श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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"वायु वेगवान देवता हैं; उपासक अपने भाग्यबल से ही वायु के
अभिमुख भागपाता है वायु उपासक को ऐश्वर्य प्रदान करते है" "यजमान
हवि द्वारा जो पाने की इच्छा करता है वह उसे मिले, उसकी वृद्धि हो,
देवगण उसे उससे संपन्न करें" इत्यादि मंत्र और अर्थवाद वाक्यो मे जो
प्रतीयमान, कर्माराधित देवताओं का फलदातृत्व एवं फलदान के उपयुक्त
जो ऐश्वर्य संबंध है वह अपेक्षणीय या आवश्यककीय मान कर ही वाक्यार्थ
के साथ, संबद्ध हो सकता है ।
देवपूजाविधायिनो यजिधातोश्च यागाख्यंकर्म स्वाराध्य देवता
प्रधानं प्रतीयते । तदेवं कृत्स्नवाक्य पर्यालोचनया वाक्यादेव विध्यपे-
क्षितं सर्वमवगतमिति नापूर्वादिकं व्युत्पत्ति समयानवगतं कर्मविधि-
ष्त्वभिधेयतया कल्प्यतया वाऽश्रयितव्यम् । तथा संकीर्ण ब्र ह्मणमंत्रार्थ-
बादमूलेषु धर्मशास्त्र इतिहास पुराणेषु ब्रह्मादीनां देवासुरप्रभृतीनांच
देहेन्द्रियादयः स्वाभावभेदाः स्थानानि भोगाः कृत्यानिचेत्येवमादयः
सुव्यक्ताः प्रतिपाद्यंते अतो विग्रहादिमत्त्वाद्देवानाम्प्यधिकारोऽ-
स्त्येव ।
"यज्" धातु का अर्थ है देवता की पूजा, देवपूजावाचक "यज्"
धातु का कर्मभूत याग भी, आराध्य देवता की प्रधानता की प्रतीति
कराता है । इस प्रकार संपूर्णवाक्य की पर्यालोचना करने पर ज्ञात होता
है कि—विधिवाक्य से जो जो अपेक्षित है, श्रुति वाक्य भी उसी की
अवगति कराते हैं । शब्द व्युत्पत्ति के नियमानुसार अवगति नहीं हो
सकती, अपूर्व या अदृष्ट आदि किसी भी कर्मविधि से, वाक्यार्थरूप या
कल्पनीय रूप से भी आश्रय नही किया जा सकता । सभी ब्राह्मण मत्रों,
अर्थवाद मूलक धर्मशास्त्र इतिहास पुराण आदि मे, ब्रह्मा आदि देवताओं
और असुरों के देह इन्द्रिय आदि के प्रभेद, स्वभावभेद, विशेष विशेष
स्थान, भोग और कर्त्तव्य, आदि का सुस्पष्ट प्रतिपादन किया गया है ।
इस प्रकार विग्रह आदि के अस्तित्व से, ब्रह्मविद्या मे देवताओं का भी
अधिकार निश्चित होता है ।
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