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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 696 में से

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पृष्ठ 279

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कार्यबुद्धि, प्रवृत्ति और व्याप्ति के बल से शब्द का प्रवर्त्तक
अर्थावबोध होता है, [अर्थात् शब्द मात्र की प्रवृत्ति को बतलाने वाले
रूप से अर्थावबोधकता होती है; कार्य विषयक ज्ञान और कार्य विषयक
प्रवृत्ति घटित अर्थावबोध से निश्चित होता है कि-] सारे ही शब्द
कार्यपरक एवं विशेष कार्य प्रतिपादक होते हैं। क्रिया संबंधी अर्थ
प्रतिपादन से ही समस्त शब्दों की शक्ति का निश्चय होता है [अर्थात्
क्रिया संपर्क रहित पद में अर्थावबोधकता नहीं होती] इष्ट साधनता
बुद्धि, जो कि प्रवृत्ति की मूलहेतु है, वह भी सीधे न होकर क्रिया बुद्धि
द्वारा ही होती है, इसीलिए अतीत, अनागत और वर्त्तमान में जो इष्ट
साधन रहते हैं, उनका ज्ञान रहते हुए भी प्रवृत्ति नहीं होती। "ये इष्ट
उपाय मेरे प्रयत्न के बिन सिद्ध नहीं हो सकते, ये मेरे प्रयास से ही
साध्य हैं, मुझे इसके लिए प्रयास करना चाहिए" ऐसी बुद्धि जब तक
नहीं होती, तब तक प्रवृत्ति हो नहीं सकती, इसलिए कार्यबुद्धि ही लोक
प्रवृत्ति की मूल हेतु है। लोक प्रवृत्ति का हेतु भूत अर्थ ही जब शब्द का
प्रकृत वाच्यार्थ है तो, कार्य को ही वेद का प्रतिपाद्य विषय माना जायगा
(सिद्ध वस्तु प्रतिपादन उसका विषय नहीं हो सकता) अतः स्वतः सिद्ध
ब्रह्म प्राप्ति रूप अनंत और नित्य फल, केवल प्रतीति या ज्ञान द्वारा नहीं
हो सकता। "चातुर्मास्य यज्ञ करने वाले पुण्यात्मा अक्षय फल पाते हैं"
इत्यादि कर्मों के प्रतिपादक श्रुतियों में स्थिर फल का प्रतिपादन किया
गया है। इसलिए यह कहना कि—कर्मफल अल्प और अस्थिर तथा ब्रह्म
ज्ञान फल अनन्त और स्थिर बतलाने वाला ब्रह्मविचारात्मक, प्रारंभ, इस
ग्रंथ में किया गया है, असंगत बात है।
अत्राभिधीयते-निखिललोकविदितशब्दार्थसंबंधावधारणप्रकारम-
पनुद्य सर्वशब्दानां अलौकिकैकार्थविबोधित्वावधारणं प्रमाणिका
न बहुमन्यन्ते। एवं किल बालाः शब्दार्थ संबंधमवधारयंति मातापितृ
प्रभृतिभिरम्बतातमातुलादीन् शशिपशुनरमृगपक्षिसर्वादींश्च "एनम-
वेहि इमं चावधारय" इत्याभिप्रायेण, अंगुल्यानिर्दिश्य तैस्तैः शब्दैस्ते-
षु तेष्वर्थेषु बहुशः शिक्षिताः शनैः शनैः तैस्तैरेव शब्दैःसंबन्धान्तरेषुतेष्व-
र्थेषु स्वात्मनां व्युत्पत्तिं दृष्ट्वा शब्दार्थयोस्सम्बन्धान्तरादर्शनात्