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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

छठा अध्याय 6/108-115 ]
यच्छक्तयः (यस्य बहिरङ्गा-मायाविद्याः शक्तयः) वदतां
वादिनां (पूर्वोत्तरपक्षाश्रितानां) विवादसंवादभूवः (विवादस्य क्वचित्
संवादस्य च भुवः उत्पत्तिहेतवः) भवन्ति; एषां (विवादशीलानां)
मुहुः (पुनः पुनः) आत्ममोहं कुर्वन्ति, तस्मै अनन्तगुणाय
(सर्वशक्तिविशिष्टाय) भूम्ने (परमात्मने) नमः।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 108 ॥
अधोक्षज-सेवक ब्राह्मण ही युक्त,
अक्षज-ज्ञानी मायादास अयुक्त :-
श्रीमद्भागवत (11/22/4)-
युक्तञ्च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।
मायां मदीयमुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥" 109 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 109 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-ब्राह्मणोंने जो कहा है, वह
सर्वत्र युक्त हुआ है; क्योंकि मेरी मायाका सहारा लेकर
जो बोलते हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्घट नहीं है।
तात्पर्य यह है कि भगवान्‌की माया अघटनघटनपटीयसी
(असम्भवको सम्भव और सम्भवको असम्भव करनेवाली)
शक्ति है; इसलिये वह अनेक स्थानोंपर सत्यको गोपन
करके मिथ्याको प्रमाणित कर सकती है। उसी मायाके
आश्रयमें कपिल, गौतम, जैमिनी और कणाद आदि
ब्राह्मणोंने बहुतसे असार वाक्योंको सार वाक्योंकी भाँति
प्रकाशित किया है॥ 109 ॥
अनुभाष्य-तत्त्व संख्याके विषयमें उद्धवके द्वाराकी
गयी जिज्ञासाके उत्तरमें श्रीकृष्णकी उक्ति,-
यथा ब्राह्मणाः भाषन्ते (निर्णीतवन्तः), [तत्] च सर्वत्र युक्तं
सन्ति। मदीयां मायां (अचिन्त्य-स्वरूपशक्तिं, न तु अविद्याम्)
उद्गृह्य (स्वीकृत्य) वदतां (जनानां) किं दुर्घटं नु (प्रश्ने, न
किमपीत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 109 ॥
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा श्रीगोपीनाथके
उपदेश अनसुना करना :-
तबे भट्टाचार्य कहे,-"याह गोसाञिर स्थाने।
आमार नामे गण-सहित कर निमन्त्रणे॥ 110 ॥
प्रसाद आनि' ताँरे कराह आगे भिक्षा।
पश्चात् आसि' आमारे कराइह शिक्षा॥" 111 ॥
अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उनकी बातको
अनसुना करके कहा,-"अभी श्रीचैतन्य गोसाईंके स्थानपर
जाकर मेरी ओरसे उन्हें उनके सङ्गियों सहित मेरे
घरपर प्रसाद पानेको निमन्त्रण दीजिये। भगवान् श्रीजगन्नाथका
प्रसाद लाकर पहले उन्हें भोजन कराइये और उसके
बादमें मुझे शिक्षा देना॥" 110-111 ॥
श्रीगोपीनाथकी अनेक प्रकारसे श्रीभट्टाचार्यका
उपकार करनेकी चेष्टा :-
आचार्य-भगिनीपति, श्यालक-भट्टाचार्य।
निन्दा-स्तुति-हास्ये शिक्षा करा'न आचार्य॥ 112 ॥
अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्य बहनोई थे तथा श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्य उनके साले थे। ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध होनेके
कारण श्रीगोपीनाथाचार्य कभी निन्दाके द्वारा, कभी
स्तुतिके द्वारा एवं कभी हास-परिहासके द्वारा श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यको शिक्षा प्रदान कर रहे थे॥ 112 ॥
श्रीभट्टाचार्यके मायावाद-वाक्यको सुनकर श्रीमुकुन्दका क्रोध
करना ही उनके प्रति कृपा :-
आचार्येर सिद्धान्ते मुकुन्देर हैल सन्तोष।
भट्टाचार्येर वाक्ये मने हैल दुःख-रोष॥ 113 ॥
अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्यके सिद्धान्तको सुनकर
श्रीमुकुन्द दत्त बहुत सन्तुष्ट हुए, परन्तु श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके वचनोंको सुनकर वे मन-ही-मन बहुत
दुःखी हुए तथा उनमें कुछ रोष भी भर आया॥ 113 ॥
महाप्रभुको निमन्त्रण :-
गोसाञिर स्थाने आचार्य कैल आगमन।
भट्टाचार्येर नामे ताँरे कैल निमन्त्रण॥ 114 ॥
श्रीमुकुन्द, श्रीगोपीनाथकी श्रीभट्टाचार्यके विरुद्ध निन्दा :-
मुकुन्द-सहित कहे भट्टाचार्येर कथा।
भट्टाचार्ये निन्दा करे, मने पाञा व्यथा॥ 115 ॥
। 179

[ 6/114-124 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्य महाप्रभुके पास गये
और उन्हें श्रीभट्टाचार्यकी ओरसे निमन्त्रण दिया।
श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीमुकुन्द दत्तके साथ मिलकर महाप्रभुको
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा कही गयी सभी बातोंको
बतलाया और मनमें दुःख होनेके कारण उन्होंने
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी निन्दा भी की॥114-115॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यको सम्मान प्रदान :—
शुनि' महाप्रभु कहे,—“ऐछे मत् कह।
आमा प्रति भट्टाचार्येर हय अनुग्रह ॥ 116 ॥
आमार संन्यास-धर्म चाहेन राखिते।
वात्सल्ये करुणा करेन, कि दोष इहाते ॥”117 ॥
अनुवाद—उनकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा, —“ऐसा
मत कहो। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी मेरे ऊपर बहुत
कृपा है। मेरे प्रति अपने हृदयमें वात्सल्यमय करुणाके
कारण वे मेरे संन्यास-धर्मकी रक्षा करना चाहते हैं, तो
इसमें क्या दोष है?”॥ 116-117 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौमके साथ श्रीजगन्नाथ दर्शन
करनेके बाद उनके घरमें जाना :—
आर दिन महाप्रभु भट्टाचार्य-सने।
आनन्दे करिला जगन्नाथ-दरशने ॥ 118 ॥
भट्टाचार्य-सङ्गे ताँर मन्दिरे आइला।
प्रभुरे आसन दिया आपने बसिला ॥ 119 ॥
अनुवाद—अगले दिन महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके
साथ आनन्दपूर्वक श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन किया। फिर
वे श्रीभट्टाचार्यके साथ उनके घरपर आये। उन्होंने
महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन प्रदान किया और स्वयं
भी बैठ गये॥ 118-119 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुको वेदान्तका
पढ़ाना और उपदेश देना :—
वेदान्त पड़ाइते तबे आरम्भ करिला।
स्नेह-भक्ति करि' किछु प्रभुरे कहिला ॥ 120 ॥
“वेदान्त-श्रवण, —एइ संन्यासीर धर्म।
निरन्तर कर तुमि वेदान्त श्रवण ॥”121 ॥
अनुवाद—तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको
वेदान्त पढ़ाना आरम्भ किया। स्नेह-भक्तिके साथ वे
महाप्रभुसे कहने लगे,—“वेदान्तका श्रवण करना ही
संन्यासीका धर्म है, इसलिये आप निरन्तर वेदान्तका
श्रवण कीजिये॥”120-121 ॥
अनुभाष्य—'वेदान्त'—यहाँ वेदान्तका तात्पर्य
शङ्कराचार्यके द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रका निर्विशेष-ब्रह्म-प्रतिपादक
शारीरक भाष्य है। 'वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तः' [वेदान्तसूत्रके
वाक्योंमें सदा आनन्द अनुभव करना चाहिये], यह
संन्यासियोंका धर्म है॥ 121 ॥
महाप्रभुका दैन्य :—
प्रभु कहे,—“मोरे तुमि कर अनुग्रह।
सेइ से कर्त्तव्य, तुमि येइ मोरे कह ॥”122 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आपकी मेरे प्रति बहुत
कृपा है, इसलिये आप मुझे जैसा कहेंगे, वैसा करना
ही मेरा कर्तव्य है॥”122 ॥
श्रीसार्वभौमके मुखसे महाप्रभुका सात दिन तक
वेदान्त श्रवण और मायावाद-भाष्यके श्रवणमें
अनादर होनेके कारण मौनवृत्ति :—
सप्तदिन पर्यन्त ऐछे करेन श्रवणे।
भाल-मन्द नाहि कहे, बसि' मात्र सुने ॥ 123 ॥
अनुवाद—तब सात दिन तक महाप्रभुने श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यसे वेदान्त श्रवण किया। ठीक या गलत, उन्होंने
कुछ भी नहीं कहा, बैठकर मात्र श्रवण करते
रहे॥ 123 ॥
आठवें दिन श्रीसार्वभौमकी उसके कारणकी जिज्ञासा :—
अष्टम-दिवसे ताँरे पुछे सार्वभौम।
“सातदिन कर तुमि वेदान्त-श्रवण ॥ 124 ॥
180 ।

छठा अध्याय 6/124-134 ]
भालमन्द नाहि कह, रह मौन धरि'।
बुझ, कि ना बुझ,–इहा जानिते ना पारि ॥' 125 ॥
अनुवाद—तब आठवें दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने
महाप्रभुसे पूछा,—"सात दिनोंसे आप वेदान्तका श्रवण
कर रहे हो। ठीक-गलत कुछ भी न कहकर केवल
मौन धारण करके बैठे हो। इसलिये मैं यह जान नहीं
पा रहा हूँ कि आप वेदान्त समझ भी रहें हैं या
नहीं॥" 124-125 ॥
महाप्रभुके द्वारा दीनतापूर्वक मायावाद-भाष्यकी उपेक्षा :-
प्रभु कहे,—"मूर्ख आमि, नाहि अध्ययन।
तोमार आज्ञाते मात्र करिये श्रवण ॥ 126 ॥
संन्यासीर धर्म लागि' श्रवण मात्र करि।
तुमि येइ अर्थ कर, बुझिते ना पारि॥" 127 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया,—"मैं मूर्ख हूँ,
इसलिये मैं वेदान्त-सूत्रका अध्ययन नहीं करता। केवल
आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही मैं सुन रहा
हूँ। संन्यासीका धर्म पालन करनेके लिये मैं श्रवणमात्र
ही करनेका प्रयास कर रहा हूँ। किन्तु आप वेदान्त-सूत्रोंकी
जो व्याख्या कर रहे हैं, वह मुझे समझ नहीं आ
रही॥" 126-127 ॥
भट्टाचार्यका महाप्रभुको अज्ञ समझकर उन्हें मौनका त्याग
करके परिप्रश्न करनेका आदेश :-
भट्टाचार्य कहे,—"ना बुझि', हेन-ज्ञान यार।
बुझिबार लागि' सेह पुछे पुनर्बार ॥ 128 ॥
तुमि शुनि' शुनि' रह मौन-मात्र धरि'।
हृदये कि आछे तोमार, बुझिते ना पारि ॥" 129 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—"जिसे यह
ज्ञान होता है—'मैं समझ नहीं पा रहा हूँ', वह
समझनेके लिये पुनः पुनः प्रश्न करता है। परन्तु
आपने बार-बार सुनकर केवल मौन ही धारण कर
रखा है। आपके हृदयमें क्या है, मैं उसे समझ नहीं
पा रहा हूँ॥" 128-129 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसार्वभौमकी मायावाद-
भाष्य-व्याख्याका खण्डन :-
प्रभु कहे,—"सूत्रेर् अर्थ बुझिये निर्मल।
तोमार व्याख्या शुनि' मन हय त' विकल ॥ 130 ॥
मुख्य अभिधा-वृत्तिसे ब्रह्मसूत्रका अर्थ सहज, परन्तु गौण-
लक्षणारूपी कल्पनाके आश्रयसे वह आवृत :-
सूत्रेर् अर्थ-भाष्य कहे प्रकाशिया।
भाष्य कह तुमि-सूत्रेर् अर्थ आच्छादिया ॥ 131 ॥
सूत्रेर् मुख्य अर्थ ना करह व्याख्यान।
कल्पनार्थे तुमि ताहा कर आच्छादन ॥ 132 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"सूत्रोंके अर्थको तो मैं
भलीभाँति समझ पा रहा हूँ, परन्तु आपकी व्याख्याको
सुनकर मेरा मन क्षुब्ध हो रहा है। 'भाष्य' तो सूत्रोंके
अर्थको प्रकाशित करता है, परन्तु आपके द्वारा कहे
हुए 'भाष्य'से तो सूत्रोंका अर्थ आच्छादित हो रहा है।
आपने सूत्रोंके मुख्य अर्थको न कहकर अपने कल्पित
अर्थके द्वारा उनको आच्छादित कर दिया है॥ 130-132 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सूत्रका जो वास्तविक भाष्य
होता है, वह सूत्रके अर्थको प्रकाशित करके बोलता
है, किन्तु आप जो भाष्य कर रहे हैं, वह तो सूत्रके
अर्थको ढक रहा है ॥ 131 ॥
अनुभाष्य—श्रीव्यासदेवके द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रोंका
अभिधा-वृत्तिका आश्रय लेकर जो मुख्य अर्थ होता है,
वह व्याख्या न करके सूत्रके अर्थको छिपाकर लक्षणाके
द्वारा कल्पित अर्थ कर रहे हो ॥ 132 ॥
उपनिषद्-प्रतिपाद्य अर्थ ही सूत्राकारमें वेदान्तमें निबद्ध :-
उपनिषद्-शब्दे येइ मुख्य अर्थ हय।
सेइ अर्थ मुख्य,-व्याससूत्रे सब कय ॥ 133 ॥
मुख्यार्थ छाड़िया कर गौणार्थ कल्पना।
'अभिधा'-वृत्ति छाड़ि' कर शब्देर 'लक्षणा' ॥ 134 ॥
। 181

[ 6/133-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
शब्द अथवा वेद ही मुख्य प्रमाण-
प्रमाणेर मध्ये श्रुति-प्रमाण-प्रधान।
श्रुति ये मुख्यार्थ कहे, सेइ से प्रमाण॥ 135॥
दृष्टान्त :-
जीवेर अस्थि-विष्ठा दुइ-शङ्ख-गोमय।
श्रुति-वाक्ये सेइ दुइ महापवित्र हय॥ 136॥
गुरु-परम्पराके बिना इन्द्रियज्ञानसे वेदको जानना दुर्बोध :-
स्वतःप्रमाण वेद सत्य येइ कय।
'लक्षणा' करिते स्वतःप्रामाण्य-हानि हय॥ 137॥
शङ्कर भाष्य-वेदान्त-विरुद्ध :-
व्यास-सूत्रेरे अर्थ-यैछे सूर्येर किरण।
स्वकल्पित भाष्य-मेघे करे आच्छादन॥ 138॥
वेद और सात्वतपुराणोंमें सविशेष ब्रह्म
अथवा श्रीभगवान् ही उद्दिष्ट :-
वेद-पुराणे कहे ब्रह्म निरूपण।
सेइ ब्रह्म-बृहद्वस्तु, ईश्वर-लक्षण॥ 139॥
सच्चिदानन्दविग्रह निर्विशेष नहीं :-
सर्वैश्वर्यपरिपूर्ण स्वयं भगवान्।
ताँरे निराकार करि' करह व्याख्यान॥ 140॥
'निर्विशेष' अर्थमें प्राकृत-विशेष या वैचित्र्यका अभाव :-
'निर्विशेष' ताँरे कहे येइ श्रुतिगण।
'प्राकृत' निषेधि करे 'अप्राकृत' स्थापन॥ 141॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 133-141॥
अमृतप्रवाह भाष्य-उपनिषद्के वाक्योंका जो मुख्य
अर्थ है, उसका ही श्रीवेदव्यासने अपने द्वारा रचित
ब्रह्मसूत्रमें उल्लेख किया है। अर्थात् उसे मुख्य अर्थ
ही जानना चाहिये। उसको छोड़कर जिस गौण अर्थकी
कल्पना की जाती है और शब्दकी 'अभिधा-वृत्ति'को
छोड़कर 'लक्षणावृत्ति'से जो अर्थ किया जाता है, वह
अमङ्गलजनक होता है। 'प्रत्यक्ष', 'अनुमान', 'ऐतिह्य'
और 'शब्द'-इन चारों प्रकारके प्रमाणोंमें, 'श्रुतिप्रमाण'
अर्थात् शब्द-प्रमाण ही सबसे प्रधान है। श्रुति वाक्योंका
जो मुख्य अर्थ है, वही प्रमाण है। देखो, पशुओंकी हड्डी
और मल-बहुत ही अपवित्र है; किन्तु 'शङ्ख' और
'गोबर' उनमें गिने जानेपर भी श्रुतिवाक्योंके बलसे
महापवित्र हुए हैं। वैदिक वाक्योंका अर्थ लक्षणा-वृत्तिके
द्वारा करनेपर, उनको 'अनुमान'के अधीन बनाकर
उनके स्वतःप्रमाणिकताको नष्ट करना हो जाता है।
व्याससूत्रोंके अर्थ सूर्यकी किरणोंके समान देदीप्यमान
हैं। मायावादियोंने अपने द्वारा कल्पित भाष्यरूपी-मेघोंके
द्वारा उसको आच्छादित कर दिया हैं। वेद और उसके
अनुगत पुराणसमूहने एकमात्र ब्रह्मका ही निरूपण किया
है। वह ब्रह्म अपने बृहत्व-धर्मवशतः [अर्थात् असीम
विस्तारके गुणोंके कारण] ईश्वर-लक्षणोंसे लक्षित होता
है। पुनः, उन ईश्वरको उनके सर्वैश्वर्यकी परिपूर्णताके
साथ देखनेपर, वही बृहद्-ब्रह्मवस्तु ही स्वयं भगवान् हो
जाती है। इसलिये 'ब्रह्म' और 'ईश्वर'-ये भगवद्-तत्त्वके
अन्तर्गत उनकी विशेष प्रतीति हैं। षडैश्वर्यपूर्ण भगवान्
सदैव परिपूर्ण 'श्री' अर्थात् रूपसे युक्त हैं, इसलिये वे
नित्य सविशेष हैं; उनको 'निराकार' कहकर व्याख्या
करनेसे वेदोंका अर्थ विकृत हो जाता है। जो सब
श्रुतियाँ उन्हें 'निर्विशेष' कहकर व्याख्या करती हैं, वे
केवल 'प्राकृत विशेष'का निषेध करके 'अप्राकृत विशेष'
की स्थापना करती हैं।
“अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स
शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता
तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥” [पुरुषोत्तम भगवान्के किसी
प्रकारके प्राकृत हाथ, पैरादि नहीं हैं। किन्तु वे अपनी
अचिन्त्य शक्तिके बलसे अपने अप्राकृत पैरोंसे इतनी
तीव्रतासे चल सकते हैं जो अन्य किसीके लिये सम्भव
नहीं है। वे अपने अप्राकृत हाथोंसे सर्वत्र ही भक्तोंके
द्वारा निवेदित वस्तुओंको ग्रहण करते हैं। वे अप्राकृत
नेत्रोंसे सर्वत्र दर्शन करते हैं। वे अप्राकृत कानोंसे
भक्तोंके द्वारा किये गये उनके नाम, रूप, गुणादिका
कीर्तन सदा श्रवण करते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, तथापि उनके
अप्राकृत स्वरूपको कोई प्राकृत व्यक्ति नहीं जान
सकता। एकमात्र उनके ऐकान्तिक भक्त उनकी कृपासे
182 ।

छठा अध्याय 6/133-142 ]
दिव्यज्ञान प्राप्त करके उनके अचिन्त्यनीय स्वरूपको
जान सकते हैं।]—(श्वेताश्वतर उपनिषद् 3/19) आदि
बहुतसी श्रुतियोंमें अप्राकृत-साकार-सच्चिदानन्दतत्त्वका
वर्णन है॥ 133-141 ॥
अनुभाष्य—'उपनिषद्'—आदिलीला, 2/5 संख्याके
अनुभाष्यमें अन्वय और आदिलीला 7/106 संख्याका
अनुभाष्य एवं 7/108 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य और
अनुभाष्य देखें।
श्रील जीवगोस्वामीके तत्त्वसन्दर्भमें 10-11 संख्या
और श्रीबलदेव विद्याभूषण-रचित टीका एवं “शास्त्रयोनित्वात्”
(ब्रह्मसूत्र 1/1/3), “तर्काप्रतिष्ठानात्” (ब्रह्मसूत्र 2/1/11)
एवं “श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्” (ब्रह्मसूत्र 2/1/27) आदि
सूत्रोंके श्रीभाष्य, श्रीमाध्वभाष्य, श्रीनिम्बार्कभाष्य और
श्रीबलदेव-कृत गोविन्दभाष्य देखें। श्रीजीव प्रभुने
'सर्वसम्वादिनी' में लिखा है,—
“तथापि भ्रम-प्रमाद-विप्रलिप्सा-करणापाटव-दोषरहितवचनात्मकः
शब्द एव मूलं प्रमाणम्। अन्येषां प्रायः पुरुष-भ्रमादि-
दोषमयस्यान्यथा-प्रतीति-दर्शनेन प्रमाणं वा तदाभासो वेति
पुरुषैर्निर्णतुमशक्यत्वात्, तस्य तदभावात्॥”
अर्थात् “प्रत्यक्षादि दस प्रकारके प्रमाण विद्यमान
रहनेपर भी भ्रमादि चार प्रकारके दोषोंसे रहित वचनात्मक
'शब्द' या श्रुति ही मूल प्रमाण है; अन्यान्य प्रमाणोंके
विषयमें मनुष्योंके वाक्यादि प्रायः ही भ्रमादि दोषोंसे युक्त
होनेके कारण उनके द्वारा अन्य प्रकारकी प्रतीति देखी
जाती है, इसलिये अन्य नौ प्रमाण वास्तवमें प्रमाण हैं
या फिर प्रमाणाभास हैं, उसका निर्णय नहीं किया जा
सकता, किन्तु वास्तव-दर्शनमूलक होनेके कारण शब्द
प्रमाणमें इस प्रकारकी आशङ्का नहीं है।”
(ब्रह्मसूत्र 2/1/5)—'दृश्यते तु', इस सूत्रके भाष्यमें
श्रीमन्मध्वाचार्यपादने इन 'भविष्यपुराण'के वचनोंको उद्धृत
किया है—
'ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम्।
मूलरामायणञ्चैव 'वेद' इत्येव शब्दितः॥
पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः।
स्वतःप्रामाण्यमेतेषां नात्र किञ्चित् विचार्यते॥”
अर्थात् “ऋक्, यजुः, साम और अथर्व, महाभारत,
पञ्चरात्र और मूल-रामायणको 'वेद' कहा गया है।
पण्डितगण जो सब वैष्णव अर्थात् सात्त्विक पुराण हैं,
उन्हींको यहाँपर 'वेद'के रूपमें जानते हैं। इनके
स्वतःप्रमाण-विषयमें किसी प्रकारका विचार (तर्क) नहीं
चलता है॥” 133-137॥
सविशेष श्रीभगवान् ही श्रुतिका उद्दिष्ट विषय :—
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (6/67) में उद्धृत
हयशीर्ष-पञ्चरात्रवचन—
या या श्रुतिर्जल्पति निर्विशेषं
सा साभिधत्ते सविशेषमेव।
विचारयोगे सति हन्त तासां
प्रायो बलीयः सविशेषमेव ॥ 142 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो जो श्रुति तत्त्ववस्तुको 'निर्विशेष'
कहकर कल्पना करती है, वही-वही श्रुति अन्तमें
सविशेष-तत्त्वको ही प्रतिपादित करती है। 'निर्विशेष'
और 'सविशेष'—भगवान्‌के ये दोनों गुण ही नित्य हैं।
इसका विचार करनेपर सविशेष-तत्त्व ही प्रबल हो
जाता है; क्योंकि जगत्में सविशेष-तत्त्वका ही अनुभव
होता है, निर्विशेष-तत्त्वका अनुभव नहीं होता ॥ 142 ॥
अनुभाष्य—
या या श्रुतिः (वेदमन्त्रः) निर्विशेषं (ब्रह्मणः विशेषरहितभावं
केवलचिन्मात्रं) जल्पति (प्रकाशयति), सा सा श्रुतिः सविशेषं
(नामरूपगुणलीलादिरूपम्) एव अभिधत्ते (मुख्यया अभिधया
वृत्त्या वदति); हन्त तासां (श्रुतीनां) विचारयोगे सति
(सूक्ष्मानुशीलनेन) प्रायः (सर्वतोभावेन) सविशेषं एव वलीयः
(वेद-वचनानां मुख्यतात्पर्यम्)।
श्लोक-भावानुवाद—जो जो श्रुति तत्त्ववस्तुको केवल
चिन्मात्र 'निर्विशेष' कहकर प्रकाश करती है, वही-वही
श्रुति मुख्य अर्थात् अभिधा वृत्तिसे सविशेष-तत्त्वको ही
। 183

[ 6/142-144 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

कहती है। श्रुतियोंका सूक्ष्मरूपसे विचार करनेपर सब
प्रकारसे सविशेष-तत्त्व ही वेदोंका मुख्य तात्पर्य दिखलायी
देता है॥ 142 ॥
श्रीभगवान् ही सभी कारकोंकी उद्दिष्ट-वस्तु :-
ब्रह्म हैते जन्मे विश्व, ब्रह्मेते जीवय।
सेइ ब्रह्मे पुनरपि हुये याय लय॥ 143 ॥
‘अपादान’, ‘करण’, ‘अधिकरण’—कारक तिन।
भगवानेर सविशेषे एइ तिन चिह्न॥ 144 ॥
अनुवाद—ब्रह्मसे ही इस विश्वकी सृष्टि होती है,
ब्रह्मसे ही विश्वकी स्थिति रहती है और इसी ब्रह्ममें
यह विश्व प्रलयके समय लीन हो जाता है। ‘अपादान’,
‘करण’ तथा ‘अधिकरण’–ये तीन कारक ही भगवान्‌के
सविशेष रूपके तीन चिह्न हैं॥ 143-144 ॥
अनुभाष्य—(ऐतःउः 1/1/1-2)—
“आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्।
नान्यत् किञ्चन मिषत्।
स इमान् लोकानसृजत।”
(श्वेःउः 4/9)—
“छन्दांसि यज्ञाः क्रु
भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति।
यस्मान् मायी सृजते विश्वमेतत्
तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः॥”
(तैःउःभृः 1अः)—
“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति,
यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म।”
वारुणि-भृगुके द्वारा पिता वरुणसे ब्रह्मके सम्बन्धमें
जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें वरुणके यह वचन हैं।
इस मन्त्रमें ‘यतः’ (जिस ब्रह्मसे विश्वका उदय हुआ
है)—अपादान-कारक है; ‘येन’ (जिस ब्रह्मके द्वारा
विश्व पालित है)—करण-कारक है; ‘यत’ अर्थात्
‘यस्मिन्’ (जिस ब्रह्ममें विश्व प्रवेश करता
है)—अधिकरण-कारक है। श्रीराघवेन्द्र-यति कृत टीका—
“अन्नमयं प्राणमयं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं मनोमयं वाङ्मयं
विज्ञानमयं आनन्दमयञ्च इत्येवं नामैकदेशे नामग्रहण-न्यायेन
अयं निर्देशो ध्येयः। विज्ञानमयानन्दमय एवाप्युपलक्ष्यौ, एतेन
ब्रह्मवल्ल्यां पञ्चरूपोक्ति-रूपलक्षणम्। चक्षुर्मय-वाङ्मय-श्रोत्रमया
अपि ग्राह्या इत्युक्तं भवति। तथाह्युक्तं ‘वाधूल’-शाखायाम्—
“तस्माद्वा एतस्मात् अन्न-रसमयात् अन्योऽन्तर आत्मा वाङ्मयः।
तस्माद्वा एतस्माद्वाङ्मयात् अन्योऽन्तर आत्मा चक्षुर्मयः। तस्माद्वा
एतस्माच्चक्षुर्मयात् अन्योऽन्तर आत्मा श्रोत्रमयः। चक्षुर्मयत्वादेस्तु
पूर्णदर्शनशक्तित्वाच्चक्षुर्मय इतरितः।” इति ऐतरेयभाष्योक्तरीत्या
पूर्णदर्शन-शक्तित्व-पूर्णश्रवणशक्तित्व-पूर्णवक्तृत्वशक्तिस्वरूपा वा।
यत्प्रयन्ति प्रलये। यदभि—स्वेच्छया—संविशन्ति मुक्तौ,
तद्विजिज्ञासस्व।” (भाः1/5/20)—“इदं हि विश्वं भगवानिवेत्तरो
यतो जगत्स्थान-निरोधसम्भवाः।”
अर्थात् (ऐतरेय उपनिषद्—) “सृष्टिके पूर्व एकमात्र
परमेश्वर ही थे, उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं
था। उन्होंने ही इन समस्त लोकोंकी सृष्टि की है।”
(श्वेताश्वतर उपनिषद्—) “वेदसमूह, सभी यज्ञ, समस्त
क्रतु, व्रतसमुदाय, यह विश्व और वेदोंमें उक्त अन्यान्य
भूत एवं भविष्यत् जो कुछ है, सभीकी मायाके
अधीश्वर परमात्माने सृष्टि की है—जिससे अन्य सभी
जीव उस मायासे बद्ध होकर रह रहे हैं।” (तैत्तिरीय
उपनिषद्—) “जिनसे ये समस्त जीव उत्पन्न हुए हैं,
जिनके द्वारा ही उन सब जीवोंका पालन होता है,
जिनमें धावित होकर जीव अन्तमें लीन होते हैं, उनको
ही विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करो, वे ही ब्रह्म हैं।”
(श्रीराघवेन्द्र यतिकृत टीका—) “नामके एकदेश-ग्रहणके
द्वारा वही नाम ही गृहीत होता है—इस न्यायानुसारसे
‘अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनोवाचं’, इनके द्वारा अन्नरसमय,
प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोतमय, मनोमय, वाङ्मय, विज्ञानमय,
आनन्दमय ब्रह्म इस क्रमसे ऐसे निर्देश चिन्तनीय है।
(उनमें) विज्ञानमय, आनन्दमय ये दो उपलक्ष्य (प्रयोजनीय)
हैं; इसी कारण ब्रह्मवल्लीमें कथित पाँचरूप (अन्नमय,
प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय)-उक्ति उपलक्षण
हैं। यहाँपर चक्षुर्मय, वाङ्मय, श्रोतमय भी ग्रहणीय कहे
गये हैं। वह ‘वाधुल-शाखा’में दिखायी देता है, जैसे,—‘वह

184 ।

छठा अध्याय 6/143-147 ]
इस अन्नरसमयसे भिन्न अन्य एक आत्मा वाङ्मय है। पहले मायाके प्रति दृष्टि-निक्षेप, उसके फलस्वरूप सृष्टि,
वह इस वाङ्मयसे भिन्न अन्य एक आत्मा चक्षुर्मय है। इसलिये भगवान्की दृष्टि-दर्शनादि-अप्राकृत :-
वह इस चक्षुर्मयसे भिन्न अन्य एक आत्मा श्रोतमय है। से काले नाहि जन्मे 'प्राकृत' मन-नयन।
चक्षुर्मयत्व आदिका पूर्णदर्शनशक्तित्व होनेके कारण अतएव 'अप्राकृत' ब्रह्मोर नेत्र-मन॥ 146॥
चक्षुर्मय कहा गया है। अथवा ऐतरेय-भाष्यमें कथित
रीतिके अनुसारसे पूर्णदर्शनशक्तित्व, पूर्णश्रवणशक्तित्व, अनुवाद-सृष्टिसे पहले 'प्राकृत' मन और नेत्रोंकी
पूर्णवक्तृत्वशक्तिस्वरूप है। 'यत्प्रयन्ति' अर्थात् प्रलयकालमें उत्पत्ति ही नहीं हुई थी, इसलिये यह प्रमाणित होता है
जीवगण जिनके प्रति (जिनकी ओर) गमन करते हैं। कि ब्रह्मके नेत्र और मन अप्राकृत हैं॥ 146 ॥
'यदभिसंविशन्ति'-मुक्तगण स्वेच्छासे जिनमें सम्यक् प्रवेश अनुभाष्य-सृष्टि करनेके उद्देश्यसे प्राकृतशक्तिपर
करते हैं, उनको विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करो।" दृष्टिपात करनेसे पहले उन्होंने अप्राकृत नेत्रोंके द्वारा
(श्रीमद्भागवतमें-) “यह विश्व भगवान्का अंशस्वरूप दृष्टिपात किया था। उस दर्शनके समय प्राकृत नेत्रोंकी
है अर्थात् उनसे प्रपञ्च पृथक् नहीं है; परन्तु इस सृष्टि नहीं हुई थी, क्योंकि प्राकृत-सृष्टि यदि उससे
प्रपञ्चसे भगवान् पृथक् हैं, जिनसे इस जगत्की पहले हुई होती, तो उनकी सृष्टि-प्रवृत्तिका उल्लेख
सृष्टि-स्थिति-प्रलय होती है।" करनेकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। तब सविशेष-ब्रह्मका
भाः (6/4/30) श्लोककी श्रीधर स्वामीकी टीका नित्य अप्राकृत मन था, जिसके द्वारा उन्होंने प्राकृत
देखें॥ 143-144 ॥ सृष्टिका मनन किया था और उनके नित्य अप्राकृत
नेत्र भी थे, जिनके द्वारा उन्होंने प्रकृति-शक्तिपर
अद्वयज्ञान (एक) श्रीकृष्णसे अनेक प्रकाश दृष्टिपात किया था॥ 146॥
ही प्रत्यक् अथवा श्रौत सिद्धान्त है, विभुचित् या विष्णु-परतत्त्व श्रीकृष्ण ही भगवान् :-
अनेकसे एकका सिद्धान्त-अश्रौत :- ब्रह्म-शब्दे कहे पूर्ण स्वयं भगवान्।
भगवान् अनेक हैते यबे कैल मन। स्वयं भगवान् कृष्ण, -शास्त्रेर प्रमाण॥ 147 ॥
प्राकृत-शक्तिते तखन कैल विलोकन ॥ 145 ॥
अनुवाद-'ब्रह्म'-शब्दका अर्थ पूर्ण स्वयं भगवान् है
अनुवाद-भगवान्ने जब एकसे अनेक होनेकी और श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं,-यह शास्त्रोंका प्रमाण
इच्छा की, तब उन्होंने प्राकृत शक्तिके ऊपर दृष्टिपात है॥ 147 ॥
किया॥ 145 ॥
अनुभाष्य-“शास्त्रयोनित्वात्” (ब्रः सूः 1/1/3) इस
अनुभाष्य- (छाःउः 6ठा प्रः 2/3)- सूत्रके भाष्यमें श्रीमन्मध्वाचार्यपादने कहा है-
“तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति।” “ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम्।
(तैःउः 2/6/1)- मूलरामायणञ्चैव शास्त्रमित्यभिधीयते॥
“सोऽकामयत् बहु स्यां प्रजायेयेति॥" यच्चानुकूलमेतस्य तच्च शास्त्रं प्रकीर्तितम्।
[(छाःउः)-उन सच्चिदानन्द भगवान्ने सङ्कल्प किया अतोऽन्यग्रन्थविस्तारो नैव शास्त्रं कुवर्त्म तत्॥ इति स्कान्दे।”
कि अनन्त चिद्-अचिन्मिश्र व्यष्टि जगत्रूपमें मैं ही अर्थात् ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद, महाभारत
अनेक हो जाऊँ। (तैःउः) - उन सच्चिदानन्द भगवान्ने (पुराणसहित) सात्वत-तन्त्र, पञ्चरात्र और मूल रामायण-यही
कामना की मैं अनेक हो जाऊँ] ॥ 145 ॥ 'शास्त्र'-शब्दसे कहे जाते हैं तथा इनके अनुकूल ग्रन्थ
। 185

[ 6/143-150 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भी शास्त्रोंमें गिने जाते हैं; इनके अतिरिक्त अन्य जो
सब ग्रन्थ हैं, वे शास्त्र ही नहीं हैं, परन्तु उन्हें ‘कुवर्त्म’
अर्थात् ‘कुमार्ग’ कहते हैं। आदिलीला, दूसरा अध्याय
देखें ॥ 147 ॥
वेदके अर्थको पूर्ण करनेवाले और अति पुराने युगोंमें
प्रकाशित होनेके कारण पुराण अर्थात् प्राचीन नाम :–
वेदेर निगूढ़ अर्थ बुझन ना हय।
पुराण-वाक्ये सेइ अर्थ करय निश्चय ॥ 148 ॥
अनुवाद—वेदोंके गूढ़ अर्थ सरलतासे समझमें नहीं
आते, इसलिये पुराण वाक्योंके द्वारा उन अर्थोंको
अच्छी प्रकारसे समझा जा सकता है॥ 148 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— “यतो वा इमानि भूतानि
जायन्ते”—(तैः भृः 1) आदि श्रुतिवाक्योंमें यह पाया
जाता है, ‘यह चराचर विश्व ब्रह्मसे ही जन्म लेता है,
ब्रह्मके द्वारा ही जीवित रहता है और उसी ब्रह्ममें ही
पुनः लीन हो जाता है।’ इन सब वेदवाक्योंके द्वारा
परब्रह्मके ‘अपादान’, ‘करण’ और ‘अधिकरण’-कारकत्व
रूपी तीन प्रकारके लक्षण हैं। इन तीन प्रकारके
नित्य-लक्षणोंके द्वारा भगवान् नित्य-सविशेषरूपमें व्यक्त
होते हैं। “बहु स्याम्” (तैःउःब्रः 6 अः) आदि
श्रुति-मतानुसार भगवान्ने जब अनेक होनेकी इच्छा
की, तब “स ऐक्षत” (ऐतःउः 1/1) इस वाक्यके
मतानुसार प्राकृत-शक्तिपर उन्होंने दृष्टिपात किया। उस
समय प्राकृत मन और नेत्रोंकी सृष्टि नहीं हुई थी;
इसलिये भगवान्ने जिस मनमें चिन्ता की, जिस नयनसे
प्रकृतिके प्रति दृष्टिपात किया, वे मन और नेत्र प्राकृत
सृष्टिके पहले ही थे। इसलिये परब्रह्मके स्वरूपगत
अप्राकृत नेत्र और मन थे—यह सभी वेदोंके द्वारा
सम्मत है। उपनिषद् वाक्योंमें प्रायः सर्वत्र ही ‘ब्रह्म’-शब्द
पाया जाता है। वही ब्रह्म ही अपनी पूर्ण अवस्थामें
स्वयं भगवान् है,—यही वेदसम्मत है और शास्त्र-प्रमाणके
द्वारा भी यही सिद्ध हो रहा है कि श्रीकृष्ण ही वही
स्वयं भगवान् हैं। यदि कहें, वेदोंमें इस प्रकारसे स्पष्ट
वाक्य नहीं है (या फिर दिखाई नहीं देते), तब विचार
करके देखो,—वेद वाक्योंके अर्थसमूह अत्यन्त निगूढ़
हैं। महर्षियोंने वेदवाक्योंके तात्पर्यको जगत्में समझानेके
लिये पुराण-वाक्योंके द्वारा वेदोंके तात्पर्यका निर्णय
किया है॥ 143-148 ॥
अनुभाष्य—श्रीजीवप्रभु-कृत तत्त्वसन्दर्भकी 12-17
संख्या और श्रीबलदेव-कृत टीका देखें॥ 148 ॥
श्रीमद्भागवत (10/14/32)—
अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्।
यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ 149 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 149 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—नन्द-गोप और व्रजवासियोंके
भाग्यकी कोई सीमा नहीं है, क्योंकि परमानन्दस्वरूप
पूर्णब्रह्म-सनातन उनके मित्ररूपमें प्रकट हुए हैं॥ 149 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका अभिमान
चूर्ण-विचूर्ण होनेपर ब्रह्मा एकान्त शरणागत होकर
श्रीकृष्णका स्तव करते-करते श्रीकृष्णप्रिय व्रजवासियोंके
अत्यधिक प्रेम-सौभाग्यकी प्रशंसा कर रहे हैं—
नन्द-गोपव्रजौकसां (नन्दराजप्रमुख-पञ्चरसावस्थितानां व्रजवासिनाम्)
अहो भाग्यं; यत् (येषां व्रजवासिनां) मित्रं सनातनं
(नित्यकालप्रकटितं) पूर्णम् (अखण्डं) परमानन्दं (सच्चिद्घनानन्दं),
ब्रह्म।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 149 ॥
श्रुतिमन्त्रोंमें जड़विशेषाका खण्डन करके अप्राकृत
सच्चिदानन्द-विग्रहत्व ही उद्दिष्ट :–
‘अपाणि-पाद’-श्रुति वर्जे ‘प्राकृत’ पाणि-चरण।
पुनः कहे,—शीघ्र चले, करे सर्व ग्रहण ॥ 150 ॥
अनुवाद—‘अपाणि-पाद’-श्रुतिवचन ब्रह्मके ‘प्राकृत’
हाथ-पैर होनेका निषेध करती है, फिर वही श्रुति यह
भी कहती है कि ब्रह्म तेजीसे चलते हैं और उनको
अर्पित सब वस्तुओंको वे ग्रहण भी करते हैं॥ 150 ॥
186 ।

छठा अध्याय 6/150–153 ]
अनुभाष्य—(श्वेःउः 3/19)—
“अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥”
अर्थात् “पुरुषोत्तम भगवान् अपने अप्राकृत सच्चिदानन्द
स्वरूपमें सदा विराजमान हैं। उनके किसी प्रकारसे
प्राकृत पैर-हाथादि नहीं हैं, किन्तु अपनी अचिन्त्यशक्तिके
बलसे वे उन अप्राकृत पैरोंसे चलते हैं, हाथोंसे भक्तोंके
द्वारा अर्पित द्रव्योंको ग्रहण करते हैं। केवल ऐसा ही
नहीं है, उनके पैरोंसे चलनेकी गति इतनी अधिक है
कि इस जगत्की किसी भी शक्तिके प्रयोगसे उतना
गतिशील नहीं हुआ जा सकता। इसीके अनुरूप उनके
अप्राकृत दोनों हाथ सर्वत्र विराजमान हैं, क्योंकि वे
प्रेमीभक्तोंकी निवेदित वस्तुको सादर ग्रहण करते हैं।
उनके प्राकृत नेत्र नहीं होनेपर भी वे उन अप्राकृत
नेत्रोंके द्वारा सभीके द्रष्टा हैं। उनके प्राकृत कान नहीं
होनेपर भी वे अपने अप्राकृत कानोंके द्वारा प्रेमी
भक्तोंके द्वारा किया गया अपने अप्राकृत नाम-रूप-गुणादिका
कीर्तन श्रवण करते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, परन्तु उनके
अप्राकृत स्वरूपको कोई प्राकृत व्यक्ति नहीं जान
सकता। एकमात्र जो उनके ऐकान्तिक भक्त हैं, वे
उनकी कृपासे दिव्यज्ञान प्राप्त करके उनके असमोध्र्व
अचिन्त्य स्वरूपको जान पाते हैं॥” 150 ॥
मुख्यवृत्तिमें सविशेषत्व और गौणवृत्तिमें निर्विशेषत्व :—
अतएव श्रुति कहे, ब्रह्म—सविशेष।
'मुख्य' छाड़ि' 'लक्षणा'ते माने निर्विशेष॥ 151 ॥
अनुवाद—इसलिये श्रुतियाँ ब्रह्मको सविशेष कहती
हैं। परन्तु मुख्य अभिधावृत्तिको छोड़कर लक्षणावृत्ति
ग्रहण करनेवाले (मायावादी) ब्रह्मके स्वरूपको निर्विशेष
रूपमें ही स्वीकार करते हैं॥ 151 ॥
अनुभाष्य—पूर्व-उल्लिखित श्रुतिके वचनोंने ब्रह्मके
विशेषत्वका ही निरूपण किया है; किन्तु मुख्य
अभिधावृत्तिका त्याग करके लक्षणाके द्वारा मायावादी
निर्विशेष-मतवादकी स्थापना करते हैं। लक्षणाके द्वारा
सिद्ध निर्विशेषत्व भी विशेषवादका ही एक परिचय मात्र
है; जड़-जगत्की विशेषताओंसे ब्रह्मका पार्थक्य स्थापन
करना उसका उद्देश्यमात्र है॥ 151 ॥
चिद्विलासका निर्विलासके रूपमें स्थापन ही मायावाद :—
षडैश्वर्यपूर्णानन्द-विग्रह याँहार।
हेन-भगवाने तुमि कह निराकार? ॥ 152 ॥
स्वाभाविक तिन शक्ति येइ ब्रह्मे हय।
'निःशक्तिक' करि' ताँरे करह निश्चय? ॥ 153 ॥
अनुवाद—जिनका षडैश्वर्यपूर्ण सच्चिदानन्द विग्रह
है, उन भगवान्‌को आप निराकार कह रहे हैं? जिन
ब्रह्मकी तीन स्वाभाविक शक्तियाँ हैं, क्या आप यह
प्रमाणित करना चाहते हैं कि वे 'निःशक्तिक' अर्थात्
शक्तिहीन हैं? ॥ 152–153 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—“अपाणिपादो जवनो ग्रहीता”
(श्वेः उः 3/19)—यह श्रुति वाक्य है। ब्रह्मके 'प्राकृत
हाथ-पैर नहीं हैं' ऐसा पहले कहकर बादमें 'शीघ्र चलते
हैं और सभी वस्तुओंको ग्रहण करते हैं'—इस वाक्यके
द्वारा 'अप्राकृत हाथ-पैर हैं' कहकर ब्रह्मको 'सविशेष'
स्थापित किया है। श्रुतिके मुख्यार्थको छोड़कर लक्षणा-वृत्तिसे
ब्रह्मके सविशेष-निषेधक निर्विशेषत्वका अन्यायरूपमें
स्थापन कर रहे हैं। मायावादी ब्रह्मको नित्य निराकार
कहकर स्थापित करते हैं, परन्तु शास्त्रके मतानुसार वे
ब्रह्म षडैश्वर्य-पूर्णानन्द-विग्रहवाले भगवद्-स्वरूपमें नित्य
विराजमान हैं। मायावादी ब्रह्मको 'निःशक्तिक' कहकर
स्थापित करते हैं, किन्तु 'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते”
(श्वेः उः 6/8)—आदि अनेक वेदवाक्यमूलक शास्त्र
वाक्योंमें उन ब्रह्मकी तीन स्वाभाविक शक्तियाँ स्वीकृत
हुई हैं॥ 150–153 ॥
अनुभाष्य—शक्तिको अज्ञानके द्वारा उत्पन्न अनित्य
विशेष-अवस्था माननेके कारण केवलाद्वैतवादियोंका विचार
है कि निःशक्तित्व ही ब्रह्मका लक्षण है। किन्तु ब्रह्ममें
तीन शक्तियाँ नित्य विराजमान होनेपर भी काल्पनिक
। 187

[ 6/153–160 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
गुणोंका आरोपवाद आदि विचारोंकी सहायतासे ब्रह्मको
शक्तिहीन कहकर निर्धारित करनेका कोई प्रयोजन नहीं
है॥ 153॥
विष्णुपुराण (6/7/61-63)—
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा।
अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ 154 ॥
अनुवाद—विष्णुशक्ति—परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या
नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही
‘चित्-शक्ति’ है, क्षेत्रज्ञा शक्ति ही ‘जीवशक्ति’ है
(जिसको मायारूपा ‘अविद्या’ से ‘अपरा’ अर्थात् भिन्ना
कहा गया है) और कर्म नामक अविद्याशक्तिका नाम
‘माया’ है॥ 154 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें ॥ 154 ॥
यया क्षेत्रज्ञशक्तिः सा वेष्टिता नृप सर्वगा।
संसारतापानखिलानवाप्नोत्यत्र सन्ततान् ॥ 155 ॥
तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्रज्ञसंज्ञिता।
सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन वर्त्तते ॥ 156 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 155-156॥
अमृतप्रवाह भाष्य—क्षेत्रज्ञ-शक्ति ही जीवशक्ति है;
वह जीवशक्ति सर्वज्ञ होनेपर भी मायावृत्तिरूप अविद्याके
द्वारा आवृत्त होकर संसारके समस्त तापोंको नित्य भोग
करती है। और, वही ‘क्षेत्रज्ञ’-नामक शक्ति अविद्या-कुण्ठासे
आवृत्त होकर, हे भूपाल, सभी जीवोंमें तारतम्यके सहित
वर्त्तमान रहती है। तात्पर्य यह है, भगवान्‌की
चिद्-शक्ति—सर्वश्रेष्ठा, जीव-शक्ति—मध्यमा और
अविद्या-कर्म कहलानेवाली माया शक्ति—अधमा है।
जीवशक्ति मायाके द्वारा आवृत्त होकर अर्थात् चिद्-शक्तिकी
वृत्तिसे दूर होकर संसारके तापोंको भोगती है। वह
चिद्-शक्तिसे दूर रहते हुए अपने द्वारा किये हुए
कर्मोंके चक्रमें प्रवेश करके ऊँची-नीची अवस्थाएँ प्राप्त
करती है॥ 155-156॥
अनुभाष्य—
हे नृप, सर्वगा (चिज्जड़ोभयगामिनी) सा क्षेत्रज्ञशक्तिः
(जीवाख्यशक्तिः) यया (अविद्यया भगवद्विमुखया मायया) वेष्टिता
(आवृता); अत्र (देवीधामनि संसारे) सा सन्ततान् (नानाकर्म-
फलभोगजन्यान्) अखिलान् (नानाविधान्) तापान् अवाप्नोति
(लभते)॥ हे भूपाल, तया (अविद्यया) तिरोहितत्वात्
(गुणमायासङ्गहीनात्) क्षेत्रज्ञ-संज्ञिता शक्तिः (जीवशक्तिः)
[भगवद्वैमुख्यविधायिन्यविद्या-वर्त्तमानत्वात्] सर्वभूतेषु तारतम्येन
वर्त्तते (अविद्यया वरांवरा च मन्यते)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 155-156 ॥
विष्णुपुराण (1/12/69)—
ह्लादिनी सन्धिनी संवित् त्वय्येका सर्वसंश्रये।
ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुण-वर्जिते ॥ 157 ॥
अनुवाद—हे भगवन् ! आप सभीके आश्रय और
निर्गुण हैं। आपमें स्थित त्रिविधरूप शक्ति ‘ह्लादिनी’,
‘सन्धिनी’ और ‘संवित्’, तीनों चिन्मय हैं। मायाके
वशमें होने योग्य चित्-कण जीव जब मायामें आविष्ट
होकर मायाके तीन गुणोंका आश्रय करते हुए जिस
अवस्थाको प्राप्त करते हैं, उस अवस्थामें वह शक्ति
‘ह्लादकारी’ (सात्त्विक), ‘तापकरी’ (तामसिक) और
‘मिश्रा’ (राजसिक)—इन तीन प्रकारके भावोंको प्राप्त
करती है। किन्तु सभी गुणोंसे अतीत आपमें यह शक्ति
निर्मल और निर्गुणस्वरूपमें एकाकार होकर रहती
है॥ 157 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला, 4/63 संख्या देखें ॥ 157 ॥
शक्तिमान् भगवान्‌की तीन शक्तियाँ :—
सच्चिदानन्दमय हय ईश्वर-स्वरूप।
तिन अंश चिच्छक्ति हय तिन रूप ॥ 158 ॥
आनन्दांशे ‘ह्लादिनी’, सदांशे ‘सन्धिनी’।
चिदंशे ‘संवित्’, यारे कृष्णज्ञान मानि ॥ 159 ॥
अन्तरङ्गा—चिच्छक्ति, तटस्था—जीवशक्ति।
बहिरङ्गा—माया,—तिने करे प्रेमभक्ति ॥ 160 ॥
188 ।

छठा अध्याय 6/158-163
चिद्विलासकी निर्विशेषरूपमें धारणा-दम्भमात्र :-
षड्‌विध ऐश्वर्य-प्रभुर चिच्छक्ति-विलास।
हेन शक्ति नाहि मान,—परम साहस॥161॥
भगवान् और जीवका नित्य भेद,
केवल-अभेदवाद-नास्तिकता :-
'मायाधीश'-'मायावश'—ईश्वरे-जीवे भेद।
हेन-जीवे ईश्वर-सह कह त' अभेद॥162॥
गीतामें 'जीव'-भगवच्छक्ति :-
गीताशास्त्रे जीवरूप 'शक्ति' करि' माने।
हेन-जीवे 'भेद' कर ईश्वरेर सने॥163॥
अनुवाद-ईश्वरका स्वरूप सच्चिदानन्दमय है। तीन
अंशोंमें भगवान्‌की एक ही चिद्-शक्ति तीन रूपोंमें
प्रकाशित होती है। आनन्द-अंशसे 'ह्लादिनी', सत्-अंशसे
'सन्धिनी' और चित्-अंशसे 'सम्वित्', वही सम्वित् ही
श्रीकृष्ण-सम्बन्धीय ज्ञान है। 'अन्तरङ्गा' अर्थात् चिद्-शक्ति
स्वयं, 'तटस्था' अर्थात् जीवशक्ति, 'बहिरङ्गा' अर्थात्
मायाशक्ति-तीनों शक्तियाँ ही भगवान्‌की प्रेममयी सेवा
करती हैं। भगवान्‌का षड्‌विध ऐश्वर्य ही उनकी
चिद्-शक्तिका विलास है। उनकी ऐसी शक्तिको नहीं
मानते हो, तो यह आपका दुःसाहस या धृष्टता है।
ईश्वर मायाधीश हैं और जीव मायाके वशमें होने योग्य
है, ऐसे जीवको ईश्वरके साथ अभेद कहते हो।
गीताशास्त्रमें जीवको भगवान्‌की शक्ति कहा गया है, तो
भी आप कहते हैं कि जीव और भगवान्‌में पूर्णतया
भेद है (अमृतप्रवाह भाष्य देखें) ॥158-163॥
अमृतप्रवाह भाष्य-वेद-वेदान्त-मतानुसार-ईश्वर,
जीव और माया, इन तीन तत्त्वोंका स्वरूप और
सम्बन्ध जानना आवश्यक है। सर्वप्रथम ईश्वरके
स्वरूपको जानना अति आवश्यक है। ईश्वरका स्वरूप
सच्चिदानन्दमय ही है। भगवान्‌की एक चिद्-शक्ति ही
'सत्', 'चित्' और 'आनन्द'-इन तीन अंशोंमें तीन
रूपोंमें प्रकाशित होती है। आनन्द-अंशसे 'ह्लादिनी',
सत्-अंशसे 'सन्धिनी' और चित्-अंशसे 'सम्वित्'। वही
सम्वित् ही श्रीकृष्ण-सम्बन्धीय ज्ञान है। ईश्वरकी
स्वरूपशक्ति तीन स्वरूपोंमें प्रकाशित होती है—'अन्तरङ्गा'
अर्थात् चिद्-शक्ति स्वयं, 'तटस्था' अर्थात् जीवशक्ति,
'बहिरङ्गा' अर्थात् मायाशक्ति। इन तीन प्रकाशोंमें ह्लादिनी,
सन्धिनी और सम्वित्‌के क्रियानुसार तीन-तीन भाव
समझने चाहिये। चिद्-शक्ति अपनी ह्लादिनी और
सम्वित्‌के मिलितसार (भक्ति), जीवको प्रदान करनेके
बाद, जीवशक्ति यदि उसको ग्रहण करती है, तब
निष्कपट-चिद्-शक्तिके प्रभावसे मायाशक्तिका आवरण-
विक्षेपात्मक अचित्-विक्रम दूर होकर जीवको
कृष्णप्रेमभक्तिका अधिकारी बना देता है। परमेश्वरका
षड्‌विध ऐश्वर्य ही उनका ऐश्वर्य विलास है; उनको
'निराकार', 'निःशक्तिक' कहनेसे अत्यन्त अवैदिक
वाक्यका प्रयोग होता है। ईश्वर-स्वभावतः ही मायाके
अधीश्वर हैं; जीव-स्वभावतः ही अणु-चैतन्य होनेके
कारण मायाके वशमें होने योग्य है।
मुण्डकोपनिषद् (3/1/1-2)में कहा गया है-
“द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति॥
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः॥”
अर्थात् “प्रत्येक जीवके देहरूप वृक्षमें परमात्मा
और आत्मा, दोनों सख्यभावसे नित्य वास करनेपर भी
जीवात्मा विवर्तवशः अपने पुराने और वर्तमान कर्मफलोंका
भोक्ता है, इसी अभिमानमें आसक्त होता है। किन्तु
परमात्मा यद्यपि उसी वृक्षमें अवस्थान करते हैं, किन्तु
वे किसीरूपमें कर्मफलके भोक्ता नहीं हैं, केवल
साक्षीरूप और प्रयोजककर्त्ताके रूपमें अवस्थान करते
हैं। माया उनको स्पर्श नहीं कर पाती। जीवका तटस्थ
धर्म और बहिर्मुख वृत्ति होनेके कारण वह सब समय
मायाके तीन तापोंसे दग्ध होता है। जीव यदि किसी
रूपमें अज्ञात पारमार्थिक सुकृति लाभ करे, तभी वह
स्वयंको मायाके हाथोंसे छूटनेमें असहाय और बलहीन
पाता है और तब वह चिद्बल पानेके लिये व्याकुल
। 189

[ 6/158–166 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

होता है। तब साक्षी पुरुषरूपी परमात्मा उसको तत्त्वज्ञ
और तत्त्वदर्शी गुरुके द्वारा कृपा प्रदान करते हैं। उस
कृपाको ग्रहणकर वह गुरुके आनुगत्यमें भक्ति करते हुए
भगवान्‌के सच्चिदानन्दरूपको जानकर मायासे अतीत
वैकुण्ठ या गोलोकमें भगवान्‌की नित्य सेवा प्राप्त करता
है।”
अर्थात् 'ईश्वरको भूलनेपर जीव दण्डका भागीदार
होता है, ईश्वरके द्वारा बनाये गये कारागारकी रक्षयित्री
माया उस अपराधके कारण जीवको कारागारमें बन्द
करके दण्ड देती है।' यहाँपर यह प्रमाणित होता है कि
ईश्वर स्वभावतः मायाके अधीश हैं, मायाके वशीभूत
नहीं।
जीवके स्वभावमें मायारहित सत्ता रहनेपर भी
मायाके वशमें होने योग्य एक धर्म है, उसीका नाम ही
'तटस्थत्व' है, इसलिये जीवको तटस्थ कहा जाता है।
जब जीवमें ऐसा स्वभावगत (मायाके वशीभूत होने
योग्य) और स्वरूपगत (मायारहित सत्ता) नित्य भेद है,
तब ऐसा नहीं कह सकते कि किसी विशेष अवस्थामें
जीव ईश्वरसे अभेद है। और, गीताशास्त्रमें जीवोंको
'शक्ति' कहा गया है, तब “शक्तिशक्तिमतोरभेदः” इस
वेदान्त वाक्यके अनुसार ईश्वरके साथ जीवका जो
अभेद बतलाया गया है, उसे भी स्वीकार करनेके लिये
हम बाध्य हैं। ईश्वर और जीव तत्त्वका यही
अचिन्त्यभेदाभेद ही रहस्य है॥158-163॥

अनुभाष्य—आदिलीला 4/61-62 संख्या
देखें॥158-159॥


[R1] अनुवाद—मेरी बहिरङ्गा प्रकृति भूमि, जल, अग्नि,
[R2] वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार—इन आठ
[R3] भागोंमें विभक्त है। किन्तु, आठ भेदोंवाली यह जड़ा
[R4] प्रकृति निकृष्टा है। इससे उत्कृष्ट जीवस्वरूपा मेरी एक
[R5] और प्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह जगत् अपने
[R6] कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है॥164-165॥

[R7] अमृतप्रवाह भाष्य—भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश,
[R8] मन, बुद्धि और अहङ्कार—ये आठ मेरी ही अपरा
[R9] शक्तिकी विशेष वृत्तियाँ हैं; जीवतत्त्व इससे पृथक्
[R10] है॥164-165॥

[R11] अनुभाष्य—अर्जुनके प्रति भगवान् श्रीकृष्णकी उक्ति-
[R12] भूमिः, आपः, अनलः, वायुः, खं, मनः, बुद्धिः, अहङ्कारः
[R13] च इति अष्टधा मे (मम) भिन्ना प्रकृतिः (बहिरङ्गाख्या शक्तिः)
[R14] एव। (भूम्यादि-शब्दैः पञ्च महाभूतानि, सूक्ष्मभूतैः रूपरसगन्ध-
[R15] शब्दस्पर्शादिभिः सहैकीकृत्य संगृह्यन्ते; अहङ्कार-शब्देन
[R16] तत्तत्कार्यभूतानीन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थानि तत्तत्कारण-
[R17] भूतमहत्तत्त्वमपि गृह्यते। बुद्धिममनसोः पृथगुक्तिस्तत्त्वेषु तयोः
[R18] प्राधान्यात्)।

[R19] श्लोक-भावानुवाद—भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश,
[R20] मन, बुद्धि और अहङ्कार, —यह मेरी आठ प्रकारकी
[R21] बहिरङ्गा कहलानेवाली शक्ति है। (भूमि आदि शब्दसे
[R22] पाँच महाभूत और उनके साथ सूक्ष्मभूत रूप, रस,
[R23] गन्ध, स्पर्श, शब्दादि पाँच तन्मात्राएँ मिलाकर जानना
[R24] होगा; अहङ्कार शब्दसे उन-उन कार्योंको करनेवाली
[R25] इन्द्रियाँ—वाणी, हाथ, पैर, मल-मूत्र द्वार तथा उनके
[R26] कारणस्वरूप महत्तत्त्वको ग्रहण करना होगा। बुद्धि और
[R27] मनको उनकी प्रधानताके कारण अलग तत्त्व कहा गया
[R28] है।)

[R29] श्लोक संख्या 165 के लिये आदिलीला 7/118
[R30] संख्या देखें॥164-165॥


भगवान्‌की गुण-माया और जीव-माया :—
श्रीमद्भगवद्गीता (7/4-5)—
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्न प्रकृतिरष्टधा ॥164॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥165॥

भगवद्-विग्रह—सच्चिदानन्दमय :—
ईश्वरेर श्रीविग्रह सच्चिदानन्दाकार।
से-विग्रहे कह सत्त्वगुणेर विकार ॥166॥

190 ।

छठा अध्याय 6/166-168 ]

नित्यचिद्विलास अस्वीकार पाषण्डता-मात्र :-
श्रीविग्रह ये ना माने, सेइ त' पाषण्ड।
अस्पृश्य, अदृश्य सेइ, हय यमदण्ड्य ॥ 167 ॥

**अनुवाद—**भगवान्का श्रीविग्रह सच्चिदानन्दमय है, किन्तु आप उस श्रीविग्रहको सत्त्वगुणका विकार कह रहे हैं। भगवान्के श्रीविग्रहको जो नहीं मानता है, वह पाखण्डी है। उस व्यक्तिको स्पर्श नहीं करना चाहिये, उसको देखना भी नहीं चाहिये, वह तो यमके द्वारा दण्डित होने योग्य है॥ 166-167 ॥

**अमृतप्रवाह भाष्य—**वेदशास्त्रके मतानुसार ईश्वरका सच्चिदानन्द विग्रह नित्य हैं। निराकार-धर्म-प्राकृत सत्त्वगुणके विपरीत रूपसे विशेष विकार है, अर्थात् जड़ीय सत्त्वमें जो आकार है, उसका निषेध करने वाला विशेष भाव है। प्रकृतिसे अतीत जो चिन्मय-विग्रह है, उसका आकार भी चिन्मय है। मायिक सत्त्वका निराकारत्व उसको स्पर्श नहीं कर सकता। ऐसे श्रीविग्रहको जो नहीं मानता, उसकी गिनती 'पाखण्डियों' में होती है॥ 166-167 ॥

**अनुभाष्य—**आदिलीला 7/113 संख्या देखें।

जो भगवान्के नित्य रूप-गुण-लीलामय विग्रहको प्राकृतिक सत्त्वगुणोंका विकार, अथवा समस्त अज्ञानका आधारमात्र समझकर अप्राकृत विग्रहके नित्य सेवा-परायण नहीं होते, वे पाखण्डी हैं। अर्थात् अनित्य काल्पनिक पाँच-देवताओंकी मिथ्या उपासना और भक्तिको एक समान माननेके कारण वे श्रीकृष्णके नित्य दासके पदसे गिर जाते हैं। भक्त उन पाखण्डियोंको स्पर्श नहीं करते और उसको देखते भी नहीं हैं, क्योंकि वे न्याय या अन्यायमय कर्मोंके द्वारा जड़ीय-भोगके लिये अथवा भोग-त्याग करनेके लिये अनात्माको (शरीरको) आत्मा मानकर वरण करते हैं। इस कारण वे भगवान्के नित्यविग्रह और लीलाको भी अपने सांसारिक भोग योग्य विषय ही समझते हैं। भक्तिविरोधी जड़ीय भोग-त्याग करनेपर भी उन्हें यमदण्ड भोगना ही पड़ेगा। केवलमात्र भक्तलोग ही पाखण्ड या यमदण्डके अधिकारमें नहीं हैं॥ 167 ॥

मायावादी मुखसे वैदिक होनेपर भी प्रच्छन्न बौद्ध :-
वेद ना मानिया बौद्ध हय त' नास्तिक।
वेदाश्रय नास्तिक्यवाद बौद्धके अधिक ॥ 168 ॥

**अनुवाद—**बौद्ध लोग वेदोंको नहीं मानते हैं, इसलिये वे 'नास्तिक' कहलाते हैं। किन्तु जो वेदोंका आश्रय लेकर भी नास्तिक्य-वादको मानते हैं, वे मायावादी बौद्धोंसे भी अधिक निन्दनीय हैं॥ 168 ॥

**अमृतप्रवाह भाष्य—**बौद्ध शाक्यसिंह वेदविधिको नहीं मानता था, वैदिक आर्यगण उसको 'नास्तिक' कहकर निन्दा करते हैं। किन्तु मायावादी वेदोंका आश्रय करके जो नास्तिक्यवाद प्रकाश कर रहे हैं, वह बौद्धवादकी अपेक्षा अधिकतर निन्दनीय है; क्योंकि स्पष्ट शत्रुकी अपेक्षा मित्ररूपमें आया छिपा हुआ शत्रु बहुत अधिक भयङ्कर होता है॥ 168 ॥

अनुभाष्य—'वेदाश्रय नास्तिक्यवाद'—केवलाद्वैतवाद है। वेद त्याग करके शाक्यसिंहने वैदिक-कर्मोंके अनुष्ठानोंसे छुटकारा पाया और उसने प्राकृत-नैष्कर्म्यकी स्थापना की। उसके मतानुसार, परलोकमें सच्चिदानन्द-रहित विग्रह विराजमान है। मायावादी वेदोंको मुखसे तो ग्रहण करते या मानते हैं। वे ऐसा मानते हैं कि वैदिक कर्मोंका अनुष्ठान भोगपरक अज्ञान है, ऐसा कहकर वे कर्मसे छुटकारा पाकर नैष्कर्म्यकी स्थापना करते हैं। उनके मतानुसार परलोकमें निर्बोध सच्चिदानन्द-विग्रह अर्थात् निर्विशेष केवल चिन्मात्र विराजमान है। अज्ञानमें स्थित मुक्तिकामी ज्ञानवादी सच्चिदानन्द-ज्ञानको भी 'खण्डज्ञान' या 'अज्ञानके प्रतिफलन'-रूपमें मानते हैं। इस प्रकार उन सच्चिदानन्द-ज्ञानके सम्बन्धमें किसी सम्विद्वृत्तिके अनुशीलनको भी अपने अज्ञानका ही एक प्रकारका भेदमात्र माननेके कारण भगवद्सेवासे दूर होते हैं। इसलिये शुद्ध सच्चिदानन्दकी अनुभूति अज्ञान-विग्रह ज्ञानवादियोंके लिये समझनेका विषय नहीं है। क्योंकि

। 191

[ 6/168-171 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

उनके सिद्धान्तमें निःशक्तिक-ब्रह्म—जड़मय अर्थात् 'ज्ञान',
'ज्ञेय', 'ज्ञाता',—इन तीनों अवस्थाओंसे रहित है।
जड़ाभिमानसे ग्रस्त उनका विचार-निपुणतारूपी 'अज्ञान'
प्रबल होनेके कारण वे समझते हैं कि सच्चिदानन्द
विग्रहमें भी चिन्मय 'ज्ञान', 'ज्ञेय', 'ज्ञाता'—ये धर्म नहीं
हैं। वास्तवमें अज्ञानमय अवस्थाके कारण उनका इस
प्रकार कहना है। इसलिये मायावादियोंकी वास्तविक
वस्तुके (भगवान्के) ज्ञानके सम्बन्धमें उनके अस्तित्वको
ही नकारनेवाली बुद्धि है॥168॥

ब्रह्मसूत्रमें ही जीवका परम कल्याण,
शाङ्करभाष्यमें जीवका सर्वनाश निहित :—
जीवेर निस्तार लागि' सूत्र कैल व्यास।
मायावादि-भाष्य शुनिले हय सर्वनाश॥169॥

अनुवाद—जीवोंका उद्धार करनेके लिये श्रीव्यासदेवने
ब्रह्मसूत्रकी रचना की, परन्तु जो इन सूत्रोंके मायावादी
भाष्यको सुनता है, तो उसका सर्वनाश हो जाता
है॥169॥

अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीव्यासदेवके सूत्रोंमें शुद्धभक्तिवाद
है। मायावादियोंने उन सूत्रोंके जो भाष्य लिखे हैं, उनमें
परब्रह्मका चिन्मय विग्रह अस्वीकृत हुआ है और
जीवोंकी ब्रह्मसे पृथक् सत्ता भी अस्वीकृत हुई है,
इसलिये वे शुद्धभक्तितत्त्वके अत्यन्त विरुद्ध हैं। इसलिये
मायावादियोंके भाष्यको सुननेसे जीवका सर्वनाश होता
है, क्योंकि ब्रह्मके साथ एक होनेकी इच्छारूपी दुराशासे
उत्पन्न अभिमानके द्वारा शुद्धभक्ति नष्ट होती है और
वास्तवमें यह ईश्वरको नहीं मानना है॥169॥

शक्तिपरिणामवाद ही ब्रह्मसूत्रमें उद्दिष्ट :—
'परिणाम-वाद'—व्याससूत्रे सम्मत।
अचिन्त्यशक्ति ईश्वर जगद्रूपे परिणत॥170॥

अनुवाद—'परिणाम-वाद' श्रीव्यासदेवके द्वारा रचित
ब्रह्मसूत्रके द्वारा सम्मत है, अर्थात् भगवान्की अचिन्त्यशक्ति
जड़-जगत्के रूपमें परिणत हुई है॥170॥

अनुभाष्य—आदिलीला 7/121-133 संख्याका अनुभाष्य
देखें॥170॥

प्राकृत चिन्तामणिका दृष्टान्त; शक्ति परिणत
होनेपर भी शक्तिमान् अविकृत :—
मणि यैछे अविकृते प्रसवे हेमभार।
जगद्रूप हय ईश्वर, तबु अविकार॥171॥

अनुवाद—प्राकृत चिन्तामणिमें जैसे बहुत स्वर्णका
प्रसव करनेपर भी कोई विकार नहीं आता, उसी प्रकार
अपनी अचिन्त्य शक्तिके द्वारा गुणमय जगत्के रूपमें
प्रकाशित होनेपर भी भगवान् अपने नित्य अप्राकृत
स्वरूपमें ही रहते हैं॥171॥

अनुभाष्य—शक्ति-परिमाणवाद ही 'जन्माद्यस्य' सूत्रके
द्वारा सम्मत है। असंख्य, अनन्त नित्यशक्ति जिनसे
उत्पन्न होती है, जिनमें स्थित और अव्यक्त रहती है,
तथा शक्तिसमूह जिनके अधीन हैं, ऐसी शक्तिसमूहके
प्रभु ही 'ईश्वर' हैं। अनन्त रूपोंमें विराजमान
नित्य-अनित्य-शक्ति, आत्म-अनात्म-शक्ति आदिकी एक
ही साथ ईश्वरमें अवस्थिति किस प्रकारसे सम्भव है,
उसको जीव वर्तमान जड़-बद्धावस्थामें मायाशक्तिके
अधीन रहते समय समझ नहीं सकता। इसलिये
मानवज्ञानसे इस प्रकारके परस्पर विरुद्ध गुणोंका
समाश्रय अचिन्त्य होनेपर भी ईश्वरमें नित्य अवस्थित
है। मानव जड़ज्ञानके अहङ्कारके कारण अपने क्षुद्र
अज्ञानरूपी सामर्थ्यको झूठी-कल्पनाके द्वारा बहुत बड़ा
मानकर, जिस शक्ति-रहितरूप एक अवस्थाकी 'ब्रह्म'के
रूपमें कल्पना करता है, वह (ब्रह्म न) होकर
चिन्त्य-शक्तिका प्रकारभेद मात्र है। उसके द्वारा जगत्को
ईश्वरका 'परिणाम' समझनेसे 'विवर्त्तवाद' को अवश्य
ही ग्रहण करना पड़ेगा। किन्तु ईश्वरत्वमें अचिन्त्य
नित्यशक्तिमत्ता निहित है, इसका ज्ञान होनेपर यह भी
समझमें आयेगा कि ईश्वर अपनी बहिरङ्गा-मायाशक्तिके
द्वारा परिणत खण्डज्ञान-गम्य राज्यमें (अर्थात् इस
भौतिक जगत्में) भी प्रकाशित अथवा अवतीर्ण हो

192 ।

छठा अध्याय 6/171-174 ]
सकते हैं। किसी मणिमें ऐसी शक्ति निहित होती है
जिससे मणि सोनेकी सृष्टि करके भी अपने मणिवाले
स्वरूपको किसी अन्य रूपमें परिणत अथवा परिवर्तित
नहीं करती। सोनेकी सृष्टि करनेसे पहले मणि जिस
प्रकारकी थी, सोनेको उत्पन्न करनेके बाद भी उसी
रूपमें ही रहती है। जिस प्रकार वास्तवमें अपने अन्दर
निहित शक्तिके प्रभावसे मणि स्वयं विकृत न होकर
और अपनेसे भिन्न किसी अन्य वस्तु (सोने) को उत्पन्न
करके भी अपने मणि-स्वरूपमें अवस्थित रह सकती
है, उसी प्रकार सच्चिदानन्द ईश्वर अपनी मायाशक्तिको
सञ्चालित करके, वैसी शक्तिको विकारयोग्य गुणमय
जगत्के रूपमें परिणत कर सकते हैं। ईश्वर अपनी
एक शक्तिको विकारमय जगत्रूपमें परिणत करके भी
अपने स्वरूपको विकार-रहित रख सकते हैं, - यह
नित्यशक्ति उनमें विद्यमान है॥ 171 ॥
गुरु-व्यासदेवको भ्रान्त कहनेके कारण मायावादी विवर्त्तवादी
हैं, इसलिये वे-श्रौतपथ-विरोधी नास्तिक :-
व्यास-भ्रान्त बलि' सेइ सूत्रे दोष दिया।
'विवर्त्तवाद' स्थापियाछे कल्पना करिया॥ 172 ॥
अनुवाद- शङ्कराचार्यने श्रीव्यासदेवके सूत्रमें दोष
निकालकर उनको भ्रान्त कह दिया और अपनी
कल्पनाके अनुसार सूत्रपर भाष्य लिखकर ‘विवर्त्तवाद’
को स्थापित किया॥ 172 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- ‘परिणाम-वाद’ माननेसे ईश्वर
‘विकारी’ हो जायेंगे, इसलिये व्यासदेवको तब ‘भ्रान्त’
कहना होगा, - ऐसा कहकर सूत्रके मुख्यार्थमें दोषारोपण
करके गौणार्थ करके ‘विवर्त्तवाद’को स्थापित किया॥ 172 ॥
अनुभाष्य- ‘सेइ सूत्र’ - ब्रह्मसूत्रके प्रारम्भमें “अथातो
ब्रह्मजिज्ञासा” सूत्रके उत्तरमें सर्वप्रथम “जन्माद्यस्य यतः” - यह
सूत्र परिणामवादके उद्देश्यसे ही लिखा गया है। जैसे-
“यतो वा इमानि भूतानि” - इस तैत्तिरीय-वाक्य, “यथोर्णनाभिः
सृजते गृह्णते च” - इस मुण्डक-वाक्य और श्रीमद्भागवतके
प्रारम्भमें कहे गये सभी श्लोकोंका तात्पर्य ही ‘परिणामवाद’
है। किन्तु शङ्कराचार्यका ‘परिणामवाद’ ग्रहण करनेपर
काल्पनिक लक्षणावृत्ति-वादी लोग ‘जन्माद्यस्य यतः’ - इस
सूत्रको ‘दुष्टसूत्र’ और उसके लेखक श्रीव्यासदेवको
‘भ्रान्त’ कहेंगे। इससे बचनेके लिये और अपने गुरु
व्यासको परिणामवादी एवं ‘जन्माद्यस्य’ सूत्रको परिणामवाद
कहकर वे निन्दा न करें, इस उद्देश्यसे काल्पनिक
युक्तिके द्वारा उन्होंने वेदके किसी विशेष-अंशमें लिखे
‘विवर्त्तवाद’ जिसका कोई अन्य तात्पर्य है, उसे ही
सत्य कहकर स्थापित किया॥ 172 ॥
देहमें आत्मबुद्धिरूप विवर्त्त ही मिथ्या है;
जगत्-सत्य, किन्तु नश्वर है :-
जीवेर देहे आत्मबुद्धि सेइ मिथ्या हय।
जगत् ये मिथ्या नहे, नश्वरमात्र हय॥ 173 ॥
अनुवाद-जीवकी जो देहमें आत्मबुद्धि है, वह
मिथ्या है। किन्तु यह जगत् मिथ्या नहीं है, केवल
नश्वरमात्र है॥ 173 ॥
अनुभाष्य-निर्मल जीव स्वरूपतः नित्य कृष्णदास
है। परन्तु जब वह कर्मफल भोगनेवाले स्थूल और
सूक्ष्म शरीरोंको भ्रमपूर्वक ‘मैं’ समझता है, ऐसी बुद्धि
मिथ्या है- इसको दिखलानेके लिये ‘विवर्त्तवाद’-शब्दका
प्रयोग होता है। जीवात्मा नित्य है, वह कभी भी
तात्कालिक स्थूलशरीर और सूक्ष्मशरीरके समान कालके
वशमें नहीं है। विश्व वास्तवमें मिथ्या नहीं है, तो भी
कालके द्वारा परिवर्तन-योग्य है। विश्वको अपने
भोगकी वस्तु मानना ही जीवका ‘विवर्त्त’ है। यह
जड़-जगत् ईश्वरकी शक्तिका परिणाम है। मायावादी
लोग जीवके स्वरूपमें और विश्वके स्वरूपमें ‘विवर्त्त’
विचार करते हैं, किन्तु दोनों (जीव और विश्व) ही
ईश्वरकी शक्तिके परिणाम हैं॥ 173 ॥
ओंकार ही आदि-महावाक्य और ईश्वर-मूर्ति एवं
वेद-कल्पतरुका बीज :-
'प्रणव' ये महावाक्य-ईश्वरेर मूर्ति।
प्रणव हैते सर्ववेद, जगते उत्पत्ति॥ 174 ॥
। 193

[ 6/131-179 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—'प्रणव' ही वेदोंका महावाक्य है, यह साक्षात् भगवान्‌की मूर्ति है। प्रणवसे ही सभी वेदोंकी और जगत्‌की उत्पत्ति हुई है॥ 174॥
अनुभाष्य—'प्रणव'—ईश्वरका नामविग्रह है; वही महावाक्य है। नामस्वरूप 'ओंकार' से इस नश्वर-जगत्‌में रहते समय भी विवर्त्तबुद्धिको (देहमें आत्मबुद्धिको) छोड़नेसे अप्राकृत स्वरूपका उदय होता है॥ 174॥
तत्त्वमस्यादि वाक्य—वेदके एकदेश-सूचक :—
'तत्त्वमसि'—जीव-हेतु प्रादेशिक वाक्य।
प्रणव ना मानि' तारे कहे महावाक्य॥" 175॥
अनुवाद—'तत्त्वमसि'—यह वेद-वाक्य जीवके लिये एक प्रादेशिक वाक्य है। प्रणवको महावाक्य न मानकर शङ्कराचार्यने तत्त्वमसिको महावाक्य कहा है॥" 175॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जीवकी चिन्मय सत्ताको समझानेके लिये 'तत्त्वमसि' वाक्य वेदके एक स्थानपर पाया जाता है, वह महावाक्य नहीं है॥ 175॥
अनुभाष्य—ईश्वर, जीव और जगत्‌के स्वरूपको विवर्त्तवादका विषय बनाकर शङ्कराचार्यने ॐकार-रूप नामाश्रयके बदले 'तत्त्वमसि' को महावाक्य कहा है। किन्तु जीवकी देहमें आत्मबुद्धि होकर कहीं मिथ्या भ्रमको उदित न कर दे, इसलिये वह वस्तुतः केवल भ्रान्त जीवोंके उद्देश्यसे कहा गया प्रादेशिक वाक्य है। पक्षान्तरमें, शङ्कराचार्यने 'तत्त्वमसि'को महावाक्य कहकर ब्रह्मस्वरूप, वेदोंके जीवन 'प्रणव'-नामका ही अनादर किया है॥ 175॥
श्रीसार्वभौमके अनेक पूर्वपक्ष और महाप्रभुके द्वारा उन सबका खण्डन :—
एइमते कल्पित भाष्ये शत दोष दिल।
भट्टाचार्य पूर्वपक्ष अपार करिल॥ 176॥
वितण्डा, छल, निग्रहादि अनेक उठाइल।
सब खण्डि' प्रभु निज-मत से स्थापिल॥ 177॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने शङ्कराचार्यके भाष्यको कल्पित कहकर उसमें सैकड़ो दोष दिखलाये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने भी शङ्कराचार्यके भाष्यके पक्षमें पूर्वपक्षकी ओरसे अनेक प्रश्न उठाये। वितण्डा, छल, निग्रहादिके द्वारा अनेक प्रकारकी बातें उठायीं। परन्तु महाप्रभुने उन सबका खण्डन करके अपने मतको स्थापित किया॥ 176-177॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/106-147 संख्या देखें।
'वितण्डा'—अपने मतकी स्थापना ना करके केवल दूसरेके मतका खण्डन करना। 'छल'—शब्दके वास्तविक तात्पर्यको किसी अन्य काल्पनिक विषयरूपमें आरोप करके खण्डन करना। 'निग्रह'—दूसरे पक्षकी पराजय॥ 131-177॥
महाप्रभुके द्वारा यथार्थ वेदमतकी स्थापना :—
भगवान्—'सम्बन्ध', भक्ति—'अभिधेय' हय।
प्रेमा—'प्रयोजन', वेदे तिनवस्तु कय॥ 178॥
अनुवाद—महाप्रभुने आगे कहा,—भगवान् ही 'सम्बन्ध' हैं, भक्ति ही 'अभिधेय' है और भगवत्प्रेम ही 'प्रयोजन' है—वेद इन तीन वस्तुओंको ही प्रतिपादित करते हैं॥ 178॥
इन सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनके निर्देशके अतिरिक्त सभी मतवाद ही काल्पनिक :—
आर ये ये-किछु कहे, सकलेइ कल्पना।
स्वतःप्रमाण वेद-वाक्ये न करिये लक्षणा॥ 179॥
अनुवाद—और कोई यदि वेदोंकी व्याख्या किसी और प्रकारसे करता है, तो वह उसकी कल्पनाके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। स्वतःप्रमाण वेद वाक्योंका लक्षणावृत्तिसे अर्थ नहीं करना चाहिये॥ 179॥
अनुभाष्य—मायाके गुणोंसे अतीत निर्मल जीव ही भगवद्भक्त हैं। उनका सम्बन्ध केवल भगवान्‌से ही है, अभिधेय भक्ति है और उनका प्रयोजन भगवद्-प्रेम है, यही वेदशास्त्रोंमें कहा गया है। किन्तु किसी-किसी मतवादमें देखा जाता है कि जीवका सम्बन्ध—निःशक्तिक
194

छठा अध्याय 6/179-182 ]
ब्रह्मसे है, अभिधेय-ज्ञान-वैराग्य है और प्रयोजन-मुक्ति
है; यह बद्धजीवकी कल्पना-मात्र है। वेद स्वयं ही
प्रमाण है; 'लक्षणा' वृत्तिके द्वारा उनका काल्पनिक अर्थ
होता है॥ 179 ॥
ईश्वरके आदेशसे शङ्करके द्वारा असुर-मोहन :-
आचाय्येर दोष नाहि, ईश्वर-आज्ञा हैल।
अतएव कल्पना करि' नास्तिक-शास्त्र कैल ॥ 180 ॥
अनुवाद—इसमें वास्तवमें शङ्कराचार्यका दोष नहीं
है, भगवान्की आज्ञासे ही उन्होंने ऐसा प्रचार किया है।
इसलिये उन्होंने काल्पनिक नास्तिक शास्त्रोंकी रचना
की है॥ 180 ॥
अनुभाष्य—कूर्मपुराणके पूर्वभागमें 16/115-117 संख्यामें
श्रीभगवद्-वाक्य—
“तस्माद् हि वेदवाह्यानां रक्षणार्थाय पापिनाम्।
विमोहनाय शास्त्राणि करिष्यसि वृषध्वज॥
एवं संचोदितो रुद्रो माधवेनासुरारिणा।
चकार मोहशास्त्राणि केशवोऽपि शिवे स्थितः॥
कापालं नाकुलं वामं भैरवं पूर्वपश्चिमम्।
पाञ्चरात्र-पाशुपतं तथान्यानि सहस्रशः॥” 180 ॥
अर्थात् “इसलिये हे वृषध्वज ! वेदसे बाह्य लोगोंकी
रक्षाके उद्देश्यसे और पापियोंको मोहित करनेके लिये
सभी शास्त्रोंको प्रकाश करूँँगा। इस प्रकारसे श्रीरुद्रने
असुर-विनाशक श्रीमाधवके द्वारा प्रेरित होकर और
श्रीकेशवने भी शिव-बुद्धिमें अवस्थित होकर कापाल,
नाकुल, वाम, भैरव, पूर्व-पश्चिम (अथवा पूर्वभैरव,
पश्चिमभैरव ?), पाशुपत-पञ्चरात्र तथा अन्य सहस्र
शास्त्रोंका प्रवर्त्तन किया॥” 180 ॥
पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें सहस्रनामका वाक्य (62/31) :-
स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्दिमुखान् कुरु।
माञ्च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तरोत्तरा ॥ 181 ॥
अनुवाद—भगवान्ने श्रीमहादेवको कहा, —'कलियुगमें
मनुष्योंको वेदोंके काल्पनिक अर्थोंके द्वारा उन्हें मुझसे
विमुख करो। उन कल्पित-शास्त्रोंमें मेरे नित्य-भगवत्
स्वरूपका विषय गुप्त रखो। इससे जगत्की बहिर्मुख
सृष्टि उत्तरोतर परिवर्द्धित होती रहेगी ॥ 181 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान्ने श्रीमहादेवसे कहा,-अपने
कल्पित आगमके द्वारा मनुष्योंको मुझसे विमुख करो।
मुझे इस प्रकार गोपन करो, जिसके द्वारा बहिर्मुख-जीवोंकी
जीववृद्धिकार्यसे विरक्ति उत्पन्न नहीं हो॥181॥
अनुभाष्य—
[हे शिव], त्वं कल्पितैः (सत्याद्द्र
(निजतन्र्त्रादिकैः) जनान् (जड़विषयरतान् लोकान्) मद्दिमुखान्
(हरिजनविमुखान् कर्मज्ञाननिरतान्) कुरु; मां गोपय च, येन
(भगवद्गोपन-कार्येण) उत्तरोत्तरा एषा सृष्टिः (संसारप्रवृत्तिः)
स्यात्।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
देहात्मबुद्धि होनेसे केवल शौक्र-विचारकी प्रबलताके
कारण संसारको भोग करनेकी प्रवृत्ति होती है और
जहाँ भोग-प्रवृत्ति होती है, वहाँ शुद्धभक्ति गुप्त रहती
है॥ 181 ॥
पद्मपुराणके उत्तरखण्ड (25/7) में :-
मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते।
मयैव विहितं देवि कलौ ब्राह्मणमूर्तिना ॥” 182 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 182 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमहादेवने कहा, —मैं कलियुगमें
ब्राह्मणमूर्ति धारण करके असत्-शास्त्रके द्वारा मायावादरूप
प्रच्छन्न-बौद्धमतका विधान करूँगा॥ 182 ॥
अनुभाष्य—
मायावादम् (ईश्वर-जीव-विश्व-स्वरूपत्रयं माया-
कल्पित-मिथ्या-विकारमात्रं ब्रह्मणः भिन्नमिति विचारपरम्) असच्छास्त्रं
(नित्य-भगवद्बहिर्मुखकर्मज्ञानपरम् अनित्योपदेशमयं ग्रन्थं) प्रच्छन्नं
(कपट-वेदविचार-परं श्रौतपथविरुद्धं) बौद्धं (नास्तिक-
बौद्धमतानुगतम्) उच्यते। हे देवि! मया ब्राह्मणमूर्तिना
(मालवरदेशोद्भूतेन शङ्कराख्येन देहेन) कलौ (विवादयुगारम्भे)
[मायावादमतम् एव] विहितं (स्थापितम्)।
। 195

[ 6/182–187 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्लोक-भावानुवाद—मैं कलियुगमें मालवर देशमें
शङ्कर नामसे जन्म ग्रहण करके असत्-शास्त्र जिसमें
नित्य भगवद्-विमुख कर्म-ज्ञानको परम कहा गया है,
उसके द्वारा (ब्रह्मसे भिन्न ईश्वर-जीव-विश्व, तीनों
मायासे कल्पित मिथ्या विकारमात्र हैं) ऐसे मायावादरूप
प्रच्छन्न-बौद्धमतको स्थापित करूँगा॥ 182॥
विलासहीन केवल चिद्-साहित्य-वाद और
चिद्-राहित्य-वाद, दोनों ही जागतिक विचारसे उत्पन्न
मनोधर्मके अन्तर्गत हैं॥ 182॥
महाप्रभुकी व्याख्या सुनकर भट्टाचार्य विस्मित :—
शुनि' भट्टाचार्य हैल परम विस्मित।
मुखे ना निःसरे वाणी, हइला स्तम्भित ॥ 183 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी व्याख्याको सुनकर श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्य आश्चर्यचकित हो गये। कुछ भी बोलनेमें वे
असमर्थ हो गये और वे स्तम्भित हो गये ॥ 183 ॥
श्रीकृष्णभक्ति ही जीवका परम पुरुषार्थ :—
प्रभु कहे,—“भट्टाचार्य, ना कर विस्मय।
भगवाने भक्ति—परम-पुरुषार्थ हय ॥ 184 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“भट्टाचार्य ! आश्चर्य मत
करो। भगवद्भक्ति ही परम पुरुषार्थ है ॥ 184 ॥
दिव्यसूरिगण भी श्रीकृष्ण-चरणोंके प्रति आकृष्ट :—
'आत्माराम' पर्यन्त करे ईश्वर-भजन।
ऐछे अचिन्त्य भगवानरे गुणगण ॥ 185 ॥
अनुवाद—आत्माराम अर्थात् आत्मामें रमण करनेवाले
मुक्त पुरुष भी भगवान्‌का भजन करते हैं, क्योंकि
भगवान्‌में ऐसे अचिन्त्य गुण हैं कि वे आत्माराम
मुनियोंके चित्तको भी आकर्षित करते हैं ॥ 185 ॥
श्रीमद्भागवत (1/7/10) :—
आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ ”186 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 186 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—आत्मामें ही जिनकी रति है,
ऐसे वासना-ग्रन्थियोंसे शून्य सभी मुनि भी बृहत्कर्मा
श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करते हैं; क्योंकि जगत्‌के
चित्तहारी श्रीहरिका ऐसा ही एक गुण है ॥ 186 ॥
अनुभाष्य—स्वभावतः ब्रह्मानन्दमें निमग्न परमहंस
श्रीशुकदेवने किसलिये श्रीकृष्ण-नाम-रूप-गुण-लीला और
कथापूर्ण श्रीमद्भागवतका अभ्यास किया,—शौनक आदि
ऋषियोंके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीसूतकी उक्ति,—
आत्मारामः (आत्मनि भगवति रमन्ते ये ते कृष्णक्रीड़नशीलाः)
मुनयः (भोगपर-जड़-विषयरहिताः) निर्ग्रन्थाः (हृदयजकामग्रन्थिहीनाः
ब्रह्मभूताः) अपि उरुक्रमे (अजिते कृष्णे) अहैतुकीम्
(अन्याभिलाषिताशून्यं कर्मज्ञानाद्यनावृतं शुद्धां कृष्णानुशीलनमयी)
भक्तिं (सेवां) कुर्वन्ति। हरिः इत्थम्भूतगुणः
(मुक्तामुक्त-सर्वास्थ-जीवाकर्षण-धर्मयुतः)। [अलौकिक-गुणाधारः
हरिर्मायावादनिरतानां जनानां तत्तन्मत-वादात् मोचयित्वा कृपया
तेभ्यः स्वचरणं प्रयच्छति]।
श्लोक-भावानुवाद—स्वभावतः श्रीकृष्णकी लीलाओंमें
रमण करनेवाले आत्माराम, जड़विषयोंसे विरक्त मुनि
और जिनकी हृदयकी कामनाओंकी ग्रन्थि खुल गयी
है—ऐसे ब्रह्मभूत पुरुष, सभी उरुक्रम अर्थात् अजित
भगवान्‌की अन्याभिलाषिता-शून्य, कर्म-ज्ञानसे अनावृत
शुद्ध कृष्णानुशीलनमयी भक्ति करते हैं। हरि अपने
स्वाभाविक गुणोंसे मुक्त और बद्ध अवस्थावाले सभी
जीवोंको आकर्षण करनेवाले हैं। [हरि अलौकिक
गुणोंके आधार हैं, वे मायावादादिमें निरत लोगोंको
उन-उन मतवादोंसे मुक्त करके कृपापूर्वक अपने
चरणोंका आश्रय प्रदान करते हैं।] ॥ 186 ॥
श्रीसार्वभौमकी श्लोककी व्याख्या सुननेकी इच्छा :—
शुनि' भट्टाचार्य कहे,—“शुन, महाशय।
एइ श्लोकेर अर्थ शुनिते वाञ्छा हय ॥” 187 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे कहा,—“सुनो
महाशय ! इस श्लोकका अर्थ सुननेकी मेरी इच्छा हो
रही है॥” 187 ॥
196 ।

छठा अध्याय 6/188-198 ]
महाप्रभुके अनुरोधसे श्रीसार्वभौमके द्वारा व्याख्या
करते हुए अपने पाण्डित्यका प्रकाश :-
प्रभु कहे, —"तुमि कि अर्थ कर, ताहा शुनि'।
पाछे आमि करिब अर्थ, येबा किछु जानि ॥" 188 ॥
शुनि' भट्टाचार्य श्लोक करिल व्याख्यान।
तर्कशास्त्र-मत उठाय विविध विधान ॥ 189 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —"आप इस श्लोकका
क्या अर्थ करते हैं, मैं उसे सुनना चाहता हूँ। बादमें
मैं जो कुछ जानता हूँ, उसके अनुसार अर्थ करूँगा।"
यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उपरोक्त श्लोककी
व्याख्या की और तर्कशास्त्रके मतानुसार उन्होंने विविध
अर्थ बतलाये ॥ 188-189 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा यथाशक्ति नौ प्रकारकी व्याख्या :-
नवविध अर्थ कैल शास्त्रमत लञा।
शुनि' प्रभु कहे किछु ईषत् हासिया ॥ 190 ॥
महाप्रभुका मान देनेका धर्म-श्रीसार्वभौमकी प्रशंसा :-
“भट्टाचार्य, जानि—तुमि साक्षात् बृहस्पति।
शास्त्रव्याख्या करिते ऐछे कारो नाहि शक्ति ॥ 191 ॥
किन्तु तुमि अर्थ कैले पाण्डित्य-प्रतिभाय।
इहा वइ श्लोकेर आछे आरो अभिप्राय ॥" 192 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने शास्त्रोंके मतानुसार
इस श्लोकके नौ प्रकारके अर्थ किये। जिसे सुनकर
महाप्रभुने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए कहा, —"भट्टाचार्य !
ऐसा लगता है कि आप तो साक्षात् देवगुरु बृहस्पति
हैं। इस जगत्में शास्त्रोंकी ऐसी व्याख्या करनेकी शक्ति
और किसीमें नहीं है। किन्तु आपने पाण्डित्य प्रतिभासे
जो अर्थ प्रकाशित किये हैं, इनके अतिरिक्त भी इस
श्लोकका और भी अभिप्राय है ॥" 190-192 ॥
भट्टाचार्यकी प्रार्थनासे महाप्रभुकी स्वतन्त्र व्याख्या :-
भट्टाचार्येर प्रार्थनाते प्रभु व्याख्या कैल।
ताँर नव अर्थ-मध्ये एक ना छुँइल ॥ 193 ॥
महाप्रभुके द्वारा अठारह प्रकारसे व्याख्या :-
आत्मारामश्च-श्लोके 'एकादश' पद हय।
पृथक् पृथक् कैले पदेर अर्थ निश्चय ॥ 194 ॥
तत्तत्पद-प्राधान्ये 'आत्माराम' मिलाञा।
अष्टादश अर्थ कैल अभिप्राय लञा ॥ 195 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी प्रार्थनापर महाप्रभुने
उनके द्वारा किये हुए नौ प्रकारके अर्थोंमेंसे किसीको
स्पर्श किये बिना 'आत्मारामश्च'-श्लोककी व्याख्या
आरम्भ की। आत्मारामश्च-श्लोकमें 'ग्यारह' पद हैं।
महाप्रभुने सभी पदोंकी एक-एक करके व्याख्या की।
महाप्रभुने श्लोकके प्रधान पदोंके लेकर प्रत्येकके साथ
'आत्माराम' पदको जोड़कर अठारह प्रकारसे व्याख्या
की ॥ 193-195 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्लोकके ग्यारह शब्दोंके ग्यारह
अर्थ हैं और श्लोकमें 'मुनयः', 'निर्ग्रन्थाः', 'उरुक्रम',
'अहैतुकी', 'भक्ति', 'गुण' और 'हरि'—इन सात प्रधान
पदोंमें 'आत्माराम'-पद जोड़कर और सात अर्थ होते
हैं—अर्थात् कुल मिलाकर अठारह अर्थ हैं ॥ 194-195 ॥
अनुभाष्य— 'एकादशपद'- 1) आत्मारामः, 2) च,
3) मुनयः, 4) निर्ग्रन्थाः, 5) अपि, 6) उरुक्रमे,
7) कुर्वन्ति, 8) अहैतुकीं, 9) भक्तिं, 10) इत्थम्भूतगुणः,
11) हरिः ॥ 194 ॥
भगवद्गुणशक्ति अचिन्त्य और आत्माराम-आकर्षिणी :-
भगवान्, ताँर शक्ति, ताँर गुणगण।
अचिन्त्य प्रभाव तिनेर ना याय कथन ॥ 196 ॥
अन्य यत साध्य-साधन करि' आच्छादन।
एइ तिने हरे सिद्ध-साधकेर मन ॥ 197 ॥
सनकादि-शुकदेव ताहाते प्रमाण।
एइमत नाना अर्थ करेन व्याख्यान ॥ 198 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान्, उनकी शक्ति और उनके
गुणसमूह—इन तीनोंका ही प्रभाव अचिन्त्य है, इनका
। 197

[ 6/196-202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सम्पूर्ण रूपसे वर्णन सम्भव नहीं है। ये तीनों अन्य होकर वे श्रीकृष्णका निर्मल भजन करने लगे।
सभी प्रकारके साध्य और उनके लिये किये जानेवाले श्रीव्यासदेवकी कृपासे शुकदेव गोस्वामी श्रीकृष्णकी
साधनोंको आच्छादित करके सिद्ध एवं साधकोंके भी लीलाओंके प्रति आकृष्ट हुए। श्रीकृष्णके गुणोंसे
मनका हरण करते हैं। श्रीसनकादि और श्रीशुकदेव आकृष्ट होकर वे भी श्रीकृष्णका भजन करने लगे।
गोस्वामी इसके प्रमाण हैं। इस प्रकार महाप्रभुने अनेक ब्रह्मानन्दसे कोटि गुणा पूर्ण आनन्द श्रीकृष्णके चिन्मय-गुणोंमें
प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या की ॥ 196-198 ॥ है, इसलिये वे आत्माराम मुनियोंके चित्तको भी
अमृतप्रवाह भाष्य—'तिने'—भगवान्, भगवद्-शक्ति आकर्षित कर लेते हैं।"
और भगवद्-गुणसमूह ॥ 197 ॥
इस प्रसङ्गमें भाः 3/15/43 देखें। मध्यलीला 24/3-308 संख्या भी देखें ॥ 193-198 ॥
अनुभाष्य—ज्ञानी, कर्मी और अन्याभिलाषियोंके
दलोंमें जितने प्रकारके सम्बन्ध और अभिधेय कल्पित श्रीसार्वभौमकी आत्मग्लानि :—
होते हैं, उनको आच्छादित करके अचिन्त्य प्रभाववाले शुनि' भट्टाचार्येर मने हैल चमत्कार।
भगवान्, उनकी शक्ति और उनके गुणसमूह—ये तीन प्रभुके कृष्ण जानि' करे आपना धिक्कार ॥ 199 ॥
वस्तुएँ साधक-जीव और सिद्धोंके मनका हरण करते इँहो त' साक्षात् कृष्ण, —मुञि ना जानिया।
हैं। सनकादि और शुकदेव आदि मुक्त-मनीषियोंका महा-अपराध कैनु गर्वित हइया ॥ '200 ॥
श्रीकृष्णके प्रति आकृष्ट होना ही इसका उदाहरण है।
मध्यलीला, 24/107-109, 111— अनुवाद—महाप्रभुसे 'आत्माराम श्लोक'की व्याख्या
“मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते॥” सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका मन आश्चर्यचकित हो
“जन्म हैते शुक-सनकादि 'ब्रह्ममय'। गया। वे महाप्रभुको श्रीकृष्ण जानकर अपनेको धिक्कारने
कृष्णगुणाकृष्ट हञा कृष्णेरे भजय॥ लगे,—'ये तो साक्षात् श्रीकृष्ण हैं, मैंने ऐसा नहीं समझा
सनकाद्येरे कृष्णकृपाय सौरभे हरे मन। और अपने ज्ञानके अभिमानमें गर्वित होकर महा-अपराध
गुणाकृष्ट हञा करे निर्मल भजन॥ किया है॥'199-200॥
व्यासकृपाय शुकदेवेर लीलादि-स्मरण।
कृष्णगुणाकृष्ट हञा करेन भजन॥” श्रीसार्वभौमकी महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति
मध्यलीला, 17/139— और महाप्रभुकी कृपा :—
“ब्रह्मानन्द हैते पूर्णानन्द कृष्णगुण। आत्मनिन्दा करि' लैल प्रभुर शरण।
अतएव आकर्षये आत्मारामेर मन॥” कृपा करिवारे तबे प्रभुर हैल मन ॥ 201 ॥
अर्थात् “ब्रह्ममें लीन मुक्त जीव भी श्रीकृष्णकी अनुवाद—इस प्रकार श्रीसार्वभौमने अपनी निन्दा
लीलाओंके प्रति आकर्षित होकर उनका भजन करते करते हुए महाप्रभुकी शरण ग्रहण की। महाप्रभुकी भी
हैं। यद्यपि शुकदेव गोस्वामी और सनकादि चार कुमार श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यपर कृपा करनेकी इच्छा हो गयी॥ 201 ॥
ब्रह्मके ध्यानमें लीन रहते थे, तथापि वे भी श्रीकृष्णके
चिन्मय गुणों और लीलाओंके प्रति आकर्षित हुए और महाप्रभुके द्वारा पहले चतुर्भुज रूप और बादमें
वे भी श्रीकृष्णका भजन करने लगे। सनकादि चार द्विभुज-रूपका प्रदर्शन :—
कुमारोंका मन श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें समर्पित तुलसीकी निज-रूप प्रभु ताँरे कराइल दर्शन।
गन्धसे आकृष्ट हुआ। तब उनके गुणोंसे आकृष्ट चतुर्भुज-रूप प्रभु हइला तखन ॥ 202 ॥
198 ।