श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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तु दोषे स्वदेशविशिष्टस्य चन्द्रस्यैकग्रहण वेद्यत्वादेकश्चन्द्रः इति
भवति प्रत्ययः। दोषकृतं तु सामग्री द्वित्वं तत्कृतं ग्रहणद्वित्वं; तत्कृतं
ग्राह्याकार द्वित्वं चेति निरवद्यम् ।
दिग्भ्रम में भी, भ्रांत दिशा का, अन्यान्य दिशाओं से संबंध होने के
कारण, केवल मात्र एक ही दिशा का जो ज्ञान होता है, वह भी यथार्थ
ही है, क्योंकि ठीक से न देख पाने के कारण गन्तव्य दिशा की ओर न
जाकर दूमरी दिशा की ओर भटकना हो जाता है ।
आँख पर अंगुली रखने से चाक्षुष रश्मियाँ दो भागों में विभक्त हो
जाती हैं, जिससे दो चन्द्रो का भान होता है, रश्मियों का एक भाग तो
ठीक चन्द्रमा के सामने पड़ता है, दूसरा भाग तिरछा होकर कुछ दूर
दूसरे चन्द्र को देखता है, इस प्रकार दो चन्द्रों की प्रतीति होती है।
नेत्र रश्मियाँ हैं तो सत्य ही, इसलिए उनके द्वारा स्वतंत्र रूप से जो दो
चन्द्र देखे जाते हैं, वह प्रतीति भी यथार्थ ही है प्रत्यभिज्ञा में केवल नेत्र
ही ज्ञान के साधन नहीं होते, अपितु पूर्व संस्कार भी अपेक्षित होता है ।
दो चन्द्रों की भिन्न प्रतीति करते हुए भी, जो एक चन्द्र का निश्चित ज्ञान
बना रहता है, वह पूर्वसंस्कारजन्य ही रहता है । दोनों नेत्र एक ही कार्य
करते है, फिर भी चाक्षुष तेज में तिमिरादि (रोगविशेष) के दोष से
'त्रों के कार्य में विभिन्नता आ जाने के कारण भी दो चन्द्रों की प्रतीति
होती है, दोष के ज्ञान हो जाने पर सही अवगति होती है, तब दो के बजाय
एक ही चन्द्र प्रतीत होने लगता है । दोष के कारण ही, साधन मैं द्वैत
होता है, साधन द्वैत से ज्ञान में द्वैत होता है और उनके अनुसार चन्द्र
दो प्रतीत होते हैं । इनसे ज्ञात होता है, कि उक्त द्वैत प्रतीति यथार्थ है ।
अतः सर्वविज्ञानजातं यथार्थमिति सिद्धम्। ख्यात्यंतराणां
दूषणानि तैस्तैर्वादिभिरेव प्रपंचितानीति न तत्र यत्नः क्रियते ।
अथवा किमनेन बहुनोपपादनप्रकारेण । प्रत्यक्षानुमानागमाख्यं
प्रमाणजातमागम्यं च निरस्तनिखिलदोषगंधमनवधिकातिशयसंख्ये-
यकल्याणगुणगणं सर्वज्ञं सत्यसंकल्पं परंब्रह्माभ्युपगच्छतां किं
न सेत्स्यति । किं नोपपद्यते । भगवताहि परेणब्रह्मणा क्षेत्रज्ञपुण्य-
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प.पानुगु तद् ग्यतयायाखिल जा त् सृजता सुखदु.खोपेक्षाफलानु-
भवानुभाव्याः पदार्थाः सर्वसाधारणानु..व विषयाः, केचन तत्पुरुष-
मात्रानुभवविषयाः तत्तत्कालावसानाः तथातथाऽनुभाव्याः सृज्यन्ते ।
तत्र बाध्यबाधकभावः सर्वानुभवविषयतया तद्रहिततया चोपपद्-
यत इति सर्वं समंजसम् ।
उक्त दृष्टान्तों से सिद्ध हो चुका कि प्रतीयमान समस्त जगत यथार्थ
है। ख्यातियों में जो दोष है, वे स्वयं ख्यातिवादियों द्वारा परस्पर निरा-
कृत हो चुके है, उसके लिए हमने प्रयास नही किया। बहुत अधिक
समर्थन की चेष्टा से कोई विशेष लाभ भी नही है। जो लोग, प्रत्यक्ष,
अनुमान और आगम (शास्त्र) प्रमाण मानते है तथा समस्त दोषों से
रहित—, न्यूनाधिक भावरहित—असंख्य-कल्याणमयगुण विभूषित—सत्य-
संकल्प—सर्वज्ञ-आदि गुण विशिष्ट परब्रह्म का अस्तित्व भी स्वीकारते हैं,
उनकी दृष्टि में तो कुछ भी परिहार्य और असंगत नहीं है। परब्रह्म
भगवान्—जीव के पाप पुण्य के अनुसार, सुख दुःखों से अपेक्षित फलवाले
जिन जीवोपभोग्य पदार्थों का सर्जन करते हैं; उनमें कुछ सर्वसाधारण के
अनुभव के योग्य, कुछ व्यक्ति विशेष के अनुभव के योग्य, एवं कुछ विशेष
समय में अनुभव योग्य होते हैं। वे सृष्ट पदार्थ परस्पर बाध्य बाधक
भाव से सर्वानुभूतविषयक और व्यक्ति विशेष के अनुभव विषयक होने से
उपपन्न और सुसंगत होते हैं।
यत् पुनः सदसदनिर्वचनीयमज्ञानं श्रुतिसिद्धमिति, तदसत् ।
“अनृतेन हि प्रत्यूढाः” इत्यादिश्वनृतशब्दस्यानिवर्चनीयानभिधा-
यित्वात् । ऋतेतरविषयो हि अनृत शब्दः । ऋतमिति कर्म वाचि ।
“ऋतं पिबन्तौ ” इति वचनात् । ऋतं कर्मफलाभिसंधिरहितं, परं
पुरुषााराधानवेषं तत्प्राप्तिफलम् । अत्र तद्व्यतिरिक्तं संसारिकफलं
कर्मानृतं ब्रह्म प्राप्ति विरोधि” एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्ति अनृतेन
हि प्रत्यूढाः” इति वचनात् ।
और जो—सदसद् अनिर्वचनीय अज्ञान को श्रुति संम्मत बतलाया,
वह भी असंगत बात है। “अनृतेन हि प्रत्यूढा.” वाक्य में प्रयुक्त “अनृत”
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शब्द अनिर्वचनीयता का बोधक नहीं हैं। “अनृत” शब्द तो “ऋत” से
अतिरिक्त विषय का बोधक है। “ऋत” शब्द कर्मवाची है, “ऋतं-
पिबन्तौ” वाक्य से इस अर्थ की प्रतीति होती है “ऋत” अर्थात् कर्मफल
की अभिसंधि (शर्त) रहित, भगवत् प्राप्ति साधक, भगवदाराधन रूप
कर्म भी “ऋत” शब्द का वाच्यार्थ है। उससे भिन्न, सकाम सांसारिक
फल वाला कर्म “अनृत” है, जो कि--ब्रह्मप्राप्ति में बाधक है। “इस
ब्रह्मलोक को प्राप्त नहीं करते, जो कि--अनृत (सकाम कर्म) से आवृत
हैं “इस वाक्य से उक्त अर्थ की ही प्रतीति होती है।
“नासदासीन्नोसदासीत्” इत्यत्रापि सदसच्छब्दौ चिदचिद्
व्यष्टि विषयौ। उत्पत्तिवेलायां सत्यच्छब्दाभिहितयोश्चिदचिद्
व्यष्टिभूतयोः वस्तुनोऽपि अकाले अचित्समष्टिभूते तमः शब्दाभि-
धेये वस्तुनि प्रलय प्रतिपादनपरत्वात् अस्य वाक्यस्य। नात्र
कस्यचित् सदसदनिर्वचनीयतोच्यते, सदसतोः कालविशेषे असद्-
भावमात्र वचनात्। अत्रतमः शब्दाभिहितस्य अचित्समष्टित्वं
श्रुत्यन्तरादवगम्यते– “अव्यक्तमक्षरेलीयते, अक्षरं तमसि लीयते”
इति। सत्यम् तमः शब्देनाचित् समष्टिरूपायाः प्रकृतेः सूक्ष्मावस्थो-
च्यते। तस्यास्तु “मायां तु प्रकृतिं विद्यात्” इति मायाशब्देनाभिधा-
नादनिर्वचनीयत्वमिति चेत् , नैतदेवम् , मायाशब्दस्यानिर्वचनीयवा-
चित्वं न दृष्टं इति। मायाशब्दस्य मिथ्यापर्यायत्वेनानिर्वचनीयवा-
चित्वमिति चेत् , तदपि नास्ति, नहि सर्वत्र मायाशब्दो मिथ्या
विषयः। आसुरराक्षसशास्त्रादिषु सत्येष्वेव मायाशब्द प्रयोगात्।
यथोक्तम्–“तेन मायासहस्रं तच्छम्बरस्याऽशुगामिना, बालस्य
रक्षतादेहमैकैकश्येनसूदितम्” इति। अतोमायाशब्दो विचित्रा-
र्थसर्गकराभिधायी। प्रकृतेश्च मायाशब्दाभिधानं विचित्रार्थ
सर्गकरत्वादेव। अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया
सन्निरुद्धः “इति मायाशब्दवाच्यायाः प्रकृतेर्विचित्रार्थसर्गकरत्वं
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दर्शयति । परं पुरुषस्य च तद्वत्तामात्रेण मायित्वमुच्यते, नाज्ञत्वेन
जीवस्यैव हि मायया निरोधः श्रूयते । “तस्मिंश्चान्यो मायया
सन्निरुद्धः ” इति, “अनादिमायया सुप्तोयदा जीवः प्रबुध्यते”
इति च । “इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते” इत्यत्रापि विचित्राः
शक्तयोऽभिधीयन्ते । अत एवहि “भूरित्वष्टेव राजति” इत्युच्यते,
नाऽसि “मिथ्याभिभूतः कश्चिद्विराजते ” । “ मम माया दुरत्यया”
इत्यत्रापि गुणमयीति वचनात् सैव त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः उच्यते
इति । न श्रुतिभिः सदसदनिर्वचनीय अज्ञान प्रतिपादनम् ।
“सृष्टि से पूर्व सद् भी नही था, असद् भी नही था” इस वाक्य में
सद् असद् शब्द, चेतन-जड व्यष्टि बोधक है। उत्पत्ति के समय “सत्”
और ‘त्यत्’ शब्द से व्यष्टि रूप, जडचेतन वस्तु का निरूपण, किया गया
है, वह प्रलय के समय “अचित् रूप समष्टि ‘तम” शब्द वाक्य प्रकृति में
लीन हो जाती हैं, यही उक्त वाक्य का तात्पर्य है। इस वाक्य में सद्सद्
अनिर्वचनीयता की कोई चर्चा नही है। सद् और असद् वस्तु किसी काल
विशेष मे रहती ही नहीं, यही बतलाया गया है । “तम” शब्द वाक्य,
अचित् समष्टि अर्थ, एक दूसरी श्रुति में इस प्रकार बतलाया गया है-
“अव्यक्त अक्षर में लीन हो जाता है, अक्षर तम में लीन हो जाता है, तम
परमात्मा से एकीभूत हो जाता है” इत्यादि ।
यदि कहो कि-“‘तम’ शब्द से अचित् समिष्ट रूप प्रकृति की
सूक्ष्मावस्था बतलाई गई है, यह बात तो यथार्थ है, परन्तु “मायां तु
प्रकृतिं विद्यात् ” इस वाक्य से “माया” शब्द वाक्य अनिर्वचनीय ही
ज्ञात होता है। “यह कथन असंगत है, क्योंकि-माया शब्द की अनिर्वच-
नीयता का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता। यदि कहो कि-माया शब्द
मिथ्या का पर्यायवाची है, इसलिए अनिर्वचनीय है, सो भी नहीं हो
सकता - सभी जगह माया शब्द मिथ्या बोधक नहीं है, असुर, राक्षस,
शस्त्र आदि में भी माया शब्द का प्रयोग देखा जाता है - जैसे कि-
“शीघ्रगामी सुदर्शन द्वारा प्रह्लाद की देह रक्षा के लिए, शंबरासुर के
हजारों माया (असुर) एक एक करके नष्ट कर दिये गए ”। इससे ज्ञात
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होता है कि—आश्चर्य कर वस्तु सृष्टि "माया" शब्द वाच्यार्थ है, मिथ्या
वस्तु नहीं। विचित्र सृष्टि कारिणी प्रकृति के लिये प्रायः माया शब्द का
प्रयोग किया गया है।
"मायी परमेश्वर इसी के द्वारा जगत की सृष्टि करता है, तथा
जीव इससे आबद्ध है" इस वाक्य से माया शब्द वाच्य प्रकृति की विचित्र
सृष्टि कारिता प्रतीत होती है। परमपुरुष परमात्मा माया संबद्ध होने से
मायी कहे गये हैं, अज्ञ होने से उन्हें मायी नहीं कहा गया है। जीव में,
माया शक्ति का संकोच बतलाया है। "तस्मिंश्चान्यो—" "अनादि माया
सुप्तो—" 'इन्द्रोमायाभि०' इत्यादि वाक्यो में माया शब्द परमेश्वर की
शक्ति वैचित्र्य का ही वाचक है। इसीलिए परमेश्वर को भूरित्वष्टैव
राजति" कहा गया है, यदि माया शब्द मिथ्यावाची होता तो उक्त वाक्य
के स्थान पर "मिथ्याभूतः कश्चित् विराजते" कहा जाता। मम माया
दुरत्यया" इस गीता वाक्य में भी "गुणमयी" पद से उसी त्रिगुणात्मिका
प्रकृति का उल्लेख किया गया है। इस से ज्ञात होता है कि—कोई भी
श्रुति सदसद् अनिर्वचनीया माया का समर्थन नही करती।
नाप्यैक्योपदेशानुपपत्त्या; नहि "तत्त्वमसि" इति जीवपरयो-
रैक्योपदेशे सति सर्वज्ञेसत्यसंकल्पेसकलजगत्सर्गस्थितिविनाश हेतुभूते
तच्छब्दावगते प्रकृतेब्रह्मणि, विरुद्धज्ञानपरिकल्पनाहेतु
भूता कादाचिदप्यनुपपत्तिर्दृश्यते। ऐक्योपदेशस्तु "त्वं" शब्देनापि
जीव शरीरकस्य ब्रह्मणएवाभिधानादुपपन्नतरः। "अनेन जीवेना-
त्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपेव्याकरवाणि" इति सर्वस्य वस्तुनः
परमात्मपर्यन्तस्यैव हि नामरूपभाक्त्वमुक्तम् । अतो न ब्रह्माज्ञान
परिकल्पनम्। इतिहासपुराणयोरपि न ब्रह्माज्ञानवादः क्वचिदपि
दृश्यते ।
श्रुति प्रतिपाद्य ऐक्योपदेश से भी ब्रह्माज्ञान कल्पना समझ में
नहीं आती। "तत्त्वमसि" जीव परमात्मा के ऐक्योपदेश के प्रसंग में
सर्वज्ञ, सत्य संकल्प, जगत् की सृष्टि स्थिति संहार के कारण परब्रह्म ही
"तत्" शब्द वाच्य है, "त्वं" पद भी जीवशरीरीब्रह्म का ही वाचक है।
इसलिए ब्रह्माज्ञान की कल्पना समझ में नहीं आती। "इसजीव में प्रवेश
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कर नामरूप की अभिव्यक्ति करूँ" इस श्रुति में परमात्मा पर्यन्त समस्त
वस्तुओं को नामरूपात्मक बतलाया गया है इसलिए ब्रह्म में अज्ञान
कल्पना निष्प्रयोजन सिद्ध होती है। इतिहास पुराण में भी ब्रह्माज्ञानवाद
की कहीं चर्चा नहीं है ।
ननु—"ज्योतींषिविष्णुः" इति ब्रह्मैकमेव तत्त्वमिति प्रतिज्ञाय
"ज्ञानस्वरुपो भगवन्यतोऽसौ" इति शैलाब्धिधरादिभेद भिन्नस्य
जगतो ज्ञानैकस्वरूपब्रह्माज्ञानविजृम्भितत्वमभिधाय "यदा तु शुद्धं
निजरूपस्यैव ब्रह्मणः स्वस्वरूपावस्थितिवेलायां वस्तुभेदाभावदर्श-
नेनाज्ञान "विजृम्भितत्वमेव स्थिरीकृत्य" वस्त्वस्ति कि ? "महीघट-
त्वम्" इति श्लोकद्वयेन जगदुपलब्धि प्रकारेणापि "वस्तुभेदानाम्
"सत्यत्वमुपपाद्यतस्मात् विज्ञानभूते" इति प्रतिज्ञातं ब्रह्मव्यतिरिक्त
स्यासत्यत्वमुपसंहृत्य "विज्ञानमेकं" इति ज्ञानस्वरूपे ब्रह्मणि
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अपना कर्म ही बतलाया गया है, फिर बाद में “विशुद्ध ज्ञान स्वरूप ब्रह्म
के विशुद्ध स्वरूप का निर्देश किया गया है। “मैंने इस प्रकार सद्भाव का
निरूपण किया” इत्यादि श्लोकों का तात्पर्य है कि--“ज्ञानस्वरूप ब्रह्म
ही एकमात्र सत्य है, बाकी सब मिथ्या है, भुवन आदि समस्त पदार्थों की
व्यावहारिक सत्यता है, मैंने तत्त्व की बात तुम्हें बतलादी” ऐसा उपदेश
प्रतीत होता है।
नैतदेवम्-- अत्र भुवनकोषस्य विस्तीर्णं स्वरूपमुक्त्वा पूर्व-
मुक्तं रूपान्तरम् संक्षेपतः “श्रूयतामित्यारभ्याभिधीयते। चिदचिद्
मिश्रे जगति चिदंशो वाङ्मनसागोचरस्वसंवेद्य स्वरूपभेदो
ज्ञानैकाकारतयाऽस्पृष्टप्राकृतभेदो विनाशीति नास्तिशब्दाभि-
धेयः। उभयंतु परब्रह्मरूप वासुदेव शरीरतया तदात्मकमित्येतद्-
रूपं संक्षेपेणरत्राभिहितम् ।
(समाधान) बात ऐसी नहीं है--उक्त प्रकरण में भुवनकोष का
विस्तृत स्वरूप बतलाकर, “श्रूयताम्” से उक्त वस्तु का सूक्ष्म रूप संक्षेप
रूप से बतलाया गया है उसमें बतलाता गया कि--यह जगत् जडचेतनमय
है; इसका चैतन्यांश-वाङ्मनसगोचर, केवल आत्मवेद्य, विविध भागों-
वाला, ज्ञानाकार, अविनाशी. “अस्ति” शब्द वाच्य है। जीव के कर्मफल
से विविध भेदों और आकारों में परिणत जड अंश, विनाशशील “नास्ति”
पदवाच्य है दोनों ही परब्रह्म वासुदेव के शरीर, तदात्मक हैं, ऐसा ही
संक्षिप्तरूप से स्वरूप का विवेचन किया गया है।
तथापि-- “यदम्बु वैष्णवः कायस्ततोविप्रवसुंधरा, पद्माकारा
समुद्भूता पर्वताब्ध्यादिसंयुता।” इत्यम्बुने विष्णोः शरीरत्वेन
अम्बुपरिणामभूतं ब्रह्माण्डमपि विष्णोः कायः, तस्य च विष्णुरा-
त्मेति सकल श्रुतिगततादात्म्योपदेशोपबृंहणरूपस्य सामानाधिकर-
ण्यस्य “ज्योतींषि विष्णुः” इत्यारभ्य वक्ष्यमाणस्य शरीरात्मभाव
एव निबंधनमित्याहुः। अस्मिन् शास्त्रे पूर्वमपि एतदसकृदुक्तम्--
“तानि सर्वाणि तद्वपुः”--“सत्सर्वं वै हरेस्तनुः”-- “स एव
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सर्वभूतात्मा विश्वरूपोयतोऽव्ययः” इति । तदिदंशरीरात्म भावप्रयुक्तं
तादात्म्यं सामानाधिकरण्येन व्यपदिश्यते ‘ज्योतींषि विष्णुः’ इति ।
उक्त तथ्य को ही अन्य श्लोक में बतलाते हैं—“विष्णु के शरीर
रूप जल से शैल, सागर आदि युक्त पद्माकार वसुंधरा उत्पन्न हुई”
इसमे जल को, विष्णु के शरीररूप से बतलाकर जल के परिणाम रूप
इस जगत को भी उनका शरीर स्थानीय कहा गया है । अन्यान्य श्रुतियों
मे भी विष्णु को ब्रह्माण्ड की आत्मा बतलाकर ब्रह्माण्ड और विष्णु का
सामानाधिकरण्य अभेद बतलाया गया है । ऐसा शरीरात्मभाव ही
“ज्योतींषि विष्णुः” से बतलाया गया है । इस शास्त्र में “वह सब उन्ही
का शरीर है”—वह सब हरि का तनु है—वह विश्वरूप अव्यय, सभी
भूतो के आत्मा हैं ।” इत्यादि वाक्यो से यहीबात कईबार कही गई है ।
शरीरात्मभाव तादात्म्य ही “ज्योतींषि विष्णुः ” मे सामान्याधिकरण
रूप से कहा गया है ।
अस्त्यात्मकना
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इस जगत में अस्त्यात्म और नास्त्यात्मक वस्तुएं विष्णु की शरीर
स्थानीय होने से विष्ण्वात्मक कही गई है। सत् और असत् दोनो में,
असत् रूप का कारण इस प्रकार बतलाया गया है--"ज्ञान स्वरूप भगवान
इस जगत् में व्याप्त है।" इस वाक्य में बतलाया गया कि--समस्त जीवों
में स्थित भगवान का ज्ञानमय रूप ही स्वाभाविक है, देव मनुष्य आदि
वस्तु रूप स्वाभाविक नही है। जड देव मनुष्य शैल समुद्र आदि भेद
उन्ही के ज्ञान (इच्छा) से स्वयंभूत है, अर्थात् एकमात्र ज्ञानस्वरूप भगवान
की जो विविध वैचित्र्य जनक, देव, मनुष्य, शैल, समुद्र आदि आकार
स्मारक कर्मराशि है, वही विचित्रता की प्रतीति कराने वाली है। अचिद्
वस्तुएं, जीवो के कर्मानुरूप परिणामवाली है, इसलिए "नास्ति" पद
वाच्य है। इससे भिन्न चिद् वस्तु "अस्ति" पद वाच्य है यह भी इसी से
ज्ञात होता है। यही बात "यदा तु शुद्ध निजरूपि" इत्यादि में विस्तृत
रूप से वर्णित है। एकमात्र ज्ञानस्वरूप आत्मा मे जो देव मनुष्य आदि
रूप से विविध वैचित्र्य आरोपित होता है, उसका एकमात्र कारण कर्म
ही है, उन समस्त कर्मों के क्षीण हो जाने पर, जीवात्मा अपने निर्दोष
वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करता है। उस स्थिति मे, देव आदि रूप
में आत्मभाव की कल्पना की मूलकारण कर्मराशि विनष्ट हो जाती है
तथा कर्मफलानुयायी भोगप्रद वस्तुभेद भी नही रह जाते।
ये देवादिषुवस्तुष्वात्मतयाभिमतेषु भोग्यभूता देवमनुष्यशैला-
ब्धिधरादिवस्तुभेदाः, ते तन्मूलभूतकर्मसु विनष्टेषु न भवन्ति इति
अचिद् वस्तुनः कादाचित्कावस्थाविशेषयोगितया नास्तिशब्दाभिधे-
यत्वं, इतरस्य सर्वदा निजसिद्धज्ञानैकाकारत्वेन अस्तिशब्दाभिधेय-
मित्यर्थः । प्रतिक्षणमन्यथाभूततया कादाचित्कावस्था योगिनोऽचिद्-
वस्तुनो नास्तिशब्दाभिधेयत्वमेवेत्याह--"वस्त्वस्ति किम् ?" इति ।
अस्ति शब्दाभिधेयो हि आदिमध्यपर्यन्तहीनः सततैकरूपः पदार्थः
तस्य कदाचिदपि नास्ति बुद्ध्यनर्हत्वात् । अचिद्वस्तु किंचिद्
क्वचिदपि तथाभूतं न दृष्टचरं ।
( १०४ )
देव आदि वस्तुओ में जो आत्मभाव से अभिमत, देव-मनुष्य, शैल-
समुद्र-पृथिवी आदि वस्तु भेद है, वे अपने मूल भूत कर्म के विनष्ट हो
जाने पर समाप्त हो जाते हैं। जड़ वस्तु की यह भेद स्थिति सीमित काल
वाली होती है, इसीलिए उसे “नास्ति” शब्द से कहा गया है। चिद् वस्तु
स्वतः सिद्ध, ज्ञानस्वरूप, सदाविद्यमान रहने वाली होने से “अस्ति”
शब्द वाच्य है। प्रतिक्षण में परिवर्त्तनशील, अनियमित स्थिति वाली
अचिद् वस्तु की नास्ति शब्द वाच्यता “वस्त्वस्ति किम् ?” इत्यादि
श्लोक मे वर्णित है। “आदिमध्यान्तरहित सदा एकसी रहने वाली
“अस्ति” शब्द वाच्य वस्तु में, कभी भी “नास्ति” बुद्धि नहीं हो सकती।
इसके विपरीत अचिद् वस्तु कही, कभी उक्त रूप में हो नही सकती।
ततः किमित्यत्राह ? “यच्चान्यथात्वमिति” यद्वस्तु प्रतिक्षण
अन्यथात्वं याति, तदुत्तरोत्तरावस्था प्राप्त्या पूर्वपूर्वावस्थां जहा-
तीति तस्यपूर्वावस्थस्योत्तरावस्थायां न प्रतिसंधानमस्ति । अतः सर्वदा
तस्य नास्तिशब्दाभिधेयत्वमिति । तथाहि उपलभ्यत इत्याह—“मही
घटत्वम्” इति । स्वकर्मणादेव मनुष्यत्वादिभावेन स्तिमितात्म-
निश्चयैः स्वभोग्यभूतमचिद्वस्तु प्रतिक्षणमन्यथाभूतमालक्ष्यते
अनुभूयत इत्यर्थः । एवं सति किमप्यचिद्वस्तु अस्तिशब्दार्हमादि-
मध्यन्तहीनं सततैक रूपमालक्षितमस्ति किं ? न हि अस्तीति
अभिप्रायः । यस्मादेवं तस्मात् ज्ञानस्वरूपमात्मव्यतिरिक्तमचिद्वस्तु
कदाचित्क्वचित् केवलास्ति शब्दवाच्यं न भवतीत्याह “तस्मान्न-
विज्ञानमृते” इति । आत्मा तु सर्वत्र ज्ञानैकाकारतया देवादिभेद
प्रत्यनीक स्वरूपोऽपि देवादिशरीर प्रवेश हेतुभूत स्वकृत विविध
कर्ममूल देवादिभेदभिन्नात्मबुद्धिभिः तेनतेन रूपेण बहुधाऽनुसंहित
इति, तद्भेदानुसंधानं नात्मस्वरूप प्रयुक्तमित्याह “विज्ञानमेकमिति” ।
यदि कहो कि, उससे क्या होता है ? (उत्तर) अन्यथात्व होता है ,
अर्थात्—जो वस्तु प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती है, वह उत्तरोत्तर
अवस्था को प्राप्त करती हुई पूर्वावस्थाओं को छोड़ती जाती है उसकी
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उन पूर्वावस्थाओं का उत्तरोतरावस्थाओं में स्मरण नहीं रहता इसलिए
उसके लिए सदा "नास्ति" शब्द का प्रयोग होता है। "पृथिवी घटरूपता
करती है" इत्यादि श्लोक में उक्त उपलब्धि की बात ही कही गई है। जो
लोग अपने कर्म के अनुसार देह मनुष्यादि देह प्राप्त करके विश्चित आत्म-
स्वरूप का असंदिग्ध रूप से साक्षात्कार करते हैं, वे ही अपनी भोग्य
वस्तुओं को प्रतिक्षण परिवर्तनशील देख पाते हैं, अर्थात् अनुभव करते हैं।
इस प्रकार कभी भी अचित् वस्तु "अस्ति" शब्द वाच्य, आदि मध्य
अन्तहीन, सदा एक रूप देखी गई है क्या ? तो यही कहना होगा कि वह
वस्तु ऐसी है ही नहीं तो देखी कैसे जा सकती है। इससे यह मत स्थिर
होता है कि-ज्ञानस्वरूप आत्मा से भिन्न, कोई भी अचिद् वस्तु, कभी
किसी भी स्थिति में, "अस्ति" शब्द से उल्लेख्य नहीं है, न हो सकती है।
यही बात "तस्मान्न विज्ञानमृते" श्लोक में कही गई है। आत्मा स्वरूपतः
एकमात्र ज्ञानस्वरूप होने से, देवादिभेदों से रहित होते हुए भी, देवादिशरीर
में प्रविष्ट होने के मूलकारण,विविध कर्मों से ही, देवादिरूप विभिन्न भेद
बुद्धि वाला होता है, उस भेद बुद्धि से ही आत्मा में भेद प्रतीति होती है,
जो कि स्वाभाविक नहीं होती; यही सब "विज्ञानमेकं" श्लोक में
बतलाया गया है।
आत्मस्वरूपं तु कर्मरहितं, तत एव मलरूपप्रकृतिस्पर्शरहितम्।
ततश्च तत्प्रयुक्त शोकमोहलोभाद्यशेषहेयगुणासंगि, उपचयापचया-
नर्हतयैकम्, तत एव सदैकरूपम् । तच्चवासुदेवशरीरमिति तदात्मकं,
श्रतदात्मकस्य कस्यचिदप्यभावादित्याह "ज्ञानं विशुद्धम" इति ।
चिदंशः सदैकरूपतया सर्वदाऽस्ति शब्द वाच्यः। अचिदंशस्तु क्षण-
परिणामित्वेन सर्वदानाशनिर्भ इति, सर्वदा नास्ति शब्दाभिधेयः, एवं
रूपचिदचिदात्मकं जगद्वासुदेवशरीरं तदात्मकमिति जगद्या-
थात्म्यं सम्यगुक्तमित्याह— "सद्भाव एवं" इति । अत्र "सत्यम्
असत्यम्" इति "यदस्ति यन्नास्ति" इति प्रक्रान्तस्योपसंहारः ।
एतत् ज्ञानैकाकारतया समम्, अशब्दगोचरस्वरूपभेदमेवाचिन्मिश्र
भुवनाश्रितं देवमनुष्यादि रूपेण सम्यग्व्यवहार्हभेदं यद्वर्त्तते, तत्र
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हेतुः कर्मैवेति उक्तमित्याह--"एतत्तु यत्" इति । तदेव विवृणोति
-"यज्ञः पशुः" इति, जगद्याथात्म्य ज्ञानप्रयोजनं मोक्षोपायत-
नमित्याह "यच्चैतत्" इति ।
आत्मा का स्वरूप कर्म रहित है, इसलिए वह मलरूप प्रकृति के
स्पर्श से भी रहित है; कर्म और प्रकृति से अस्पृष्ट होने से ही वह, शोक-
मोह-लोभ आदि निकृष्ट गुणों के संपर्क से रहित, उपचय अपचय आदि
अवस्थाओं से रहित, सदा एक रूप रहता है। ऐसा आत्मा ही, वासुदेव
का शरीर स्थानीय होने से वासुदेवात्मक है, जगत् में वासुदेव से भिन्न
कुछ भी नही है, यही तथ्य "ज्ञानंविशुद्ध" वाक्य में निहित है।
चिदंश सदा एक रूप होने से, सदा "अस्ति" शब्द वाच्य है।
अचिदंश, क्षणभंगुर होने से नाशवान होने से "नास्ति" शब्दाभिधेय है।
ऐसा जडचेतनमय यह साराजगत वासुदेव का शरीर स्थानीय तदात्मक
है; यही जगत का यथार्थ तत्त्व है। "सद्भाव एवम्" वाक्य में यही बात
बतलाई गई है। यहाँ "सत्यम् असत्यम्" इत्यादि पद, पूर्वोक्त "यदस्ति
यत्रास्ति" पदों के उपसंहार ही है।
चैतन्य ज्ञानाकार अशब्द, अगोचर स्वरूप से मिलकर, यह जडमय
जगत, भुवनाश्रित देव-मनुष्यादि रूपों से व्यवहार्य भेदों वाला होता है,
इस मिश्रण का हेतु भी कर्म ही है-यही बात "एतत्तूयत्" वाक्य में बतलाई
गई है। इसी का विवेचन "यज्ञःपशुः" इत्यादि में किया गया है। जगत
के यथार्थ तत्त्व को जानकर, मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए
"यच्चैतत्" वाक्य इसी को बतलाता है।
अत्र निर्विशेषेपरब्रह्मणि तदाश्रये सदसदनिर्वचनीयं चाज्ञाने,
जगतस्तत्कल्पितत्वे वाऽनुगुणं किंचिदपि पदं न दूष्यते अस्ति नास्ति
शब्दाभिधेयं चिदचिदात्मकं कृत्स्नंजगत् परमस्यपरेशस्यपरस्यै-
ब्रह्मणोः विष्णोः कायत्वेन तदात्मकम् । ज्ञानैकाकारस्यात्मनो-
देवादिविविधाकारानुभवेऽचित्परिणामे च हेतुर्वस्तुयाथात्म्यज्ञान-
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विरोधी क्षेत्रज्ञानां कर्मैवेति प्रतिपादनात् अस्तिनास्तिसत्यासत्यं
शब्दानां च सदसदनिर्वचनीयवस्त्वभिधानासामर्थ्याच्च नास्त्यसत्य
शब्दावस्तिसत्यशब्द विरोधिनौ। अतश्च ताभ्यां असत्वं हि
प्रतीयते, नानिर्वचनीयत्वम् ।
उक्त प्रसंग में एक भी ऐसा पद नहीं है, जिससे परब्रह्म का
निर्विशेष रूप, उसमें सदसदनिर्वचनीय अज्ञान की सत्ता जगत की
मिथ्यात्व आदि की कल्पना की गई हो, अपितु इसमें तो स्पष्ट कहा गया
कि-अस्ति-नास्ति शब्दों से प्रतिपादित जडचेतन सारा जगत, परात्पर
परमेश्वर ब्रह्म विष्णु का शरीर एवं स्वरूप है। ज्ञान स्वरूप आत्मा की
देव मनुष्य आदि आकारों की प्रतीति और अचित् परिणाम भी, वस्तु के
यथार्थ ज्ञान के विरोधी, जीव के शुभाशुभ कर्म ही हैं। अस्ति-नास्ति,
सत्य-असत्य आदि शब्दों में भी सद्-असद् अनिर्वचनीय वस्तु के बोधन
का सामर्थ्य नहीं है। नास्ति और असत्य शब्द केवल, अस्ति और सत्य
शब्दों का विरुद्धार्थ मात्र प्रकाशन करते हैं। इन दो शब्दों से असत्ता
मात्र प्रतीत होती है, अनिर्वचनीयता नहीं ।
अत्र चाचिद्वस्तुनि नास्त्यसत्यशब्दौ न तुच्छत्वमिथ्यात्वपरौ
प्रयुक्तौ, अपितु विनाशित्वपरौ। “वस्त्वस्ति किम्” महीघटत्वम्
“इत्यत्रापि विनाशित्वमेव हि उपपादितम्, न निष्प्रमाणकत्वम्,
ज्ञानवाध्यत्वंवा। एकेनाकारेणैकस्मिन् कालेऽनुभूतस्य कालान्तरे-
परिणामविशेषेणान्यथोपलब्ध्वा नास्ति त्वोपपादनात् । तुच्छत्वं
हि प्रमाणसंबंधानर्हत्वम् । बाधोऽपि यद्देशकालादिसंबंधितया
नास्तीत्युपलब्धिः, न तु कालान्तरे, श्रनुभूतस्य कालान्तरे परि-
णामादिना नास्तित्युपलब्धिः कालभेदेन विरोधाभावात् । अतो न
मिथ्यात्वम् ।
इस प्रसंग में, अचिद् वस्तु के लिए प्रयुक्त नास्ति और असत्य शब्द
तुच्छता और मिथ्यात्व के द्योतक नहीं है अपितु विनाशिता के वाचक हैं।
“वस्त्वस्ति किम्’-मही घटत्वम् वाक्य भी, जड पदार्थ की ध्वंशशीलता
के ही प्रतिपादक हैं। निष्प्रमाणकता या ज्ञान वाध्यता के नहीं।
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एक समय मे जो वस्तु जिस प्रकार की दीखती है वही वस्तु
विकारशील होने से कालान्तर में दूसरे प्रकार की दीखती है, इसी
अन्यथा भाव को, उक्त प्रसंग मे नास्ति शब्द से कहा गया है। किसी भी
प्रमाण से सिद्ध न होनी वाली वस्तुस्थिति को तुच्छता, तथा जो वस्तु
जिस स्थान और काल में अस्ति बोधक हो वही वस्तु उसी स्थान में
नास्ति बोधक हो जाय, उसे वाध्य कहते है। परिणामादि द्वारा जो
कालान्तर में नास्ति बोधक होती है उसे बाध नहीं कहते, क्यों कि-विभिन्न
काल में एक ही वस्तु के अस्तित्व और नास्तित्व में किसी प्रकार का
विरोध नही होता। इसलिए उक्त वाक्य से भी अचिद् वस्तु का मिथ्यात्व
सिद्ध नही होता ।
एतदुक्तं भवति--ज्ञानस्वरूपमात्मवस्तु आदिमध्यपर्यन्तहीनं
सष्टतैकस्वरूपमिति स्वत एव सदास्तिशब्दवाच्यम् । अचेतनं तु
क्षेत्रज्ञ भोग्यभूतं तत्कर्मानुगुणपरिणामि विनाशीति सर्वंदा नास्त्यर्थ-
गर्भमिति नास्त्यसत्यशब्दाभिधेयम्, इति । यथोक्तः——“यत्तु
कालान्तरेणापिनान्यसंज्ञामुपैति वै, परिणामादिसंभूतां तद्वस्तु नृप
तच्च किम्। अनाशीपरमार्थश्च प्राज्ञैरभ्युपगम्यते, त्ततुनास्ति न
संदेहोनाशिद्रव्योपपादितम् ।”
कथन यह है कि-ज्ञानस्वरूप आत्मा, आदि मध्य अन्त रहित, सदा
एक रूप में रहने वाला होने से “अस्ति” शब्द वाच्य है। जड पदार्थ,
क्षेत्रज्ञ जीव के कर्मानुसार उसी के भोग के लिए, नामरूप से परिणत,
विनाशोन्मुख होने से नकारात्मक ही हैं, इसीलिए उन्हें नास्ति और
असत्य शब्दों से उल्लेख किया जाता है। जैसा कि कहा भी है-“जो
कालान्तर में भी, परिणाम आदि जन्य नामान्तर को प्राप्त नहीं होते वे
ही वास्तविक सत्य हैं, पर जगत में कोई ऐसी वस्तु-है क्या ? महात्मा लोग
अविनाशी वस्तु को ही परमार्थ मानते हैं, जड़ पदार्थ में ऐसा कोई वस्तु
नहीं है जिसे अविनाशी कहा जा सके, इसलिए ऐसी कोई भी वस्तु
परमार्थ नामक, इस जगत में नहीं है यह निःसंशय बात है ।”
देशकालकर्मविशेषापेक्षया अस्तित्वनास्तित्वयोगिनिवस्तुनि
केवलास्ति बुद्धि बोध्यत्वमपरमार्थ इत्युक्तम् । आत्मन एव केवला-
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स्ति बुद्धि बोध्यत्वमिति स परमार्थ इत्युक्तम्। श्रोतुश्च मैत्रेयस्य—
“विष्ण्वाधारं यथा चैतत् त्रैलोक्यं समवस्थितं परमार्थश्च मे प्रोक्तो
यथाज्ञानं प्रधानतः ।” इत्यनुभाषणाच्च, “ज्योतिषि विष्णु” इत्यादि
सामानाधिकरण्यस्याऽत्मशरीरभाव एव निबंधनम् । चिदचिद्
वस्तुनोश्चास्तिनास्ति शब्दप्रयोग निबन्धनम् ज्ञानस्यकर्म निमित्त
स्वाभाविक रूपत्वेन न प्राधान्यम्, अचिद्वस्तुनश्च तत्कर्मनिमित्त
परिणामित्वेनाप्राधान्यमिति प्रतीयते ।
देश काल या क्रिया विशेष में जिसके अस्तित्व और नास्तित्व का
का व्यवहार होता है, वह केवल “अस्ति” बुद्धि के साथ-साथ परमार्थ
भी है। श्रोता मैत्रेय ने उपदेश श्रवण के बाद कहा कि-यह सारी त्रिलोकी
भगवान विष्णु में स्थित है हमारी बुद्धि के अनुसार जगत् की यही परमा-
र्थता आपने कही। “इस वाक्य से ज्ञात होता है कि—ज्योति और विष्णु
का जो अभेद दिखलाया गया है उसमें शरीर शरीरी संबंध ही निहित
है। चित् और जड वस्तु में जो अस्ति नास्ति शब्द का प्रयोग होता है,
उसमें अकर्मनिमित्तक ज्ञान के वास्तविक रूप का चिन्तन ही कारण है।
अचित् वस्तु, ज्ञान साध्यकर्म का ही परिणाम है, इसलिए ज्ञान की
अपेक्षा उसकी अप्रधानता प्रतीत होती है।
यदुक्तं — निर्विशेषब्रह्मविज्ञानादेवाविद्यानिवृत्ति वदंति
श्रुतयः इति । तदसत्—“वेदाहमेतं पुरुषं महान्तं, आदित्यवर्णं-
तमसः परस्तात्—तमेवविद्वानमृत इह भवति—नान्यःपंथा
विद्यतेऽयनाय”, सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युत: पुरुषादधि, “न तस्येशे
कश्चन् तस्यनाम महद्यश.”, य एनं विदुरमृतास्तेभवंति “इत्या-
द्यनेक वाक्यविरोधात् । ब्रह्मणः सविशेषत्वादेव सर्वाण्यपि वाक्यानि
सविशेषज्ञानादेव मोक्षं वदंति । शोधक वाक्यान्यपि सविशेषमेव
ब्रह्मप्रतिपादयंतीत्युक्तम् ।
जो यह कहा कि—“निर्विशेष ब्रह्म ज्ञान से ही अविद्या की निवृत्ति
का श्रुतियों में उपदेश है”, सो असंगत बात है—“आदित्यवर्ण सूर्य की
( १६० )
तरह स्वप्रकाश, अज्ञानान्धकार से अतीत उस महान् पुरुष को जानकर
यहीं अमरता मिलती है, उसके पास पहुँचने का कोई दूसरा मार्ग नहीं
है"—"विद्युत के समान प्रकाशमान उस पुरुष से समस्त निमेष उत्पन्न
हुए हैं” उसका शासक कोई नहीं है, उसका नाम ही महान यश है—
“जो इसे जानता है, वह मुक्त हो जाता है।” इत्यादि अनेक श्रुतियों में
निर्विशेष के विपरीत वर्णन मिलता है। परब्रह्म को सविशेष मानकर ही
समस्त वाक्य सविशेष ब्रह्म ज्ञान से मोक्ष बतलाते हैं। जीव के अज्ञान
को दूर करने वाले शोधक ( सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म आदि ) वाक्य भी
सविशेष ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं, ऐसा पहिले भी कह चुके हैं।
तत्त्वमस्यादि वाक्येषु सामानाधिकरण्यं न निर्विशेषवस्त्वैक्य-
परम्, तत्त्वंपदयोः सविशेषब्रह्माभिधायित्वात्। तत्पदंहि सर्वज्ञं
सत्य संकल्पं जगत् कारणं ब्रह्म परामृशति—"तदैक्षत् बहुस्याम्"
इत्यांदिषु तस्यैव प्रकृतत्वात्। तत् सामानाधिकरएं त्वं पदं च
अचिद्विशिष्टजीवशरीरकंब्रह्म प्रतिपाद्यति, प्रकारद्वयाव-
स्थितैकवस्तुपरत्वात् सामानाधिकरण्यस्य । प्रकारद्वय परित्यागे
प्रवृत्ति निवृत्त भेदासंभवेन सामानाधिकरण्यमेव परित्यक्तं स्यात्,
द्वयोः पदयोः लक्षणा च । “
( १६१ )
बहुस्यां इत्यादि उसी की प्रकृति के वाचक हैं । “तत्” का सामानाधिकरण्य
“त्वं” पद भी अचित् विशिष्ट जीव शरीरी ब्रह्म का प्रतिपादक है ।
विभिन्न प्रकार के दो पदार्थों की एकार्थ बोधकता को ही सामानाधिकरण्य
कहते हैं । तत् और त्वं पद में यदि प्रकार गत भेद नहीं मानेंगे तो, प्रवृत्ति
निमित्तकता न होगी और भी सामानाधिकरण्य भी छोड़ना होगा, तथा
दोनों पदों में लक्षणा (गौणार्थ) करनी पड़ेगी । “यह वही देवदत्त है” इस
सुस्पष्ट वाक्य में भी लक्षणा नहीं की जाती, क्यों कि भूत और वर्त्तमान
काल में प्रतीतित एक ही व्यक्ति तो है, वह भिन्न स्थान में स्थित देखा
गया, पर एक ही समय में तो नहीं देखा गया, जिससे संशय हो सके ।
विभिन्न काल में दृष्ट होने से, संशय हो ही नहीं सकता । “तत्” पद का
यदि निर्विशेष अर्थ करेंगे तो “तदैक्षत बहुस्यां” इस उपक्रम श्रुति से
विरुद्धता होगी । एक विज्ञान से सर्व विज्ञान वाली प्रतिज्ञा भी संगत न
होगी । समस्त दोष रहित, कल्याण गुण संपन्न, सर्वज्ञ ज्ञान स्वरूप ब्रह्म
में अज्ञान और अज्ञान जन्य दोष भी संलग्न होंगे । यदि कहो कि-तत्
त्वं पदों का सामानाधिकरण्य, एकत्व बोधक नहीं, बाधार्थक है; तो तत्
त्वं पद के सर्वाधिष्ठान भूत परब्रह्म और जीव के, जीव भाव की निवृत्ति
के लिए लक्षणा करनी पड़ेगी, तथा सामानाधिकरण्य के कथित नियम
का भी उल्लंघन होगा, साथ ही प्रकरण विरोध आदि दोष होंगे ।
इयांस्तु विशेष:—नेदं रजतमितिवदप्रतिपन्नस्यैव वाधस्यागत्या
परिकल्पनम्, तत्पदेनाधिष्ठानातिरेकिधर्मानुपस्थापनेन वाधानु-
पत्तिश्च । अधिष्ठानंतु प्राक्तिरोहितस्वरूपं तत्पदेनोपस्थाप्यत इति
चेन्न, प्रागाधिष्ठानाप्रकाशे तदाश्रय भ्रमबाधयोरसंभवात् ।
भ्रमाश्रयमधिष्ठानमतिरोहितमिति चेत्, तदेवाधिष्ठान स्वरूपं
भ्रमविरोधीति तत्प्रकाशे सुतरां न तदाश्रय भ्रमबाधौ । अतोऽधि-
ष्ठानातिरेकि परमार्थिकधर्मतत्तिरोधानानभ्युपगमे भ्रांतिबाधौ
दुरुपपादौ । अधिष्ठाने हि पुरुषमात्राकारे प्रतीयमाने तदति-
रेकिणि पारमार्थिके राजत्वे तिरोहिते सत्येव व्याधात्वभ्रमः । राज-
त्वोपदेशेन च तन्निवृत्तिर्भवति, नाधिष्ठानमात्रोपदेशेन, तस्य
प्रकाशमानत्वेनानुपदेश्यत्वात् भ्रमानुपमर्दित्वाच्च ।
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एक विशेषता यह होगी कि-“यह रजत नही है” इस बाध्य
प्रतीति की तरह तत् त्वं पदों मे किसी प्रकार की बाधा न होते हुए भी
(अपने मत के प्रतिपादन के लिए) जबरन बाधा की परिकल्पना करनी
पड़ेगी । तत् पद से जिस चैतन्याधिष्ठान की प्रतीति होती है, उसमें
उससे भिन्न धर्म की उपस्थापना करने से बाधा उत्पन्न भी नही होती ।
यदि कहो कि-चैतन्याधिष्ठान के प्रथम अज्ञान तिरोहित रहता
है, बाद मे तत् पद से वह प्रकट हो जाता है; सो ऐसा नही है, बाधा
के पूर्व यदि अधिष्ठान प्रकाशित न रहेगा तो, आधार रहित भ्रम और
बाधा दोनों हो नही सकते । यदि कहो कि भ्रमाश्रय अधिष्ठान अतिरोहित
रहता है (केवल बाधा का आश्रय ही आवृत रहता है) सो भी असंभव
है, जब अधिष्ठान का स्वरूप ही भ्रम का विरोधी है तो वह अधिष्ठान
के प्रकाशित स्वरूप के समक्ष टिक भी कैसे सकता है । इससे सिद्ध होता
है, कि भ्रम और बाधा अधिष्ठान आश्रित नही हो सकते । उक्त वाक्य
में अधिष्ठान के अतिरिक्त किसी पारमार्थिक धर्म और उस धर्म के
तिरोधान को माने बिना भ्रम और बाधा का उपपादन करना सहज नही
है । पुरुष आकार वाले अधिष्ठान से भिन्न वास्तविक राजत्व के छिपे
रहने पर ही बाध्यत्व भ्रम होता है। राजत्व के उपदेश से ही उस
भ्रम की निवृत्ति होती है। केवल अधिष्ठान मात्र के उपदेश से नही
होती क्योंकि-अधिष्ठान तो प्रकाशित रहता ही है, उसके उपदेश
की अपेक्षा ही क्या' है उससे भ्रम की निवृत्ति हो भी नही सकती ।
जीवशरीर जगत्कारण ब्रह्मपरत्वे मुख्यवृत्तं पदद्वयं, प्रकार
द्वयविशिष्टैकवस्तुप्रतिपादनेन सामानाधिकरण्य च सिद्धम् । निरस्त
निखिलदोषस्यसमस्तकल्याणगुणात्मकस्य ब्रह्मणो जीवान्तर्यामित्व-
मप्यैश्वर्यमपरं प्रतिपादितं भवति । उपक्रमानुकूलता च । एक-
विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञोपपत्तिश्च, सूक्ष्मचिद्वस्तुशरीरस्यैव
ब्रह्मणः स्थूलचिदचिद्वस्तुशरीरत्वेन कार्यत्वात् “तमीश्वराणां
परममहेश्वरम्” पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयतो” अपहत पाप्मा...
सत्यकामसत्यसंकल्पः” इत्यादि श्रुत्यंतरा विरोधश्च ।
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( १६३ )
जीव शरीरी, जगत के कारण परब्रह्म के मुख्यार्थ बोधक “तत्”
और “त्वं” दो पद हैं, एक ही विशिष्ट वस्तु दो प्रकारों से कही गई है,
यही इसका सिद्ध सामानाधिकरण्य है। समस्त दोष रहित कल्याणगुणा-
कर परब्रह्म की जीवान्तर्यामिता भी एक ऐश्वर्य है, उसका भी प्रतिपादन
किया गया है ऐसा मानने से ही उक्त प्रसंग का उपक्रम अनुकूल हो
सकता है तथा एक विज्ञान से सर्व विज्ञान की प्रतिज्ञा भी संगत हो सकती
है। सूक्ष्म जड़ चेतन वस्तु जैसे ब्रह्म का शरीर है स्थूल, जड़, चेतन भी
उसी प्रकार ब्रह्म का शरीर है, क्योंकि स्थूल, सूक्ष्म वस्तु का ही कार्य
रूप है। “ईश्वर सर्वश्रेष्ठ महेश्वर हैं” “परब्रह्म की अनेक शक्तियां
प्रसिद्ध हैं, वह निष्पाप, सत्यकाम, सत्यसंकल्प है” इत्यादि श्रुतियाँ भी
उक्त मान्यता से अविरुद्ध हैं।
‘तत्त्वमसि” इत्यत्रोद्देश्योपादेयविभागः कथमितिचेत् नात्र-
किंचिदुद्दिश्य किमपि विधीयते, ”ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्” इत्यनेनैव
प्राप्तत्वात्। अप्राप्ते हि शास्त्रमर्थवत्। इदं सर्वमिति सजीवं
जगन्निर्दिश्य ऐतदात्म्यमिति तस्यैषआत्मेति तत्र प्रतिपादित तत्र च
हेतुरुक्तः- “सन्मूलास्सौम्येमास्सर्वाः प्रजास्सदायतनास्सत्प्रतिष्ठाः”
इति, “सर्वं खल्विदंब्रह्म तज्जलानितिशान्तः” इतिवत् ।
यदि कहो कि-ऐसा मानने से “तत्त्वमसि” में उद्देश्य, विधेय का
विभाग कैसे होगा? सो यहाँ किसी के उद्देश्य से किसी की विधि नहीं
की गई है, “यह सब कुछ आत्म्य है” इस वाक्य से उक्त बात की पुष्टि
होती है। अप्राप्त विषय का प्रतिपादन करना ही शास्त्र का प्रयोजन
होता है। “इदं शरीरम्” से सजीव जगत का निर्देश करके ‘ऐतदात्म्यं’
से ब्रह्म को उसका आत्मा बतलाया गया है। “यह सब कुछ ब्रह्म स्वरूप
है, सब कुछ उसी से उत्पन्न, स्थित और विलीन है, उसी की शांतभाव
से उपासना करो” इस वाक्य में जैसे-साधक के शांतभाव अवलंबन के
लिए, ब्रह्म का सर्वमय भाव हेतु रूप से बतलाया गया है, वैसे ही वहीं-
“हे सौम्य ! सद् ब्रह्म ही समस्त जायमान पदार्थों का मूल आश्रय और
विलय स्थान है” इस वाक्य से हेतु द्वारा पूर्व विहित ब्रह्मात्मभाव का
समर्थन किया गया है।
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तथा श्रुत्यन्तराणि च ब्रह्मणस्तद्व्यतिरिक्तस्य चिदचिद्वस्तु-
नश्च शरीरात्मभावमेवतादात्म्यं वदंति—“अन्तः प्रविष्टः शास्ता
जनानांसर्वात्मा-“यः पृथिव्यांनिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न
वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवी अन्तरो यमयति स त आत्मा
ऽन्तर्याम्यमृतः”—“य आत्मनि तिष्ठन् नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद
यस्य आत्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मा
अंतर्याम्यमृतः”—“यः पृथिवीमन्तरे संचरन्” इत्यारभ्य यस्यमृत्युः
शरीरम्, यं मृत्युनंवेद, एष सर्व भूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो
देव एको नारायणः” तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्, तदनुप्रविश्य
सच्चत्यच्चाभवत् इत्यादीनि ।
तथा अन्य श्रुतियां भी ब्रह्मातिरिक्त चित्जडात्मक वस्तु के
साथ ब्रह्म का शरीर शरीरी भाव रूप तादात्म्य बतलाती है—“सर्वात्मा
परमेश्वर अंतर्यामी रूप से जगत् का शासन करते हैं-“जो पृथिवी में
स्थित पृथिवी से भिन्न है, जिन्हें पृथिवी नहीं जानती, पृथिवी ही
जिनका शरीर है; जो अंतर्यामी रूप से पृथिवी का सयमन करते है, वही
अमृत अंतर्यामी तेरे आत्मा है। “जो आत्मा में स्थित आत्मा से
भिन्न हैं, आत्मा जिन्हें नहीं जानता, आत्मा जिनका शरीर है, जो
अंतर्यामी होकर आत्मा का संयमन करते है, वही अमृत अंतर्यामी
तेरे आत्मा हैं, जो कि पृथिवी में संचरण करते हैं”—यहाँ से प्रारम्भ
करके-“मृत्यु जिनका शरीर है, मृत्यु जिन्हें नहीं जानता, वह अंतर्यामी
निष्पाप दिव्य देव एक मात्र नारायण हैं”—“वह भूतों की सृष्टि करके
उनमें प्रविष्ट हो गए तथा कार्य कारण रूप से प्रकट हुए’, इत्यादि ।
अत्रापि “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकर-
वाणि”इति ब्रह्मात्मकजीवानुप्रवेशेनैव सर्वेषां वस्तुत्वं शब्दवाच्यत्वं च
प्रतिपादितम् । “तदनु प्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् ‘ इत्यनेनैका-
र्थ्याज्जीवस्यापि ब्रह्मात्मकत्वं ब्रह्मानुप्रवेशादेवेत्यवगम्यते । अतश्चिच-
दश्चिदात्मकस्य सर्वस्यवस्तुजातस्यब्रह्मतादात्म्यात्मशरीरभावादेवेत्व-