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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 696 में से

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पृष्ठ 248

( १८८ )
एक समय मे जो वस्तु जिस प्रकार की दीखती है वही वस्तु
विकारशील होने से कालान्तर में दूसरे प्रकार की दीखती है, इसी
अन्यथा भाव को, उक्त प्रसंग मे नास्ति शब्द से कहा गया है। किसी भी
प्रमाण से सिद्ध न होनी वाली वस्तुस्थिति को तुच्छता, तथा जो वस्तु
जिस स्थान और काल में अस्ति बोधक हो वही वस्तु उसी स्थान में
नास्ति बोधक हो जाय, उसे वाध्य कहते है। परिणामादि द्वारा जो
कालान्तर में नास्ति बोधक होती है उसे बाध नहीं कहते, क्यों कि-विभिन्न
काल में एक ही वस्तु के अस्तित्व और नास्तित्व में किसी प्रकार का
विरोध नही होता। इसलिए उक्त वाक्य से भी अचिद् वस्तु का मिथ्यात्व
सिद्ध नही होता ।
एतदुक्तं भवति--ज्ञानस्वरूपमात्मवस्तु आदिमध्यपर्यन्तहीनं
सष्टतैकस्वरूपमिति स्वत एव सदास्तिशब्दवाच्यम् । अचेतनं तु
क्षेत्रज्ञ भोग्यभूतं तत्कर्मानुगुणपरिणामि विनाशीति सर्वंदा नास्त्यर्थ-
गर्भमिति नास्त्यसत्यशब्दाभिधेयम्, इति । यथोक्तः——“यत्तु
कालान्तरेणापिनान्यसंज्ञामुपैति वै, परिणामादिसंभूतां तद्वस्तु नृप
तच्च किम्। अनाशीपरमार्थश्च प्राज्ञैरभ्युपगम्यते, त्ततुनास्ति न
संदेहोनाशिद्रव्योपपादितम् ।”
कथन यह है कि-ज्ञानस्वरूप आत्मा, आदि मध्य अन्त रहित, सदा
एक रूप में रहने वाला होने से “अस्ति” शब्द वाच्य है। जड पदार्थ,
क्षेत्रज्ञ जीव के कर्मानुसार उसी के भोग के लिए, नामरूप से परिणत,
विनाशोन्मुख होने से नकारात्मक ही हैं, इसीलिए उन्हें नास्ति और
असत्य शब्दों से उल्लेख किया जाता है। जैसा कि कहा भी है-“जो
कालान्तर में भी, परिणाम आदि जन्य नामान्तर को प्राप्त नहीं होते वे
ही वास्तविक सत्य हैं, पर जगत में कोई ऐसी वस्तु-है क्या ? महात्मा लोग
अविनाशी वस्तु को ही परमार्थ मानते हैं, जड़ पदार्थ में ऐसा कोई वस्तु
नहीं है जिसे अविनाशी कहा जा सके, इसलिए ऐसी कोई भी वस्तु
परमार्थ नामक, इस जगत में नहीं है यह निःसंशय बात है ।”
देशकालकर्मविशेषापेक्षया अस्तित्वनास्तित्वयोगिनिवस्तुनि
केवलास्ति बुद्धि बोध्यत्वमपरमार्थ इत्युक्तम् । आत्मन एव केवला-
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