श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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वैदिकानामर्थशून्यत्वमनित्यत्वं वा वेदस्य स्यादिति चेत्—तन्न-अतः
प्रभवात्-अस्मादिन्द्रादिशब्दादेव पुनः पुनरिन्द्राद्यर्थस्य प्रभवात् । एत-
दुक्तं भवति-यदि देवदत्तादिशब्दवदिन्द्रादि शब्दा वैदिका व्यक्ति
विशेष मात्रे संकेत पूर्वकाः प्रवृत्ताः, अपितु स्वभावत एव गवादि
शब्दवत् आकृति विशेष वाचित्वेन, ततश्चैकस्यामिन्द्र व्यक्तौ विनष्टा-
यामत एव वैदिकादिन्द्रशब्दान्मनसि विपरिवर्त्तमानादवगततद्वाच्य
भूतेन्द्राद्यर्थकारो धाता तदाकारमेवापरमिन्द्रं सृजति, यथा कुलालो
घटशब्दान्मनसि विपरिवर्त्तमानात्तदाकारमेव घटम् इति ।
( संशय ) ठीक है, कर्म में विरोध भले ही न हो पर वैदिक शब्दों
में तो विरोध होने की सभावना है, क्योंकि—जब देवताओं का शरीर
मानेगे तो, उनका उपचय-अपचय-विनाश आदि भी मानना ही पड़ेगा ।
शरीर मानने पर उनके अवयव भी मानेगे ही, अवयव नित्य होते नहीं,
इसलिए इन्द्रादि की अनित्यता भी माननी पड़ेगी । देवदत्त आदि शब्दों
की तरह, वैदिक इन्द्रादि शब्दो को भी अनित्य मानना होगा । इन्द्र की
उत्पत्ति के पूर्व और विनाश के बाद, फिर—वेदों में वर्णित इन्द्र का
अस्तित्व ही क्या रह जायगा ? इन्द्र के अस्तित्व के सशयित हो जाने
पर वेदों का अस्तित्व और नित्यता भी संशयित हो जावेगा । इत्यादि
( समाधान ) उक्त संशय असंगत है; इन्द्र आदि शब्द वेद में
नित्य ही है, इन्द्र आदि का भले ही पुनः पुनः उद्भव अनुद्भव होता
रहे, पर इन्द्र आदि शब्द, देवदत्त आादि शब्द की तरह, व्यक्ति विशेष
के बोधक नहीं हैं, अपितु गो आदि शब्द की तरह आकृति विशेष के
वाचक है । एक इन्द्र के विनष्ट हो जाने पर भी, वैदिक आकृति विशेष
इन्द्र शब्द का मानसिक चिन्तन करके, विधाता, उसी आकार प्रकार के
इन्द्र का सर्जन कर देते हैं, जैसे कि—कुम्हार, घट शब्द संपन्न आकार
विशेष का चिन्तन, विनष्ट घट के समान अन्य घट का निर्माण कर
देता है ।
कथमिदमवगम्यते ? प्रत्यक्षानुमानभ्यां—श्रुतिस्मृतिभ्यामित्यर्थं
श्रुतिस्तावद्-“वेदेन रूपे व्याकरोत् सतासतो प्रजापतिः” इति ।
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तथा-“स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत, स भुव इति व्याहरत्
सोऽन्तरिक्षमसृजत्” इत्यादि । वाचक शब्द पूर्वकं तत्तदर्थं संस्थानं
स्मरन् तत्तदर्थ संस्थान विशिष्टं तंतमर्थं सृष्टवानित्यर्थः ।
स्मृतिरपि-“अनादिनिधना ह्येषा वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा आदौ
वेदमयी दिव्या यतस्सर्वाः प्रसूतयः” इति । “सर्वेषां तु स नामानि
कर्माणि च पृथक् पृथक्, वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च
निर्ममे” । संस्था संस्थानानि रूपाणीति यावत् । तथा “नामरूपं
च भूतानां कृत्यानां च प्रपंचनम्, वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां
चकार सः” इति अतो देवादीनां विग्रहवत्वेऽपि वैदिक शब्दानामा-
नर्थक्यं, वेदस्यादिमत्वं न प्रसज्यते ।
यदि पूछें कि-तुम कैसे जान सके ? प्रत्यक्ष से या अनुमान से श्रुति
या स्मृति से ? तो भाई श्रुति ही का वचन है “प्रजापति ने वेद से, सत्
और असत् इन दो रूपों को प्रकट किया” तथा “उन्होंने भू शब्द से भूमि
की, भुवः शब्द से अंतरिक्ष की, सृष्टि की” इत्यादि से ज्ञात हुआ कि-
पदार्थ वाचक शब्दों का स्मरण करते हुए विशेष, विशेष पदार्थों के संस्थान
आकृति विशेष का स्मरण करके, उन-उन आकृति विशेषों की सृष्टि की।
स्मृति में भी इसी प्रकार-“स्वयम्भू ने सर्व प्रथम अनादि निधन
वेदमय, दिव्य वाक्य प्रकाश किया, जिससे कि सारी सृष्टि होती है”-
उस आदि पुरुष ने सर्वप्रथम वैदिक शब्दों से ही पृथक्-पृथक् नाम-कर्म
एवं विभिन्न प्रकार के संस्थानों का निर्माण किया”-“उन्होंने, देव आदि
समस्त भूतों के नाम रूप एव विविध कर्त्तव्य विषयों की वैदिक शब्दों
से ही सृष्टि की” इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट है कि-देव आदि के शरीरी
होते हुए भी, वैदिक शब्दों की नित्यता में कोई अंतर नहीं आता ।
अतएव च नित्यत्वम् ।१।३।२८॥
यत एवेन्द्र वशिष्ठादिशब्दानां देर्षिवाचिनां तत्तदाकारं
वाचित्वं, तत्तच्छब्देन तत्तदर्थस्मृतिपूर्विका च तत्तदर्थसृष्टिः, तत
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एव "मंत्रकृतो वृणोते" नम ऋषिभ्यो मंत्रकृद्भ्यः "अयं सोऽग्निरिति
विश्वामित्रस्य सूक्तं भवति" इत्यादिभिर्वशिष्ठादीनां मंत्रकृत्व कांडकृत्व
ऋषित्वार्दौ प्रतीयमानेऽपि वेदस्य नित्यत्वमुपपद्यते । एभिरेव "मंत्रकृत
वृणीते" इत्यादिभिर्वेदशब्दैः तत्तत्कांडसूक्त मंत्रकृताऋषीणामाकृति
शक्त्यादिकं परामृश्य, तत्तदाकारान् तत्तच्छक्ति युक्तांश्च सृष्ट्व्
प्रजापतिस्तानेव तत्तन्मंत्रादिकरणे नियुंक्ते । तेऽपि प्रजापतिन
आहित शक्त्यस्तत्तदनुगुणं तपस्तप्त्वा नित्यसिद्धान्पूर्वं पूर्वं वशिष्ठादि
दृष्टान् तानेव मंत्रादीन् अनधीत्यैव स्वरतोवर्णतश्चास्वलितान्प
श्यंति । अतश्च वेदानां नित्यत्व मेषां च मंत्रकृत्वमुपपद्यते ।
जैसे कि-देवता और ऋषिवाची, इंद्र वशिष्ट आदि शब्द आकृति
विशेष के बोधक है, उनका स्मरण करके ही उनकी सृष्टि की जाती
वैसे ही "मंत्रकृतोवृणीते-नमोऋषिभ्यो मंत्रकृद्भ्यः-अयं सोऽग्निरि
विश्वामित्रस्य सूक्तं भवति" इत्यादि वेदवाक्यों में, वशिष्ठ आदि क
मंत्र कर्तृता, कांड कर्तृता, तथा ऋषित्व आदि की प्रतीति होते हुए भ
वेदों की नित्यता अक्षुण्य रहती है। क्यों कि-"मंत्रकृतोवृणीते" इत्या
शब्दों के आधार पर, प्रजापति उन-उन मंत्रों, सूक्तों और काण्ड कर
ऋषियों की रचना कर, उन्हीं को उन मंत्रादि कार्य संपादन में नियुक्त
करते है प्रजापति से प्राप्त शक्ति द्वारा वे ऋषि भी अपने-अपने कर्त्तव्य
नुकूल तपश्चर्या द्वारा, अध्ययन पूर्वक, पूर्व-पूर्व वशिष्ठ आदि, दृष्ट
नित्यसिद्ध मंत्रराशि का, यथायथ (जैसे का जैसा ही) स्वर और वर्ण
अनुसार अविकल साक्षात्कार कर लेते हैं। इस प्रकार वेदों की नित्यत
एवं वशिष्ठादिकों की मंत्रकर्त्तृता सिद्ध हो जाती है।
अथस्यात्- नैमित्तिक प्रलयादिषु इन्द्रादि उत्पत्तौ वेदशब्देभ
पूर्वं पूर्वेन्द्रादिस्मरणेन प्रजापतिना देवादिसृष्टिरुपपद्यतां ना
प्राकृतप्रलये तु स्रष्टुः प्रजापतेः भूतादि अहंकार परिणाम शब्दर
च विनष्टत्वात् कथं प्रजापतेः शब्द पूर्विका सृष्टिरुत्पद्यते ? कथन्त
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विनष्टस्य वेदस्य नित्यत्वं ? अतो वेद नित्यत्ववादिना देवादीनां
विग्रहवत्त्वाऽभ्युपगमेऽपि लोक व्यवहारस्य प्रवाहानादिताऽश्रयणी-
येति ? अत्रोत्तरं पठति—
शंका—नैमित्तिक प्रलय के समय तो, ब्रह्म पूर्व सृष्ट्यानुसार वेद
वाक्य स्मरण पूर्वक, आकृति विशेष इन्द्र आदि की सृष्टि कर लेते हैं,
ऐसा तो मान भी सकते हैं, पर प्राकृत प्रलय में जब कि-सृष्टिकर्त्ता
प्रजापति एवं भूतोपादान अहंकार के परिणाम स्वरूप शब्द का भी लय
हो जाता है, तब प्रजापति की शब्दानुस्मरण पूर्विका सृष्टि कैसे संभव
होगी, तथा विनष्ट वेदों की नित्यता भी कैसे रहेगी ? इसलिए वेद-
नित्यता वादी, देवादिकों की देह सत्ता स्वीकारने पर भी, जो लोक
व्यवहार में अनादि प्रवाह रूपता है, उसका समर्थन कैसे करेंगे ? इसी का
उत्तर देते हैं—
समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ॥१।३।२८॥
कृत्स्नोपसंहारे जगदुत्पत्त्यावृत्तावपि पूर्वोक्तात्समाननामरूप-
त्वादेव न कश्चिद विरोधः । तथाहि—स भगवान् पुरुषोत्तमः
प्रलयावसान समये पूर्वसंस्थानं जगत्स्मरन् “बहुस्याम्” इति संकल्प्य
भोग्यभोक्तृजातं स्वस्मिन् शक्तिमात्रावशेषं प्रलीनं विभाव्य महदादि
ब्रह्माण्डं हिरण्यगर्भ पर्यन्तं यथापूर्वं सृष्ट्वा वेदांश्च पूर्वानुपूर्वी-
विशेष संस्थानाविष्कृत्य हिरण्यगर्भायोपदिश्य पूर्ववदेव देवाद्याकार-
जगत्सर्गे तं नियुज्य स्वयमपि तदन्तरात्मतयाऽवतस्थे । अतो
यथोक्तं सर्वमुपपन्नम् । एतदेव च वेदस्यापौरुषेयत्वं नित्यत्वं च,
यत्पूर्वपूर्वोच्चारणक्रमजनितसंस्कारेण तमेव क्रमविशेषं स्मृत्वातेनैव
क्रमेणोच्चार्यत्वम् तदस्मासु सर्वेश्वरेऽपि समानम् । इयांस्तु विशेषः—
संस्कारानपेक्षमेव स्वयमेवानुसंधत्ते पुरुषोत्तमः ।
प्राकृत प्रलय के बाद पुनः सृष्टि होने पर, पूर्वकथित समान नाम
और रूप की संभावना में भी, कोई विरोध नहीं आता । देखिये वेदों में
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हो ऐसा कहा गया है कि-उन भगवान पुरुषोत्तम ने प्रलयावसान के समय
पूर्व कल्पनीय संस्थान विशेष जगत का स्मरण करके “अनेक होऊँ' ऐसा
संकल्प करके, केवल शक्ति रूप से स्वयं में विलीन भोग्य और भोक्तृ
समूह को पृथक् पृथक् करके, महत्तत्व से लेकर ब्रह्मांड तक सृष्टि करके,
हिरण्यगर्भ को उसका उपदेश देकर उन्हें पूर्व कल्पानुसार जैसी की जैसी
आकृति वाले देव आदि समस्त जगत की सृष्टि में नियुक्त करके, स्वयं
अन्तर्यामी रूप से सृष्ट जगत में प्रविष्ट हो गए इस प्रकार उक्त संशय
का समाधान हो जाता है। इसी से वेदों की अपौरुषेयता और नित्यता
भी प्रमाणित हो जाती है। वेदों का जो पूर्व पूर्व उच्चारण क्रम जन्य
संस्कार है, उसी क्रम विशेष का स्मरण करके, सदा उच्चारण करना
चाहिए, यह नियम हम लोगों और सर्वेश्वर दोनों के लिए समान है।
सर्वेश्वर में, हमसे एक ही विशेषता है कि-वह पूर्व संस्कार निरपेक्ष होकर
स्वयं ही अनुसंधान या स्मरण करते हैं [जब कि हम लोग पूर्व संस्कारा-
नुसार ही स्मरण करने के लिए बाध्य हैं ]
कुत इदं यथोक्तभवगम्यत इति चेत् ? तत्राह-दर्शनात् स्मृतेश्च ।
दर्शनं तावत् -"यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति
तस्मै" इति । स्मृतिरपि मानवी-"आसीदिदं तमोभूतम्" इत्यारभ्य-
'सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः, अतएव
ससर्जादौ तासु वीर्यमपासृजत्, तदण्डमभवद् हैमंसहस्रांशु समप्रभम् ।
तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः" इति । यथा पौराणिकी-
"तत्र सुप्तस्य नाभौ पद्मभजायत तस्मिन् पत्मे महाभाग वेदवेदां-
गपारणः, ब्रह्मोत्पन्नः स तेनोक्तः प्रजाः सृज महामते ।" तथा -
"परोनारायणो देवः तस्याज्जातश्चतुर्मुखः" इति । तथा "आदि-
सर्गमहं वक्ष्ये" इत्यारभ्योच्यते-"सृष्ट्वा नारं तोयमंतः स्थितोऽहं
येनस्यान्मे नाम नारायणेति, कल्पेकल्पेऽतत्र शयामि भूयः सुप्तस्य मे
नाभिजं स्याद्यथाऽब्जं, एवम्भूतस्य मे देवि नाभिपद्मे चतुर्मुखः,
उत्पन्नस्यमया चोक्तः प्रजाः सृजत् महामते" इति ।
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अतो देवादीनामप्यर्थित्व सामर्थ्ययोगात् ब्रह्मविद्यायामधि-
कारोऽस्तीति सिद्धम् ।
यदि पूछें कि उक्त बात कैसे जान सके ? उसपर सूत्रकार कहते हैं
दर्शन और स्मृति से दर्शन जैसे-“जिन्होंने प्रथम ब्रह्मा की सृष्टि की तथा
जिन्होंने सृष्टि के निमित्त उन्हें वेदों की प्रेरणा दी।” इत्यादि । मनु स्मृति
में जैसे-“यह जगत सृष्टि के पूर्व तमोभूत था” इत्यादि से प्रारंभ करके-
“उन्होंने विविध प्रजासृष्टि की आकांक्षा करके, सर्व प्रथम अपने शरीर
से जल की सृष्टि की, उसी से वीर्य की सृष्टि की, वह वीर्य ही हजारों
सूर्यों के समान प्रभा संपन्न हिरण्मय अंड के रूप में परिणत हो गया, उस
अंड में से ही पितामह ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ।” पौराणिक स्मृति में
भी जैसे-“क्षीर सागर में सुप्त नारायण की नाभि से कमल प्रकट हुआ
उस कमल से वेद वेदांग पारंगत ब्रह्मा प्रकट हुए, उन्हें भगवान ने आज्ञा
दी कि-महामति ! तुम प्रजा की सृष्टि करो।” तथा-“प्रकाशमान
नारायण ही श्रेष्ठ हैं, उन्ही से चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट हुए” तथा-“आदि
सृष्टि करूँ” इत्यादि से प्रारंभ करके-“नार जल की सृष्टि कर मैं उसी
मे स्थित हो गया, उसी से मेरा नाम नारायण हुआ, प्रतिकल्प में मैं वहाँ
बार बार शयन करता हूँ, सोये हुए मेरी नाभि से कमल उत्पन्न होता है,
उस नाभि पद्म से चतुर्मुख ब्रह्मा का जन्म होता है, तब मैं उन्हें आज्ञा
देता हूँ कि-तुम प्रजा की सृष्टि करो।”
उक्त वर्णनों से सिद्ध होता है कि-देवताओं के शरीरी और
समर्थ्यवान होने से, उन्हें ब्रह्मविद्या में अधिकार प्राप्त है ।
८ मध्वाधिकरणः-
मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ।१।३।३०॥
ब्रह्मविद्यायां देवादीनामप्यधिकारोऽस्तीत्युक्तम्, इदमिदानीं
चिन्त्यते येषूपासनेषु या देवता एवोपास्यास्तेषु तासामधिकारोऽस्ति न
इति, किं प्राप्तम् ? नास्त्यधिकारस्तेषु मध्वादिष्विति जैमिनिर्मन्यते ।
कुतः ? असंभवात् नहि आदित्यवस्वादिभिरुपास्या आदित्यवस्वाद्य-
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योऽन्ये संभवंति । न च वस्वादीनां सतां वस्वादित्वं प्राप्यं भवति,
प्राप्तत्वात्, मधुविद्यायामृग्वेदादि प्रतिपाद्यकर्मनिष्पाद्यस्य रश्मि
द्वारेण प्राप्तस्य रसस्याश्रयतया लब्धमधुब्दपदेशस्यादित्यस्यांशानां
वस्वादिभिर्भुज्यमानानामुपास्यत्वंवस्वादित्वं च प्राप्यं श्रूयते-
“असौ वा आदित्यो देवमधु” इत्युपक्रम्य-“तद्यत्प्रथमममृतं वेद
वसूनामेवैकोभूत्वा अग्निनैव मुखेनैतदेवामृतम् दृष्ट्वा तृप्यति”
इत्यादिना ।
ब्रह्मविद्या में देवादिक का अधिकार है, यह तो सिद्ध हो चुका।
अब प्रश्न होता है कि- उपासनाओं में प्रायः उन सभी देवताओं की उपा-
सना का विधान है, जिनके अधिकार की चर्चा की जा रही है,, उन्हें स्वयं
अपनी उपासना करने का अधिकार है या नहीं ? जैमिनि आचार्य का मत
है कि-मधु आदि विद्याओं में देवताओं का अधिकार नहीं है क्यों कि-
ऐसा होना असंभव है, आदित्य वसु आदि देवता ही उक्त विद्याओं के
उपास्य हैं, वे स्वयं उपासक कैसे हो सकते हैं ? वसु आदि को उपासना से
वसु आदि का साक्षात्कार तो हो नहीं सकता, क्यों कि वे स्वयं तो उपा-
सक रूप से उपस्थित हैं ही वे ही फिर उपास्य रूप से कैसे प्रकट हो
सकते हैं ।
जैसा कि-मधु विद्या में, ऋग् वेदादि प्रतिपाद्य कर्म निष्पन्न
मधुनामक आदित्य की रश्मियों द्वारा निस्यूत रस, उपास्य वसु आदि से
[L
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परंब्रह्मोपासने देवानामुपासकत्वकथनं देवानामितरोपासन निवृत्तिं
द्योतयति । अत एषु वस्वादीनामनधिकारः ।
“देवगण ज्योतियों की ज्योति उस परब्रह्म को, आयु और अमृत
मान कर उपासन करते हैं" ऐसी ज्योति रूप परब्रह्म की उपासना
का वर्णन किया गया है। परब्रह्म की उपासना में देवताओं और मनुष्यों
का तुल्याधिकार होते हुए भी, यहाँ जो पृथक् उपासकता बतलाई गई है,
इससे, देवताओं के लिए अन्यों की उपासना की निवृत्ति का भाव द्योतित
होता है। इससे स्पष्ट होता है कि-मधु आदि विद्याओं मे देवताओं का
अधिकार नहीं है [अर्थात् देवताओं के उपास्य एकमात्र ब्रह्म ही है, ऐसा
उक्त उदाहरण से प्रतीत होता है, मधु आदि विद्याओं में देवताओं को
स्वयं उपास्य बतलाया गया है, इसलिए वे स्वयं उसमें उपासक नहीं हो
सकते, इन विद्याओं में मनुष्यों के ही अधिकार की बात निश्चित
होती है।
इति प्राप्तेऽभिधीयते सिद्धान्त :--
उक्त मत पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से सूत्र प्रस्तुत करते हैं—
भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ।१।३।३२।।
आदित्य वस्वादीनामपि तेष्वधिकारभावं भगवान् बादरायणो
मन्यते । अस्ति ह्यादित्य वस्वादीनामपि स्वावस्थब्रह्मोपासनेन
वस्वादित्व प्राप्ति पूर्वकं ब्रह्मप्रेप्सा संभवः । इदानीं वस्वादीनामपि
सतां कल्पांतरेऽपि वस्वादित्व प्राप्तिश्चोपेक्षिता भवति ।
मधु आदि ब्रह्मविद्या में आदित्य वसु आदि का अधिकार भगवान
बादरायण मानते हैं। आदित्य और वसु आदि भी, आत्मा में अवस्थित
पर ब्रह्म की उपासना द्वारा, वस्वादि भाव पूर्वक ब्रह्म प्राप्ति के इच्छुक
हो सकते हैं। इस जन्म में जो वसु आदि हैं, वे कल्पान्तर में भी वसु आदि
ही हों, ऐसी अपेक्षा भी तो, उपासना द्वारा हो सकती है।
अत्रहि कार्यकारणोभयावस्थ ब्रह्मोपासनं विधीयते । “असौ
वा आदित्यो देवमधु” इत्यारभ्य- “तत ऊर्ध्वं उदेत्य” इत्यतः
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प्रागादित्यवस्वादिकार्यविशेषावस्थं ब्रह्मोपास्यसुपदिश्यते । “अथतत
ऊर्ध्वं उदेत्य” इत्यादिना आदित्यान्तरात्मतयाऽवस्थितं कारणावस्थ
मेव ब्रह्मोपास्यमुपदिश्यते । तदेवं कार्यकारणोभयावस्थं ब्रह्मोपासीनः
कल्पान्तरे वस्वादित्वं प्राप्य तदन्ते कारणं परंब्रह्मैवाप्नोति ।
उक्त प्रकरण मे कार्य और कारण दोनों अवस्था वाले ब्रह्म की
उपासना का विधान किया गया है । “असौ वा आदित्यो” इत्यादि से
प्रारंभ करके “अथ तत ऊर्ध्वं” इत्यादि वाक्य के पूर्व तक, आदित्य वसु
आदि को कार्य विशेषावस्थापन्न ब्रह्मोपासना का उपदेश दिया गया है ।
“अथ तत ऊर्ध्वं” इत्यादि वाक्य मे, आदित्य के अंतरात्मा मे अवस्थित,
कारणावस्थ ब्रह्म की उपासना का उपदेश है । कार्य और कारण इन
दोनों अवस्थाओ वाले ब्रह्म के उपासक, कल्पांतर में वसु आदि रूप प्राप्त
कर, अन्त में कारण ब्रह्म में लीन हो जाते हैं, यही उक्त उपदेश का
तात्पर्य है ।
“न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद् दिवा हैवास्मै
भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद” इति कृत्स्नाया मधुविद्याया
ब्रह्मोपनिषत्व श्रवणात् ब्रह्मप्राप्तिपर्यन्तवस्वादित्वफलस्य श्रवणाच्च
वस्वादि भोग्यभूत् आदित्यांशस्य विधीयमानमुपासनं तदवस्थस्यैव
ब्रह्मण इत्यवगम्यते । अतएवं विधमुपासनमादित्य वस्वादीनामपि
संभवति । एवं च ब्रह्मण एवोपास्यत्वात् “तं देवा ज्योतिषां
ज्योतिः” इत्युपपद्यते । तदाह वृत्तिकारः-“अस्ति हि मध्वादिषु
संभवो ब्रह्मण एव सर्वत्र निचाय्यत्वात् ।
‘जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद को जानते हैं, उनके लिए न तो
सूर्य का उदय होता है न अस्त, उनके लिए तो मदा दिन ही दिन रहता
है' इत्यादि में, समस्त मधुविद्या की ब्रह्मोपनिषद स्वरूपता, ब्रह्म प्राप्ति
पर्यन्त वसु आदि रूप फल प्राप्ति, वसु आदि भोग्यभूत आदित्यांश को
उपासना, उस अवस्था में ही ब्रह्मावाप्ति आदि, बातें ज्ञात होती है इससे
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सिद्ध होता है कि-आदित्य वसु आदि से भी मधुविद्या की उपासना संभव
है । इसीलिए ब्रह्म की भी उपास्यता “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः" इत्यादि
में बतलाई गई है । जैसा कि-वृत्तिकार भी कहते है-'सर्वत्र ब्रह्म की
उपासना ही विहित है, इसलिए मधुविद्या आदि में देवतादि का अधिकार
हो सकता है ।'
६ अपशूद्राधिकरण :-
शुगस्यतदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ।१।३।३३॥
ब्रह्मविद्यायां शूद्रस्याप्यधिकारोऽस्ति नवेति विचार्यते; किं
युक्तम् ? अस्तीति, कुतः ? अर्थित्वसामर्थ्य प्रयुक्तत्वादधिकारस्य
शूद्रस्यापि तत्संभवात् । यद्यप्यग्निविद्या साध्येषु कर्मष्वनग्नि
विद्यत्वाच्छूद्रस्यानधिकारः, तथापि मनोवृत्तिमात्रत्वाद ब्रह्मोपासनस्य
तत्राधिकारोऽस्त्येव, शास्त्रीय क्रियाऽपेक्षत्वेऽप्युपासनस्य तत्तद्वर्णा-
श्रमोचित क्रियाया एवापेक्षितत्वाच्छूद्रस्यापि स्ववर्णोचितपूर्ववर्णां
शुश्रूषैव क्रिया भविष्यति । "तस्माच्छूद्रोयज्ञेऽनवक्लृप्तः” इत्यप्यग्नि-
विद्यासाध्ययज्ञादिकर्मानधिकार एव न्यायसिद्धोऽनूद्यते ।
ब्रह्मविद्या में शूद्रों का अधिकार है कि नहीं ? इस पर विचार
करते हैं । कह सकते हैं कि है, क्यो कि-शूद्रो मे भी अन्यवर्णों की तरह
अर्थित्व और सामर्थ्य संभव है । यद्यपि अग्निविद्या साध्य कर्मों में
अग्निहोत्री न होने के कारण, शूद्रों का अनधिकार सिद्ध होता है, तथापि
ब्रह्मविद्या जब एक मनोवृत्ति मात्र ही है, तब उसमे उनका स्वाभाविक
अधिकार सिद्ध हो जाता है । उपासना, यदि शास्त्र क्रिया सापेक्ष्य हो तो
भी, शास्त्रानुसार अपनी वर्णोचित क्रिया सुश्रूषा के आश्रय से, वे शूद्र
भी, अन्य वर्णों की तरह, उपासना के अधिकारी हो सकते हैं । “शूद्र
यज्ञ में अनधिकृत हैं" यह श्रुति तो, एकमात्र अग्निविद्या साध्य यज्ञादि
कर्मों में ही, शूद्र के अनधिकार की पुष्टि करती है ।
नन्वधीत वेदस्य श्रुतवेदांतस्य ब्रह्मस्वरूप तदुपासन प्रकारा-
नभिज्ञस्य कथं ब्रह्मोपासनं संभवति ? उच्यते-अनधीतवेदस्या श्रुतवे-
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दांतवाक्यस्यापीतिहासपुराण श्रवणेनापि ब्रह्मस्वरूपतदुपासनज्ञानं
संभवति । अस्ति च शूद्रस्यापीतिहासपुराण श्रवणानुज्ञा श्रावयेच्च-
तुरोवर्णान् कृत्वाब्राह्मणमग्रतः” इत्यादौ । दृश्यंतेचेतिहासपुराणेषु
विदुरादयो ब्रह्मनिष्ठाः । तथोपनिषत्स्वपि संवर्गविद्यायां शूद्रस्यापि
ब्रह्मविद्याधिकारः प्रतीयते-शुश्रूषु हि जानश्रुतिमाचार्यो रैकवः
शूद्रेत्यामंत्र्य तस्मैब्रह्मविद्यामुपदिशति-“आजहारेमाः शूद्रोनेनैव
मुखेनालापयिष्यथाः” इत्यादिना । अतः शूद्रस्याप्यधिकारः
संभवति ।
यदि कहो कि-जिन्होंने वेदाध्ययन, वेदांत श्रवण नहीं किया तथा
जो ब्रह्म के स्वरूप और उपासना से अनभिज्ञ हैं, वे ब्रह्मोपासना कर कैसे
पावेंगे ? तो सुनिये-वेदाध्ययन और वेदांतश्रवण के बिना भी पुराणेति-
हास के श्रवण से ही ब्रह्मस्वरूप और उपासना पद्धति का ज्ञान संभव
है । इतिहास पुराण के श्रवण की आज्ञा शूद्र को-“ब्राह्मण को अग्रवर्ती
करके चारों वर्णों को रहस्य श्रवण करना चाहिए” इत्यादि से शास्त्र से
ही प्राप्त है। इतिहास पुराण आदि में विदुरादि के ब्रह्मनिष्ठ होने की
चर्चा है। उपनिषदों में भी संवर्ग विद्या के प्रकरण में, शूद्रों को ब्रह्मविद्या
के अधिकार की चर्चा है। आचार्य रैकव ने ब्रह्म शुश्रूषु जानश्रुति को
“शूद्र” कह कर पुनः उसे ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया है, जैसे कि-हे
शूद्र ! तू ये गौ कन्या आदि लाया है, तू इस विद्याग्रहण के बहाने ही
मुझसे बातें कर रहा है” इत्यादि से ज्ञात होता है। इसलिए शूद्र का
अधिकार सिद्ध होता है।
सिद्धान्त-इति प्राप्ते उच्यते-न शूद्रस्याधिकारः संभवति,
सामर्थ्याभावात् , न हि ब्रह्मस्वरूपतदुपासनप्रकारमजानतस्तदंग-
भूतवेदानुवचनयज्ञादिष्वनधिकृतस्योपासनोपसंहारसामर्थ्यसंभवः,
असमर्थस्य च अर्थितत्व सद्भावेऽप्यधिकारो न संभवति, असामर्थ्य
च वेदाध्ययनाभावात्, यथैव हि त्रैवर्णिकविषयाध्ययनविधिसिद्ध-
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( ५२७ )
स्वाध्याय संपाद्यज्ञान लाभेन कर्मविधयो ज्ञानतदुपयादीनपरान्न
स्वीकुर्वन्ति, तथा ब्रह्मोपासन विधयोऽपि । अतोऽध्ययन विधिसिद्ध
स्वध्याधिगतज्ञानस्यैव ब्रह्मोपासनोपायत्वाच्छूद्रस्य ब्रह्मोपासन
सामर्थ्यासंभवः ।
उक्त मत पर सिद्धान्त स्थिर करते हैं कि-शूद्र का अधिकार नहीं
है, क्यों कि-उनमें सामर्थ्य का अभाव है । जो ब्रह्म के स्वरूप और उनकी
उपासना प्रणाली को नही जानते तथा उपासना के अंगस्वरूप वेदपाठ
यज्ञादि में जिनका अनधिकार है, उनमें उपासना के अनुकूल सामर्थ्य
संभव नहीं है, वेदाध्ययन का अभाव ही, सामर्थ्य का अभाव है । ब्राह्मण
आदि तीन वर्णों के लिए वेदाध्ययन शास्त्र विहित है, वेदाध्ययन संपाद्य
ज्ञान से ही उन लोगों को उपासना का अधिकार प्राप्त है । कर्म विधि
जैसे कि—ज्ञान और तदुपयोगी अन्यान्य साधनों की अपेक्षा नही करती
है, ब्रह्मोपासना की विधि भी उसी प्रकार है । अध्ययन विधि लभ्य
वेदाध्ययन जन्य ज्ञान ही ब्रह्मोपासना का प्रधान उपाय है । वैदिक ज्ञान
के अभाव से ही, शूद्रों में ब्रह्मोपासना का सामर्थ्य संभव नही है ।
इतिहास पुराणे अपि वेदोपबृंहणं कुर्वती एवोपायभावमनुभवतः
न स्वातंत्र्येण शूद्रस्येतिहास पुराण श्रवणानुज्ञानं पापक्षयादिफलार्थम्,
नोपासनार्थम् । विदुरादयस्तु भवान्तराधिगतज्ञाना प्रमीषात्
ज्ञानवंतः प्रारब्धकर्मवशाच्चेदृशजन्मयोगिन इति तेषां ब्रह्मनिष्ठ-
त्वम् ।
इतिहास पुराण में भी, वेदोपबृंहण करके ही, उपासना के उपायों
का विवेचन किया गया है, स्वच्छन्द विवेचन नहीं है । शूद्रों को जो
इतिहास पुराण श्रवण का उपदेश दिया गया है वह, पापक्षय फल प्राप्ति
के निमित्त से दिया गया है, उपासना के लिए नही दिया गया है। जन्मा-
न्तराधिगत अविलुप्त ज्ञानसंपन्न विदुर आदि, प्रारब्ध कर्मवश शूद्र
योनि मे गए थे, वस्तुतः वे जन्मसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ थे ।
( ५२८ )
यच्च-संवर्गविद्यायां शुश्रूषोः शूद्रेति संबोधन शूद्रस्याधिकारं
सूचयति-इति, तन्नेत्याह-शुगस्य तदनादर श्रवणात्तदाद्रवणात्सू-
च्यते हि “शुश्रूषोर्जानश्रुतेः पौत्रायणस्य ब्रह्मज्ञानकैवल्येन हं सोक्ता-
नादरवाक्य श्रवणात् तदैव ब्रह्मविदो रैक्वस्य सकाशं प्रत्याद्रवणा-
च्छुगस्य संजातेति हि सूच्यते, अतः स शूद्रेत्यामंत्रयते, न चतुर्थ-
वर्णत्वेन ।
संवर्ग विद्या में शुश्रूषु जानश्रुति को "शूद्र" कहा गया एकमात्र
इसी आधार से शूद्रों के अधिकार की बात मान लेना भी, भ्रांति है
इसके निवारणार्थ ही “शुगस्य तदनादर श्रवणात् सूच्यतेहि” सूत्र प्रस्तुत
किया जाता है । ब्रह्मविद्या शुश्रुषु जानश्रुति का ब्रह्मविद्या ज्ञान के अभाव
से, हंस द्वारा जो अनादर हुआ उससे म्लान होकर वह रैक्व के पास
गया । इससे ज्ञात होता है कि--वह उस समय अत्यंत दु खी और संतप्त
था, जिससे कि उसकी आकृति कांतिहीन हो गई थी; रैक्व ने इसीलिए
उसे शूद्र कहा था, चतुर्थवर्ण की दृष्टि से नही कहा था ।
शोचतीति हि शूद्रः, “शुचेर्दश्च” इति र प्रत्यये धातोश्च दीर्घे
चकारस्य च दकारे शूद्र इति भवति । अतः शोचितृत्वमेवास्य शूद्र
शब्द प्रयोगेन सूच्यते, न जातियोगः । जानश्रुतिः किल पौत्रायणो
बहुद्रव्य प्रदो बह्वन्न प्रदश्च बभूव । तस्य धार्मिकाग्रेसरस्य धर्मेण
प्रीतयोः कयोश्चिन्महात्मनोरस्य ब्रह्मजिज्ञासामुत्पिपादयिषतोः हंस-
रूपेण निशायामस्याविदूरे गच्छतोरन्यतर इतरमुवाच-“भो भो
भायं भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समंदिवा ज्योति-
रातंतं तत्मा प्रसांक्षीस्तत्वा मा प्रधाक्षीत्' इति । एवं जानश्रुतिः
प्रशासारूपं वाक्यभुषश्रुत्य परोहस. प्रत्युवाच-“कम्बर एनमेतत् संतं
सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ” इति । कं सन्तमेनं जानश्रुतिं सयुग्वानं
रैक्वं ब्रह्मज्ञमिव गुणश्रे ष्ठमेतदात्थ, स ब्रह्मज्ञो रैक्व एव लोके गुण-
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( ५२६ )
वत्तरः महताधर्मेण संयुक्तस्याप्यस्य जानश्रुतेरब्रह्मज्ञस्य को गुणः,
यद्गुणजनितं तेजो रैक्वतेज इव मां दहेदित्यर्थः ।
जो शोक करे उसे शूद्र कहते हैं, “शुचेर्दश्च” इस पाणिनीय सूत्र
से, र प्रत्यय होने पर शुच् धातु के उकार को दीर्घ और च के स्थान पर
द होने से शूद्र शब्द बनता है । उक्त प्रसंग में शूद्र शब्द से शोकान्वित
भाव ही सूचित होता है, जाति संबंध नहीं । पौत्रायण जानश्रुति, बहुद्रव्य
और बहुअन्न का प्रसिद्ध दानी था, धार्मिकाग्रगण्य उसकी धर्मचर्या से
परितुष्ट कोई दो महात्मा, उसकी ब्रह्मजिज्ञासा, को उद्बुद्ध करने के
लिए, हंस रूप धारण करके, रात्रि के समय, यात्रा में उसके साथ चलते
हुए इस प्रकार परस्पर वार्त्ता करने लगे--‘‘अरे भल्लाक्ष ! पौत्रायण
जानश्रुति का तेज आकाश में चारों ओर फैल रहा है, उसका स्पर्श मत
करना, कहीं वह तुम्हें भस्म न कर दे’’ ऐसी जानश्रुति की प्रशंसा सुनकर
दूसरा कहता है-‘’अरे तू इस राजा में कौन सी विशेषता देखकर ऐसी
प्रशंसा कर रहा है, क्या तू इसे गाड़ी वाले रैक्व के बराबर मानता है ?’’
अर्थात् ब्रह्मज्ञ वह रैक्व जगत में सर्वाधिक गुणवान है, यह जानश्रुति
महा धार्मिक होते हुए भी ब्रह्म ज्ञान रहित है, उसमें कौन सा गुण है
जिससे कि उसमें रैक्व के समान दाहिका शक्ति आ गई जिससे मुझे
दाह होगा ?
एवमुक्तेन परेण क्वोऽसौ रैक्व इति पृष्टः लोके यल्किञ्चित्
साध्वनुष्ठितं कर्म यच्च सर्वचेतनगतं विज्ञानम्, तदुभयं यदीयज्ञान-
कर्मान्तर्भूतम् स रैक्व” इत्याह। तदेतद् हंसवाक्यं ब्रह्मज्ञानविधुरतया
आत्मनिन्दागर्भं तद्वत्तया च रैक्व प्रशंसा रूपं जानश्रुतिरुपश्रुत्य
तत्क्षणादेवक्षत्तारं रैक्वान्वेषणाय प्रेष्य तस्मिन्विदित्वा आगते स्वय-
मपि रैक्वभुपसद्य गवां षट्शतं निष्कमश्वतरी रथं च रैक्वायोपहृत्य
रैक्व प्रार्थयामास “अनुम एतां भगवो देवतां शाधि यां देवता-
मुपास्से” इति त्वदुपास्यां परां देवतां ममानुशाधीत्यर्थः ।
इस प्रकार उस हंस के कहने पर, दूसरे ने पूछा ‘‘यह रैक्व कौन
है ?’’ इस पर उस हंस ने बतलाया कि--‘‘इस जगत में जो भी कुछ
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( २१० )
उत्कृष्ट कर्म होते हैं तथा समस्त चेतन में जो कुछ ज्ञान निहित है, ये
दोनों बातें जिसके ज्ञान और कर्म के अंतर्गत हैं वे रैक्व है।" ब्रह्मज्ञान
के अभाव से अपने निंदापूर्ण तथा ब्रह्मज्ञान के सद्भाव से रैक्व के स्तुति-
परक उस हंस के वाक्य को सुनकर जानश्रुति ने तत्काल सारथी को
रैक्व को खोजने को भेजा। सारथी, रैक्व को खोज कर आया तब,
जानश्रुति स्वयं रैक्व के पास गया, जाकर उसने छः सौ गाय, स्वर्णहार,
घोड़ेवाले रथ भेंट कर उनसे प्रार्थना की कि--"भगवन ! आप जिन
देवता की उपासना करते हैं उनका मुझे उपदेश दें" अर्थात् अपने उपास्य
परादेवता का मुझे भी उपदेश दो।
स च रैक्वः स्वयोगमहिम विदित लोकत्रयो जानुश्रुतेर्ब्रह्मज्ञान
विधुरतानिमित्तानादरगर्भहंसवाक्य श्रवणेन शोकाविष्टतां तदनंतर-
मेव ब्रह्मजिज्ञासोद्योगं च विदित्वाऽस्य ब्रह्मविद्यायोग्यतामभिज्ञाय
चिरकाल सेवां बिना द्रव्यप्रदानेन शुश्रूषमाणस्यास्य यावच्छक्ति
प्रदानेन ब्रह्मविद्या प्रतिष्ठिता भवतीति मत्वा तमनुगृह्णन् तस्य
शोकाविष्टतामुपदेशयोग्यताख्यापिकां शूद्र शब्देनामंत्रणेन ज्ञापयन्नि-
दमाह-“अहहारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्तु” इति । सह गोभि-
रयं रथस्तवैवास्तु नैतावता मह्यं दत्तेन ब्रह्मजिज्ञासया शोकाविष्टस्य
तव ब्रह्मविद्या प्रतिष्ठिता भवतीत्यर्थः ।
अपनी योगशक्ति के प्रभाव से त्रिलोक तत्त्वज्ञ उस रैक्व ने समझ
लिया कि--ब्रह्मज्ञानाभाव और हंसोक्त अनादर वचन श्रवण से जानश्रुति
शोकाविष्ट है, इसीलिए यह असूयावश ब्रह्मविद्या प्राप्ति के लिए उद्यत
है। उसकी ऐसी ब्रह्मजिज्ञासा योग्यता को समझकर कि दीर्घकालीन
ब्रह्मचर्य की साधना के बजाय केवल भेंट द्वारा ही ब्रह्मविद्या ग्राहिका
शक्ति आ जावेगी, ऐसा विचार कर अनुग्रह पूर्वक रैक्व ने जानश्रुति से
कहा--"अरे शूद्र ! गौओं सहित यह हारयुक्त रथ तेरे ही पास रहे"
अर्थात्-गो रथ आदि तू ही रख, इनको देने मात्र से ही, शोकाविष्ट
ब्रह्म जिज्ञासु तुझमें ब्रह्म विद्या स्थिर नहीं हो सकती।
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( ५३१ )
स च जानश्रुतिर्भूयोऽपि स्वशक्त्यनुगुणमेव गवादिकंधनं कन्यां
च प्रदायोपससाद, स रैकवः पुनरपि तस्य योग्यतामेव ख्यापयन् शूद्र
शब्देनामंत्र्याह—"आजहारेमा शूद्रानेनैव मुखेनाला पयिष्यथाः"
इति इमानि धनानि शक्त्यनुगुणान्याजहर्थ, अनेनैव द्वारेण चिरसे-
वया बिनाऽपि मां त्वदभिलाषितं ब्रह्मोपदेश रूपवाक्यमालापयिष्य-
तीत्युक्त्वा तस्मा उपदिदेश अतः शूद्रशब्देन विद्योपदेशयोग्यताख्या-
पनार्थं शोक एवास्य सूचितः न चतुर्थवर्णत्वम्।
उस जानश्रुति ने और अधिक गौ कन्या आदि लाकर देते हुए
ब्रह्मजिज्ञासा की-रैक्व ने उसकी योग्यता को जानने के लिए उसे पुनः
शूद्र कहते हुए कहा—"अरे शूद्र । अपनी शक्ति के अनुसार जो गौवें
और कन्यायें लाया है इनके द्वारा ही तू मुझसे, बिना चिरन्तन कालीन
सेवा के, ब्रह्मोपदेश चाहता है" इतना कह उसे उपदेश दिया । इस प्रसंग
के विवेचन से ज्ञात होता है कि—जानश्रुति की विद्योपदेश योग्यता की
परीक्षा और असूयायुक्त शोक को सूचित करने के लिए ही उसे शूद्र कहा
गया । अंतिमवर्ण का सूचक शूद्र शब्द नही है ।
क्षत्रियत्ववगतेश्च ।१।३।३४॥
"बहुदायी" इति दानपतित्वेन "बहुपाक्यः" इत्यादिना"
सर्वत एवं एतदन्नमत्स्यति "इत्यन्तेन बहुतरपक्वान्नप्रदायित्व
प्रतीते ।" सहसज्जहान एव क्षत्तारमुवाच" इति क्षत्रियत्व प्रती-
तेश्च न चतुर्थवर्णत्वम् ।
"बहुत दान करने वाला" पद से दानशीलता तथा "बहुत अन्न
पकाया गया" आदि से लेकर "सब लोग यही अन्न खावें" इस पद तक
अनेक पक्वान्नों के दान की चर्चा से और "उसने शय्या त्याग करते ही
सारथी से कहा" इत्यादि वर्णनों से क्षत्रियत्त्व की प्रतीति होती है, चतुर्थ-
वर्ण शूद्रता की प्रतीति नहीं होती ।
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( ५३२ )
तदेवमुपक्रमगताख्यायिकायां क्षत्रियत्व प्रतीतिरुक्ता, उपसंहार-
गताख्यायिकायामपि क्षत्रियत्वमस्य प्रतीयत इत्याह—
उपाख्यान के उपक्रम से तो जानश्रुति का क्षत्रियत्व प्रतीत होता
ही है, उपाख्यान के उपसंहार से भी क्षत्रियत्व की प्रतीति होती है-यही
बतलाते हैं ।
उत्तरत्र चैत्ररथेन लिंगात् ।१।३।३५॥
अस्य जानश्रुतेरुपदिश्यमानायामस्यामेव संवर्गविद्यायामुत्तरत्र
कीर्त्यमानेनाभिप्रतारिणाम्ना चैत्ररथेन क्षत्रियेणास्य क्षत्रियत्वं
गम्यते । कथम् ? “अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च
काक्षसेनि परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे” इत्यादिना “ब्रह्मचा-
रिन्नेदमुपास्महे” इत्यंतेन कापेयाभिप्रतारिणोर्भिक्षमाणस्य ब्रह्मचा-
रिणश्च संवर्गविद्या संबंधित्वं प्रतीयते । तेषुचाभिप्रतारी क्षत्रियः
इतरौ ब्राह्मणौ अतोऽस्यां विद्यायां ब्राह्मणस्य तदितरेषु च क्षत्रि-
यस्यैवान्वयो दृश्यते, न शूद्रस्य । अतोऽस्यां विद्यायांमन्विताद् रैक्वाद्
ब्राह्मणात् अन्यस्य जानश्रुतेरपि क्षत्रियत्वमेव युक्तम् ; न चतुर्थ-
वर्णत्वम् ।
जानश्रुति के उपदेश प्राप्त हो जाने के बाद, इसी संवर्ग विद्या के
अंतिम प्रकरण में चित्ररथवंशज अभिप्रतारि को क्षत्रिय बतलाया गया है,
जिससे कि क्षत्रियत्व की प्रतीति होती है । “कापेय शौनक और कक्षसेन
के पुत्र अभिप्रतारी को भोजन परोसते समय ब्रह्मचारी ने भिक्षा मांगी”
इत्यादि से लेकर “ब्रह्मचारी ! हम उसी की उपासना करते हैं” इस
अंतिम वाक्य तक कापेय, अभिप्रतारी और ब्रह्मचारी का, संवर्ग विद्या से
संबंध प्रतीत होता है । इन तीनों में अभिप्रतारी क्षत्रिय और दो ब्राह्मण
थे, इस विद्या में ब्राह्मण और क्षत्रियों का ही संबंध दिखलाया गया है शूद्र
का नहीं । इसलिए इस विद्या से सबद्ध रैक्व ब्राह्मण से भिन्न जानश्रुति
को भी क्षत्रिय मानना ही युक्तियुक्त है, शूद्रा मानना ठीक नही है ।
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नन्वस्मिन् प्रकरणेऽभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वं च न
श्रुतम् तत्कथमस्याभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वम् ? कथं वा क्षत्रियत्वं ?
तत्राह-लिङ्गात् इति । "अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च
काक्षसेनिम्" इत्यभिप्रतारिणः कापेयसाहचर्याल्लिङ्गादस्याभि
प्रतारिणः कापेय संबंधः प्रतीयते । अन्यत्र च "एतेन वैचैत्ररथं
कापेया अयाजयन्" इति कापेयसंबंधिनश्चैत्ररथत्वं श्रूयते, तथा
चैत्ररथस्य क्षत्रियत्वं-"तस्माच्चैत्रथोनामैकः क्षत्रपतिरजायत" इति ।
अतोऽभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वं च गम्यते ।
प्रश्न होता है कि-इस प्रकरण में अभिप्रतारी का चैत्ररथत्व और
क्षत्रियत्व, स्पष्ट रूप से तो कहा नहीं गया, फिर यह कैसे जाना कि
वह चित्ररथवंशज क्षत्रिय था ? कहते हैं कि-चिन्ह से ही ज्ञात होता है ।
"एक बार कापेय शौनक और काक्षसेनि अभिप्रतारी" इत्यादि वाक्य में
कापेय के साथ अभिप्रतारी का वर्णन किया गया है जिससे ज्ञात होता है
कि अभिप्रतारी भी किसी गोत्र से संबद्ध था । अन्यत्र "कापेय इसके द्वारा
ही चैत्ररथ को यज्ञ कराते हैं" इत्यादि में भी कापेय और चैत्ररथ का
संबंध दिखलाया गया है, तथा-"चैत्ररथ नाम का एक क्षत्रपति था"
इत्यादि से चैत्ररथ का क्षत्रियत्व स्पष्ट प्रतीत होता है । इन सभी वर्णनों
से अभिप्रतारी का चैत्ररथत्व और क्षत्रियत्व ज्ञात होता है ।
तदेवं न्यायविरोधिनि शूद्रस्याधिकारे लिंगं नोपलभ्यत
इत्युक्तम्, इदानीं न्याय सिद्धः शूद्रस्यानधिकारः श्रुतिस्मृतिभिर-
नुगृह्यत, इत्याह--
युक्ति विरुद्ध शूद्राधिकार विषयक कोई प्रमाण नहीं है यह दिख-
लाया गया । शूद्र का अनधिकार युक्तिसम्मत तथा श्रुति स्मृति अनुमोदित
है, यही बतलाते हैं-
संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ।१।३।३६॥
ब्रह्मविद्योपदेशेषूपनयनसंस्कारः परामृश्यते-"उप त्वानेष्ये"
"तं होपनिन्ये" इत्यादिषु । शूद्रस्य चोपनयनादिसंस्काराभावोऽ-
( ५३४ )
भिलप्यते–“न शूद्रे पातकं किंचिन्न च संस्कारमर्हति”—चतुर्थोवर्णं
एकजातिर्न च संस्कारमर्हति” इत्यादिषु ।
जहाँ ब्रह्मविद्योपदेश प्रकरणों में उपनयन संस्कार के विषय में
“तुझे उपनीत करता हूँ” उसे उपनीत किया “ऐसा विचार किया गया हैं
वही शूद्र के लिए उपनयन का अनधिकार भी बतलाया गया है—’ शूद्र
को किसी प्रकार का पाप नही लगता और न वह किसी संस्कार के योग्य
ही है “चौथा वर्ण ही एक ऐसी जाति है जिसे सस्कार की आवश्यकता
नही है” इत्यादि ।
तदभाव निर्धारणे च प्रवृत्तेः ।१।३।३७॥
“नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याहर” इति शुश्रूषो
र्जावालस्य शूद्रत्वाभाव निर्धारणे सत्येव विद्योपदेशप्रवृत्तेश्च न
शूद्रस्याधिकारः ।
“ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नही कर सकता इसलिए
सौम्य ! तू समिधा ले आ” ऐसे शुश्रूषु जाबालि के शूद्रत्व के अभाव को
भली भाँति जानकर ही गौतम विद्योपदेश में प्रवृत्त हुए । इस वर्णन से
ज्ञात होता है कि-शूद्र का ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है ।
श्रवणाध्ययनार्थ प्रतिषेधात् ।१।३।३८॥
शूद्रस्य वेद श्रवणतदध्ययनतदर्थानुष्ठानानि प्रतिषिध्यंते–
“पद्युहवा एतच्छमशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्येतव्यम्”–
तस्माच्छूद्रो बहुपशुरयज्ञीय” इति । बहुपशुः पशुसदृश इत्यर्थः ।
श्रनुपशृण्वतो अध्ययनतदर्थज्ञानतदर्थानुष्ठानानि न संभवंति,
अतस्तान्यपि प्रतिषिद्धान्येव ।
शूद्र को, वेद श्रवण, अध्ययन और वैदिक अनुष्ठानों का प्रतिषेध
किया गया है–जैसे कि–“शूद्र चलता फिरता श्मशान है इसलिए उसके
समीप वेदाध्ययन नहीं करना चाहिए” शूद्र पशुतुल्य ही है यज्ञ के योग्य
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नहीं हैं” इत्यादि । जिसके लिए वेद श्रवण तक विहित नहीं है, उसके
लिए वेदाध्ययन, वेदार्थज्ञान और वेदानुष्ठान आदि तो कभी संभव ही
नहीं हैं । इसलिए वे सब भी उसके लिए प्रतिषिद्ध ही हैं ।
स्मृतेश्च ।१।३।३६॥
स्मर्यते च श्रवणादि निषेधः “अथ हास्यवेदमपशृण्वतस्त्रपुज-
तुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणमुदाहरणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेदः”
इति । “न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत्” इति च ।
अतः शूद्रस्यानधिकार इति सिद्धम्।
श्रवण आदि का निषेध स्मृति में भी जैसे-“वेद सुनने वाले शूद्र के
कानों को गर्म लोह और शीशे से पूर्ण करो, वेदपाठ करने पर जीभ काट
लो, याद कर लेने पर शरीर काट दो” इत्यादि । “इसे धर्म का उपदेश
मत दो, न व्रतानुष्ठान का ही उपदेश दो”। इत्यादि से शूद्र का अनधि-
कार सिद्ध होता है ।
ये तु निर्विशेषचिन्मात्र ब्रह्मैव परमार्थः, अन्यत् सर्वंमिथ्याभूतम्
बंधश्चापारमार्थिकः, स च वाक्यजन्यवस्तुयाथात्म्यज्ञानमात्रनिवर्त्यः,
तन्निवृत्तिरेवमोक्षः इति वदंति, तै ब्रह्मज्ञाने शूद्रादेरनधिकारो वक्तुं
न शक्यते । अनुपनीतस्य अनधीतवेदस्याश्रुतवेदांतवाक्यस्यापि
यस्मात्कस्मादपि निर्विशेषचिन्मात्रं ब्रह्मैव परमार्थोऽन्यत्सर्वम्
तस्मिन् परिकल्पितं मिथ्याभूतमिति वाक्याद्वस्तुयाथात्म्यज्ञानो-
त्पत्तेः, तावतैव बंधनिवृत्तेश्च ।
( शांकरमत निरसन ) जो लोग निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म को ही
सत्य और सबको मिथ्या तथा देहादिबंधन को असत्य और तत्त्वमसि
आदि वाक्य जन्य ज्ञान से बंधन की निवृति तथा उस निवृत्ति को ही
मोक्ष मानते हैं वे तो शूद्रों के वेदों के अनधिकार की बात कह ही नहीं
सकते । उनके उक्त मत के अनुसार तो, अनुपनीत—वेदाध्ययन रहित—
वेदांतवाक्यों से अपरिचित जिस किसी भी व्यक्ति को “निर्विशेष चिन्मात्र