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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 696 में से

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पृष्ठ 249

( १८६ )
स्ति बुद्धि बोध्यत्वमिति स परमार्थ इत्युक्तम्। श्रोतुश्च मैत्रेयस्य—
“विष्ण्वाधारं यथा चैतत् त्रैलोक्यं समवस्थितं परमार्थश्च मे प्रोक्तो
यथाज्ञानं प्रधानतः ।” इत्यनुभाषणाच्च, “ज्योतिषि विष्णु” इत्यादि
सामानाधिकरण्यस्याऽत्मशरीरभाव एव निबंधनम् । चिदचिद्
वस्तुनोश्चास्तिनास्ति शब्दप्रयोग निबन्धनम् ज्ञानस्यकर्म निमित्त
स्वाभाविक रूपत्वेन न प्राधान्यम्, अचिद्वस्तुनश्च तत्कर्मनिमित्त
परिणामित्वेनाप्राधान्यमिति प्रतीयते ।
देश काल या क्रिया विशेष में जिसके अस्तित्व और नास्तित्व का
का व्यवहार होता है, वह केवल “अस्ति” बुद्धि के साथ-साथ परमार्थ
भी है। श्रोता मैत्रेय ने उपदेश श्रवण के बाद कहा कि-यह सारी त्रिलोकी
भगवान विष्णु में स्थित है हमारी बुद्धि के अनुसार जगत् की यही परमा-
र्थता आपने कही। “इस वाक्य से ज्ञात होता है कि—ज्योति और विष्णु
का जो अभेद दिखलाया गया है उसमें शरीर शरीरी संबंध ही निहित
है। चित् और जड वस्तु में जो अस्ति नास्ति शब्द का प्रयोग होता है,
उसमें अकर्मनिमित्तक ज्ञान के वास्तविक रूप का चिन्तन ही कारण है।
अचित् वस्तु, ज्ञान साध्यकर्म का ही परिणाम है, इसलिए ज्ञान की
अपेक्षा उसकी अप्रधानता प्रतीत होती है।
यदुक्तं — निर्विशेषब्रह्मविज्ञानादेवाविद्यानिवृत्ति वदंति
श्रुतयः इति । तदसत्—“वेदाहमेतं पुरुषं महान्तं, आदित्यवर्णं-
तमसः परस्तात्—तमेवविद्वानमृत इह भवति—नान्यःपंथा
विद्यतेऽयनाय”, सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युत: पुरुषादधि, “न तस्येशे
कश्चन् तस्यनाम महद्यश.”, य एनं विदुरमृतास्तेभवंति “इत्या-
द्यनेक वाक्यविरोधात् । ब्रह्मणः सविशेषत्वादेव सर्वाण्यपि वाक्यानि
सविशेषज्ञानादेव मोक्षं वदंति । शोधक वाक्यान्यपि सविशेषमेव
ब्रह्मप्रतिपादयंतीत्युक्तम् ।
जो यह कहा कि—“निर्विशेष ब्रह्म ज्ञान से ही अविद्या की निवृत्ति
का श्रुतियों में उपदेश है”, सो असंगत बात है—“आदित्यवर्ण सूर्य की