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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2150, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2150

[ 4/198–207 चौथा अध्याय 133
अनुवाद—वास्तवमें महाप्रभुने जब पहले दिन श्रीसनातन
गोस्वामीको आलिङ्गन किया था, उन्हींके स्पर्शसे श्रीसनातनके
शरीरकी गन्ध चन्दन जैसी हो गयी थी ॥ 198 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको सान्त्वना देना,
श्रीसनातनके स्पर्शसे महाप्रभुको सुख :—
प्रभु कहे,—“सनातन, ना मानिह दुःख।
तोमार आलिङ्गने आमि पाइ बड़ सुख ॥ 199 ॥
उस वर्ष श्रीसनातनको अपने निकट रखनेके बाद अगले
वर्ष वृन्दावन जानेकी आज्ञा प्रदान :—
एइ–वत्सर तुमि इँहा रह आमा–सने।
वत्सर रहिं' तोमारे आमि पाठाइमु वृन्दावने ॥"200 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन ! तुम दुःखी
मत होओ, तुम्हें आलिङ्गन करके मुझे बहुत अधिक
सुखकी प्राप्ति होती है। तुम इस वर्ष यहाँ मेरे पास
रहो। एक वर्ष यहाँ रहनेके बाद मैं तुम्हें वृन्दावन भेज
दूँगा॥" 199–200 ॥
महाप्रभुके आलिङ्गन-स्पर्शके फलसे
श्रीसनातनकी देहकी स्वर्णकान्ति :—
एत बलि' पुनः ताँरे कैला आलिङ्गन।
कण्डु गेल, अङ्ग हैल सुवर्णेर सम ॥ 201 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने पुनः श्रीसनातन
गोस्वामीको आलिङ्गन किया। श्रीसनातन गोस्वामीकी
देहसे खाज-पीब नष्ट हो गये और उनके सभी अङ्ग
स्वर्णकी भाँति उज्ज्वल हो गये ॥ 201 ॥
ऐसा देखकर श्रीहरिदासका विस्मय और सम्पूर्णरूपसे
महाप्रभुकी इच्छासे परिचालित श्रीसनातनकी देहमें
जड़ेन्द्रियोंसे दिखलायी देनेवाले खाज-पीबके कष्टको
प्रदर्शित करनेकी लीलाके वास्तविक मर्मार्थका वर्णन :—
देखि' हरिदास मने हैल चमत्कार।
प्रभुरे कहेन, —“एइ भङ्गी ये तोमार ॥ 202 ॥
सेइ झारिखण्डेर पानी तुमि खाओआइला।
सेइ पानी–लक्ष्ये इँहार कण्डु उपजिला ॥ 203 ॥
कण्डु करि' परीक्षा कराइले सनातने।
एइ लीला–भङ्गी तोमार केह नाहि जाने ॥" 204 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीकी देहमें परिवर्तनको
देखकर श्रीहरिदास ठाकुरके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ।
श्रीहरिदास ठाकुरने महाप्रभुसे कहा, —“यह आपकी
लीला है। आपने ही सनातनको झारिखण्डके जलका
पान कराया तथा उसी जलके द्वारा इनकी देहमें
खाज-पीबको उत्पन्न कराया। खाज-पीब उत्पन्न कराके
आपने ही सनातनकी परीक्षा ली। आपकी इस लीलाकी
रीतिको कोई नहीं जान सकता ॥”202–204 ॥
अनुभाष्य—'पानी-लक्ष्ये',—झारिखण्डके पानीय जलको
उपलक्ष्य करके ॥ 203 ॥
महाप्रभुका प्रस्थान और दोनों भक्तोंके द्वारा
भगवान्की कृपापर विचार :—
दुँहे आलिङ्गिया प्रभु गेला निजालय।
प्रभुर गुण कहे दुँहे हञा प्रेममय ॥ 205 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीसनातन गोस्वामी,
उन दोनोंको आलिङ्गन करके महाप्रभु अपने वासस्थानपर
लौट गये। वे दोनों प्रेममय होकर महाप्रभुके गुणोंका
गान करने लगे ॥ 205 ॥
प्रतिदिन श्रीसनातनके द्वारा श्रीहरिदासके
साथ महाप्रभुकी कथाकी चर्चा :—
एइमत सनातन रहे प्रभु–स्थाने।
कृष्णचैतन्य–गुण–कथा हरिदास–सने ॥ 206 ॥
अनुवाद—इस प्रकार श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके
आश्रयमें श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे। उनकी श्रीहरिदास ठाकुरके
साथ निरन्तर श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके गुणोंकी चर्चा
चलती रहती ॥ 206 ॥
दोलयात्राके बाद श्रीसनातनको वृन्दावन भेजना :—
दोलयात्रा देखि' प्रभु ताँरे विदाय दिला।
वृन्दावने ये करिबेन, सब शिखाइला ॥ 207 ॥