श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
छठा अध्याय 6/202-211 ]
देखाइल ताँरे आगे चतुर्भुज-रूप।
पाछे श्याम-वंशीमुख स्वकीय स्वरूप ॥ 203 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कृपा करके श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको
पहले चतुर्भुज रूप प्रकट करके अपना (नारायण) रूप
दिखलाया। अपना नारायण रूप दिखलानेके बादमें
अपना नित्य श्यामसुन्दर-वंशीधारी श्रीकृष्ण स्वरूप
दिखलाया ॥ 202-203 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा स्तव-स्तुति :-
देखि' सार्वभौम दण्डवत् करि' पड़ि'।
पुन: उठि' स्तुति करे दुइ कर जुड़ि' ॥ 204 ॥
अनुवाद—महाप्रभुमें श्रीकृष्णके स्वरूपको प्रकाशित
देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने भूमिपर गिरकर उन्हें
दण्डवत् प्रणाम किया। फिर उठकर हाथ जोड़कर
उनकी स्तव-स्तुति करने लगे ॥ 204 ॥
महाप्रभु-कृपासे श्रीसार्वभौमके चित्तमें तत्त्वकी स्फूर्ति :-
प्रभुर कृपाय ताँर स्फुरिल सब तत्त्व।
नाम-प्रेमदान-आदि वर्णन महत्त्व ॥ 205 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी कृपासे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके
हृदयमें समस्त तत्त्व स्फुरित हो गये और वे महाप्रभुके
द्वारा भगवान्के नाम और भगवद्-प्रेमके सर्वत्र दानकी
महिमाको समझ गये ॥ 205 ॥
अतिशीघ्र रचना करनेकी शक्ति :-
शत श्लोक कैल दण्ड एक ना याइते।
बृहस्पति तैछे श्लोक ना पारे करिते ॥ 206 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने एक दण्ड (चौबीस
मिनट) से भी कम समयमें ही सौ श्लोकोंकी रचना
करके महाप्रभुकी स्तुति की। देवगुरु बृहस्पति भी इतने
कम समयमें इतने श्लोकोंकी रचना नहीं कर सकते ॥ 206 ॥
अनुभाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा रचित इन
सौ श्लोकोंके ग्रन्थका नाम ‘सुश्लोक-शतक' है ॥ 206 ॥
महाप्रभुके आलिङ्गनसे श्रीसार्वभौममें सात्त्विक भाव :-
शुनि' सुखे प्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन।
भट्टाचार्य प्रेमावेशे हैल अचेतन ॥ 207 ॥
अश्रु, स्तम्भ, पुलक, स्वेद, कम्प थरहरि।
नाचे, गाय, कान्दे, पड़े प्रभु-पद धरि' ॥ 208 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने वे सौ श्लोक सुनकर श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यका सुखपूर्वक आलिङ्गन किया। श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्य महाप्रभुके आलिङ्गनसे प्रेमावेशमें आविष्ट
होकर मूर्च्छित हो गये। उनके शरीरमें अश्रु, स्तम्भ,
पुलक, पसीना, कम्प आदि अष्ट-सात्त्विक भाव उदित
हो गये तथा वे नाचने-गाने लगे, कभी रोने लगे और
कभी भूमिपर गिरकर महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़ने
लगे ॥ 207-208 ॥
श्रीगोपीनाथकी प्रसन्नता :-
देखि' गोपीनाथाचार्य हर्षित मन।
भट्टाचार्येर नृत्य देखि' हासे प्रभुर गण ॥ 209 ॥
अनुवाद—इसे देखकर श्रीगोपीनाथाचार्य मनमें बहुत
प्रसन्न हुए और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके नृत्यको देखकर
महाप्रभुके सङ्गी हँसने लगे ॥ 209 ॥
श्रीसार्वभौमकी दशाका दर्शन करनेसे गोपीनाथके द्वारा महाप्रभुकी महिमाका कीर्तन :-
गोपीनाथाचार्य कहे महाप्रभुर प्रति।
“सेइ भट्टाचार्येर तुमि कैले एइ गति ॥” 210 ॥
अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभुसे कहा, —
“प्रभो! आपने भट्टाचार्यकी ऐसी गति कर दी ॥” 210 ॥
महाप्रभुके द्वारा भक्तका सम्मान :-
प्रभु कहे, —“तुमि भक्त, तोमार सङ्ग हैते।
जगन्नाथ इँहारे कृपा कैल भालमते ॥” 211 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया, —“आप भक्त हैं,
आपके सङ्गके कारण ही श्रीजगन्नाथदेवने इनपर पूर्ण
कृपा की है॥” 211 ॥
। 199
[ 6/212-224 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
स्थिर होकर श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति :-
तबे भट्टाचार्ये प्रभु सुस्थिर करिल।
स्थिर हञा भट्टाचार्य बहु स्तुति कैल॥ 212 ॥
“जगत् निस्तारिले तुमि, — सेह अल्पकार्य।
आमा उद्धारिले तुमि, —ए शक्ति आश्चर्य॥ 213 ॥
तर्क-शास्त्रे जड़ आमि, यैछे लौहपिण्ड।
आमा द्रवाइले तुमि, प्रताप प्रचण्ड ॥” 214 ॥
अनुवाद - तब महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको शान्त किया। स्थिर होकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुकी बहुत स्तुति की। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य कहने लगे, - “जगत्का उद्धार करना तो आपके लिये छोटा सा कार्य है, परन्तु आपने जो मेरा उद्धार किया है, यह वास्तवमें आपकी आश्चर्यमय शक्तिका परिचय है। तर्क-शास्त्रके अध्ययनसे मैं जड़बुद्धि हो गया था। मेरा हृदय लोहेके पिण्डकी भाँति कठोर हो गया था, परन्तु आपने इसे द्रवीभूत कर दिया, आपका प्रभाव अति महान् है॥” 212-214॥
महाप्रभुका अपने स्थानपर आगमन :-
स्तुति शुनि' महाप्रभु निज वासा आइला।
भट्टाचार्य आचार्य-द्वारे भिक्षा कराइला ॥ 215 ॥
अनुवाद- श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी स्तुति सुनकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट आये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यके द्वारा महाप्रसाद मँगवाकर महाप्रभुको भोजन करवाया॥ 215 ॥
अगले दिन प्रातःकाल महाप्रभुके द्वारा प्रसादान्न-संग्रह :-
आर दिन प्रभु गेला जगन्नाथ-दरशने।
दर्शन करिला जगन्नाथ-शय्योत्थाने ॥ 216 ॥
पूजारी आनिया माला-प्रसादान्न दिला।
प्रसादान्न-माला पाञा प्रभु हर्ष हैला ॥ 217 ॥
अनुवाद - अगले दिन सूर्योदयसे पहले महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शन करने गये और श्रीजगन्नाथदेवके शय्या-उत्थान अर्थात् मङ्गलारतीके दर्शन किये। पुजारीने श्रीजगन्नाथदेवकी प्रसादी-माला और प्रसाद-अन्न लाकर उन्हें दिया। महाप्रभु प्रसाद-अन्न और माला पाकर बहुत प्रसन्न हुए॥ 216-217 ॥
भट्टाचार्यके घरमें आगमन :-
सेइ प्रसादान्न-माला अञ्चले बाँधिया।
भट्टाचार्येर घरे आइला त्वरायुक्त हञा ॥ 218 ॥
अनुवाद - उस प्रसाद-अन्न और मालाको अपने आँचलमें सावधानीपूर्वक बाँधकर महाप्रभु तेजीसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर आये ॥ 218 ॥
भट्टाचार्यके द्वारा प्रातःकृत्यसे पहले ही महाप्रभुके द्वारा दिये गये प्रसादका सम्मान :-
अरुणोदय-काले हैल प्रभुर आगमन।
सेइकाले भट्टाचार्येर हैल जागरण ॥ 219 ॥
'कृष्ण' 'कृष्ण' स्फुट कहि' भट्टाचार्य जागिला।
कृष्णनाम शुनि' प्रभुर आनन्द बाड़िला ॥ 220 ॥
बाहिरे प्रभुर तेंहो पाइल दरशन।
आस्ते-व्यस्ते आसि' कैल चरण-वन्दन ॥ 221 ॥
बसिते आसन दिया दुँहे त' बसिला।
प्रसादान्न खुलि' प्रभु ताँर हाते दिला ॥ 222 ॥
प्रसादान्न पाञा भट्टाचार्येर आनन्द हैल।
स्नान, सन्ध्या, दन्तधावन यद्यपि ना कैल ॥ 223 ॥
श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे जाड्यका नाश :-
चैतन्य-प्रसादे मनेर सब जाड्य गेल।
एइ श्लोक पड़ि' अन्न भक्षण करिल ॥ 224 ॥
अनुवाद - महाप्रभु अरुणोदयके समय ही श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर पहुँच गये। उस समय श्रीभट्टाचार्य अभी नींदसे जागे ही थे और वे उच्च स्वरसे 'कृष्ण' 'कृष्ण' नामका उच्चारण करते हुए उठे थे। उनके मुखसे 'कृष्ण' नाम सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द हुआ। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने देखा कि महाप्रभु उनके घरके
200 ।
छठा अध्याय 6/219-234 ]
बाहर आये हैं, तो हड़बड़ाकर वे उनके पास आये (प्रसादग्रहणविषये) कालविचारणा न (नास्ति)। तत्र
और उनके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीसार्वभौम (प्रसादग्रहणविषये) देशनियमः न, तथा कालनियमः न,
भट्टाचार्यने महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन दिया तथा प्राप्तमन्नं (कृष्णप्रसादं) द्रुतं (तत्क्षणमेव) शिष्टैः (वैष्णवैः)
वे स्वयं भी बैठ गये। तब महाप्रभुने अपने आँचलको भोक्तव्यं (प्रसादार्चने स्थानकाल-व्यवधानादिकं न ग्राह्यम्) इति
खोलकर उसमेंसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके हाथमें प्रसाद हरिः अब्रवीत्।
दिया। प्रसादको पाकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 225-226 ॥
आनन्दित हो गये। यद्यपि अभी तक उन्होंने स्नान, श्रीसार्वभौमके द्वारा प्रसादका सम्मान देखकर महाप्रभुको
सन्ध्या तथा दन्त-धावन आदि कुछ भी नहीं किया था, परमानन्द और प्रेमपूर्वक दोनोंका नृत्य :-
तथापि महाप्रभुकी कृपासे उनके मनकी जड़ता दूर हो देखिया आनन्द हैल महाप्रभुर मन।
गयी और उन्होंने निम्नोक्त श्लोकका पाठ करके प्रसाद प्रेमाविष्ट हञा प्रभु कैला आलिङ्गन ॥ 227 ॥
ग्रहण किया ॥ 219-224 ॥ दुइजने धरि' दुँहे करेन नर्त्तन।
अनुभाष्य- 'अरुणोदय-काल'-सूर्य उदय होनेसे प्रभु-भृत्य दुँहा स्पर्शे, दुँहे फूले मन ॥ 228 ॥
पहलेके चार दण्ड (96 मिनट) समयको 'अरुणोदय-काल' अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यकी प्रसादमें इस प्रकारकी श्रद्धाको
कहते हैं॥ 219 ॥ देखकर महाप्रभु प्रसन्न हो गये और उन्होंने प्रेमाविष्ट
अप्राकृत-प्रसादके सम्मानमें कालाकालका विचार नहीं :- होकर श्रीसार्वभौमका आलिङ्गन किया। दोनों एक-दूसरेको
पद्मपुराण- पकड़कर नृत्य करने लगे। महाप्रभु और दास-दोनोंका
शुष्कं पर्युषितं वापि नीतं वा दूरदेशतः। मन एक-दूसरेको स्पर्श करके प्रफुल्लित हो
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं नात्र कालविचारणा ॥ 225 ॥ गया ॥ 227-228 ॥
स्वेद-कम्प-अश्रु दुँहे आनन्दे भासिला।
न देशनियमस्तत्र न कालनियमस्तथा। प्रेमाविष्ट हञा प्रभु कहिते लागिला ॥ 229 ॥
प्राप्तमन्नं द्रुतं शिष्टैर्भुक्तव्यं हरिरब्रवीत् ॥ 226 ॥ श्रीसार्वभौमके उद्धारसे महाप्रभुका आत्मगौरव :-
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 225-226 ॥ “आजि मुञि अनायासे जिनिनु त्रिभुवन।
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रसाद सूख गया हो, भले आजि मुञि करिनु वैकुण्ठ आरोहण ॥ 230 ॥
ही बासा हो या किसी दूरदेशसे लाया गया हो, प्राप्त आजि मोर पूर्ण हैल सर्व अभिलाष।
करनेके साथ-ही-साथ उसे खानेकी विधि है; इसमें सार्वभौमेर हैल महाप्रसादे विश्वास ॥ 231 ॥
समयका विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। सार्वभौमको महाप्रभुका आशीर्वाद :-
भगवान्ने ऐसी आज्ञा दी है कि श्रीकृष्णके अन्न-प्रसादको आजि तुमि निष्कपटे हैला कृष्णाश्रय।
प्राप्त करते ही सज्जन व्यक्ति उसका भोजन करेंगे, कृष्ण आजि निष्कपटे तोमा हैल सदय ॥ 232 ॥
इसमें देश और कालका कोई नियम नहीं है ॥ 225-226 ॥ आजि से खण्डिल तोमार देहादि-बन्धन।
अनुभाष्य- आजि तुमि छिन्न कैले मायार बन्धन ॥ 233 ॥
शुष्कं (रसरहितं) पर्युषितं (पूर्वपूर्वदिनपक्वं) दूरदेशतः आजि कृष्णप्राप्ति-योग्य हैल तोमार मन।
(सुदूरविदेशात्) नीतम् (आनीतं) वा [कृष्णप्रसादं] प्राप्ति-मात्रेण
(लाभमात्रेण) भोक्तव्यं (सादरेण गृहीत्वयं सेव्यं) अत्र वेद-धर्म लङ्घि' कैले प्रसाद भक्षण ॥ "234 ॥
। 201
[ 6/232–239 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—उनके दोनोंके अङ्गोंमें स्वेद, कम्प, अश्रु
आदि सात्त्विक विकार प्रकट होकर उन्हें आनन्दके
समुद्रमें डुबोने लगे। महाप्रभु प्रेममें आविष्ट होकर
कहने लगे,—“आज मैंने अनायास ही त्रिभुवनपर विजय
प्राप्त कर ली है और वैकुण्ठ प्राप्त किया है। आज
मेरी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो गयी हैं, क्योंकि
श्रीसार्वभौमका महाप्रसादमें विश्वास उत्पन्न हुआ है।
आज आपने निष्कपट होकर श्रीकृष्णका आश्रय ग्रहण
किया है और श्रीकृष्णने भी निष्कपट होकर आपपर
कृपा की है। आजसे आपके देहादि-बन्धन टूट गये
हैं और आज आपने मायाके बन्धनोंको तोड़ दिया है।
आज आपका मन श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके योग्य
हुआ है, क्योंकि आज आपने वेद-धर्मका उल्लङ्घन
करके प्रसादका सेवन किया है॥” 232–234 ॥
श्रीकृष्णके प्रति निष्कपट शरणागत
भक्तोंकी ही मायासे मुक्ति :—
श्रीमद्भागवत (2/7/42)—
येषां स एष भगवान् दययेदनन्तः
सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्।
ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां
नेषां ममाहमितिधीः श्वशृगालभक्ष्ये ॥ 235 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 235 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अनन्तस्वरूप भगवान् उनपर
ही अकपट दया करते हैं, जो सब प्रकारसे उनके
श्रीचरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करते हैं और वे ही
इस दुस्तर दैवी मायाको पार करते हैं। सियार और
कुत्तेके आहार इस जड़ शरीरमें जिनकी 'मैं' और 'मेरा'
की बुद्धि है, उनपर भगवान् दया नहीं करते॥ 235 ॥
अनुभाष्य—श्रीनारदजीसे भगवान्के लीलावतार-समूहके
कर्म, प्रयोजन और विभूतियोंका वर्णन करके ब्रह्माजी
भगवान्की माया और भक्तोंके माहात्म्यको बता रहे
हैं—
स एष अनन्तः भगवान् येषां (एकान्तप्रपन्नानां) दययेत्
(अनुकम्पां कुर्यात्) यदि निर्व्यलीकं (निष्कपटं यथा स्यात्
तथा) सर्वात्मना (सर्वतोभावेन, न तु अंशेन) आश्रितपदः
(कृष्णपादैकप्रपन्नाः) भवन्ति, ते दुस्तरां (तर्तुमशक्यामपि)
देवमायां अतितरन्ति। एषां (प्रपन्नानां) श्व-शृगाल-भक्ष्ये (पशुभोजन-
योग्ये देहे) अहं-मम-इति-धीः (बुद्धिः) न (नास्ति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 235 ॥
भट्टाचार्यके द्वारा जड़ाभिमानका त्याग :—
एत कहि' महाप्रभु आइला निज-स्थाने।
सेइ हैते भट्टाचार्येर खण्डिल अभिमाने ॥ 236 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर
आ गये। उसी समयसे ही श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका
पाण्डित्यका अभिमान दूर हो गया ॥ 236 ॥
श्रीसार्वभौमका सब प्रकारसे भक्तिमार्गका आश्रय :—
चैतन्य-चरण बिना नाहि जाने आन।
भक्ति बिना शास्त्रे अन्य ना करे व्याख्यान ॥ 237 ॥
गोपीनाथका प्रसन्नता-पूर्वक नृत्य :—
गोपीनाथाचार्य ताँर वैष्णवता देखिया।
'हरि' 'हरि' बलि' नाचे हाते तालि दिया ॥ 238 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य-चरणोंके अतिरिक्त अब वे
और कुछ नहीं जानते थे और तबसे वे शास्त्रोंकी
केवल भक्तिपरक व्याख्या ही करते थे। श्रीगोपीनाथाचार्य
भी उनकी वैष्णवताको देखकर 'हरि' 'हरि' बोलकर
ताली बजाते हुए नाचने लगे॥ 237–238 ॥
भट्टाचार्यकी श्रीजगन्नाथकी अपेक्षा
महाप्रभुके प्रति अधिक प्रीति :—
आर दिन भट्टाचार्य आइला दर्शने।
जगन्नाथ ना देखि' आइला प्रभु-स्थाने ॥ 239 ॥
अनुवाद—अगले दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करने निकले, परन्तु मन्दिर न
जाकर पहले महाप्रभुके दर्शनके लिये उनके वासस्थानपर
आ गये॥ 239 ॥
202 ।
छठा अध्याय 6/240-247 ]
श्रीसार्वभौमकी दीनता :—
दण्डवत् करि' कैल बहुविध स्तुति।
दैन्य करि' कहे निज-पूर्वदुर्मति ॥ 240 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा पूछनेपर कि सर्वश्रेष्ठ साधन क्या है?
महाप्रभुके द्वारा नामसङ्कीर्तनकी महिमाका वर्णन :—
भक्तिसाधन-श्रेष्ठ शुनिते हैल मन।
प्रभु उपदेश कैल नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 241 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/76 संख्या देखें ॥ 242 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्लोककी व्याख्याको
सुनकर भट्टाचार्य विस्मित :—
एइ श्लोकेर अर्थ शुनाइल करिया विस्तार।
शुनि' भट्टाचार्य-मने हैल चमत्कार ॥ 243 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने इस श्लोकका विस्तारपूर्वक
अर्थ सुनाया, जिसे सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके मनमें
चमत्कार हुआ ॥ 243 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको दण्डवत्
प्रणामकर उनकी अनेक प्रकारसे स्तुति की। तब
उन्होंने दीनतापूर्वक अपनी पहलेकी दुर्मतिकी बात कही
और भक्ति-साधनोंमेंसे सर्वश्रेष्ठ साधनको जाननेकी
इच्छा प्रकट की। तब महाप्रभुने उनको सर्वश्रेष्ठ साधन
श्रीनाम-सङ्कीर्तनका उपदेश दिया ॥ 240-241 ॥
श्रीगोपीनाथकी भविष्यवाणीकी सफलता :—
गोपीनाथाचार्य बले,—“आमि पूर्वे ये कहिल।
शुन, भट्टाचार्य, तोमार सेइ त' हइल ॥” 244 ॥
अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,—“सुनो भट्टाचार्य !
मैंने आपको पहले जो कहा था, अब आपके साथ वही
हुआ न ॥” 244 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा
प्रश्न करनेपर कि चौंसठ प्रकारकी साधनभक्तिमेंसे
कौनसा अङ्ग सर्वश्रेष्ठ है, तो उसके उत्तरमें महाप्रभुने
कहा,—नामसङ्कीर्तन ही एकमात्र सर्वश्रेष्ठ है ॥ 241 ॥
श्रीगोपीनाथके साथ सम्बन्ध होनेके कारण श्रीसार्वभौमको
महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :—
भट्टाचार्य कहे ताँरे करि' नमस्कारे।
“तोमार सम्बन्धे प्रभु कृपा कैल मोरे ॥ 245 ॥
तुमि—महाभागवत, आमि—तर्क-अन्धे।
प्रभु कृपा कैल मोरे तोमार सम्बन्धे ॥” 246 ॥
बृहन्नारदीय-पुराण (38/126) :—
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥ 242 ॥
अनुवाद—कलियुगमें हरिनाम ही, हरिनाम ही, हरिनाम
ही एकमात्र साधन है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई गति
नहीं है, नहीं है, नहीं है ॥ 242 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यको
प्रणाम करके कहा,—“आपके साथ सम्बन्ध होनेके
कारण ही महाप्रभुने मुझपर कृपा की है। आप
महाभागवत हैं और मैं तर्कका आश्रय करनेवाला
अन्धा था। वास्तवमें आपके साथ सम्बन्धके कारण ही
महाप्रभुने मुझपर कृपाकी है ॥” 245-246 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—
“कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात्॥”
अर्थात् “सत्ययुगमें भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे,
त्रेतामें बड़े-बड़े यज्ञोंके द्वारा उनकी आराधना करनेसे
और द्वापरमें विधिपूर्वक उनका अर्चन करनेसे जो फल
मिलता है, वह कलियुगमें केवल भगवन्नामका कीर्तन
करनेसे ही प्राप्त हो जाता है ॥” 242 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीभट्टाचार्यको
श्रीजगन्नाथके दर्शनकी अनुमति :—
विनय शुनि' तुष्ट्ये प्रभु कैल आलिङ्गन।
कहिल, —“करह याञा ईश्वर दरशन ॥” 247 ॥
। 203
[ 6/247-254 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके ऐसे दीनतापूर्वक
वचनोंको सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें
आलिङ्गनकर कहने लगे, - "अब जाकर श्रीजगन्नाथदेवका
दर्शन करो ॥ "247 ॥
घर आकर प्रसाद और महाप्रभुके महिमासूचक
श्लोकको भेजना :-
जगदानन्द-दामोदर,- दुइ सङ्गे लञा।
घरे आइल भट्टाचार्य जगन्नाथ देखिया ॥ 248 ॥
उत्तम उत्तम प्रसाद बहुत आनिला।
निजविप्र-हाते दुइ जना सङ्गे दिला ॥ 249 ॥
निज-कृत दुइ श्लोक लिखिया तालपाते।
'प्रभुके दिह' बलि' दिल जगदानन्द-हाते ॥ 250 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करनेके बाद
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य श्रीजगदानन्द और श्रीदामोदरको
साथ लेकर अपने घर लौट आये। मन्दिरसे वे अपने
साथ बहुतसा उत्तम-उत्तम प्रसाद भी लाये। उस
प्रसादको अपने एक ब्राह्मण और श्रीजगदानन्द तथा
श्रीदामोदरके हाथोंमें दिया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अपने
द्वारा रचित दो श्लोकोंको तालपत्रपर लिखकर श्रीजगदानन्द
पण्डितके हाथमें देकर कहा, - 'इसे महाप्रभुको दे
देना ॥ '248-250 ॥
महाप्रभुके द्वारा पत्रकी प्राप्तिसे पहले श्रीमुकुन्दके द्वारा
दोनों श्लोकोंकी नकलके द्वारा रक्षा :-
प्रभु-स्थाने आइला दुँहे प्रसाद-पत्री लञा।
मुकुन्द दत्त पत्र निल तार हाते पाञा ॥ 251 ॥
श्रीजगदानन्दका महाप्रभुको श्रीभट्टाचार्यके
श्लोकवाला पत्र देना :-
दुइ श्लोक बाहिर-भिते लिखिया राखिल।
तबे जगदानन्द पत्री प्रभुके लञा दिल ॥ 252 ॥
प्रभु श्लोक पड़ि' पत्र छिण्डिया फेलिल।
भित्ते देखि' भक्त सब श्लोक कण्ठे कैल ॥ 253 ॥
अनुवाद-श्रीजगदानन्द और श्रीदामोदर, प्रसाद और
पत्रीको लेकर महाप्रभुके पास आये। भीतर जानेसे
पहले श्रीमुकुन्द दत्तने श्रीजगदानन्दके हाथसे वह पत्री
ले ली और उन दो श्लोकोंको बाहर दीवारपर लिख
दिया। तब श्रीजगदानन्दने भीतर जाकर महाप्रभुको वह
पत्री दी। महाप्रभुने उन श्लोकोंको पढ़ते ही पत्रीको
फाड़कर फेंक दिया। परन्तु भक्तोंने दीवारपर लिखे उन
दोनों श्लोकोंको देखकर कण्ठस्थ कर लिया था। वे दो
श्लोक इस प्रकार हैं ॥ 251-253 ॥
ज्ञान-वैराग्य-भक्ति-वितरणकारी श्रीगौरको प्रणाम :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (6/74)-
वैराग्यविद्या-निजभक्तियोग-
शिक्षार्थमेकः पुरुषः पुराणः।
श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी
कृपाम्बुधिर्यस्तमहं प्रपद्ये ॥ 254 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 254 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-वैराग्य, विद्या और निजभक्तियोगकी
शिक्षा देनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्यरूपधारी एक सनातन
पुरुष-जो सर्वदा कृपाके समुद्र हैं, उनके प्रति मैं
शरणागत होता हूँ ॥ 254 ॥
अनुभाष्य-
वैराग्यविद्यानिज-भक्तियोगशिक्षार्थं (कृष्णेतरवस्तुविरक्ति-
परेशानुभूति-निजनाम-रूप-गुण-लीला-सेवनयोग्योपदेशार्थम्) एकः
पुराणः (सनातनः) कृपाम्बुधिः (जड़ासक्तजनेष्वपि परमोत्तम-मुक्त-
जनोचित-व्रजप्रेमदानरूप-दयार्णवः) पुरुषः श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी
(श्रीकृष्णचैतन्य एव शरीरं धर्तुं शीलमस्य सः) अहं तं प्रपद्ये
(आश्रयामि)।
श्लोक-भावानुवाद-जड़ विषयोंमें आसक्त लोगोंको
भी मुक्तजनोंके लिये उचित परम-उत्तम व्रजप्रेमदानरूप
दयाके समुद्र; श्रीकृष्णसे इतर वस्तुओंसे विरक्ति, पर-ईशकी
अनुभूति और निज नाम-रूप-गुण-लीला-सेवाके योग्य
उपदेश देनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्य-शरीरधारी एक सनातन
पुरुषके मैं शरणागत होता हूँ ॥ 254 ॥
204 |
छठा अध्याय 6/255-261 ]
गुप्तभक्ति-व्यक्तकारी श्रीगौरमें निष्ठा :-
कालान्नष्टं भक्तियोगं निजं यः
प्रादुष्कर्त्तुं कृष्णचैतन्यनामा।
आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे
गाढं गाढं लीयतां चित्तभृङ्गः॥ 255॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 255॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कालके प्रभावसे निजभक्तियोगको
प्राय विनष्ट देखकर जो 'श्रीकृष्णचैतन्य'—नामक पुरुष
उसका पुनः प्रचार करनेके लिये आविर्भूत हुए हैं,
उनके श्रीचरणकमलोंमें मेरा चित्तरूपी भ्रमर गाढ़रूपसे
लीन हो जाय॥ 255॥
अनुभाष्य—
कालात् (अन्याभिलाषकर्मज्ञानजड़ासक्तिप्राबल्यात् काल-
धर्मवशेन) नष्टं (लुप्तं) निजं (कृष्णनामरूपगुणलीलामयं) भक्तियोगं
प्रादुष्कर्तुं (पुनः प्रकटयितुं) यः कृष्णचैतन्यनामा [सन्] आविर्भूतः
(प्रकाशितः), तस्य पादारविन्दे (चरण-कमले) चित्तभृङ्गः
(चञ्चलमनाभ्रमरः) गाढं गाढं लीयतां (निमज्जतु)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 255॥
दोनों श्लोकोंके द्वारा श्रीसार्वभौमकी महिमाका विस्तार :-
एइ दुइ श्लोक—भक्तकण्ठे मणिहार।
सार्वभौमेर कीर्त्ति घोषे ढक्कावाद्याकार॥ 256॥
अनुवाद—ये दो श्लोक नगाड़ेके भाँति उच्च स्वरसे
श्रीसार्वभौमकी कीर्ति सब समयके लिये घोषित करते
रहेंगे, क्योंकि ये सब भक्तोंके कण्ठके मणिमय हार
स्वरूप बन गये हैं॥ 256॥
श्रीगौरगत प्राण सार्वभौम :-
सार्वभौम हैला प्रभुर भक्त एकजन।
महाप्रभुर सेवा-बिना नाहि अन्य मन॥ 257॥
'श्रीकृष्णचैतन्य शचीसुत गुणधाम।'
एइ ध्यान, एइ जप, लय एइ नाम॥ 258॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुके अनन्य
भक्त बन गये। अब वे महाप्रभुकी सेवाके अतिरिक्त
और कुछ भी नहीं जानते थे। 'समस्त गुणोंके सागर
शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्य'के नामका सब समय जप-कीर्तन
करते और उन्हींका ध्यान करते॥ 257-258॥
महाप्रभुके निकट श्रीसार्वभौमके द्वारा ब्रह्मस्तुतिके एक
श्लोकका पाठान्तरपूर्वक पाठ करना :-
एकदिन सार्वभौम प्रभु-आगे आइला।
नमस्कार करि' श्लोक पड़िते लागिला॥ 259॥
भागवतेर 'ब्रह्मस्तवे'र श्लोक पड़िला।
श्लोक-शेषे दुइ अक्षर-पाठ फिराइला॥ 260॥
अनुवाद—एक दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुके
पास आकर उनको प्रणाम करनेके बाद भागवतसे
ब्रह्म-स्तुतिका एक श्लोक पढ़ा। पढ़ते हुए उन्होंने
श्लोकके अन्तिम चरणके दो अक्षरोंका पाठ बदल
दिया॥ 259-260॥
श्रीमद्भागवत (10/14/8) परिवर्तित :-
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत
यो भक्तिपदे स दायभाक्॥ 261॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 261॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो आपकी अनुकम्पा प्राप्तिकी
उद्देश्यसे अपने कर्मोंके मन्द फलोंको भोग करते-करते
मन, वाक्य और शरीरके द्वारा आपके प्रति भक्ति करते
हुए जीवन यापन करते हैं, वे 'मुक्तिपदे दायभाक्'
अर्थात् वे मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं। इस श्लोकका
पाठ करते समय श्रीसार्वभौमने “भक्तिपदे स दायभाक्”—
ऐसा उच्चारण किया था॥ 261॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णके द्वारा गर्व चूर्ण होनेपर ब्रह्मा
एकान्त शरणागत होकर श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं—
तत् (तस्मात्) ते अनुकम्पां (कृपां) सुसमीक्ष्यमाणः (सम्यक्
। 205
[ 6/261-265 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
मन्यमानः) आत्मकृतं (निजानुष्ठितं) विपाकं (कर्मफलं) भुञ्जानः
एव हृद्वाग्वपुभिः (कायमनोवाक्यैः) ते (तुभ्यं) नमः विदधत्
(जड़ीयाहङ्कारं त्यक्त्वा आत्मसमर्पणं कुर्वन्) यः जीवेत्, सः
मुक्तिपदे दायभाक् (योग्यपात्रः) भवति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥261॥
महाप्रभु द्वारा भागवतके पाठका समर्थन और संरक्षण :-
प्रभु कहे,-" 'मुक्तिपदे'–इहा पाठ हय।
'भक्तिपदे' केने पड़, कि तोमार आशय ॥" 262 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उनसे कहा,-"श्लोकमें तो
'मुक्तिपदे'–यह पाठ है। आप 'भक्तिपदे' पाठ क्यों कह
रहे हैं? आपका ऐसा कहनेका क्या अभिप्राय है?"॥262॥
भट्टाचार्यकी मुक्तिके स्थानपर
भक्ति-पाठ-रक्षा करनेकी इच्छा :-
भट्टाचार्य कहे,-" 'भक्ति'-सम नहे मुक्तिफल।
भगवद्भक्तिविमुखेर हय दण्ड केवल ॥ 263 ॥
पाषण्ड, मायावादी और विष्णुविद्वेषी
दैत्यगणको सायुज्य मुक्ति :-
कृष्णेर विग्रह येइ सत्य नाहि माने।
येइ निन्दा-युद्धादिक करे ताँर सने ॥ 264 ॥
सेइ दुइर दण्ड हय-'ब्रह्मसायुज्य-मुक्ति'।
तार मुक्ति फल नहे, येइ करे भक्ति ॥ 265 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-" 'भक्ति'के
समान मुक्तिका फल नहीं है। मुक्ति तो भगवद्भक्ति-विमुख
लोगोंके लिये केवल दण्डमात्र है। श्रीकृष्णके विग्रहको
जो लोग सत्य नहीं मानते और जो लोग उनकी निन्दा
एवं उनसे युद्धादि करते हैं,-इन दोनों प्रकारके
लोगोंको 'ब्रह्मसायुज्य-मुक्ति' रूप दण्ड मिलता है। परन्तु
जो भक्ति करते हैं, उसका फल ऐसी मुक्ति नहीं
है॥263-265॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीभट्टाचार्यने कहा,- (प्रेम)-भक्ति
ही भक्तिका सर्वोत्तम फल है, मुक्ति भक्तिका फल नहीं
है। भगवद्भक्तिसे विमुख व्यक्तिके लिये सायुज्यमुक्ति
केवल एक प्रकारका दण्ड है॥ 263 ॥
अनुभाष्य-श्रीरूप गोस्वामी द्वारा रचित लघुभागवतामृतमें
ब्रह्मलोकके वर्णनके प्रसङ्गमें उनके द्वारा रचित कारिका-
"भक्तेरव्यभिचारायाः प्रेमसैवेव यत्फलम्।
केवलं ब्रह्मभावस्तु विद्वेषेणापि लभ्यते ॥"
अर्थात् "प्रेमसेवा ही अव्यभिचारिणी भक्तिका फल
है। (पक्षान्तरमें) यह निश्चित है कि ब्रह्मभाव (भगवान्के)
विद्वेषके द्वारा भी प्राप्त होता है।"
श्रीबलदेवविद्याभूषणके द्वारा रचित टीका-
"ननु चित्परमाणोर्जीवस्य चिद्राशौ तस्मिन् ब्रह्मणि लयेनैव
भाव्यं, न पुनस्ततो निःसृत्य तदाश्रयस्य कृष्णस्य सेवनं
सम्भवेदिति चेत्? तत्राह-भक्तेरिति। तस्मिन् ब्रह्मणि विलीनतया
स्थितिस्तु भगवता कृष्णेन् निहतानां विद्वेषिणामपि भवेत्,
'सिद्धलोकस्तु तमसाः पारे यत्र वसन्ति हि। सिद्धा ब्रह्मसुखे
मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः ॥' (ब्रह्माण्डपुराणे) इति स्मरणात्।
तस्मात् तल्लीनत्वमात्रं भक्तेः फलं न भवतीति। तमसाः-
अष्टमावरणात् प्रकृतिमण्डलात्, पारे ब्रह्मलोकः- 'चयस्त्विषाम्'
इति न्यायेन निराकारचित्पुअरूपं स्थानमित्यर्थः।
सिद्धाः-अनवज्ञातभगवदङ्घ्रयस्तादृग्ब्रह्मचिन्तकाः तच्चिन्तनात्
विध्वस्त-लिङ्गाः, यत्र वसन्ति-लीयन्ते; तच्चरणावज्ञाताणान्तु
ज्ञानलव-दग्धनामधःपातो भवति, 'येऽन्येऽरविन्दाक्ष !
विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रं
पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥" (भाः 10/2/32) इति
श्रीभागवतात्।"
अर्थात् "यदि चित्परमाणु जीवका चित्पुञ्ज ब्रह्ममें
ही लय हो गया, ऐसा होनेपर तो ब्रह्मसे निकलकर
जीवके लिये पुनः उसके आश्रय श्रीकृष्णकी सेवा
सम्भव नहीं होगी ? इस आशङ्काके उत्तरमें उल्लिखित
श्लोक कहा गया है। ब्रह्ममें लीन होकर अवस्थान
करना तो अति तुच्छ है, - वह स्थिति तो श्रीकृष्णके
हाथों मारे गये विद्वेषी दैत्योंको भी प्राप्त होती है;
क्योंकि ब्रह्माण्डपुराणमें ही इसका प्रमाण मिलता है
(आदिलीला 5/39 संख्या देखें)। इस श्लोकमें,
"चयस्त्विषाम्' –इस न्यायके अनुसार 'ब्रह्म या सिद्धलोक'
शब्दसे निराकार चित्पुञ्जरूप विशेष स्थानको समझना
होगा। 'सिद्धाः'-शब्दका तात्पर्य, जो सब जीव भगवान्के
चरणकमलोंकी अवज्ञा नहीं करते हैं, अपितु इस
206 ।
छठा अध्याय 6/263-269 ]
प्रकारकी ब्रह्मचिन्ताके द्वारा जिनके लिङ्गदेहका आवरण
दूर हो गया है-वे 'वसन्ति' अर्थात् लय प्राप्त करते
हैं। किन्तु जो भगवान्के श्रीचरणोंकी अवज्ञा करनेवाले
हैं, उनका (भाः 10/2/32)-“येऽन्योरविन्दाक्ष” श्लोकके
अनुसार जो सामान्य ज्ञान पहले सहारा था, वह भी
भगवान्की अवज्ञा करनेके फलस्वरूप सम्पूर्ण रूपसे
नष्ट हो जाता है, इसलिये उनका अधःपतन होता है
अर्थात् उनको नरककी प्राप्ति होती है ॥ "263-265 ॥
पाँच प्रकारकी मुक्ति :-
यद्यपि मुक्ति हय एइ पञ्च-प्रकार ।
सालोक्य-सामीप्य-सारूप्य-सार्ष्टि-सायुज्य आर ॥ 266 ॥
सायुज्यके अतिरिक्त चार प्रकारकी
मुक्तियाँ भक्तिकी आनुषङ्गिक :-
'सालोक्यादि' चारि यदि हय सेवा-द्वार।
तबु कदाचित् भक्त करे अङ्गीकार ॥ 267 ॥
नरक-सदृश सायुज्य 'भक्तिविनाशक'
होनेके कारण सर्वथा परित्याज्य :-
'सायुज्य' शुनिते भक्तेर हय घृणा-भय।
'नरक' वाञ्छये, तबु सायुज्य ना लय ॥ 268 ॥
अनुवाद-यद्यपि मुक्ति 'सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य,
सार्ष्टि और सायुज्य'-पाँच प्रकारकी होती है, तथापि
सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ यदि भगवद्-सेवाका
द्वार हों, तो कदाचित् भक्त उन्हें स्वीकार करते हैं।
'सायुज्य' मुक्तिका नाम सुनते ही भक्तोंको उससे घृणा
और भय होता है। भक्त सायुज्य मुक्तिको अङ्गीकार
करनेके स्थानपर नरक जाना श्रेयस्कर समझते
हैं॥ 266-268 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि
और सायुज्य, - इन पाँच प्रकारकी मुक्तियोंमेंसे पहली
सालोक्यादि चार इतनी निन्दनीय नहीं हैं, क्योंकि वे
भगवत्सेवाके द्वार-स्वरूप हैं। तथापि श्रीकृष्णभक्त उपरोक्त
चार प्रकारकी मुक्तियोंको भी स्वीकार नहीं करते,
क्योंकि वे जन्म-जन्मान्तर श्रीकृष्णभक्तिकी ही अभिलाषा
करते हैं। 'सायुज्य'-शब्द सुनने मात्रसे भक्तमें उसको
तुच्छ समझकर घृणा और 'भक्तिविरोधिकारी अपराध'
जानकर भय होता है ॥ 267-268 ॥
दो प्रकारके सायुज्य :-
ब्रह्मे, ईश्वरे सायुज्य दुइ त' प्रकार।
ब्रह्म-सायुज्य हैते ईश्वर-सायुज्य धिक्कार ॥ 269 ॥
अनुवाद-सायुज्य मुक्ति दो प्रकारकी है-
'ब्रह्म-सायुज्य' और 'ईश्वर-सायुज्य'। ब्रह्म-सायुज्यसे
ईश्वर-सायुज्य और भी अधिक धिक्कारके योग्य है॥269॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सायुज्य दो प्रकारका होता
है—ब्रह्मसायुज्य और ईश्वरसायुज्य। मायावादी वेदान्तियोंके
मतानुसार जीवका चरमफल—ब्रह्मसायुज्य है; पातञ्जलके
मतानुसार, कैवल्य-अवस्थामें ईश्वर-सायुज्य है। इन
दोनों प्रकारके सायुज्योंमेंसे ईश्वरसायुज्य ही अधिक
घृणित है। ब्रह्मसायुज्यमें निर्विशेषज्ञानके द्वारा निर्विशेष
गति प्राप्त होती है; किन्तु सविशेष-ईश्वरका ही ध्यान
करके जो कैवल्यरूपी ईश्वरसायुज्य प्राप्त होता है, वही
वासनादोषके कारण और अधिक पतनरूपी फल है।
“क्लेशकर्मविपाकाशयैर परामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ।”
अर्थात् “क्लेशों और कर्मफलकी वासनाओंसे अस्पृष्ट
विशेष पुरुष ही ईश्वर है।", “स पूर्वेषामपि गुरुः
कालेनावच्छेदात् ।” अर्थात् “वह सनत् कुमारादिसे भी
पूर्व विद्यमान है और कालसे कभी भी ढका या
प्रभावित नहीं होता।” इसके द्वारा सविशेष-ईश्वरका
नित्यत्व देखा जाता है। पुनः इस पातञ्जलमें कैवल्यपादमें
“पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा
वा चितिशक्तिरिति” अर्थात् “प्रकृतिके तीनों गुणोंके
प्रभाव दूर होनेपर शुद्ध आत्मा अपने चिद्-स्वरूपमें
कैवल्य-मुक्तिको प्राप्त होती है।” इस सूत्रके द्वारा
साधककी सिद्धावस्थामें अन्य पुरुष-ईश्वरके अवस्थानका
अभाव है। सविशेषतत्त्वके आश्रयके छलसे योगमार्ग
अत्यन्त तुच्छ है। तात्पर्य यह है कि (योगपन्थामें)
सविशेष तत्त्वकी उपासनासे सविशेष-फल ना होकर
अत्यन्त सुदूरवर्ती धिक्कारयोग्य फल प्राप्त होता है ॥ 269 ॥
। 207
[ 6/270-278 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सेव्यकी निष्काम-सेवाके अतिरिक्त सेवककी
किसी भी मुक्तिकी कामना नहीं :-
श्रीमद्भागवत (3/29/13)-
सालोक्य-सार्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ २70 ॥
अनुवाद-[मेरे द्वारा] सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्टि
(ऐश्वर्यसम्पत्ति), सामीप्य (निकटवास), सारूप्य
(चतुर्भुजाकार) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति)
प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते, क्योंकि
मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी
अभिलाषा नहीं है॥ 270 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/207 संख्या देखें ॥ 270 ॥
महाप्रभुके द्वारा मुक्तिपदकी व्याख्या :-
प्रभु कहे,–“मुक्तिपदे'र आर अर्थ हय।
मुक्तिपद-शब्दे 'साक्षात् ईश्वर' कहय ॥ 271 ॥
मुक्ति पदे याँर, सेइ 'मुक्तिपद' हय।
किम्वा नवम पदार्थ 'मुक्तिर' समाश्रय ॥ 272 ॥
दुइ-अर्थे 'कृष्ण' कहि, केने पाठ फिरि।”
सार्वभौम कहे,-"ओ-पाठ कहिते ना पारि ॥ 273 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मुक्तिपदके और भी
अर्थ हैं। मुक्तिपद-शब्दसे 'साक्षात् ईश्वर'को कहा जाता
है। मुक्ति जिनके चरणोंमें रहती है, वे 'मुक्तिपद' हैं।
अथवा [भागवतके दस लक्षणोंमेंसे] नौवें पदार्थ मुक्तिके
जो सम्पूर्ण आश्रय हैं, वे मुक्तिपद हैं। इसलिये जब ये
दोनों अर्थ 'मुक्तिपद'के द्वारा श्रीकृष्णको ही कहते हैं,
तब क्यों पाठमें परिवर्तन करते हो?" श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यने कहा,-"मैं वह पाठ [मुक्तिका उच्चारण] नहीं
कर सकता ॥ 271-273 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - जिनके चरणोंमें मुक्ति है,
वे-'मुक्तिपद' अर्थात् 'दसवें' पदार्थ श्रीकृष्ण हैं; अथवा
नौवाँ पदार्थ जो मुक्ति है, वह जिनको आश्रय करके
रहती है, वे-श्रीकृष्ण हैं॥ 272 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 2/91-92 संख्या देखें ॥ 272 ॥
तथापि श्रीसार्वभौमके द्वारा मुक्ति-शब्दके 'सायुज्य' अर्थका
अनादर और 'भक्ति'-शब्दका आदर :-
यद्यपि तोमार अर्थ एइ शब्दे कय।
तथापि 'आश्लिष्य-दोषे' कहन ना याय ॥ 274 ॥
यद्यपि 'मुक्ति'-शब्देर हय पञ्च वृत्ति।
'रूढ़िवृत्यॆ' कहे तबु 'सायुज्ये' प्रतीति ॥ 275 ॥
मुक्ति-शब्द कहिते मने हय घृणा-त्रास।
भक्ति-शब्द कहिते मने हय त' उल्लास ॥ २76 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - यद्यपि आपके
अर्थोंमें 'मुक्तिपद' श्रीभगवान् ही हैं, तथापि 'आश्लिष्य-दोष'
(संशय) के कारण 'मुक्तिपद' शब्द कहा नहीं जाता।
यद्यपि 'मुक्ति' शब्दकी पाँच प्रकारकी वृत्तियाँ हैं, तथापि
रूढ़िवृत्तिके द्वारा मुक्ति शब्दसे 'सायुज्य'की ही प्रतीति
होती है। मुक्ति-शब्द कहते ही मनमें घृणा होती है
और भय लगता है। परन्तु भक्ति-शब्द कहते ही मनमें
उल्लास हो जाता है॥ 274-276 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'आश्लिष्य-दोष'-जिसका दो
प्रकारसे अर्थ हो सकता है; जिसमें मुख्य अर्थकी कुछ
हानि होती है, वह दोष। 'रूढ़िवृत्ति'-मुख्यवृत्ति ॥ 274-275 ॥
छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
श्रीसार्वभौमकी निष्काम भक्तिको
देखकर महाप्रभुकी प्रसन्नता :-
शुनिय़ा हासेन प्रभु आनन्दित मने।
भट्टाचार्य कैल प्रभु दृढ़ आलिङ्गने ॥ 277 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके वचनोंको सुनकर
महाप्रभु बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उनका प्रगाढ़
आलिङ्गन किया ॥ 277 ॥
ग्रन्थकारके द्वारा श्रीकृष्णचैतन्यकी
कृपाकी महिमाका कीर्तन :-
येइ भट्टाचार्य पड़े पड़ाय मायावादे।
ताँर ऐछे वाक्य स्फुरे चैतन्य-प्रसादे ॥ 278 ॥
208 ।
छठा अध्याय 6/278-286 ]
लोहाके यावत् स्पर्शि' हेम नाहि करे।
तावत् स्पर्शमणि केह चिनिते ना पारे ॥ 279 ॥
अनुवाद-[ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी
कह रहे हैं] जो श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य मायावादको पढ़ते
और पढ़ाते थे, आज महाप्रभुकी कृपासे उनके मुखसे
ऐसे वाक्य निकल रहे हैं। जब तक अपने स्पर्शसे वह
लोहेको सोना नहीं बनाती, तब तक स्पर्शमणिको कोई
पहचान नहीं पाता ॥ 278-279 ॥
महाप्रभुका 'परमेश्वर श्रीकृष्ण' होनेमें सभीका विश्वास :-
भट्टाचार्येर वैष्णवता देखि' सर्वजन।
प्रभुके जानिल,-'साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन' ॥ 280 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी वैष्णवताको देखकर
सभी जान गये कि महाप्रभु 'साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन'
श्रीकृष्ण हैं ॥ 280 ॥
काशीमिश्रादिकी महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति :-
काशीमिश्र-आदि यत नीलाचलवासी।
शरण लइल सबे प्रभु-पदे आसि' ॥ 281 ॥
अनुवाद-तदुपरान्त काशीमिश्रादि जितने नीलाचलवासी
थे, सभीने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण
की ॥ 281 ॥
इसके बाद महाप्रभुका दक्षिण भारतमें भ्रमण :-
सेइ सब कथा आगे करिब वर्णन।
एबे कहि प्रभुर दक्षिण-यात्रा-विवरण ॥ 282 ॥
अनुवाद-इन सब कथाओंका मैं बादमें वर्णन
करूँगा, अभी मैं महाप्रभुकी दक्षिण-भारतकी यात्राका
वर्णन करूँगा ॥ 282 ॥
सार्वभौम करे यैछे प्रभुर सेवन।
यैछे परिपाटी करे भिक्षा-निर्वाहण ॥ 283 ॥
विस्तारिया आगे ताहा करिब वर्णन।
एइ महाप्रभुर लीला-सार्वभौम-मिलन ॥ 284 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने जिस प्रकार भिक्षादि
करवाकर अनेक प्रकारसे महाप्रभुकी सेवा की, इन सब
लीलाओंका मैं विस्तारपूर्वक बादमें वर्णन करूँगा। यह
महाप्रभुकी श्रीसार्वभौम-मिलन लीला है ॥ 283-284 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला पन्द्रहवाँ अध्याय देखें ॥ 284 ॥
छठे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रीसार्वभौम और चैतन्य महाप्रभुके संवादको
श्रवण करनेसे निष्काम भक्तिकी प्राप्ति,
यह कर्मकाण्डीय फलश्रुति मात्र नहीं :-
इहा येइ श्रद्धा करि' करये श्रवण।
ज्ञान-कर्मपाश हैते हय विमोचन ॥ 284 ॥
श्रद्धाय चैतन्यलीला सुने येइजन।
अचिरे मिलये ताँरे चैतन्य-चरण ॥ 285 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 286 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सार्वभौमोद्धारो
नाम षष्ठ-परिच्छेदः।
अनुवाद-इस लीलाको जो श्रद्धापूर्वक सुनते हैं, वे
ज्ञान और कर्मके बन्धनसे छूट जाते हैं। जो
श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्यलीलाको सुनते हैं, उन्हें शीघ्र ही
महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है। श्रीरूप-रघुनाथ
गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास
इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 284-286 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतमें मध्यखण्डमें सार्वभौम-उद्धार
नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 209
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सातवाँ अध्याय
कथासार—माघमासके शुक्ल पक्षमें महाप्रभुने संन्यास
ग्रहण करके फाल्गुन मासमें नीलाचलमें वास किया।
फाल्गुनमासमें दोलयात्राका दर्शन करके चैत्रमासमें
श्रीसार्वभौमका उद्धार किया। वैशाखमासमें दक्षिणकी
ओर यात्रा की। अकेले ही दक्षिणमें भ्रमण करेंगे,—ऐसा
प्रस्ताव रखनेपर, श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनके साथ 'कृष्णदास'
नामक एक ब्राह्मणको भेजा। जानेके समय श्रीसार्वभौमने
महाप्रभुको साथ ले जानेके लिये चार कौपीन-बहिर्वास
दिये और श्रीरामानन्द रायके साथ गोदावरीके तटपर
साक्षात्कार करनेके लिये अनुरोध किया। आलालनाथ
तक श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि कुछ भक्त महाप्रभुके साथ
गये थे। उन सबको वहीं छोड़कर केवल कृष्णदासको
साथ ले जाना स्वीकार करके महाप्रभु 'कृष्ण' 'कृष्ण'
बोलते-बोलते चलने लगे। जिस गाँवमें वे रात्रिमें वास
करते थे, वहाँ शरणागत व्यक्तियोंमें शक्ति सञ्चार
करके उसे सम्पूर्ण देशको ही 'वैष्णव' बनानेकी आज्ञा
देते। वे सब (महाप्रभुसे शक्ति-प्राप्त लोग) पुनः दूसरे
लोगोंकी भक्तिकी शिक्षा देकर अन्यान्य गाँवोंमें भक्तोंकी
संख्यामें वृद्धि करने लगे। इस प्रकार सबको वैष्णव
बनाते हुए महाप्रभु कूर्मस्थानमें पहुँचे, वहाँ 'कूर्म'-नामक
ब्राह्मणपर कृपा की और 'वासुदेव' नामक ब्राह्मणका
गलितकुष्ठ (ऐसा कोढ़, जिसमें कीड़े पड़ गये हों, उस)
रोगसे उद्धार किया। वासुदेवका उद्धार करके 'वासुदेवामृतप्रद'
नामक महाप्रभुका एक नाम हुआ।
—(अमृतप्रवाहभाष्य)
'वासुदेवामृतप्रद'-प्रभुको प्रणाम :-
धन्यं तं नौमि चैतन्यं वासुदेवं दयार्द्रधीः।
नष्टकुष्ठं रूपपुष्टं भक्तितुष्टं चकार यः॥1॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने दयार्द्रबुद्धि (दयासे द्रवित
बुद्धि) होकर 'वासुदेव'-नामक भक्तको कोढ़-रोगसे मुक्त
करके सुन्दर रूपमें पुष्ट किया और उसे भक्ति देकर
सन्तुष्ट किया था, उन्हीं धन्य श्रीचैतन्यदेवको मैं प्रणाम
करता हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
यः दयार्द्रधीः (दयया आर्द्रा धीर्यस्य सः) [कुष्ठ रोगाक्रान्तं]
वासुदेवं नष्टकुष्ठं (विगतकुष्ठरोगं) रूपपुष्टं (सौन्दर्यमयं) भक्तितुष्टं
चकार, तं धन्यं चैतन्यं नौमि।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो,
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ 2 ॥
माघ मासमें संन्यास, फाल्गुन मासमें पुरीधाममें वास,
चैत्र मासमें श्रीसार्वभौमका उद्धार, वैशाख मासमें
दक्षिण भारत जानेकी इच्छा :-
एइमते सार्वभौमेर निस्तार करिल।
दक्षिण-गमने प्रभुर इच्छा उपजिल ॥ 3 ॥
माघ-शुक्लपक्षे प्रभु करिल संन्यास।
फाल्गुने आसिया कैल नीलाचले वास ॥ 4 ॥
फाल्गुनेर शेषे दोलयात्रा से देखिल।
प्रेमावेशे बहुविध नृत्यगीत कैल ॥ 5 ॥
चैत्रे रहि' कैल सार्वभौम-विमोचन।
वैशाखेर प्रथमे दक्षिण याइते हैल मन ॥ 6 ॥
। 211
[ 7/3-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद - इस प्रकार श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उद्धार
करनेके बाद महाप्रभुकी दक्षिण भारत जानेकी इच्छा
जाग्रत हुई। माघमासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास
ग्रहण किया और फाल्गुन मासमें नीलाचलमें आकर
वास किया था। फाल्गुन मासके अन्तमें महाप्रभुने
डोलयात्राका दर्शन किया और प्रेमावेशमें अनेक प्रकारसे
नृत्य-गीत किया। चैत्रमासमें नीलाचलमें रहते हुए
महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उद्धार किया तथा
वैशाख मासके प्रारम्भमें उन्होंने दक्षिण भारत जानेका
निश्चय किया ॥ 3-6॥
भक्तोंके निकट कृतज्ञता-ज्ञापन और विदायी-माँगना :-
निजगण आनि' कहे विनय करिया।
आलिङ्गन करि' सबाय श्रीहस्ते धरिया॥ 7॥
“तोमा-सबा जानि आमि प्राणाधिक करि' ।
प्राण छाड़ा याय, तोमा-सबा छाड़िते ना पारि ॥ 8 ॥
तुमि-सब बन्धु मोर बन्धुकृत्य कैले।
इँहा आनि' मोरे जगन्नाथ देखाइले ॥ 9 ॥
एबे सबा-स्थाने मुञि मागों एक दाने।
सबे मेलि' आज्ञा देह, याइब दक्षिणे ॥ 10 ॥
बड़े भाई विश्वरूपको ढूँढ़नेके छलसे दक्षिण भारतके
लोगोंके उद्धारके लिये अकेले जानेकी इच्छा :-
विश्वरूप-उद्देशे अवश्य आमि याब।
एकाकी याइब, केहो सङ्गे ना लइब॥ 11 ॥
सेतुबन्ध हैते आमि ना आसि यावत्।
नीलाचले तुमि-सब रहिबे तावत् ॥" 12 ॥
अनुवाद - महाप्रभुने अपने सभी भक्तोंको बुलाकर
उनका आलिङ्गन किया और उनके हाथोंको पकड़कर
विनीत भावसे कहने लगे, - "आप सब मुझे मेरे प्राणोंसे
भी अधिक प्रिय हैं। मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ,
परन्तु आप सबको नहीं। आप सब मेरे बन्धु हैं और
मुझे यहाँ लाकर श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन कराके वास्तवमें
बन्धुका कार्य ही किया है। अब मैं आप सबसे एक
दान माँगता हूँ, आप सभी मुझे दक्षिण भारत जानेकी
अनुमति प्रदान करो। मुझे अपने भाई श्रीविश्वरूपको
खोजनेके लिये अवश्य ही जाना है, परन्तु मैं अकेला
ही जाऊँगा और किसीको साथमें नहीं लूँगा। जब तक
मैं रामेश्वरम्से लौटकर नहीं आ जाता, तब तक आप
सब नीलाचलमें ही रहना ॥ "7-12 ॥
विश्वरूप-सिद्धि-प्राप्ति जानेन सकल।
दक्षिण-देश उद्धारिते करेन एइ छल ॥ 13 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु तो सर्वज्ञ हैं। विश्वरूपको
इससे पूर्व ही सिद्धिप्राप्ति हो चुकी है अर्थात् वे
अप्रकट हो चुके हैं, उसे महाप्रभु पूर्णरूपसे जानते थे,
परन्तु दक्षिण-भारतके लोगोंका उद्धार करनेके लिये
उन्होंने यह छल किया कि मैं विश्वरूपको खोजूँगा ॥ 13 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 9/299-300 संख्या देखें ॥ 13 ॥
भक्तोंका दुःख :-
शुनिया सबार मने हैल महादुःख।
निःशब्द हइला, सबार शुकाइल मुख ॥ 14 ॥
अनुवाद - महाप्रभुकी बातको सुनकर सभीके मनमें
इतना दुःख हुआ कि वे कुछ बोल ही नहीं पाये और
सबका मुख सूख गया ॥ 14 ॥
साथमें जानेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रार्थना :-
नित्यानन्दप्रभु कहे, - “ऐछे कैछे हय?
एकाकी याइबे तुमि, के इहा सहय? ॥ 15 ॥
दुइ-एक सङ्गे चलुक, ना पड़ हठ-रङ्गे।
यारे कह, सेइ दुइ चलुक् तोमार सङ्गे ॥ 16 ॥
दक्षिणेर तीर्थपथ आमि सब जानि।
आमि सङ्गे याइ, प्रभु, आज्ञा देह तुमि ॥ " 17 ॥
अनुवाद - श्रीनित्यानन्द प्रभुने कुछ धैर्य धारण
212 ।
सातवाँ अध्याय 7/15-27 ]
करके कहा,—“ऐसा कैसे हो सकता है? आप अकेले
जायेंगे, इसे कौन सहन कर सकता है? हम दो-एक
व्यक्तियोंको अपने सङ्ग लेकर चलो, अन्यथा आप
किसी ठगके चङ्गुल पड़ जाओगे। आप जिन्हें कहेंगे,
वे दो व्यक्ति ही आपके साथ जायेंगे। मैं दक्षिणके सभी
तीर्थोंके मार्ग जानता हूँ। प्रभो! आप मुझे आज्ञा
दीजिये, मैं आपके साथ जाऊँगा॥”15-17॥
अनुभाष्य—'हठ-रङ्गे'—ठग या जुआ-चोरके
चङ्गुलमें॥16॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्द-जगदानन्द-दामोदर आदि
भक्तोंकी कृत्रिम निन्दाके छलसे गुणगान :—
प्रभु कहे,—“आमि नर्त्तक, तुमि—सूत्रधार।
तुमि यैछे नाचाओ, तैछे नर्त्तन आमार ॥ 18 ॥
संन्यास करिया आमि चलिलाङ वृन्दावन।
तुमि आमा लञा आइले अद्वैत-भवन ॥ 19 ॥
नीलाचल आसिते, पथे भाङ्गिला मोर दण्ड।
तोमा-सबार गाढ़-स्नेहे आमार कार्य-भङ्ग ॥ 20 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको लक्ष्य करके
कहा,—“मैं नर्तक हूँ और आप सूत्रधार हो। आप जैसे
मुझे नचाते हो, मैं वैसे ही नाचता हूँ। संन्यास लेकर
जब मैं वृन्दावनकी ओर चला, तब आप मुझे
शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घर ले आये। नीलाचल
आते समय मार्गमें आपने मेरा संन्यास दण्ड तोड़ दिया।
आप सबके गाढ़-स्नेहसे मेरे कार्य बिगड़ रहे हैं॥18-20॥
जगदानन्द चाहे आमा विषय भुञाइते।
येइ कहे, सेइ भये चाहिये करिते ॥ 21 ॥
कभु यदि इँहार वाक्य करिये अन्यथा।
क्रोधे तिनदिन मोरे नाहि कहे कथा ॥ 22 ॥
अनुवाद—(महाप्रभुने श्रीजगदानन्दके विषयमें
कहा)—जगदानन्द तो मुझे विषय-भोग करवाना चाहता
है। वह जो भी कहता है, उसके भयसे मुझे वह करना
पड़ता है। यदि कभी मैं इसकी बात नहीं मानकर कुछ
और करता हूँ, तो यह क्रोधित होकर तीन दिन तक
मुझसे बात नहीं करता॥21-22॥
मुकुन्द हुयेन दुःखी देखि' संन्यास-धर्म।
तिनबारे शीते स्नान, भूमिते शयन ॥ 23 ॥
अन्तरे दुःखी मुकुन्द, नाहि कहे मुखे।
इहार दुःख देखि' मोर द्विगुण हुये दुःखे ॥ 24 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥23-24॥
अनुभाष्य—(महाप्रभुने श्रीमुकुन्दको लक्ष्य करके
कहा)—संन्यासधर्मका पालन करनेके लिये मैं शीतकालमें
भी तीन बार स्नान और बिना शय्याके भूमिपर शयन
करता हूँ, ऐसा देखकर मुकुन्द दुःखी होता है। मेरे
लिये मुकुन्दके मनमें दुःख होता है, ऐसा जानकर
उसके लिये मैं दुगना दुःखी होता हूँ॥23-24॥
दामोदर-ब्रह्मचारीकी निरपेक्षतापर महाप्रभुका कटाक्ष :—
आमि त'—संन्यासी, दामोदर—ब्रह्मचारी।
सदा रहे आमार उपर शिक्षा-दण्ड धरि' ॥ 25 ॥
इँहार आगे आमि ना जानि व्यवहार।
इँहारे ना भाय स्वतन्त्र चरित्र आमार ॥ 26 ॥
लोकापेक्षा नाहि इँहार कृष्णकृपा हैते।
आमि कभु लोकापेक्षा ना पारि छाड़िते ॥ 27 ॥
अनुवाद—(अब महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितको
लक्ष्य करके कहा)—यद्यपि मैं संन्यासी हूँ और दामोदर
ब्रह्मचारी है, तथापि वह शिक्षा-दण्ड लेकर सदा ही मेरे
ऊपर शासन करता है, अर्थात् सदा मुझे उपदेश देता
रहता है। इसके विचारसे मैं लोक-व्यवहार नहीं
जानता, इसलिये इसे मेरा स्वतन्त्र व्यवहार अच्छा नहीं
लगता। इसपर श्रीकृष्णकी कृपा है, इसलिये यह अपेक्षा
नहीं रखता कि लोग क्या कहेंगे, परन्तु मैं संन्यासी हूँ,
इसलिये कभी भी लोकापेक्षा नहीं छोड़ सकता॥25-27॥
। 213
[ 7/25-36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य-दामोदर (ब्रह्मचारी) मुझे सदैव
इस प्रकार शिक्षादण्ड देता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता
है कि इसके सामने मैं एक व्यवहार-ज्ञानशून्य व्यक्ति
हूँ। दामोदर पण्डित आदिके प्रति कृष्णकृपा अधिक
होनेके कारण, ये लोगोंकी अपेक्षा न करके मुझे
अनेक प्रकारके विषय-भोग कराना चाहते हैं। किन्तु
मैं दीन संन्यासी हूँ, लोकापेक्षाको नहीं छोड़ सकता,
इसलिये अपने संन्यास-धर्मके अनुसार व्यवहार करता
हूँ॥ 25-27॥
अनुभाष्य- 'संन्यासी' - ब्रह्मचारीके गुरु होते हैं, इसलिये
'ब्रह्मचारी' होकर संन्यासीको उपदेश देना अनुचित है।
'ना भाय'-अच्छा नहीं लगता ॥ 25-26 ॥
महाप्रभुके द्वारा सभीको अपने वापिस
लौटने तक पुरीमें रहनेका अनुरोध :-
अतएव तुमि-सब रह नीलाचले।
दिन-कत तीर्थ आमि भ्रमिब एकले॥"28॥
अनुवाद-इसलिये तुम सब नीलाचलमें रहो और
मैं कुछ दिन अकेले ही तीर्थ भ्रमण करूँगा॥"28॥
अपने भक्तोंके दोष-प्रदर्शनके छलसे गुण-वर्णन :-
इँहा-सबार वश प्रभु हुये ये-ये-गुणे।
दोषरूप-छले करे गुण आस्वादने ॥ 29 ॥
अनुवाद-महाप्रभु जिन-जिन गुणोंके कारण इन
सब भक्तोंके वशीभूत थे, दोषरूप-छलसे उन सभी
गुणोंका महाप्रभुने आस्वादन किया॥ 29 ॥
अनुभाष्य-पूर्वकथित भक्तोंके जिन-जिन गुणोंके
कारण महाप्रभु वशीभूत हुए थे, उन्हींको ही 'छलपूर्वक
दोष' कहकर उल्लेख करके उन्होंने भक्तोंकी महिमा
बतलायी ॥ 29 ॥
महाप्रभुका अनुपम भक्तवात्सल्य :-
चैतन्येर भक्तवात्सल्य-अकथ्य-कथन।
आपने वैराग्य-दुःख करेन सहन ॥ 30 ॥
भक्तोंके लिये महाप्रभुको कष्ट स्वीकार,
भक्तोंका उसमें दुःख :-
सेइ दुःख देखि' येइ भक्त दुःख पाय।
सेइ दुःख ताँर शक्त्ये सहन ना याय॥ 31 ॥
गुण-दोषोद्गार-छले सबा निषेधिया।
एकाकी भ्रमिबेन तीर्थ वैराग्य करिया ॥ 32 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके भक्तवात्सल्यको शब्दोंके द्वारा
व्यक्त नहीं किया जा सकता। अपने संन्यासके वैराग्य
दुःखको वे स्वयं सहन कर लेते थे। परन्तु महाप्रभुके
उस दुःखको देखकर भक्त दुःखी होते और महाप्रभुमें
अपने भक्तोंके इन दुःखोंको सहन करनेकी शक्ति नहीं
थी। उनके भक्तोंको कोई दुःख न हो, इसलिये महाप्रभुने
भक्तोंके गुणोंको भी दोष कहकर छलसे उनको अपने
साथ जानेके लिये मना किया, जिससे वे वैराग्ययुक्त
होकर अकेले तीर्थ-भ्रमण कर सकें ॥ 30-32 ॥
स्वतन्त्र ईश्वर महाप्रभु अपने सङ्कल्पपर अटल :-
तबे चारिजन बहु मिनति करिल।
स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु कभु ना मानिल ॥ 33 ॥
अनुवाद-तब उन चारोंने मिलकर बहुत प्रार्थना
की, परन्तु महाप्रभु तो स्वतन्त्र ईश्वर हैं, उन्होंने
किसीकी भी बात नहीं मानी ॥ 33 ॥
श्रीनित्ताइकी अन्तिम प्रार्थना :-
तबे नित्यानन्द कहे, - "ये आज्ञा तोमार।
दुःख-सुख ये हउक्, कर्त्तव्य आमार ॥ 34 ॥
किन्तु एक निवेदन करों आर बार।
विचार करिया ताहा कर अङ्गीकार ॥ 35 ॥
कौपीन-बहिर्वास और जलपात्रको उठानेके लिये अपने
साथ किसीको ले जानेकी प्रार्थना :-
कौपीन, बहिर्वास आर जलपात्र।
आर किछु नाहि याबे, सबे एइ मात्र ॥ 36 ॥
214 ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
सातवाँ अध्याय 7/34–42 ]
महाप्रभुके द्वारा संख्या नाम-जप :-
तोमार दुइ हस्त बद्ध नाम-गणने।
जलपात्र-बहिर्वास वहिबे केमने ॥ 37 ॥
प्रेमावेशे पथे तुमि हबे अचेतन।
ए-सब सामग्री तोमार के करे रक्षण ॥ 38 ॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“आपकी
जैसी आज्ञा। उसका पालन करना हमारा कर्तव्य है,
चाहे हमें दुःख हो या सुख हो। परन्तु एक बार मैं
फिरसे कुछ निवेदन करता हूँ, कृपया उसपर विचार
करके उसे स्वीकार कीजिये। यदि और कुछ भी आप
साथ नहीं ले जायेंगे, तो भी कौपीन, बहिर्वास और
जलपात्र तो आप अवश्य ही साथ ले जायेंगे। आपके
दोनों हाथ तो नाम करने और संख्या गिननेमें बँधे
रहेंगे, फिर आप जलपात्र और बहिर्वास कैसे उठायेंगे?
प्रेमाविष्ट होकर जब आप मार्गमें अचेतन हो जायेंगे,
तब आपकी इन सब वस्तुओंकी रक्षा कौन
करेगा ? ॥ 34-38 ॥
अनुभाष्य—नाम-संख्या गिननेके लिये महाप्रभुके
दोनों हाथ बँधे रहते, इसलिये यदि कोई दूसरा व्यक्ति
कमण्डलु और बहिर्वासादिको (कौपीन-धोती आदिको)
नहीं उठायेगा, तो आवश्यकताके समय महाप्रभुको ये
व्यवहार करनेवाली वस्तुएँ नहीं मिलेंगी। प्रेमावेशमें
अचेतन होनेपर उस समय इन वस्तुओंकी रक्षाके लिये
किसी व्यक्तिकी आवश्यकता है। श्रीमन्महाप्रभुके द्वारा
किये गये नाम-संख्याकी गणनाके सम्बन्धमें
श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें कहा गया है—“वध्नन् प्रेमभरप्रकम्पितकरो
ग्रन्थीन् कटीडोरकैः संख्यातुं निजलोकमङ्गल-हरेकृष्णेति
नाम्नां जपन्” अर्थात् “समस्त जगत्का मङ्गल करनेवाले
अपने पवित्र नाम—हरे कृष्ण महामन्त्रका जप करते हुए
नाम संख्या गणना करनेके लिये जब वे गाँठयुक्त
कटिडोरीका स्पर्श करते हैं, तो उनके हाथ प्रेमावेशमें
काँपते हैं।” आदि वाक्य, और स्तवमालामें—“हरे
कृष्णेत्युच्चैः स्फुरितरसनो नामगणनाकृत-ग्रन्थिश्रेणी-
सुभगकटिसूत्रोज्ज्वलकरः” अर्थात् “उच्च स्वरसे हरे
कृष्ण नाम उच्चारण करते हुए उनकी रसना नृत्य
करती है और उच्चारित नामकी गणनाके लिये गाँठयुक्त
कटि-सूत्रमें उनका सुन्दर बायाँ हाथ सुशोभित हो रहा
है॥” आदि चैतन्याष्टक श्लोक आलोच्य हैं॥ 37-38 ॥
कृष्णदास-ब्राह्मणको साथ लेनेके लिये अनुरोध :-
‘कृष्णदास’-नामे एइ सरल ब्राह्मण।
इँहो सङ्गे करि’ लह, धर निवेदन ॥ 39 ॥
जलपात्र-वस्त्र वहि’ तोमा-सङ्गे याबे।
ये तोमार इच्छा कर, किछु ना बलिबे ॥” 40 ॥
अनुवाद—'कृष्णदास'-नामका यह एक सरल ब्राह्मण
है। इसे अपने साथ ले जाइये, यही मेरी प्रार्थना है।
यह आपके जलपात्र और वस्त्र उठाकर आपके साथ
चलेगा। आपकी जैसी इच्छा हो वैसा ही करना, यह
आपको कुछ भी नहीं कहेगा॥” 39-40 ॥
अनुभाष्य—यह कालाकृष्णदास ब्राह्मण और आदिलीला
11/37 संख्यामें वर्णित नित्यसिद्ध व्रजसखा द्वादश
गोपालोंमें अन्यतम, श्रीनित्यानन्द प्रभु जिनके प्राण
स्वरूप हैं,—वे कालाकृष्णदास, ये दोनों पृथक् व्यक्ति हैं।
पहलेवाले ब्राह्मण बादमें गौड़देश (बङ्गालमें) गये थे,
इस विषयमें मध्यलीला 10/62-74 संख्या देखें॥ 39 ॥
महाप्रभुके द्वारा स्वीकार :-
तबे ताँर वाक्य प्रभु करि’ अङ्गीकारे।
ताहा-सबा लञा गेला सार्वभौम-घरे ॥ 41 ॥
श्रीसार्वभौमके घरमें गमन :-
नमस्करि’ सार्वभौम आसन निवेदिल।
सबाकारे मिलि’ तबे आसने बसिल ॥ 42 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बातको
मान लिया और उन सबको साथ लेकर वे श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके घर गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने प्रणाम
करके महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन प्रदान किया
। 215
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ (Text) प्रस्तुत है:
[ 7/41–53 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
और फिर बाकी सबको आसन देकर वे स्वयं भी बैठ
गये॥ 41-42॥
भट्टाचार्यसे विदायीकी याचना :—
नाना कृष्णवार्त्ता प्रभु कहिल ताँहारे।
“तोमार ठाञि आइलाङ आज्ञा मागिबारे॥ 43॥
विश्वरूपको ढूँढ़नेका छल :—
संन्यास करि' विश्वरूप गियाछे दक्षिणे।
अवश्य करिब आमि ताँर अन्वेषणे॥ 44॥
आज्ञा देह, अवश्य आमि दक्षिणे चलिब।
तोमार आज्ञाते शुभे लेउटि' आसिब॥”45॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौमके साथ बहुतसी
श्रीकृष्ण विषयक चर्चा की और तब उनसे कहा,—“मैं
आपके पास एक आज्ञा माँगने आया हूँ। मेरे ज्येष्ठ
भ्राता विश्वरूप संन्यास लेकर दक्षिण भारतमें गये थे,
मुझे उन्हें ढूँढ़ने अवश्य ही जाना है। आप मुझे आज्ञा
दीजिये कि मैं उन्हें ढूँढ़ने दक्षिण भारतमें जाऊँ।
आपकी आज्ञासे सफल होकर वापिस लौट
आऊँगा॥”43-45॥
अनुभाष्य—‘लेउटि'—पश्चिम भारतीय (हिन्दी भाषाका)
शब्द ‘लौटना’ या वापिस आना॥ 45॥
भट्टाचार्यकी विरह-दुःखपूर्ण उक्ति :—
शुनि' सार्वभौम हैला अत्यन्त कातर।
चरणे धरिया कहे विषाद-उत्तर॥ 46॥
“बहुजन्मरे पुण्यफले पाइ तोमार सङ्ग।
हेन-सङ्ग विधि मोर करितेक भङ्ग॥ 47॥
शिरे वज्र पड़े यदि, पुत्र मरि' याय।
ताहा सहि, तोमार विच्छेद सहन ना याय॥ 48॥
महाप्रभुको कुछ दिन रुकनेके लिये अनुरोध :—
स्वतन्त्र-ईश्वर तुमि करिबे गमन।
दिन-कथो रह, देखि तोमार चरण॥”49॥
अनुवाद—महाप्रभुकी बात सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य
अत्यन्त दुःखी हुए और उनके चरण पकड़कर बड़े
दुःखसे कहने लगे,—“बहुत जन्मोंके पुण्योंके फलस्वरूप
मुझे आपका सङ्ग प्राप्त हुआ है, परन्तु इस सङ्गको
विधाता अब भङ्ग कर रहे हैं। यदि मेरे मस्तकपर
वज्रपात हो अथवा मेरा पुत्र मर जाय, मैं उसे सहन
कर सकता हूँ, परन्तु आपका वियोग सहन नहीं कर
सकता। आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, इसलिये आपने
जानेका निश्चय किया है, तो आप अवश्य ही जायेंगे।
परन्तु कृपा करके आप कुछ दिन और यहाँ रुक
जाँय, जिससे मैं आपके चरणोंका दर्शन कर
सकूँ॥”46-49॥
महाप्रभुकी सम्मति :—
ताहार विनये प्रभुर शिथिल हैल मन।
रहिल दिवस-कथो, ना कैल गमन॥ 50॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी विनती सुनकर
महाप्रभुके मनका सङ्कल्प शिथिल हो गया और वे उसी
समय न जाकर कुछ दिनोंके लिये वहीं रह गये॥ 50॥
भट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण और
उनकी गृहिणीके द्वारा रसोई बनाना :—
भट्टाचार्य आग्रह करि' करेन निमन्त्रण।
गृहे पाक करि' प्रभुके करा'न भोजन॥ 51॥
ताँहार ब्राह्मणी, ताँर नाम—‘षाठीर माता’।
रान्धि' भिक्षा देन तेंहो, आश्चर्य ताँर कथा॥ 52॥
आगे त' कहिब ताहा करिया विस्तार।
एबे कहि प्रभुर दक्षिण-यात्रा-समाचार॥ 53॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने आग्रह करके
महाप्रभुको अपने घर आनेका निमन्त्रण दिया और तब
अपने घरमें ही रसोई बनाकर महाप्रभुको भोजन
कराया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी पत्नी जिनको ‘षाठीकी
माता’ भी कहते थे, महाप्रभुको भोजन बनाकर देती
थीं। उनकी भी एक आश्चर्यमय कथा है, जिसका मैं
216 ।
सातवाँ अध्याय 7/51-63 ]
बादमें विस्तारसे वर्णन करूँगा। अब मैं महाप्रभुकी महाप्रभुकी आलालनाथ होते हुए दक्षिणकी यात्रा :-
दक्षिण यात्राके विषयमें वर्णन करता हूँ॥ 51-53 ॥ समुद्र-तीरे-तीरे आलालनाथ-पथे।
सार्वभौम कहिलेन आचार्य-गोपीनाथे ॥ 59 ॥
पाँच दिनके बाद पुनः विदायीकी प्रार्थना :-
श्रीसार्वभौमका घरमें रखे चार कौपीन-बहिर्वास
दिन पाँच रहि' प्रभु भट्टाचार्य-स्थाने। श्रीगोपीनाथके द्वारा मँगवाकर महाप्रभुको प्रदान करना :-
चलिबार लागि' आज्ञा मागिला आपने ॥ 54 ॥ "चारि कोपीन-बहिर्वास राखियाछि घरे।
भट्टाचार्यकी सम्मति :- ताहा, प्रसादान्न, लञा आइस विप्रद्वारे ॥" 60 ॥
प्रभुर आग्रहे भट्ट सम्मत हइला।
अनुवाद-महाप्रभु समुद्रके तटके साथ-साथ
प्रभु ताँरे लञा जगन्नाथ-मन्दिरे गेला ॥ 55 ॥
आलालनाथ जानेवाले मार्गपर चले। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरमें पाँच दिन श्रीगोपीनाथाचार्यसे कहा,-"घरमें चार कौपीन और
रहकर महाप्रभुने स्वयं उनसे चलनेकी आज्ञा माँगी। बहिर्वास रखे हैं, उसे और प्रसाद-अन्नको किसी
महाप्रभुके यात्रापर जानेका आग्रह करनेपर श्रीसार्वभौम ब्राह्मणकी सहायतासे ले आइये ॥" 59-60 ॥
भट्टाचार्य सहमत हो गये। तब महाप्रभु उनको साथ
अमृतप्रवाह भाष्य-समुद्रतटके साथ-साथ होते हुए
लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिर गये ॥ 54-55 ॥
दक्षिणकी ओर जानेपर पुरीसे छह कोसकी दूरीपर
'आलालनाथ' ग्राम है। 'आलालनाथ'में-चतुर्भुज-वासुदेव-
महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें जाकर उनसे यात्राकी
विग्रह है। वनके बीचमें एक छोटेसे गाँवमें उनका
आज्ञाकी याचना और प्रसादी-माला प्राप्तकर मन्दिरकी
मन्दिर है और उन्हें वहाँ बहुत ही उत्तम खीरका भोग
परिक्रमाकर यात्रा आरम्भ :-
लगता है। वहाँके पण्डे अभी भी (ठाकुरजीके अङ्गोंपर
दर्शन करि' ठाकुर-पाश आज्ञा मागिला।
पड़े) गर्म खीरके दाग श्रीविग्रहमें दिखलाते हैं॥ 59 ॥
पूजारी माला-प्रसाद प्रभुरे आनि' दिला ॥ 56 ॥
आज्ञा-माला पाञा हर्षे नमस्कार करि'। रायरामानन्दके साथ मिलनेके लिये श्रीसार्वभौमका
महाप्रभुसे अनुरोध :-
आनन्दे दक्षिण-देशे चले गौरहरि ॥ 57 ॥
तबे सार्वभौम कहे प्रभुर चरणे।
भट्टाचार्य-सङ्गे आर यत निजगण।
"अवश्य पालिबे, प्रभु, मोर निवेदने ॥ 61 ॥
जगन्नाथ प्रदक्षिण करि' करिला गमन ॥ 58 ॥
'रामानन्द राय' आछे गोदावरी-तीरे।
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवका दर्शनकर उनसे अधिकारी हयेन तँहो विद्यानगरे ॥ 62 ॥
जानेके लिये आज्ञा माँगी। तब पुजारीने श्रीजगन्नाथदेवकी शूद्र विषयि-ज्ञाने उपेक्षा ना करिबे।
माला और प्रसाद लाकर उन्हें प्रदान किया। मालाके आमार वचने ताँरे अवश्य मिलिबे ॥ 63 ॥
रूपमें श्रीजगन्नाथदेवकी आज्ञा पाकर महाप्रभुने हर्षित
अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे प्रार्थना
होकर उन्हें प्रणाम किया। तब महाप्रभु आनन्दसे
करते हुए कहा,-"मेरा एक निवेदन आप अवश्य ही
दक्षिण देशकी यात्राके लिये तत्पर हुए। महाप्रभु अपने
स्वीकार करना, गोदावरी-तटपर स्थित विद्यानगरके
भक्तों और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ श्रीजगन्नाथदेवकी अधिकारी 'रामानन्दराय' हैं। मेरी बात मानकर आप
प्रदक्षिणा करके यात्राके लिये चल दिये॥ 56-58 ॥
॥ 217
[ 7/61-69 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
उनसे अवश्य ही मिलना, शूद्र और विषयी जानकर
आप उनकी उपेक्षा मत करना ॥ 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'अधिकारी'—राजाका प्रधान
कर्मचारी। विद्यानगरको आजकल 'पोरबन्दर' कहते
हैं ॥ 62 ॥
अनुभाष्य—'शूद्र'—उत्कल देश (उड़ीसा)के समाजमें
करण-जातिको 'शौक्र-शूद्र' (जन्मके कारण शूद्र) कहा
जाता है। श्रीराम force? श्रीरामानन्द करण-जातिमें जन्में थे; इसलिये
लौकिक-दृष्टिसे वे शौक्रशूद्र होनेपर भी वास्तवमें
ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणोंके भी गुरु परमहंस-वैष्णव थे।
'विषयी'—स्त्री-पुत्रादिकी बातोंमें रत अथवा
बाह्य-रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्श आदि विषयोंमें ज्ञानेन्द्रियोंको
युक्त करके उनमें प्रमत्त रहनेवालेको 'विषयी' कहते हैं।
श्रीरामानन्द बाहरी दृष्टिसे कौपीनधारी संन्यासी नहीं थे,
इसलिये लौकिक दृष्टिसे वे राजाके सेवक होनेके
कारण विषयी दिखते थे, किन्तु वास्तवमें वे परम
विद्वान अथवा नरोत्तम-संन्यासी थे।
सार्वभौम भट्टाचार्यने पहले स्वयं वैष्णव नहीं होनेपर
भी श्रीरामानन्द रायको वैष्णव जाना था। और फिर,
महाप्रभुकी कृपासे भक्त बननेके बाद श्रीरामानन्दकी
बातोंपर विचार करके उनको 'अधिकारी रसिकभक्त'के
रूपमें समझा था ॥ 63 ॥
राय-रामानन्दकी प्रशंसा :-
तोमार सङ्गेर योग्य तेंहो एकजन।
पृथिवीते रसिक भक्त नाहि ताँर सम ॥ 64 ॥
पाण्डित्य आर भक्तिरस, —दुँहेर तेंहो सीमा।
सम्भाषिले जानिबे तुमि ताँहार महिमा ॥ 65 ॥
पहले वैष्णवोंको स्मार्त्त व्यक्तियोंकी अपेक्षा छोटा माननेके
कारण भट्टाचार्यके द्वारा उनका उपहास :-
अलौकिक वाक्य चेष्टा ताँर ना बुझिया।
परिहास करियाछि ताँरे 'वैष्णव' जानिया ॥ 66 ॥
बादमें महाप्रभुकी कृपासे चिन्मय-वैष्णवकी
महिमाकी उपलब्धि :-
तोमार प्रसादे एबे जनिनु ताँर तत्त्व।
सम्भाषिले जानिबे ताँर येमन महत्त्व ॥ 67 ॥
अनुवाद—रामानन्दराय ही एकमात्र आपके सङ्ग
करने योग्य हैं, पृथ्वीपर उनके समान कोई भी रसिक
भक्त नहीं है। वे पाण्डित्य और भक्तिरस—दोनोंकी चरम
सीमा हैं। उनसे बातचीत करनेपर आप स्वयं ही उनकी
महिमा जान जायेंगे। मैं उनके अलौकिक वचनों और
क्रिया-कलापोंको समझ नहीं पाता था तथा मैं उन्हें
'वैष्णव' मानकर उनका उपहास करता था। अब
आपकी कृपासे मैं राय रामानन्दकी महिमाको समझ
सका हूँ। उनके साथ वार्त्तालाप करके आप भी उनकी
महिमाको जान पायेंगे ॥ 64-67 ॥
अनुभाष्य—महाप्रभुसे विमुख प्रकृति-वादी ज्ञानी
और कर्मी लोग श्रीचैतन्याश्रित वैष्णवोंका ऐसे ही
उपहास किया करते हैं। महाप्रभुसे विमुख लोग—प्रत्यक्ष
और अनुमानको ही सर्वस्व माननेवाले जड़ेन्द्रियोंसे
प्राप्त ज्ञानमें ही मत्त तर्कपन्थी हैं। श्रीचैतन्याश्रित वैष्णव
शब्दप्रमाणको आश्रय माननेवाले अधोक्षज भगवान्के
सेवक और श्रौतपन्थी हैं ॥ 66 ॥
महाप्रभुके द्वारा उनके वाक्य-पालनकी सम्मति :-
अङ्गीकार करि' प्रभु ताँहार वचन।
ताँरे विदाय दिते ताँरे कैल आलिङ्गन ॥ 68 ॥
महाप्रभुके द्वारा गृहस्थ-वैष्णवको सम्मान :-
“घरे कृष्ण भजि' मोरे करिह आशीर्वादे।
नीलाचले आसिं येन तोमार प्रसादे ॥” 69 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी बातको
मानकर उन्हें विदायी देनेके लिये उनका आलिङ्गन
करके कहा, —“घरमें श्रीकृष्णका भजन करते समय
आप मुझे आशीर्वाद प्रदान करते रहना, जिससे मैं
आपकी कृपासे पुनः नीलाचल लौट आऊँ ॥” 68-69 ॥
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