श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1028, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/108-115 ]
यच्छक्तयः (यस्य बहिरङ्गा-मायाविद्याः शक्तयः) वदतां
वादिनां (पूर्वोत्तरपक्षाश्रितानां) विवादसंवादभूवः (विवादस्य क्वचित्
संवादस्य च भुवः उत्पत्तिहेतवः) भवन्ति; एषां (विवादशीलानां)
मुहुः (पुनः पुनः) आत्ममोहं कुर्वन्ति, तस्मै अनन्तगुणाय
(सर्वशक्तिविशिष्टाय) भूम्ने (परमात्मने) नमः।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 108 ॥
अधोक्षज-सेवक ब्राह्मण ही युक्त,
अक्षज-ज्ञानी मायादास अयुक्त :-
श्रीमद्भागवत (11/22/4)-
युक्तञ्च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।
मायां मदीयमुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥" 109 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 109 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-ब्राह्मणोंने जो कहा है, वह
सर्वत्र युक्त हुआ है; क्योंकि मेरी मायाका सहारा लेकर
जो बोलते हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्घट नहीं है।
तात्पर्य यह है कि भगवान्की माया अघटनघटनपटीयसी
(असम्भवको सम्भव और सम्भवको असम्भव करनेवाली)
शक्ति है; इसलिये वह अनेक स्थानोंपर सत्यको गोपन
करके मिथ्याको प्रमाणित कर सकती है। उसी मायाके
आश्रयमें कपिल, गौतम, जैमिनी और कणाद आदि
ब्राह्मणोंने बहुतसे असार वाक्योंको सार वाक्योंकी भाँति
प्रकाशित किया है॥ 109 ॥
अनुभाष्य-तत्त्व संख्याके विषयमें उद्धवके द्वाराकी
गयी जिज्ञासाके उत्तरमें श्रीकृष्णकी उक्ति,-
यथा ब्राह्मणाः भाषन्ते (निर्णीतवन्तः), [तत्] च सर्वत्र युक्तं
सन्ति। मदीयां मायां (अचिन्त्य-स्वरूपशक्तिं, न तु अविद्याम्)
उद्गृह्य (स्वीकृत्य) वदतां (जनानां) किं दुर्घटं नु (प्रश्ने, न
किमपीत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 109 ॥
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा श्रीगोपीनाथके
उपदेश अनसुना करना :-
तबे भट्टाचार्य कहे,-"याह गोसाञिर स्थाने।
आमार नामे गण-सहित कर निमन्त्रणे॥ 110 ॥
प्रसाद आनि' ताँरे कराह आगे भिक्षा।
पश्चात् आसि' आमारे कराइह शिक्षा॥" 111 ॥
अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उनकी बातको
अनसुना करके कहा,-"अभी श्रीचैतन्य गोसाईंके स्थानपर
जाकर मेरी ओरसे उन्हें उनके सङ्गियों सहित मेरे
घरपर प्रसाद पानेको निमन्त्रण दीजिये। भगवान् श्रीजगन्नाथका
प्रसाद लाकर पहले उन्हें भोजन कराइये और उसके
बादमें मुझे शिक्षा देना॥" 110-111 ॥
श्रीगोपीनाथकी अनेक प्रकारसे श्रीभट्टाचार्यका
उपकार करनेकी चेष्टा :-
आचार्य-भगिनीपति, श्यालक-भट्टाचार्य।
निन्दा-स्तुति-हास्ये शिक्षा करा'न आचार्य॥ 112 ॥
अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्य बहनोई थे तथा श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्य उनके साले थे। ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध होनेके
कारण श्रीगोपीनाथाचार्य कभी निन्दाके द्वारा, कभी
स्तुतिके द्वारा एवं कभी हास-परिहासके द्वारा श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यको शिक्षा प्रदान कर रहे थे॥ 112 ॥
श्रीभट्टाचार्यके मायावाद-वाक्यको सुनकर श्रीमुकुन्दका क्रोध
करना ही उनके प्रति कृपा :-
आचार्येर सिद्धान्ते मुकुन्देर हैल सन्तोष।
भट्टाचार्येर वाक्ये मने हैल दुःख-रोष॥ 113 ॥
अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्यके सिद्धान्तको सुनकर
श्रीमुकुन्द दत्त बहुत सन्तुष्ट हुए, परन्तु श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके वचनोंको सुनकर वे मन-ही-मन बहुत
दुःखी हुए तथा उनमें कुछ रोष भी भर आया॥ 113 ॥
महाप्रभुको निमन्त्रण :-
गोसाञिर स्थाने आचार्य कैल आगमन।
भट्टाचार्येर नामे ताँरे कैल निमन्त्रण॥ 114 ॥
श्रीमुकुन्द, श्रीगोपीनाथकी श्रीभट्टाचार्यके विरुद्ध निन्दा :-
मुकुन्द-सहित कहे भट्टाचार्येर कथा।
भट्टाचार्ये निन्दा करे, मने पाञा व्यथा॥ 115 ॥
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