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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 696 में से

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पृष्ठ 284

( २२४ )
न च परोद्देशप्रवृत्तकृतिव्याप्यर्हत्वंशेषत्वमिति तत् प्रति-
संबंधी शेषीत्यवगम्यते । तथासति कृतेरशेषत्वेन तां प्रति
तत्साध्यस्य शेषित्वाभावात् । न च परोद्देशप्रवृत्त्यर्हतायाशेषत्वेन
परः शेषी, उद्देश्यत्वस्यैव निरूप्यमाणत्वात् प्रधानस्यापि भृत्योद्देश-
प्रवृत्त्यर्हत्वदर्शनाच्च । प्रधानस्तु भृत्यपोषणेऽपि स्वोद्देशेन प्रवर्त्तत
इति चेन्न, भृत्योऽपि हि प्रधानपोषणे स्वोद्देशेनैव प्रवर्त्तते; कार्य-
स्वरूपस्यैवानिरूपणात् “कार्यप्रतिसंबंधी शेषः, तत्प्रतिसम्बन्धी शेषी”
इत्यप्यसंगतम् ।
दूसरे फल के उद्देश्य से प्रारंभ किये गये प्रयास के अनुगत विषय
को शेष तथा उसके संपर्कित विषय को शेषी नहीं कहा जा सकता ।
क्योंकि—कृति (प्रयत्न) ही जब शेष नहीं हो सकता, तो उससे संपर्कित
साध्य विषय ही, शेषी कैसे हो सकता है । परोद्देश्य प्रवृत्ति योग्य को
शेष तथा पर को शेषी कहें, ऐसा भी असंभव है, क्योकि-पर वस्तु की
उद्देश्यत्ता ही निरूपित हो सकती है । प्रधान की भृत्य के प्रति प्रवृत्त
कराने की क्षमता देखी जाती है [प्रधान स्वयं भृत्य के शासन में प्रवृत्त
होता नहीं देखा जाता] यदि कहो कि—प्रधान भृत्य का पोषण, अपने
उद्देश्य से ही करता है, सो ऐसा नही, भृत्य भी तो प्रधान की सेवा अपने
उद्देश्य से करता है । इस प्रकार कार्य के स्वरूप का निरूपण ही जब
दुरूह है, तो कार्य प्रतिसंबंधी शेष और उसके प्रतिसंबंधी शेषी का ऐसा
निर्देश भी असंगत है ।
नापि कृतिप्रयोजनत्वं कृत्युद्देश्यत्वम्, पुरुषस्य कृत्यारम्भ
प्रयोजनमेव हि कृतिप्रयोजनम् । स चेच्छाविषयः । तस्मादिष्ट-
त्वातिरेकिकृत्युद्देश्यत्वानिरूपणात् कृतिसाध्यताकृति प्रधानत्वरूपं
कार्यं दुर्निरूपमेव ।
कृति (प्रयत्न) के प्रयोजन को ही कृत्युद्देश्य नहीं कह सकते ।
मनुष्य के कार्यारम्भ का प्रयोजन ही वस्तुतः कृति का प्रयोजन होता है,
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