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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 696 में से

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पृष्ठ 587

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सिद्ध होता है कि-आदित्य वसु आदि से भी मधुविद्या की उपासना संभव
है । इसीलिए ब्रह्म की भी उपास्यता “तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः" इत्यादि
में बतलाई गई है । जैसा कि-वृत्तिकार भी कहते है-'सर्वत्र ब्रह्म की
उपासना ही विहित है, इसलिए मधुविद्या आदि में देवतादि का अधिकार
हो सकता है ।'
६ अपशूद्राधिकरण :-
शुगस्यतदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ।१।३।३३॥
ब्रह्मविद्यायां शूद्रस्याप्यधिकारोऽस्ति नवेति विचार्यते; किं
युक्तम् ? अस्तीति, कुतः ? अर्थित्वसामर्थ्य प्रयुक्तत्वादधिकारस्य
शूद्रस्यापि तत्संभवात् । यद्यप्यग्निविद्या साध्येषु कर्मष्वनग्नि
विद्यत्वाच्छूद्रस्यानधिकारः, तथापि मनोवृत्तिमात्रत्वाद ब्रह्मोपासनस्य
तत्राधिकारोऽस्त्येव, शास्त्रीय क्रियाऽपेक्षत्वेऽप्युपासनस्य तत्तद्वर्णा-
श्रमोचित क्रियाया एवापेक्षितत्वाच्छूद्रस्यापि स्ववर्णोचितपूर्ववर्णां
शुश्रूषैव क्रिया भविष्यति । "तस्माच्छूद्रोयज्ञेऽनवक्लृप्तः” इत्यप्यग्नि-
विद्यासाध्ययज्ञादिकर्मानधिकार एव न्यायसिद्धोऽनूद्यते ।
ब्रह्मविद्या में शूद्रों का अधिकार है कि नहीं ? इस पर विचार
करते हैं । कह सकते हैं कि है, क्यो कि-शूद्रो मे भी अन्यवर्णों की तरह
अर्थित्व और सामर्थ्य संभव है । यद्यपि अग्निविद्या साध्य कर्मों में
अग्निहोत्री न होने के कारण, शूद्रों का अनधिकार सिद्ध होता है, तथापि
ब्रह्मविद्या जब एक मनोवृत्ति मात्र ही है, तब उसमे उनका स्वाभाविक
अधिकार सिद्ध हो जाता है । उपासना, यदि शास्त्र क्रिया सापेक्ष्य हो तो
भी, शास्त्रानुसार अपनी वर्णोचित क्रिया सुश्रूषा के आश्रय से, वे शूद्र
भी, अन्य वर्णों की तरह, उपासना के अधिकारी हो सकते हैं । “शूद्र
यज्ञ में अनधिकृत हैं" यह श्रुति तो, एकमात्र अग्निविद्या साध्य यज्ञादि
कर्मों में ही, शूद्र के अनधिकार की पुष्टि करती है ।
नन्वधीत वेदस्य श्रुतवेदांतस्य ब्रह्मस्वरूप तदुपासन प्रकारा-
नभिज्ञस्य कथं ब्रह्मोपासनं संभवति ? उच्यते-अनधीतवेदस्या श्रुतवे-
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