके
सिरपर अपने चरणकमल रखे और उनका आलिङ्गन
किया॥ 233॥

[दायाँ स्तम्भ]
श्रीसनातनसे युक्त श्रीरूपानुग गणोंका
ही वृन्दावन-वासमें अधिकार :-
आज्ञा दिला, —"शीघ्र तुमि याह वृन्दावने।
तोमार वंशे प्रभु दियाछेन सेइस्थाने॥" 234॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीजीव गोस्वामीको
आज्ञा दी,—"तुम शीघ्र वृन्दावन जाओ, महाप्रभुने
तुम्हारे वंशको वही स्थान प्रदान किया है॥" 234॥
श्रीनित्यानन्दकृपा और आज्ञा-प्राप्तिके
फलस्वरूप श्रीजीवका आचार्यत्व :-
ताँर आज्ञाय आइला, आज्ञा-फल पाइला।
शास्त्र करि' कतकाल 'भक्ति' प्रचारिला॥ 235॥
अनुवाद—श्रीजीव गोस्वामी श्रीनित्यानन्द प्रभुसे आज्ञा
प्राप्तकर वृन्दावनमें आये। वहाँ उन्हें उस आज्ञाके
फलकी प्राप्ति हुई अर्थात् उन्होंने बहुत समय तक
वृन्दावनमें रहकर अनेक शास्त्रोंकी रचना की और
भक्तिका प्रचार किया॥ 235॥
ग्रन्थकारके तीन शिक्षागुरु :-
एइ तिनगुरु, आर रघुनाथदास।
इँहा-सबार चरण वन्दौँ, याँर मुञि 'दास'॥ 236॥
अनुवाद—मैं इन तीन गुरुओं (श्रीसनातन गोस्वामी,
श्रीरूप गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी) तथा श्रीरघुनाथदास
गोस्वामीके चरणोंकी वन्दना करता हूँ, मैं इन सबका
दास हूँ॥ 236॥
अनुभाष्य—'एइ तिनगुरु',—(1) श्रीरूप, (2) श्रीसनातन
और (3) श्रीजीव-गोस्वामी प्रभु॥ 236॥
चौथे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभु-श्रीसनातन-मिलन-संवादको सुनकर महाप्रभुके द्वारा
दी गयी लोकशिक्षाके अभिप्रायका अनुभव :-
एइ त' कहिलुँ पुनः सनातन-सङ्गमे।
प्रभुर आशय जानि याहार श्रवणे॥ 237॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास