श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 6/153–160 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
गुणोंका आरोपवाद आदि विचारोंकी सहायतासे ब्रह्मको
शक्तिहीन कहकर निर्धारित करनेका कोई प्रयोजन नहीं
है॥ 153॥
विष्णुपुराण (6/7/61-63)—
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा।
अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ 154 ॥
अनुवाद—विष्णुशक्ति—परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या
नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही
‘चित्-शक्ति’ है, क्षेत्रज्ञा शक्ति ही ‘जीवशक्ति’ है
(जिसको मायारूपा ‘अविद्या’ से ‘अपरा’ अर्थात् भिन्ना
कहा गया है) और कर्म नामक अविद्याशक्तिका नाम
‘माया’ है॥ 154 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें ॥ 154 ॥
यया क्षेत्रज्ञशक्तिः सा वेष्टिता नृप सर्वगा।
संसारतापानखिलानवाप्नोत्यत्र सन्ततान् ॥ 155 ॥
तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्रज्ञसंज्ञिता।
सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन वर्त्तते ॥ 156 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 155-156॥
अमृतप्रवाह भाष्य—क्षेत्रज्ञ-शक्ति ही जीवशक्ति है;
वह जीवशक्ति सर्वज्ञ होनेपर भी मायावृत्तिरूप अविद्याके
द्वारा आवृत्त होकर संसारके समस्त तापोंको नित्य भोग
करती है। और, वही ‘क्षेत्रज्ञ’-नामक शक्ति अविद्या-कुण्ठासे
आवृत्त होकर, हे भूपाल, सभी जीवोंमें तारतम्यके सहित
वर्त्तमान रहती है। तात्पर्य यह है, भगवान्की
चिद्-शक्ति—सर्वश्रेष्ठा, जीव-शक्ति—मध्यमा और
अविद्या-कर्म कहलानेवाली माया शक्ति—अधमा है।
जीवशक्ति मायाके द्वारा आवृत्त होकर अर्थात् चिद्-शक्तिकी
वृत्तिसे दूर होकर संसारके तापोंको भोगती है। वह
चिद्-शक्तिसे दूर रहते हुए अपने द्वारा किये हुए
कर्मोंके चक्रमें प्रवेश करके ऊँची-नीची अवस्थाएँ प्राप्त
करती है॥ 155-156॥
अनुभाष्य—
हे नृप, सर्वगा (चिज्जड़ोभयगामिनी) सा क्षेत्रज्ञशक्तिः
(जीवाख्यशक्तिः) यया (अविद्यया भगवद्विमुखया मायया) वेष्टिता
(आवृता); अत्र (देवीधामनि संसारे) सा सन्ततान् (नानाकर्म-
फलभोगजन्यान्) अखिलान् (नानाविधान्) तापान् अवाप्नोति
(लभते)॥ हे भूपाल, तया (अविद्यया) तिरोहितत्वात्
(गुणमायासङ्गहीनात्) क्षेत्रज्ञ-संज्ञिता शक्तिः (जीवशक्तिः)
[भगवद्वैमुख्यविधायिन्यविद्या-वर्त्तमानत्वात्] सर्वभूतेषु तारतम्येन
वर्त्तते (अविद्यया वरांवरा च मन्यते)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 155-156 ॥
विष्णुपुराण (1/12/69)—
ह्लादिनी सन्धिनी संवित् त्वय्येका सर्वसंश्रये।
ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुण-वर्जिते ॥ 157 ॥
अनुवाद—हे भगवन् ! आप सभीके आश्रय और
निर्गुण हैं। आपमें स्थित त्रिविधरूप शक्ति ‘ह्लादिनी’,
‘सन्धिनी’ और ‘संवित्’, तीनों चिन्मय हैं। मायाके
वशमें होने योग्य चित्-कण जीव जब मायामें आविष्ट
होकर मायाके तीन गुणोंका आश्रय करते हुए जिस
अवस्थाको प्राप्त करते हैं, उस अवस्थामें वह शक्ति
‘ह्लादकारी’ (सात्त्विक), ‘तापकरी’ (तामसिक) और
‘मिश्रा’ (राजसिक)—इन तीन प्रकारके भावोंको प्राप्त
करती है। किन्तु सभी गुणोंसे अतीत आपमें यह शक्ति
निर्मल और निर्गुणस्वरूपमें एकाकार होकर रहती
है॥ 157 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला, 4/63 संख्या देखें ॥ 157 ॥
शक्तिमान् भगवान्की तीन शक्तियाँ :—
सच्चिदानन्दमय हय ईश्वर-स्वरूप।
तिन अंश चिच्छक्ति हय तिन रूप ॥ 158 ॥
आनन्दांशे ‘ह्लादिनी’, सदांशे ‘सन्धिनी’।
चिदंशे ‘संवित्’, यारे कृष्णज्ञान मानि ॥ 159 ॥
अन्तरङ्गा—चिच्छक्ति, तटस्था—जीवशक्ति।
बहिरङ्गा—माया,—तिने करे प्रेमभक्ति ॥ 160 ॥
188 ।