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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2146, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2146

[ 4/178-181 चौथा अध्याय 129
अनुवाद—जिनका चित्त ज्ञान और विज्ञानसे तृप्त
है, जो विकाररहित और जितेन्द्रिय हैं तथा मिट्टी, पाषाण
और स्वर्णमें समदर्शी हैं, वे योगारूढ़ पुरुष योगी
कहलाते हैं॥ 178॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो ज्ञान-विज्ञानके द्वारा परितृप्त
हैं, कूटस्थ अर्थात् चित्-स्वभावमें स्थित हैं, जितेन्द्रिय
हैं एवं मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णमें समान
बुद्धिवाले हैं, उन्हें ही 'योगी' अर्थात् 'योगारूढ़' कहा
जाता है॥ 178॥
चौथे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा (ज्ञानम् औपदेशिकं, 'विज्ञानम्'
अपरोक्षानुभवः, ताभ्यां तृप्तः निराकाङ्क्षः आत्मा चित्तं यस्य
सः अतः) कूटस्थः (एकेनैव स्वभावेन सर्वकालं व्याप्य
स्थितः निर्विकारः वा, अतएव) विजितेन्द्रियः (विजितानि
इन्द्रियाणि येन सः, अतएव) समलोष्ट्र
मृत्पिण्डपाषाणखण्ड-सुवर्णानि यस्य सः, लोष्ट्र
बुद्धिशून्यः इत्यर्थः) योगी युक्तः (योगारूढ़ः) उच्यते।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 178॥
जड़़ीय विधि-निषेधसे परे नैष्कर्म्यको प्राप्त संन्यासी अथवा
महाभागवतके लिये ही सर्वत्र विष्णुप्रतीतिके कारण जड़़ीय
भेदज्ञानसे उत्पन्न विषमता-रहित सुदर्शन :-
आमि त'-संन्यासी, आमार 'सम-दृष्टि' धर्म।
चन्दन-पङ्केते आमार ज्ञान हय 'सम'॥ 179॥
अनुवाद—मैं तो संन्यासी हूँ, सभीके प्रति सम-दृष्टि
रखना ही मेरा धर्म है। चन्दन तथा कीचड़में मेरा सम
ज्ञान है॥ 179॥
अनुभाष्य—सभी वस्तुओंके प्रति समदृष्टियुक्त होना
ही संन्यासी, पण्डित अथवा वैष्णवका धर्म है; क्योंकि
उनमें प्राकृत अभिनिवेश नहीं है। उनकी इन्द्रिय-तर्पणके
लिये चन्दनकी सुगन्धको ग्रहण करनेकी आसक्ति
अथवा इन्द्रियोंके सुखके लिये कीचड़की दुर्गन्धको
त्यागनेकी इच्छा नहीं है। युक्तवैराग्यशील 'वैष्णव' प्राकृत
वस्तुका ग्रहण और त्याग—इन दोनों प्रकारकी प्रवृत्तियोंके
दास होने अर्थात् उनके वशीभूत होनेके लिये अग्रसर
नहीं होते। वे प्राकृत भोग और त्याग, दोनोंके प्रति
उदासीन होकर सुदर्शन अथवा चित्-विलास-दर्शनसे
युक्त होते हैं॥ 179॥
अपने धर्मसे च्युत होनेकी आशङ्काके कारण
अप्राकृत-वैष्णवमें प्राकृत बुद्धि करनेका निषेध :-
एड् लागि' तोमा त्याग करिते ना युयाय।
घृणा-बुद्धि करि यदि, निज-धर्म याय॥"180॥
अनुवाद—इसलिये मैं तुम्हारा त्याग नहीं कर
सकता। यदि मैं तुम्हारे प्रति घृणा-बुद्धि करूँ, तो मेरा
अपना धर्म नष्ट होता है॥"180॥
अनुभाष्य—श्रीरूपप्रभु रचित उपदेशामृतका छठा
श्लोक—
“दृष्टैः स्वभावजनितैर्वपुषश्च दोषैः
न प्राकृतत्वमिह भक्तजनस्य पश्येत्।
गङ्गाम्भसां न खलु बुद्बुदफेनपङ्कै-
र्ब्रह्मद्रवत्वमपगच्छति नीरधर्मैः॥”
[अर्थात् “इस जगत्में अवस्थित भक्तजनोंमें नीचवर्ण,
कठोरता और आलस्यादि दिखायी पड़नेवाले स्वाभाविक
दोषोंके द्वारा अथवा कुरूपता और ज्वर आदि पीड़ाओंसे
विकृत दिखायी पड़नेवाले शारीरिक दोषोंके द्वारा भक्तजनोंका
प्राकृतत्व नहीं देखना चाहिये अर्थात् उन्हें प्राकृत जीव
नहीं समझना चाहिये, जैसे बुलबुलों, फेन और कीचड़
आदिके सम्बन्धसे गङ्गाजल जलधर्मको अङ्गीकार करके
भी अपना द्रवीभूत-ब्रह्म होनेका धर्म त्याग नहीं करता
अर्थात् अप्राकृत धर्म नहीं छोड़ता; वैसे ही आत्मस्वरूप
प्राप्त वैष्णवोंमें प्राकृत दोषोंका आरोप नहीं करना
चाहिये।]॥ 180॥
अमानी दोनों भक्तोंका महाप्रभुके द्वारा की
गयी प्रशंसाको अस्वीकार करना :-
हरिदास कहे,—“प्रभु, ये कहिला तुमि।
एइ 'बाह्य प्रतारणा', नाहि मानि आमि॥ 181 ॥