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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 595, कुल 696 में से

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पृष्ठ 595

नन्वस्मिन् प्रकरणेऽभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वं च न
श्रुतम् तत्कथमस्याभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वम् ? कथं वा क्षत्रियत्वं ?
तत्राह-लिङ्गात् इति । "अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च
काक्षसेनिम्" इत्यभिप्रतारिणः कापेयसाहचर्याल्लिङ्गादस्याभि
प्रतारिणः कापेय संबंधः प्रतीयते । अन्यत्र च "एतेन वैचैत्ररथं
कापेया अयाजयन्" इति कापेयसंबंधिनश्चैत्ररथत्वं श्रूयते, तथा
चैत्ररथस्य क्षत्रियत्वं-"तस्माच्चैत्रथोनामैकः क्षत्रपतिरजायत" इति ।
अतोऽभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वं च गम्यते ।
प्रश्न होता है कि-इस प्रकरण में अभिप्रतारी का चैत्ररथत्व और
क्षत्रियत्व, स्पष्ट रूप से तो कहा नहीं गया, फिर यह कैसे जाना कि
वह चित्ररथवंशज क्षत्रिय था ? कहते हैं कि-चिन्ह से ही ज्ञात होता है ।
"एक बार कापेय शौनक और काक्षसेनि अभिप्रतारी" इत्यादि वाक्य में
कापेय के साथ अभिप्रतारी का वर्णन किया गया है जिससे ज्ञात होता है
कि अभिप्रतारी भी किसी गोत्र से संबद्ध था । अन्यत्र "कापेय इसके द्वारा
ही चैत्ररथ को यज्ञ कराते हैं" इत्यादि में भी कापेय और चैत्ररथ का
संबंध दिखलाया गया है, तथा-"चैत्ररथ नाम का एक क्षत्रपति था"
इत्यादि से चैत्ररथ का क्षत्रियत्व स्पष्ट प्रतीत होता है । इन सभी वर्णनों
से अभिप्रतारी का चैत्ररथत्व और क्षत्रियत्व ज्ञात होता है ।
तदेवं न्यायविरोधिनि शूद्रस्याधिकारे लिंगं नोपलभ्यत
इत्युक्तम्, इदानीं न्याय सिद्धः शूद्रस्यानधिकारः श्रुतिस्मृतिभिर-
नुगृह्यत, इत्याह--
युक्ति विरुद्ध शूद्राधिकार विषयक कोई प्रमाण नहीं है यह दिख-
लाया गया । शूद्र का अनधिकार युक्तिसम्मत तथा श्रुति स्मृति अनुमोदित
है, यही बतलाते हैं-
संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ।१।३।३६॥
ब्रह्मविद्योपदेशेषूपनयनसंस्कारः परामृश्यते-"उप त्वानेष्ये"
"तं होपनिन्ये" इत्यादिषु । शूद्रस्य चोपनयनादिसंस्काराभावोऽ-