श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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अतो देवादीनामप्यर्थित्व सामर्थ्ययोगात् ब्रह्मविद्यायामधि-
कारोऽस्तीति सिद्धम् ।
यदि पूछें कि उक्त बात कैसे जान सके ? उसपर सूत्रकार कहते हैं
दर्शन और स्मृति से दर्शन जैसे-“जिन्होंने प्रथम ब्रह्मा की सृष्टि की तथा
जिन्होंने सृष्टि के निमित्त उन्हें वेदों की प्रेरणा दी।” इत्यादि । मनु स्मृति
में जैसे-“यह जगत सृष्टि के पूर्व तमोभूत था” इत्यादि से प्रारंभ करके-
“उन्होंने विविध प्रजासृष्टि की आकांक्षा करके, सर्व प्रथम अपने शरीर
से जल की सृष्टि की, उसी से वीर्य की सृष्टि की, वह वीर्य ही हजारों
सूर्यों के समान प्रभा संपन्न हिरण्मय अंड के रूप में परिणत हो गया, उस
अंड में से ही पितामह ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ।” पौराणिक स्मृति में
भी जैसे-“क्षीर सागर में सुप्त नारायण की नाभि से कमल प्रकट हुआ
उस कमल से वेद वेदांग पारंगत ब्रह्मा प्रकट हुए, उन्हें भगवान ने आज्ञा
दी कि-महामति ! तुम प्रजा की सृष्टि करो।” तथा-“प्रकाशमान
नारायण ही श्रेष्ठ हैं, उन्ही से चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट हुए” तथा-“आदि
सृष्टि करूँ” इत्यादि से प्रारंभ करके-“नार जल की सृष्टि कर मैं उसी
मे स्थित हो गया, उसी से मेरा नाम नारायण हुआ, प्रतिकल्प में मैं वहाँ
बार बार शयन करता हूँ, सोये हुए मेरी नाभि से कमल उत्पन्न होता है,
उस नाभि पद्म से चतुर्मुख ब्रह्मा का जन्म होता है, तब मैं उन्हें आज्ञा
देता हूँ कि-तुम प्रजा की सृष्टि करो।”
उक्त वर्णनों से सिद्ध होता है कि-देवताओं के शरीरी और
समर्थ्यवान होने से, उन्हें ब्रह्मविद्या में अधिकार प्राप्त है ।
८ मध्वाधिकरणः-
मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ।१।३।३०॥
ब्रह्मविद्यायां देवादीनामप्यधिकारोऽस्तीत्युक्तम्, इदमिदानीं
चिन्त्यते येषूपासनेषु या देवता एवोपास्यास्तेषु तासामधिकारोऽस्ति न
इति, किं प्राप्तम् ? नास्त्यधिकारस्तेषु मध्वादिष्विति जैमिनिर्मन्यते ।
कुतः ? असंभवात् नहि आदित्यवस्वादिभिरुपास्या आदित्यवस्वाद्य-
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