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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 590, कुल 696 में से

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पृष्ठ 590

( ५२८ )
यच्च-संवर्गविद्यायां शुश्रूषोः शूद्रेति संबोधन शूद्रस्याधिकारं
सूचयति-इति, तन्नेत्याह-शुगस्य तदनादर श्रवणात्तदाद्रवणात्सू-
च्यते हि “शुश्रूषोर्जानश्रुतेः पौत्रायणस्य ब्रह्मज्ञानकैवल्येन हं सोक्ता-
नादरवाक्य श्रवणात् तदैव ब्रह्मविदो रैक्वस्य सकाशं प्रत्याद्रवणा-
च्छुगस्य संजातेति हि सूच्यते, अतः स शूद्रेत्यामंत्रयते, न चतुर्थ-
वर्णत्वेन ।
संवर्ग विद्या में शुश्रूषु जानश्रुति को "शूद्र" कहा गया एकमात्र
इसी आधार से शूद्रों के अधिकार की बात मान लेना भी, भ्रांति है
इसके निवारणार्थ ही “शुगस्य तदनादर श्रवणात् सूच्यतेहि” सूत्र प्रस्तुत
किया जाता है । ब्रह्मविद्या शुश्रुषु जानश्रुति का ब्रह्मविद्या ज्ञान के अभाव
से, हंस द्वारा जो अनादर हुआ उससे म्लान होकर वह रैक्व के पास
गया । इससे ज्ञात होता है कि--वह उस समय अत्यंत दु खी और संतप्त
था, जिससे कि उसकी आकृति कांतिहीन हो गई थी; रैक्व ने इसीलिए
उसे शूद्र कहा था, चतुर्थवर्ण की दृष्टि से नही कहा था ।
शोचतीति हि शूद्रः, “शुचेर्दश्च” इति र प्रत्यये धातोश्च दीर्घे
चकारस्य च दकारे शूद्र इति भवति । अतः शोचितृत्वमेवास्य शूद्र
शब्द प्रयोगेन सूच्यते, न जातियोगः । जानश्रुतिः किल पौत्रायणो
बहुद्रव्य प्रदो बह्वन्न प्रदश्च बभूव । तस्य धार्मिकाग्रेसरस्य धर्मेण
प्रीतयोः कयोश्चिन्महात्मनोरस्य ब्रह्मजिज्ञासामुत्पिपादयिषतोः हंस-
रूपेण निशायामस्याविदूरे गच्छतोरन्यतर इतरमुवाच-“भो भो
भायं भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समंदिवा ज्योति-
रातंतं तत्मा प्रसांक्षीस्तत्वा मा प्रधाक्षीत्' इति । एवं जानश्रुतिः
प्रशासारूपं वाक्यभुषश्रुत्य परोहस. प्रत्युवाच-“कम्बर एनमेतत् संतं
सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ” इति । कं सन्तमेनं जानश्रुतिं सयुग्वानं
रैक्वं ब्रह्मज्ञमिव गुणश्रे ष्ठमेतदात्थ, स ब्रह्मज्ञो रैक्व एव लोके गुण-
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