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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ५०३ )
उक्त संशय पर समाधान रूप से सूत्रकार "आविर्भूतस्वरूपस्तु"
पद प्रस्तुत करते हैं अर्थात् प्रजापति वाक्य में बतलाया गया है कि-
जीवात्मा के जो अपहतपाप्मत्व आदि गुण हैं वे मिथ्या ज्ञान से आवृत्त
रहते हैं, कर्म बन्धनों के विच्छेद के बाद, शरीर से छूटने पर-परं ज्योति-
परमात्मा की प्रप्ति होने पर ही उसे अपना स्वाभाविक प्रकृत स्वरूप
प्राप्त होता है, तभी वह अपहतपाप्मत्व आदि गुणों वाला होता है।
दहर वाक्य में तो अतिरोहित, सदा एकरस अपहतपाप्मत्वादि गुण वाला
दहर बतलाया गया है। आविर्भूत स्वरूप होते हुए भी जीवात्मा में,
सेतुत्व, सर्वलोक विधारकत्व आदि विशेषताओं की संभावना नही है।
सत्य शब्द के निर्वचन से ज्ञात जड़ चेतन के नियंत्रण की क्षमता, ही,
दहराकाश की परब्रह्मता, निश्चित करती है। सेतुत्व, सर्वलोक विधा-
रकत्व आदि विशेषताये, आविर्भूत स्वरूप होने पर जीवात्मा में संभव
नहीं हैं, यह हम "जगद्व्यापारवर्ज्यम्" सूत्र के प्रसंग में सिद्ध करेंगे।
यद्येवम्-दहर वाक्य "अत एष संप्रसादः" इत्यादिना जीव प्रस्ताव
किमर्थः ? इतिचेत् तत्राह-
यदि ऐसी ही बात है तो, दहर वाक्य में "अतएष संप्रसादः"
इत्यादि से, जीव को प्रस्तुत करने का क्या तात्पर्य है ? इस संशय पर
कहते हैं।
अन्यार्थश्च परामर्शः ।१।३।१६॥
दहराकाशस्यैवापहपाप्मत्वादि जगद्विधरणत्वादिवन्मुक्तस्य
तदुपसंपत्त्याऽपहपाप्मत्वादि कल्याणगुणविशिष्ट स्वाभाविकरूप
प्राप्ति कथनेन तद्धेतुत्वरूपं परमपुरुषासाधारणं गुणमुपदेष्टुं प्रजा-
पति वाक्योक्तस्य जीवस्यात्र परामर्शः । प्रजापति वाक्ये च मुक्ता-
त्मस्वरूपयाथात्म्य विज्ञानं दहरविद्योपयोगितयोक्तम्, ब्रह्मप्रेप्सोर्हि
जीवात्मनः स्वरूपं च ज्ञातव्यमेव स्वयमपि कल्याण गुण एव
संन्ननवधिकातिशयासंख्येय कल्याणगुणगणं परं ब्रह्मानुभविष्यतीति
ब्रह्मोपासनफलांतर्गतत्वात् स्वरूप याथात्म्य विज्ञानस्य । "सर्वांश्च
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( ५०४ )
लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्” “स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन्”
इत्यादिकं प्रजापति वाक्ये कीर्त्यमानं फलमपि, दहरविद्याफलमेव ।
दहराकाश में जैसे निष्पापता, जगद्विधारकत्ता आदि विशेषतायें
हैं, वैसे दहरोपासना द्वारा उक्त कल्याणमय गुण विशिष्ट स्वभाव सिद्ध
स्वरूप मुक्त पुरुष मे भी, हो सकते हैं, इस बात को निर्णय करने के लिए
तथा परम पुरुष के असाधारण गुण ही स्वरूप प्राप्ति के एक मात्र कारण
हैं इस उपदेश के लिए, प्रजापति वाक्य में बतलाए गए जीवात्मा के
स्वरूप को, इस दहर प्रकरण में प्रस्तुत किया गया है। प्रजापति वाक्य
में, मुक्तात्म स्वरूप के याथात्म्य ज्ञान के लिए, दहर विद्या की उपयोगिता
बतलाई गई है, ब्रह्म प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियो को जीवात्मा का प्रकृत
स्वरूप भी अवश्य जानना चाहिए, क्यो कि—जीव स्वयं कल्याणमय गुणो
से संपन्न होते हुए भी, निरवधि, निरतिशय कल्याणमय गुणों वाले
परब्रह्म का अनुभव करता है। स्व स्वरूप का याथात्म्य ज्ञान भी ब्रह्मो-
पासना के फलस्वरूप ही होता है। प्रजापति वाक्य मे जो यह कहा गया
कि-“वह समस्त लोक और समस्त काम्यफलो को प्राप्त करता है”
“हास्य और क्रीड़ा करते हुए विचरण करता है” यह सब भी दहर विद्या
के फलस्वरूप ही होता है।
श्रुतेरितिचेत्तदुक्तम् ॥१।३।२०॥
“दहरोऽस्मिन्” इत्यल्पपरिमाण श्रुतिराराग्रोपमितस्य जीवस्यै-
वोपपद्यते, न तु सर्वस्माज्ज्यायसो ब्रह्मणः, इति चेत्-तत्र यदुत्तरं
वक्तव्यम्, तत्पूर्वमेवोक्तम्-“निचाय्यत्वादेवं” इत्यनेन । अतोदहरा-
काशोऽनाघ्राताविद्याद्यशेषदोषगंधः स्वाभाविकनिरतिशय ज्ञानवलै-
श्वर्यवीर्यशक्ति तेजः प्रभृत्यपरिमितोदारगुणसागरः पुरुषोत्तमः एव ।
प्रजापति वाक्यनिर्दिष्टस्तु “घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्ति” इत्येवमादि-
भिरवगतकर्मनिमित्तदेह परिग्रहः पश्चात् परंज्योतिरूपसंपद्याविर्भूत
अपहतपाप्मत्वादिगुण स्वरूप इति न दहराकाशः ।
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( ५०५ )
यदि कहो कि-दहराकाश की अल्पता के प्रतिपादक "दहरोऽस्मिन्
इत्यादि वाक्य में, आरा के अग्रभाग के समान सूक्ष्म जीवात्मा का ही
उपपादन किया गया है, सर्वश्रेष्ठ परमात्मा का नहीं ? इस विषय में
हमें जो कुछ कहना था वह "निचाय्यत्वादेवम्" सूत्र में ही कह चुके हैं।
अविद्या आदि समस्त दोषों से अनाघ्रात, स्वभावसिद्ध निरतिशय ज्ञान-
बल-ऐश्वर्य वीर्य-शक्ति-तेज आदि अपरिमित उदार गुणों के सागर पुरु-
षोत्तम ही, दहराकाश हैं । "ध्र'ति त्वेवैनं" इत्यादि से ज्ञात होता है
कि—जीवात्मा प्रायः प्राक्तनकर्मानुसार देहधारी रहता है, परंज्योति
स्वरूप परब्रह्म को जानकर ही, अपहतपाप्मत्व आदि गुणों से संपन्न जैव
स्वरूप से अभिव्यक्त होता है । इससे निश्चित होता है कि—प्रजापति
वाक्य में जीव का ही निर्देश किया गया है, दहराकाश का नहीं ।
इतश्चैतदेवम्- इससे भी यह बात स्पष्ट है कि-
अनुकृतेस्तस्य च ।१।३।२१॥
तस्य दहराकाशस्य परस्य ब्रह्मणः अनुकारात् अभयपहतपाप्म
त्वादिगुणको विमुक्त बंधः प्रत्यगात्मा न दहराकाशः । तदनुकारः
तत्साभ्यम् तथाहि प्रत्यगात्मनो विमुक्तस्य परब्रह्मानुकारः श्रूयते-
"यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्, तदा
विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यभुपैति" इति ।
अतोऽनुकर्त्ता प्रजापति वाक्य निर्दिष्टः अनुकार्यं ब्रह्म दहराकाशः ।
जीव जब, परब्रह्म दहराकाश के समान अपहपाप्मत्वादि गुणों से
संपन्न होकर बंधनविमुक्त होता है, तो दहराकाश नहीं कह सकते ।
तदनुकार का तात्पर्य होता है तत्समान । विमुक्त जीवात्मा की परब्रह्मानु-
कृति निम्नोक्त श्रुति में प्रसिद्ध है--'जब यह दृष्टा ( जीव ) सबके
शासक, ब्रह्मा के भी आदि कारण, संपूर्ण जगत के रचयिता, दिव्य प्रकाश
स्वरूप परंपुरुष का साक्षात्कार कर लेता है, उस समय पुण्यपाप से
विमुक्त होकर निर्मल वह ज्ञानी महात्मा, सर्वोत्तम समता को प्राप्त कर
लेता है' इससे निश्चित होता है कि-प्रजापति वाक्य में अनुकर्त्ता
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जीव का ही उल्लेख है तथा दहराकाश प्रकरण में अनुकार्य ब्रह्म का
उल्लेख है।
अपिस्मर्यते ॥१।३।२२॥
संसारिणोऽपि मुक्तावस्थायां परमसाम्यापत्ति लक्षणः पर-
ब्रह्मानुकारः स्मर्यते "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः सर्गेऽपि
नोपजायन्ते प्रलये न व्यथंति च" इति ।
संसारी जीवात्मा की भी मुक्तावस्था में परम साम्यावस्था रूप
परब्रह्मानुकारिता, स्मृति में भी बतलाई गई है--"इस ज्ञान का आश्रय
लेकर मेरे साधर्म्य को प्राप्त हुए पुरुष, न तो सृष्टिकाल में उत्पन्न होते
हैं न प्रलयकाल में व्यथित होते हैं।"
केचित् "अनुकृतेस्तस्य च" अपिस्मर्यते "इतिसूत्रद्वयमधिकर-
णान्तरं" तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्यभासा सर्वमिदं विभाति"
इत्यस्याः श्रुतेः परब्रह्मपरत्व निर्णयाय प्रवृत्तं वदंति । तत्तु "अदृश्य
श्वादि गुणको धर्मोक्तेः" द्युम्वाद्यायतनं स्वशब्दात्" इत्यधिकरण
द्वयेन तस्य प्रकरणस्य परब्रह्मविषयत्व प्रतिपादनात्" ज्योतिश्चरणा
भिधानात्" इत्यादिषु परस्य ब्रह्मणो भारूपत्वावगतेश्च पूर्वपक्षा-
नुत्थानादयुक्तम्, सूत्राक्षर वैरूप्यं च ।
कोई ( श्री शंकर ) "अनुकृते स्तस्य च" अपिस्मर्यते" इन दो सूत्रों,
को, अन्य प्रकरण की "उसके प्रकाशित होने पर ही सब प्रकाशित होते
हैं, उसी से यह सारा जगत प्रकाशित है" इत्यादि श्रुति के परब्रह्मत्व का
निर्णायक बतलाते हैं। यह बात कुछ जचती नहीं, क्योंकि-'अदृश्यत्वादि'
द्युम्वाद्यायतन "आदि दोनों अधिकरणों में परब्रह्म विषयक प्रतिपादन
किया गया है। "ज्योतिश्चरणाभिधान" इत्यादि में भी परब्रह्म के
भारूप की अवगति हो जाती है, इसलिए पुनः उसी विषय को यहाँ भी
उठाना, अयुक्त है तथा सूत्राक्षरों से विपरीत है।

( ५०७ )

६ प्रमिताधिकरण—
शब्दादेव प्रमितः ।१।३।२३॥
कठवल्लीषु श्रूयते—“अंगुष्ठमात्रो पुरुषः मध्य आत्मनि तिष्ठति,
ईशानोभूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ।” एतद्वैतत् “अंगुष्ठ मात्रः
पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः, ईशानोभूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः”
एतद्वैतत्—“अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदाजनानां हृदये संन्नि-
विष्टः तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन् मुंजादिवैषीकां धैर्येण तं विद्याच्छु-
क्रममृतम्” इति । तत्रसंदिह्यते—किमयमंगुष्ठमात्र प्रमितः प्रत्यगात्मा,
उतपरमात्मा इति किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति, कुतः ? जीवस्यान्य-
त्रांगुष्ठमात्रत्वश्रुतेः “प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः, अंगुष्ठमात्रः
रवितुल्यरूपः संकल्पाहंकार समन्वितो यः” . इति । न चान्यत्रो-
पासनार्थंतयाऽपि परमात्मनोऽगुष्ठमात्रत्वं श्रूयते । एवं निश्चिते
जीवत्वे ईशानत्वं शरीरेन्द्रियभोग्यभोगोपकरणापेक्षयाऽपि भवि-
ष्यति ।
कठवल्ली की श्रुति है कि—“अंगुष्ठ परिमाण वाला पुरुष आत्मा
में अवस्थित है, वही भूत और भविष्य का शासक है, उन्हें जान लेने वह
किसी की निन्दा नहीं करता—यही है वह—(जिसके लिए तुमने पूछा था)
अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला पुरुष धूमरहित ज्योति के समान है, वही
भूतभविष्य का शासक है, वही आज है और कल भी रहेगा—यही है
वह—सबका अंतर्यामी अंगुष्ठमात्र परिमाण वाला पुरुष, सदैव प्राणियों
के हृदय में स्थित है, उसे मूंज से सींक भाँति ( जैसे कि सींक मूंज से
भिन्न है ) अपने शरीर से धीरतापूर्वक पृथक् करके देखे, उसी को अमृत
स्वरूप समझे ।”
अब संशय होता है कि—यह अंगुष्ठ परिमाण वाला प्रमित, जीवा-
त्मा है परमात्मा ? कह सकते हैं कि जीवात्मा । क्योंकि—अन्य श्रुतियों
में जीव को अंगुष्ठ परिमाण वाला कहा गया है—जैसे कि—“प्राणों का
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( ५०८ )
अधिपति अपने कर्मों से प्रेरित होकर अनेक योनियों में विचरता हुआ,
जो कि अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला है, वह सूर्य के समान प्रकाशस्वरूप,
सकल्प और अहंकार से युक्त है।" किसी भी श्रुति में उपासना के लिए,
परमात्मा के अंगुष्ठ परिमाण का वर्णन भी नही मिलता । इस प्रकार
प्रमित की जीवता निश्चित हो जाने पर-शरीर-इन्द्रिय भोग्य और
भोगोपकरण इत्यादि में जीव की शासकता भी निश्चित हो सकती है।
सिद्धान्तः—इति प्राप्ते ब्रूमः—शब्दादेव प्रमितः—अंगुष्ठ प्रमितः
परमात्मा, कुत. ? "ईशानो भव्यस्य" इति शब्दादेव । न च भूत
भव्यस्य सर्वस्येशितृत्वं कर्मपरवशस्य जीवस्योपपद्यते ।
उक्त संशय पर सिद्धात रूप से "शब्दादेवप्रमित " सूत्र प्रस्तुत
किया गया, जिसका तात्पर्य है कि-अंगुष्ट प्रमित परमात्मा है "ईशानो-
भूतभव्यस्य" शब्द से ही उसकी परमात्मकता सिद्ध होती है। कर्म
परवश जीवात्मा में भूत भविष्य आदि समस्त की शासकता संभव
नही है।
कथं तर्हि परमात्मनोऽगुष्ठमात्रत्वमित्यत्राह-
परमात्मा की अंगुष्ठ मात्रता कैसे संभव है ? इस पर कहते हैं—
हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥१।३।२४॥
परमात्मन उपासनार्थमुपासक हृदये वर्त्तमानत्वादुपासक हृदय-
स्यांगुष्ठ प्रमाणत्वात्तदपेक्षयेदमंगुष्ठ प्रमितत्वमुपपद्यते । जीवस्यापि
अंगुष्ठ प्रमितत्वं हृदयांतर्वर्तित्वात्तदपेक्षमेव, तस्याराग्रमात्रत्वश्रुतेः ।
मनुष्याणामेवोपासकत्व संभावनया, शास्त्रस्यमनुष्याधिकारत्वात्
मनुष्य हृदयस्य च तत्तदंगुष्ठ प्रमितत्वात्खरतुरगभुजगादीनामनंगुष्ठ
प्रमितस्वेऽपि न कश्चिद्दोषः स्थितं तावदुत्तरत्र समापयिष्यते ।
मनुष्य का हृदय अंगुष्ठ परिमाण का है, उसमें परमात्मा की
उपासना की जाय, इसलिए आयतन के अनुरूप, परमात्मा के अंगुष्ठ
परिमाण का वर्णन किया गया है। जीवात्मा के लिए भी जो अंगुष्ठ
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( ५०६ )
परिमाण का वर्णन मिलता है, वह भी हृदय के परिमाणानुसार ही है,
अन्यथा श्रुतियों में तो जीव को आरा के अग्रभाग के समान अतिसूक्ष्म
बतलाया गया है । उपासना मनुष्यों से ही संभव हो सकती है, शास्त्र
का अधिकार भी मनुष्य का ही बतलाया गया है । मनुष्य का हृदय अपने
अपने अंगुष्ठ परिमाण का होता है । गर्दभ घोड़ा सर्प इत्यादि का तो
अंगुष्ठ परिमाण का प्रश्न ही नहीं उठता; जीव के अंगुष्ठ परिमाण पर
किसी प्रकार की शंका का अवकाश भी नहीं है । इस विषय को अग्रिम
अधिकरण में समाप्त करेंगे ।
७ देवताधिकरणः-
तदुपर्यपि बादरायणः संभवात् ।१।३।२५॥
परस्य ब्रह्मणोंऽगुष्ठप्रमितत्वोपपत्तये मनुष्याधिकारं ब्रह्मोपास-
नशास्त्रमित्युक्तम् । तत्प्रसंगेनेदानीं ब्रह्मविद्यायां देवादीनामप्य-
धिकारोऽस्ति नास्तीति विचार्यते । किं तावद्युक्तम् ? नास्ति देवा-
दीनामधिकार इति, कुतः ? सामर्थ्याभावात्-न हि अशरीराणां
देवादीनां विवेकविमोकादि साधनसप्तकानुगृहीत ब्रह्मोपासनोपसंहार-
सामर्थ्यमस्ति । न च देवादीनां सशरीत्वे प्रमाणमुपलभामहे ।
यद्यपि परिनिष्पन्नेऽपि वस्तुनि व्युत्पत्ति संभावनया वेदांतवाक्यानि
परे ब्रह्मणि प्रमाणभावमनुभवंति, तथापि देवादीनां विग्रहवत्त्व प्रति-
पादन परं न किंचिदपि वाक्यमुपलभ्यते । मंत्रार्थवादास्तु कर्मविधि-
शेषतयाऽन्यपरत्वान्न देवादि विग्रह साधने प्रभवंति । कर्मविधयश्च
स्वापेक्षितोद्देश्यकारकत्वातिरेकि देवतागतं किमपि न साधयंति ।
अतएव तासामर्थित्वमपि न संभवति । अतः सामर्थ्यार्थित्वयोरभा-
वाद्देवादीनां अनधिकारः- इति ।
परब्रह्म के अंगुष्ठमात्र परिमाण के प्रतिपादन का एकमात्र
अभिप्राय है कि—मनुष्यमात्र का ही ब्रह्मोपासना का अधिकार है, इसी-
लिए शास्त्रों में उन्हें ही अधिकारी माना गया है । इसी प्रसंग में विचार
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( ५१० )
उपस्थित होता है कि-ब्रह्मविद्या (उपासना) में देवता आदि का भी
अधिकार है या नहीं ? कह सकते हैं कि नहीं है, क्योंकि देवतादि में
सामर्थ्य नहीं है, अशरीरी देवता आदि में विवेक-विमोक आदि सप्त
प्रकार की साधनाओं की सहायता से ब्रह्मविद्या को ग्रहण करने का
सामर्थ्य ही नहीं है। उन लोगों के शरीरी होने का कोई प्रमाण भी नहीं
मिलता। यद्यपि शब्द द्वारा स्वतः सिद्ध ( क्रिया संबंध रहित ) वस्तु में
व्युत्पादन की संभावना से वेदांत वाक्यों को परब्रह्म के संबंध में प्रमाण
माना जा सकता है, फिर भी देवताओं के शरीरी होने के प्रमाण कहीं
भी नहीं मिलते। मंत्र और अर्थवाद वाक्य भी, जो कि-कर्म विधि के
अंगरूप से वर्णित हैं, अन्यार्थ बोधक हैं। देवताओं के शरीर अस्तित्व को
प्रमाणित करने में वे भी असमर्थ हैं। कर्मविधि समूहक वाक्य भी, देव-
ताओं के संबंध में, कर्मापेक्षित उद्देश्य के प्रतिपादन के अतिरिक्त कुछ
और प्रमाणित नहीं कर पाते। इसलिए उनका अर्थित्व भी संभव नहीं
है। सामर्थ्य और अर्थित्व के अभाव होने से, देवादिकों का, ब्रह्मविद्या में
अनाधिकार सिद्ध होता है।
सिद्धान्तः-एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे-‘‘तदुपर्य्यपि बादरायणः
संभवात्’’-तदुपरि अपि, तद् ब्रह्मोपासनं उपरि-देवादिष्वपि,
संभवतीति बादरायणो मन्यते। तेषामर्थित्व सामर्थ्ययोः संभवात् ।
अर्थित्वंतावद् आध्यात्मिकादिदुर्विषहदुःखाभितापात् परस्मिन्
ब्रह्मणि च निरस्तनिखिल दोषगंधेऽनवधिकातिशयासंख्येय कल्याण-
गुणगणे निरतिशय भोग्यत्वादिज्ञानाच्च संभवति । सामर्थ्यमपि
पटुतरदेहेन्द्रियादिमत्तया संभवति । देहेन्द्रियादिमत्वं च ब्रह्मादीनां
सकलोपनिषत्सु सृष्टि प्रकरणेषु उपासनप्रकरणेषु च श्रूयते ।
तथाहि-‘‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत् तदैक्षत् बहुस्यां प्रजायेयेति
तत्तेजोऽसृजत्’’ इत्यारभ्य-सर्वमचेतनं तेजोवन्नप्रमुखावस्थ्याविशेषवद्
व्याकृत्य-‘‘अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’’
इति संकल्प्य ब्रह्मादिस्थावरान्तं चतुर्विधंभूतजातं तत्तत्कर्मोचित्,

( ५११ )
शरीरं तदुचित नामभाक्चायमकरोदित्युक्तम् । एवं सर्वत्र सृष्टि
वाक्येषु देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मना चतुर्विधा सृष्टिराम्नायते ।
उक्त संशय पर सिद्धान्तरूप से उक्त "तदुपर्यपि" आदि सूत्र प्रस्तुत
किया जाता है, अर्थात् ब्रह्मोपासना, देवताओं में भी हो सकती है, ऐसा
बादरायण का मत है । देवता आदि में अर्थित्व और सामर्थ्य है । दुःसह
अध्यात्मिकादि दुःखों से तप्त होने से तथा समस्त दोषों से रहित,
निरवधि, निरतिशय, असंख्य कल्याणमय, गुणों से युक्त परब्रह्म में भी
निरतिशय भोग सद्भाव का ज्ञान होने से अर्थित्व, और कार्यक्षम उत्कृष्ट
देह इन्द्रियादि की विद्यमानता से, उनमें सामर्थ्य भी है । सभी उपनिषदों
में सृष्टि और उपासना के प्रकरणों में, ब्रह्मा आदि देवताओं की, देह
इन्द्रिय आदि की सत्ता बतलाई गई है । "हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व यह
सारा जगत सद् ही था, उसने संकल्प किया अनेक हो जाऊँ उसने तेज
की सृष्टि की" इत्यादि से प्रारंभ करके-अव्यक्त तेज आदि समस्त
अचेतनों की विशेष अवस्थाओं का विवेचन करके- 'इनमें जीवात्मरूप
से प्रविष्ट होकर नामरूप की अभिव्यक्ति करूँगा" ऐसा संकल्प के उस
परमात्मा ने ब्रह्मा से लेकर स्थावर तक चतुर्विध भूतवर्ग के विशेष कर्मा-
नुसार उनके शरीर और नामरूप को विभक्त किया; ऐसा बतलाया

( ५१२ )
के योग्य देह इन्द्रिय आदि के संबंध निबंधन से ही, कल्पित होता है।
जैसा कि वर्णन मिलता है—"देवता और असुर दोनों ने ही, परंपरा से
जान लिया उन्होंने कहा—देवों के राजा इन्द्र तथा असुरों के राजा
विरोचन, दोनों आपस में स्पर्धा करते हुए, हाथों में समिधायें लेकर,
प्रजापति के पास पहुँचे, उन्होंने बत्तीस साल तक ब्रह्मचर्य का पालन
किया, तब उनसे प्रजापति ने कहा—"इत्यादि से, देवताओं के देह इन्द्रिय
आदि की, स्पष्ट प्रतीत हो रही है।
कर्मविधिविशेषभूत मंत्रार्थवादेष्वपि "वज्रहस्तः पुरंदरः"
"तेनेन्द्रो वज्रमुदयच्छत्" इत्यादिभिःप्रतीयमानं विग्रहादिमत्वं प्रमा-
णांतराविरुद्धं तत्प्रमेयमेव । न चानुष्ठेयार्थप्रकाशनस्तुतिपरत्वाभ्यां
प्रतीयमानार्थान्तरा विवक्षा शक्यते वक्तुम् । स्तुत्याद्युपयोगित्वात्तेन
विना स्तुत्याद्यनुपपत्तेश्च । गुणकथनेन हि स्तुतित्वम् । गुणाना-
मसद्भावे स्तुत्वमेव हीयते । न चासतागुणेन कथितेन परोचना
जायते । अतः कर्मं परोचयंतो गुणसद्भावं बोधयंत एवार्थंवादाः ।
कर्मविधि के विशेष अंग मंत्र और अर्थवाद के—"वज्रहस्त पुरंदर"
इन्द्र ने वज्र उठाया" इत्यादि वाक्यों से भी देह के अस्तित्व की प्रतीति
होतीहै। यह वर्णन प्रमाणान्तरों के विरुद्ध भी नहीं है, इसलिए प्रामा-
णिक ही है। मंत्र और अर्थवाद वाक्य, कर्मानुष्ठान और स्तुतिपरक ही
हैं—ऐसा नहीं कहा जा सकता, अन्यार्थ भी, स्तुतिवाद के उपयोगी ही
होते हैं; उक्त वाक्यों की अर्थान्तर विविक्षा न मानने से, स्तुतिवाद
उपपन्न ही नहीं हो सकता । गुणकथन को ही तो स्तुति कहते हैं, यदि
गुणों का ही असद्भाव हो जायेगा तो, स्तुतित्व भी नष्ट हो जायेगा
असद्गुणों के कथन से तो लोगों की प्रवृत्ति उद्दीप्त हो नहीं सकती । कर्म
के विषय में रोचक अर्थवाद ही; वर्णनीय गुणों के, सद्भाव के द्योतक
होते हैं।
मन्त्राश्च कर्मसु विनियुक्तास्तत्रतत्र किंचित्करवायानुष्ठेयमर्थं
प्रकाशयंतो देवतादिगतविग्रहादिगुणविशेषमभिदधत एव तत्र किंचित्
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( ५१३ )
कुर्वन्ति, अन्यथा इन्द्रादि स्मृत्यनुपपत्तेः । न च निर्विशेषा देवता
धियमधिरोहति । तत्र प्रमाणान्तराप्राप्तान्गुणान् स्वयमेव बोध-
यित्वा तैः कर्मं प्ररोचयंति । गुण विशिष्टं वा प्रकाशयंति, प्राप्तां-
श्चानूद्य तैः प्ररोचन प्रकाशने कुर्वन्ति, विरुद्धत्वे तु तद्वाचिभिः
शब्दैरविरुद्धान् गुणान् लक्षयित्वा कुर्वन्ति । कर्मविधेेश्च देवताया
ऐश्वर्यमपेक्षितमेव । कामिनः कर्त्तव्यतया कर्मविधीयमानं स्वयं क्षण
प्रध्वंसि कालांतरभाविनः फलस्य स्वर्गादेः साधकमपेक्षते ।
मंत्र समूह भी, कर्म के विनियुक्त विशेष विशेष विषयों में, कुछ न
कुछ उपकार साधन के लिए ही, कर्मानुष्ठेय अर्थ का प्रतिपादन करते हैं ।
मंत्र समूह देवादिकों के शरीरादि गुणविशेषों का प्रतिपादन करके ही,
उपकारी होते हैं अन्यथा कार्यकाल में इन्द्रादि का स्मरण ही नहीं हो
सकता । निर्विशेष ( शरीरादि विशेषभाव रहित ) केवल शब्दमय देवता,
कभी बुद्ध्यारूढ़ ( स्मृत ) नहीं हो सकते । अन्य प्रमाणों जो गुणवर्णन
पाया जाता है, वह स्वयं उद्बोधक या रुचिवर्द्धक होता है अथवा गुण-
विशिष्ट कर्मविशेष का प्रतिपादक होता है । जो गुण प्रमाणान्तरों में
मिलते हैं, वे सब अनुवाद या पुनरुल्लेख मात्र हैं, जो कि साधकों में,
उत्कट श्रद्धा और कर्म स्वरूप का प्रकाशन करते हैं । ( प्रमाणान्तरों के
साथ ) विरुद्धता उपस्थित होने पर गुणवाचक शब्दों से अविरुद्ध गुण
समूहों को, लक्षित करके प्रतिपादन किया गया है । देवताओं का ऐश्वर्य
या विभूति भी, कर्म सापेक्ष होते हैं । सकाम साधकों द्वारा, कर्त्तव्यरूप
से विधीयमान कर्म, स्वयं क्षणभंगुर होते हैं, वे कालांतर में स्वर्गादिफल
के रूप में, साधक की साधना के अनुसार प्रतिफलित होते हैं ।
मंत्रार्थवादयोश्च-“वायुर्वैक्षेपिष्ठा देवता वायुमेव स्वेन भाग-
धेयेनोपधावति स एवैनं भूतिं गमयति”-“यदनेनहविषाऽशास्ते तद-
श्यात्तद्ध्यात्तदस्मै देवाराधन्ताम्” इत्यादिषु देवताया कर्मणाऽ-
राधितायाः फलदायित्वं तदनुगुणं चैश्वर्यं प्रतीयमानमपेक्षितत्वेन
वाक्यार्थे समन्वीयते ।
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( ५१४ )
"वायु वेगवान देवता हैं; उपासक अपने भाग्यबल से ही वायु के
अभिमुख भागपाता है वायु उपासक को ऐश्वर्य प्रदान करते है" "यजमान
हवि द्वारा जो पाने की इच्छा करता है वह उसे मिले, उसकी वृद्धि हो,
देवगण उसे उससे संपन्न करें" इत्यादि मंत्र और अर्थवाद वाक्यो मे जो
प्रतीयमान, कर्माराधित देवताओं का फलदातृत्व एवं फलदान के उपयुक्त
जो ऐश्वर्य संबंध है वह अपेक्षणीय या आवश्यककीय मान कर ही वाक्यार्थ
के साथ, संबद्ध हो सकता है ।
देवपूजाविधायिनो यजिधातोश्च यागाख्यंकर्म स्वाराध्य देवता
प्रधानं प्रतीयते । तदेवं कृत्स्नवाक्य पर्यालोचनया वाक्यादेव विध्यपे-
क्षितं सर्वमवगतमिति नापूर्वादिकं व्युत्पत्ति समयानवगतं कर्मविधि-
ष्त्वभिधेयतया कल्प्यतया वाऽश्रयितव्यम् । तथा संकीर्ण ब्र ह्मणमंत्रार्थ-
बादमूलेषु धर्मशास्त्र इतिहास पुराणेषु ब्रह्मादीनां देवासुरप्रभृतीनांच
देहेन्द्रियादयः स्वाभावभेदाः स्थानानि भोगाः कृत्यानिचेत्येवमादयः
सुव्यक्ताः प्रतिपाद्यंते अतो विग्रहादिमत्त्वाद्देवानाम्प्यधिकारोऽ-
स्त्येव ।
"यज्" धातु का अर्थ है देवता की पूजा, देवपूजावाचक "यज्"
धातु का कर्मभूत याग भी, आराध्य देवता की प्रधानता की प्रतीति
कराता है । इस प्रकार संपूर्णवाक्य की पर्यालोचना करने पर ज्ञात होता
है कि—विधिवाक्य से जो जो अपेक्षित है, श्रुति वाक्य भी उसी की
अवगति कराते हैं । शब्द व्युत्पत्ति के नियमानुसार अवगति नहीं हो
सकती, अपूर्व या अदृष्ट आदि किसी भी कर्मविधि से, वाक्यार्थरूप या
कल्पनीय रूप से भी आश्रय नही किया जा सकता । सभी ब्राह्मण मत्रों,
अर्थवाद मूलक धर्मशास्त्र इतिहास पुराण आदि मे, ब्रह्मा आदि देवताओं
और असुरों के देह इन्द्रिय आदि के प्रभेद, स्वभावभेद, विशेष विशेष
स्थान, भोग और कर्त्तव्य, आदि का सुस्पष्ट प्रतिपादन किया गया है ।
इस प्रकार विग्रह आदि के अस्तित्व से, ब्रह्मविद्या मे देवताओं का भी
अधिकार निश्चित होता है ।
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( ५१५ )
विरोधः कर्मणीति चेन्नानेक प्रतिपत्तेर्दर्शनात् ।।१।३।२६।।
देवादीनां विग्रहादिमत्वाऽभ्युपगमे कर्मणि विरोधः प्रसज्यते
बहुषु यागेषु युगपदेकस्येन्द्रस्य विग्रहवत्वे “अग्निमग्नि आवह”
“इन्द्रागच्छ हरिव आगच्छ” इत्यादिना आहूतस्य तस्य सन्निधाना-
ऽपरोः दर्शयति चाग्न्यादीनां तत्रतत्रागमनं “कस्यवाह देवा यज्ञमाग-
च्छंति कस्य वा न बहूनां यजमानानां यो वै देवताः पूर्वं परिगृह्णाति
स एनाश्वोभूते यजते” इति । अतो विग्रहादिमत्वे कर्मणि विरोधः
प्रसज्यत इति चेत्, तन्न-अनेक प्रतिपत्तेर्दर्शनात्-दृश्यते हि सौभरि
प्रभृतीनां शक्तिमतां युगपदनेक शरीर प्रतिपत्तिः ।
( शंका ) यदि कहें कि—देवादिकों के देहादि के अस्तित्व स्वीकारने
में विद्या में भले ही अधिकार हो जाए पर कर्म में तो विरोध उपस्थित
हो जायेगा । शरीरधारी एक इन्द्र, एक समय में विभिन्नकाल में होने वाले
यज्ञों में “अग्निमग्नि आवह” “इन्द्रागच्छ हरिव आगच्छ” इत्यादि मंत्रों
से आवाहन करने पर, एक साथ कैसे उपस्थित सकेंगे ?” कस्यवाह देवा
यज्ञमागंच्छंति” इत्यादि से, अग्नि आदि की उपस्थिति प्रमाणित है।
इत्यादि—
( समाधान ) आपका उक्त कथन, युर्तियुक्त नहीं है—योग शक्ति
संपन्न सौभरि आदि मुनियों का, एक समय में ही, अनेक शरीर धारण
कर, अनेक कार्य करने का उल्लेख मिलता है । इसलिए इन्द्रादि देव-
ताओं में भी ऐसा संभव है ।
शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ।।१।३।२७।।
विरोध इति वर्त्तते । मा भूत्कर्मणि विरोधोऽनेक शरीर-
प्रतिपत्तेः । शब्दे तु वैदिके विरोधः प्रसज्यते, अनित्यार्थ संयोगात्।
विग्रहवत्वे हि सावयवत्वेनेन्द्रादेरर्थस्यानित्यत्वमनिवार्यम् । अतो देव-
दत्तादिशब्दवदिन्द्राद्यर्थजन्मनः प्राग् विनाशादूर्ध्वं चेन्द्रादिशब्दानां
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( ५१६ )
वैदिकानामर्थशून्यत्वमनित्यत्वं वा वेदस्य स्यादिति चेत्—तन्न-अतः
प्रभवात्-अस्मादिन्द्रादिशब्दादेव पुनः पुनरिन्द्राद्यर्थस्य प्रभवात् । एत-
दुक्तं भवति-यदि देवदत्तादिशब्दवदिन्द्रादि शब्दा वैदिका व्यक्ति
विशेष मात्रे संकेत पूर्वकाः प्रवृत्ताः, अपितु स्वभावत एव गवादि
शब्दवत् आकृति विशेष वाचित्वेन, ततश्चैकस्यामिन्द्र व्यक्तौ विनष्टा-
यामत एव वैदिकादिन्द्रशब्दान्मनसि विपरिवर्त्तमानादवगततद्वाच्य
भूतेन्द्राद्यर्थकारो धाता तदाकारमेवापरमिन्द्रं सृजति, यथा कुलालो
घटशब्दान्मनसि विपरिवर्त्तमानात्तदाकारमेव घटम् इति ।
( संशय ) ठीक है, कर्म में विरोध भले ही न हो पर वैदिक शब्दों
में तो विरोध होने की सभावना है, क्योंकि—जब देवताओं का शरीर
मानेगे तो, उनका उपचय-अपचय-विनाश आदि भी मानना ही पड़ेगा ।
शरीर मानने पर उनके अवयव भी मानेगे ही, अवयव नित्य होते नहीं,
इसलिए इन्द्रादि की अनित्यता भी माननी पड़ेगी । देवदत्त आदि शब्दों
की तरह, वैदिक इन्द्रादि शब्दो को भी अनित्य मानना होगा । इन्द्र की
उत्पत्ति के पूर्व और विनाश के बाद, फिर—वेदों में वर्णित इन्द्र का
अस्तित्व ही क्या रह जायगा ? इन्द्र के अस्तित्व के सशयित हो जाने
पर वेदों का अस्तित्व और नित्यता भी संशयित हो जावेगा । इत्यादि
( समाधान ) उक्त संशय असंगत है; इन्द्र आदि शब्द वेद में
नित्य ही है, इन्द्र आदि का भले ही पुनः पुनः उद्भव अनुद्भव होता
रहे, पर इन्द्र आदि शब्द, देवदत्त आादि शब्द की तरह, व्यक्ति विशेष
के बोधक नहीं हैं, अपितु गो आदि शब्द की तरह आकृति विशेष के
वाचक है । एक इन्द्र के विनष्ट हो जाने पर भी, वैदिक आकृति विशेष
इन्द्र शब्द का मानसिक चिन्तन करके, विधाता, उसी आकार प्रकार के
इन्द्र का सर्जन कर देते हैं, जैसे कि—कुम्हार, घट शब्द संपन्न आकार
विशेष का चिन्तन, विनष्ट घट के समान अन्य घट का निर्माण कर
देता है ।
कथमिदमवगम्यते ? प्रत्यक्षानुमानभ्यां—श्रुतिस्मृतिभ्यामित्यर्थं
श्रुतिस्तावद्-“वेदेन रूपे व्याकरोत् सतासतो प्रजापतिः” इति ।
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( ५१७ )
तथा-“स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत, स भुव इति व्याहरत्
सोऽन्तरिक्षमसृजत्” इत्यादि । वाचक शब्द पूर्वकं तत्तदर्थं संस्थानं
स्मरन् तत्तदर्थ संस्थान विशिष्टं तंतमर्थं सृष्टवानित्यर्थः ।
स्मृतिरपि-“अनादिनिधना ह्येषा वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा आदौ
वेदमयी दिव्या यतस्सर्वाः प्रसूतयः” इति । “सर्वेषां तु स नामानि
कर्माणि च पृथक् पृथक्, वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च
निर्ममे” । संस्था संस्थानानि रूपाणीति यावत् । तथा “नामरूपं
च भूतानां कृत्यानां च प्रपंचनम्, वेदशब्देभ्य एवादौ देवादीनां
चकार सः” इति अतो देवादीनां विग्रहवत्वेऽपि वैदिक शब्दानामा-
नर्थक्यं, वेदस्यादिमत्वं न प्रसज्यते ।
यदि पूछें कि-तुम कैसे जान सके ? प्रत्यक्ष से या अनुमान से श्रुति
या स्मृति से ? तो भाई श्रुति ही का वचन है “प्रजापति ने वेद से, सत्
और असत् इन दो रूपों को प्रकट किया” तथा “उन्होंने भू शब्द से भूमि
की, भुवः शब्द से अंतरिक्ष की, सृष्टि की” इत्यादि से ज्ञात हुआ कि-
पदार्थ वाचक शब्दों का स्मरण करते हुए विशेष, विशेष पदार्थों के संस्थान
आकृति विशेष का स्मरण करके, उन-उन आकृति विशेषों की सृष्टि की।
स्मृति में भी इसी प्रकार-“स्वयम्भू ने सर्व प्रथम अनादि निधन
वेदमय, दिव्य वाक्य प्रकाश किया, जिससे कि सारी सृष्टि होती है”-
उस आदि पुरुष ने सर्वप्रथम वैदिक शब्दों से ही पृथक्-पृथक् नाम-कर्म
एवं विभिन्न प्रकार के संस्थानों का निर्माण किया”-“उन्होंने, देव आदि
समस्त भूतों के नाम रूप एव विविध कर्त्तव्य विषयों की वैदिक शब्दों
से ही सृष्टि की” इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट है कि-देव आदि के शरीरी
होते हुए भी, वैदिक शब्दों की नित्यता में कोई अंतर नहीं आता ।
अतएव च नित्यत्वम् ।१।३।२८॥
यत एवेन्द्र वशिष्ठादिशब्दानां देर्षिवाचिनां तत्तदाकारं
वाचित्वं, तत्तच्छब्देन तत्तदर्थस्मृतिपूर्विका च तत्तदर्थसृष्टिः, तत
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( ५१८ )
एव "मंत्रकृतो वृणोते" नम ऋषिभ्यो मंत्रकृद्भ्यः "अयं सोऽग्निरिति
विश्वामित्रस्य सूक्तं भवति" इत्यादिभिर्वशिष्ठादीनां मंत्रकृत्व कांडकृत्व
ऋषित्वार्दौ प्रतीयमानेऽपि वेदस्य नित्यत्वमुपपद्यते । एभिरेव "मंत्रकृत
वृणीते" इत्यादिभिर्वेदशब्दैः तत्तत्कांडसूक्त मंत्रकृताऋषीणामाकृति
शक्त्यादिकं परामृश्य, तत्तदाकारान् तत्तच्छक्ति युक्तांश्च सृष्ट्व्
प्रजापतिस्तानेव तत्तन्मंत्रादिकरणे नियुंक्ते । तेऽपि प्रजापतिन
आहित शक्त्यस्तत्तदनुगुणं तपस्तप्त्वा नित्यसिद्धान्पूर्वं पूर्वं वशिष्ठादि
दृष्टान् तानेव मंत्रादीन् अनधीत्यैव स्वरतोवर्णतश्चास्वलितान्प
श्यंति । अतश्च वेदानां नित्यत्व मेषां च मंत्रकृत्वमुपपद्यते ।
जैसे कि-देवता और ऋषिवाची, इंद्र वशिष्ट आदि शब्द आकृति
विशेष के बोधक है, उनका स्मरण करके ही उनकी सृष्टि की जाती
वैसे ही "मंत्रकृतोवृणीते-नमोऋषिभ्यो मंत्रकृद्भ्यः-अयं सोऽग्निरि
विश्वामित्रस्य सूक्तं भवति" इत्यादि वेदवाक्यों में, वशिष्ठ आदि क
मंत्र कर्तृता, कांड कर्तृता, तथा ऋषित्व आदि की प्रतीति होते हुए भ
वेदों की नित्यता अक्षुण्य रहती है। क्यों कि-"मंत्रकृतोवृणीते" इत्या
शब्दों के आधार पर, प्रजापति उन-उन मंत्रों, सूक्तों और काण्ड कर
ऋषियों की रचना कर, उन्हीं को उन मंत्रादि कार्य संपादन में नियुक्त
करते है प्रजापति से प्राप्त शक्ति द्वारा वे ऋषि भी अपने-अपने कर्त्तव्य
नुकूल तपश्चर्या द्वारा, अध्ययन पूर्वक, पूर्व-पूर्व वशिष्ठ आदि, दृष्ट
नित्यसिद्ध मंत्रराशि का, यथायथ (जैसे का जैसा ही) स्वर और वर्ण
अनुसार अविकल साक्षात्कार कर लेते हैं। इस प्रकार वेदों की नित्यत
एवं वशिष्ठादिकों की मंत्रकर्त्तृता सिद्ध हो जाती है।
अथस्यात्- नैमित्तिक प्रलयादिषु इन्द्रादि उत्पत्तौ वेदशब्देभ
पूर्वं पूर्वेन्द्रादिस्मरणेन प्रजापतिना देवादिसृष्टिरुपपद्यतां ना
प्राकृतप्रलये तु स्रष्टुः प्रजापतेः भूतादि अहंकार परिणाम शब्दर
च विनष्टत्वात् कथं प्रजापतेः शब्द पूर्विका सृष्टिरुत्पद्यते ? कथन्त
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( ५१६ )
विनष्टस्य वेदस्य नित्यत्वं ? अतो वेद नित्यत्ववादिना देवादीनां
विग्रहवत्त्वाऽभ्युपगमेऽपि लोक व्यवहारस्य प्रवाहानादिताऽश्रयणी-
येति ? अत्रोत्तरं पठति—
शंका—नैमित्तिक प्रलय के समय तो, ब्रह्म पूर्व सृष्ट्यानुसार वेद
वाक्य स्मरण पूर्वक, आकृति विशेष इन्द्र आदि की सृष्टि कर लेते हैं,
ऐसा तो मान भी सकते हैं, पर प्राकृत प्रलय में जब कि-सृष्टिकर्त्ता
प्रजापति एवं भूतोपादान अहंकार के परिणाम स्वरूप शब्द का भी लय
हो जाता है, तब प्रजापति की शब्दानुस्मरण पूर्विका सृष्टि कैसे संभव
होगी, तथा विनष्ट वेदों की नित्यता भी कैसे रहेगी ? इसलिए वेद-
नित्यता वादी, देवादिकों की देह सत्ता स्वीकारने पर भी, जो लोक
व्यवहार में अनादि प्रवाह रूपता है, उसका समर्थन कैसे करेंगे ? इसी का
उत्तर देते हैं—
समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ॥१।३।२८॥
कृत्स्नोपसंहारे जगदुत्पत्त्यावृत्तावपि पूर्वोक्तात्समाननामरूप-
त्वादेव न कश्चिद विरोधः । तथाहि—स भगवान् पुरुषोत्तमः
प्रलयावसान समये पूर्वसंस्थानं जगत्स्मरन् “बहुस्याम्” इति संकल्प्य
भोग्यभोक्तृजातं स्वस्मिन् शक्तिमात्रावशेषं प्रलीनं विभाव्य महदादि
ब्रह्माण्डं हिरण्यगर्भ पर्यन्तं यथापूर्वं सृष्ट्वा वेदांश्च पूर्वानुपूर्वी-
विशेष संस्थानाविष्कृत्य हिरण्यगर्भायोपदिश्य पूर्ववदेव देवाद्याकार-
जगत्सर्गे तं नियुज्य स्वयमपि तदन्तरात्मतयाऽवतस्थे । अतो
यथोक्तं सर्वमुपपन्नम् । एतदेव च वेदस्यापौरुषेयत्वं नित्यत्वं च,
यत्पूर्वपूर्वोच्चारणक्रमजनितसंस्कारेण तमेव क्रमविशेषं स्मृत्वातेनैव
क्रमेणोच्चार्यत्वम् तदस्मासु सर्वेश्वरेऽपि समानम् । इयांस्तु विशेषः—
संस्कारानपेक्षमेव स्वयमेवानुसंधत्ते पुरुषोत्तमः ।
प्राकृत प्रलय के बाद पुनः सृष्टि होने पर, पूर्वकथित समान नाम
और रूप की संभावना में भी, कोई विरोध नहीं आता । देखिये वेदों में
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हो ऐसा कहा गया है कि-उन भगवान पुरुषोत्तम ने प्रलयावसान के समय
पूर्व कल्पनीय संस्थान विशेष जगत का स्मरण करके “अनेक होऊँ' ऐसा
संकल्प करके, केवल शक्ति रूप से स्वयं में विलीन भोग्य और भोक्तृ
समूह को पृथक् पृथक् करके, महत्तत्व से लेकर ब्रह्मांड तक सृष्टि करके,
हिरण्यगर्भ को उसका उपदेश देकर उन्हें पूर्व कल्पानुसार जैसी की जैसी
आकृति वाले देव आदि समस्त जगत की सृष्टि में नियुक्त करके, स्वयं
अन्तर्यामी रूप से सृष्ट जगत में प्रविष्ट हो गए इस प्रकार उक्त संशय
का समाधान हो जाता है। इसी से वेदों की अपौरुषेयता और नित्यता
भी प्रमाणित हो जाती है। वेदों का जो पूर्व पूर्व उच्चारण क्रम जन्य
संस्कार है, उसी क्रम विशेष का स्मरण करके, सदा उच्चारण करना
चाहिए, यह नियम हम लोगों और सर्वेश्वर दोनों के लिए समान है।
सर्वेश्वर में, हमसे एक ही विशेषता है कि-वह पूर्व संस्कार निरपेक्ष होकर
स्वयं ही अनुसंधान या स्मरण करते हैं [जब कि हम लोग पूर्व संस्कारा-
नुसार ही स्मरण करने के लिए बाध्य हैं ]
कुत इदं यथोक्तभवगम्यत इति चेत् ? तत्राह-दर्शनात् स्मृतेश्च ।
दर्शनं तावत् -"यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति
तस्मै" इति । स्मृतिरपि मानवी-"आसीदिदं तमोभूतम्" इत्यारभ्य-
'सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः, अतएव
ससर्जादौ तासु वीर्यमपासृजत्, तदण्डमभवद् हैमंसहस्रांशु समप्रभम् ।
तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः" इति । यथा पौराणिकी-
"तत्र सुप्तस्य नाभौ पद्मभजायत तस्मिन् पत्मे महाभाग वेदवेदां-
गपारणः, ब्रह्मोत्पन्नः स तेनोक्तः प्रजाः सृज महामते ।" तथा -
"परोनारायणो देवः तस्याज्जातश्चतुर्मुखः" इति । तथा "आदि-
सर्गमहं वक्ष्ये" इत्यारभ्योच्यते-"सृष्ट्वा नारं तोयमंतः स्थितोऽहं
येनस्यान्मे नाम नारायणेति, कल्पेकल्पेऽतत्र शयामि भूयः सुप्तस्य मे
नाभिजं स्याद्यथाऽब्जं, एवम्भूतस्य मे देवि नाभिपद्मे चतुर्मुखः,
उत्पन्नस्यमया चोक्तः प्रजाः सृजत् महामते" इति ।

( ५२१ )
अतो देवादीनामप्यर्थित्व सामर्थ्ययोगात् ब्रह्मविद्यायामधि-
कारोऽस्तीति सिद्धम् ।
यदि पूछें कि उक्त बात कैसे जान सके ? उसपर सूत्रकार कहते हैं
दर्शन और स्मृति से दर्शन जैसे-“जिन्होंने प्रथम ब्रह्मा की सृष्टि की तथा
जिन्होंने सृष्टि के निमित्त उन्हें वेदों की प्रेरणा दी।” इत्यादि । मनु स्मृति
में जैसे-“यह जगत सृष्टि के पूर्व तमोभूत था” इत्यादि से प्रारंभ करके-
“उन्होंने विविध प्रजासृष्टि की आकांक्षा करके, सर्व प्रथम अपने शरीर
से जल की सृष्टि की, उसी से वीर्य की सृष्टि की, वह वीर्य ही हजारों
सूर्यों के समान प्रभा संपन्न हिरण्मय अंड के रूप में परिणत हो गया, उस
अंड में से ही पितामह ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ।” पौराणिक स्मृति में
भी जैसे-“क्षीर सागर में सुप्त नारायण की नाभि से कमल प्रकट हुआ
उस कमल से वेद वेदांग पारंगत ब्रह्मा प्रकट हुए, उन्हें भगवान ने आज्ञा
दी कि-महामति ! तुम प्रजा की सृष्टि करो।” तथा-“प्रकाशमान
नारायण ही श्रेष्ठ हैं, उन्ही से चतुर्मुख ब्रह्मा प्रकट हुए” तथा-“आदि
सृष्टि करूँ” इत्यादि से प्रारंभ करके-“नार जल की सृष्टि कर मैं उसी
मे स्थित हो गया, उसी से मेरा नाम नारायण हुआ, प्रतिकल्प में मैं वहाँ
बार बार शयन करता हूँ, सोये हुए मेरी नाभि से कमल उत्पन्न होता है,
उस नाभि पद्म से चतुर्मुख ब्रह्मा का जन्म होता है, तब मैं उन्हें आज्ञा
देता हूँ कि-तुम प्रजा की सृष्टि करो।”
उक्त वर्णनों से सिद्ध होता है कि-देवताओं के शरीरी और
समर्थ्यवान होने से, उन्हें ब्रह्मविद्या में अधिकार प्राप्त है ।
८ मध्वाधिकरणः-
मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ।१।३।३०॥
ब्रह्मविद्यायां देवादीनामप्यधिकारोऽस्तीत्युक्तम्, इदमिदानीं
चिन्त्यते येषूपासनेषु या देवता एवोपास्यास्तेषु तासामधिकारोऽस्ति न
इति, किं प्राप्तम् ? नास्त्यधिकारस्तेषु मध्वादिष्विति जैमिनिर्मन्यते ।
कुतः ? असंभवात् नहि आदित्यवस्वादिभिरुपास्या आदित्यवस्वाद्य-
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( ५२२ )
योऽन्ये संभवंति । न च वस्वादीनां सतां वस्वादित्वं प्राप्यं भवति,
प्राप्तत्वात्, मधुविद्यायामृग्वेदादि प्रतिपाद्यकर्मनिष्पाद्यस्य रश्मि
द्वारेण प्राप्तस्य रसस्याश्रयतया लब्धमधुब्दपदेशस्यादित्यस्यांशानां
वस्वादिभिर्भुज्यमानानामुपास्यत्वंवस्वादित्वं च प्राप्यं श्रूयते-
“असौ वा आदित्यो देवमधु” इत्युपक्रम्य-“तद्यत्प्रथमममृतं वेद
वसूनामेवैकोभूत्वा अग्निनैव मुखेनैतदेवामृतम् दृष्ट्वा तृप्यति”
इत्यादिना ।
ब्रह्मविद्या में देवादिक का अधिकार है, यह तो सिद्ध हो चुका।
अब प्रश्न होता है कि- उपासनाओं में प्रायः उन सभी देवताओं की उपा-
सना का विधान है, जिनके अधिकार की चर्चा की जा रही है,, उन्हें स्वयं
अपनी उपासना करने का अधिकार है या नहीं ? जैमिनि आचार्य का मत
है कि-मधु आदि विद्याओं में देवताओं का अधिकार नहीं है क्यों कि-
ऐसा होना असंभव है, आदित्य वसु आदि देवता ही उक्त विद्याओं के
उपास्य हैं, वे स्वयं उपासक कैसे हो सकते हैं ? वसु आदि को उपासना से
वसु आदि का साक्षात्कार तो हो नहीं सकता, क्यों कि वे स्वयं तो उपा-
सक रूप से उपस्थित हैं ही वे ही फिर उपास्य रूप से कैसे प्रकट हो
सकते हैं ।
जैसा कि-मधु विद्या में, ऋग् वेदादि प्रतिपाद्य कर्म निष्पन्न
मधुनामक आदित्य की रश्मियों द्वारा निस्यूत रस, उपास्य वसु आदि से
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