श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1032, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/133-142 ]
दिव्यज्ञान प्राप्त करके उनके अचिन्त्यनीय स्वरूपको
जान सकते हैं।]—(श्वेताश्वतर उपनिषद् 3/19) आदि
बहुतसी श्रुतियोंमें अप्राकृत-साकार-सच्चिदानन्दतत्त्वका
वर्णन है॥ 133-141 ॥
अनुभाष्य—'उपनिषद्'—आदिलीला, 2/5 संख्याके
अनुभाष्यमें अन्वय और आदिलीला 7/106 संख्याका
अनुभाष्य एवं 7/108 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य और
अनुभाष्य देखें।
श्रील जीवगोस्वामीके तत्त्वसन्दर्भमें 10-11 संख्या
और श्रीबलदेव विद्याभूषण-रचित टीका एवं “शास्त्रयोनित्वात्”
(ब्रह्मसूत्र 1/1/3), “तर्काप्रतिष्ठानात्” (ब्रह्मसूत्र 2/1/11)
एवं “श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्” (ब्रह्मसूत्र 2/1/27) आदि
सूत्रोंके श्रीभाष्य, श्रीमाध्वभाष्य, श्रीनिम्बार्कभाष्य और
श्रीबलदेव-कृत गोविन्दभाष्य देखें। श्रीजीव प्रभुने
'सर्वसम्वादिनी' में लिखा है,—
“तथापि भ्रम-प्रमाद-विप्रलिप्सा-करणापाटव-दोषरहितवचनात्मकः
शब्द एव मूलं प्रमाणम्। अन्येषां प्रायः पुरुष-भ्रमादि-
दोषमयस्यान्यथा-प्रतीति-दर्शनेन प्रमाणं वा तदाभासो वेति
पुरुषैर्निर्णतुमशक्यत्वात्, तस्य तदभावात्॥”
अर्थात् “प्रत्यक्षादि दस प्रकारके प्रमाण विद्यमान
रहनेपर भी भ्रमादि चार प्रकारके दोषोंसे रहित वचनात्मक
'शब्द' या श्रुति ही मूल प्रमाण है; अन्यान्य प्रमाणोंके
विषयमें मनुष्योंके वाक्यादि प्रायः ही भ्रमादि दोषोंसे युक्त
होनेके कारण उनके द्वारा अन्य प्रकारकी प्रतीति देखी
जाती है, इसलिये अन्य नौ प्रमाण वास्तवमें प्रमाण हैं
या फिर प्रमाणाभास हैं, उसका निर्णय नहीं किया जा
सकता, किन्तु वास्तव-दर्शनमूलक होनेके कारण शब्द
प्रमाणमें इस प्रकारकी आशङ्का नहीं है।”
(ब्रह्मसूत्र 2/1/5)—'दृश्यते तु', इस सूत्रके भाष्यमें
श्रीमन्मध्वाचार्यपादने इन 'भविष्यपुराण'के वचनोंको उद्धृत
किया है—
'ऋग्यजुःसामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम्।
मूलरामायणञ्चैव 'वेद' इत्येव शब्दितः॥
पुराणानि च यानीह वैष्णवानि विदो विदुः।
स्वतःप्रामाण्यमेतेषां नात्र किञ्चित् विचार्यते॥”
अर्थात् “ऋक्, यजुः, साम और अथर्व, महाभारत,
पञ्चरात्र और मूल-रामायणको 'वेद' कहा गया है।
पण्डितगण जो सब वैष्णव अर्थात् सात्त्विक पुराण हैं,
उन्हींको यहाँपर 'वेद'के रूपमें जानते हैं। इनके
स्वतःप्रमाण-विषयमें किसी प्रकारका विचार (तर्क) नहीं
चलता है॥” 133-137॥
सविशेष श्रीभगवान् ही श्रुतिका उद्दिष्ट विषय :—
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (6/67) में उद्धृत
हयशीर्ष-पञ्चरात्रवचन—
या या श्रुतिर्जल्पति निर्विशेषं
सा साभिधत्ते सविशेषमेव।
विचारयोगे सति हन्त तासां
प्रायो बलीयः सविशेषमेव ॥ 142 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 142 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो जो श्रुति तत्त्ववस्तुको 'निर्विशेष'
कहकर कल्पना करती है, वही-वही श्रुति अन्तमें
सविशेष-तत्त्वको ही प्रतिपादित करती है। 'निर्विशेष'
और 'सविशेष'—भगवान्के ये दोनों गुण ही नित्य हैं।
इसका विचार करनेपर सविशेष-तत्त्व ही प्रबल हो
जाता है; क्योंकि जगत्में सविशेष-तत्त्वका ही अनुभव
होता है, निर्विशेष-तत्त्वका अनुभव नहीं होता ॥ 142 ॥
अनुभाष्य—
या या श्रुतिः (वेदमन्त्रः) निर्विशेषं (ब्रह्मणः विशेषरहितभावं
केवलचिन्मात्रं) जल्पति (प्रकाशयति), सा सा श्रुतिः सविशेषं
(नामरूपगुणलीलादिरूपम्) एव अभिधत्ते (मुख्यया अभिधया
वृत्त्या वदति); हन्त तासां (श्रुतीनां) विचारयोगे सति
(सूक्ष्मानुशीलनेन) प्रायः (सर्वतोभावेन) सविशेषं एव वलीयः
(वेद-वचनानां मुख्यतात्पर्यम्)।
श्लोक-भावानुवाद—जो जो श्रुति तत्त्ववस्तुको केवल
चिन्मात्र 'निर्विशेष' कहकर प्रकाश करती है, वही-वही
श्रुति मुख्य अर्थात् अभिधा वृत्तिसे सविशेष-तत्त्वको ही
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