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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 696 में से

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परिमाण का वर्णन मिलता है, वह भी हृदय के परिमाणानुसार ही है,
अन्यथा श्रुतियों में तो जीव को आरा के अग्रभाग के समान अतिसूक्ष्म
बतलाया गया है । उपासना मनुष्यों से ही संभव हो सकती है, शास्त्र
का अधिकार भी मनुष्य का ही बतलाया गया है । मनुष्य का हृदय अपने
अपने अंगुष्ठ परिमाण का होता है । गर्दभ घोड़ा सर्प इत्यादि का तो
अंगुष्ठ परिमाण का प्रश्न ही नहीं उठता; जीव के अंगुष्ठ परिमाण पर
किसी प्रकार की शंका का अवकाश भी नहीं है । इस विषय को अग्रिम
अधिकरण में समाप्त करेंगे ।
७ देवताधिकरणः-
तदुपर्यपि बादरायणः संभवात् ।१।३।२५॥
परस्य ब्रह्मणोंऽगुष्ठप्रमितत्वोपपत्तये मनुष्याधिकारं ब्रह्मोपास-
नशास्त्रमित्युक्तम् । तत्प्रसंगेनेदानीं ब्रह्मविद्यायां देवादीनामप्य-
धिकारोऽस्ति नास्तीति विचार्यते । किं तावद्युक्तम् ? नास्ति देवा-
दीनामधिकार इति, कुतः ? सामर्थ्याभावात्-न हि अशरीराणां
देवादीनां विवेकविमोकादि साधनसप्तकानुगृहीत ब्रह्मोपासनोपसंहार-
सामर्थ्यमस्ति । न च देवादीनां सशरीत्वे प्रमाणमुपलभामहे ।
यद्यपि परिनिष्पन्नेऽपि वस्तुनि व्युत्पत्ति संभावनया वेदांतवाक्यानि
परे ब्रह्मणि प्रमाणभावमनुभवंति, तथापि देवादीनां विग्रहवत्त्व प्रति-
पादन परं न किंचिदपि वाक्यमुपलभ्यते । मंत्रार्थवादास्तु कर्मविधि-
शेषतयाऽन्यपरत्वान्न देवादि विग्रह साधने प्रभवंति । कर्मविधयश्च
स्वापेक्षितोद्देश्यकारकत्वातिरेकि देवतागतं किमपि न साधयंति ।
अतएव तासामर्थित्वमपि न संभवति । अतः सामर्थ्यार्थित्वयोरभा-
वाद्देवादीनां अनधिकारः- इति ।
परब्रह्म के अंगुष्ठमात्र परिमाण के प्रतिपादन का एकमात्र
अभिप्राय है कि—मनुष्यमात्र का ही ब्रह्मोपासना का अधिकार है, इसी-
लिए शास्त्रों में उन्हें ही अधिकारी माना गया है । इसी प्रसंग में विचार
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