श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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पृथिवी को छोड़कर सब कुछ छेदन कर दिया" इस उदाहरण में छेदन
क्रिया का कर्त्ता स्वयं ही छिन्नकर्म भी है, इस उपहासास्पद उदाहरण की
तरह होगा । अध्यस्त ज्ञाता अपने नाश के, कारण निवर्त्तक ज्ञान का
स्वयं कर्त्ता नहीं हो सकता, अपना ही नाश कोई पुरुषार्थ नहीं है । यदि
अध्यस्त रूप के विनाश की ब्रह्मरूपता स्वीकारते हो तो, जागतिक भेद,
भेद प्रतीति और तन्मूला अविद्या आदि की कल्पना नहीं हो सकती ।
अस्तु भाग्य के मारे पर अब और अधिक मुसल प्रहार नहीं करेंगे, इतना
ही कथन बहुत है ।
तस्मादनादिकर्मप्रवाहरूपाज्ञानमूलत्वादबंधस्य तन्निबर्हण-
मुक्तलक्षणज्ञानादेव । तदुत्पत्तिश्चाहरह्रनुष्ठीयमानपरमपुरुषाराधन-
वेषात्मयाथात्म्यबुद्धिविशेषसंस्कृतवर्णाश्रमोचितकर्मलभ्या । तत्र
केवलकर्मणामल्पास्थिरफलत्वम्, अनभिसंहितफलपरमपुरुषाराधन-
वेषाणां कर्मणां उपासनात्मकज्ञानोत्पत्तिद्वारेणब्रह्म याथात्म्यानु-
भवरूपानन्तस्थिरफलत्वं च कर्मस्वरूपज्ञानादृते न ज्ञायते ।
केवलाकारपरित्यागपूर्वकं यथोक्तस्वरूपकर्मोपादानं च न संभवतीति
कर्मविचारानन्तरं तत एव हेतोः ब्रह्मविचारः कर्त्तव्य इति
“अथातः” इत्युक्तम् ।
अनादि कर्म प्रवाह रूप अज्ञान मूलक बंधन का निवारण उक्त
प्रकार के ज्ञान से ही हो सकता है । अहर्निश भगवदाराधन से होने वाली
आत्मविषयक यथार्थ बुद्धि विशेष से तथा परिष्कृत वर्णाश्रमोचित कर्म से
ही उक्त ज्ञान का उदय होता है । केवल कर्मानुष्ठान का फल अल्प और
अस्थायी होता है; फलवासना रहित, परम पुरुष की आराधनात्मक
कर्मों की उपासनात्मक ज्ञानोत्पत्ति से ब्रह्म का यथार्थ, अनंत और स्थिर
अनुभव होता है । कर्म का स्वरूप ज्ञान के बिना नही जाना जा सकता ।
ज्ञान रहित कर्मानुष्ठान के त्याग करने मात्र से, परम पुरुष के आराधना-
त्मक कर्म का अनुष्ठान नही हो सकता, इसलिए कर्म विचार के बाद
आराधना के मुख्य हेतु ब्रह्म का विचार आवश्यक है यही “अथातः” पद
का तात्पर्य है ।