श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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प्रकारान्तर से बतलाया गया है; वस्तुतः कोई भेद नही है। “इदं-
इत्थं” ही सर्व सम्मत प्रतीति का प्रकार है। इस तथ्य को सूत्रकार
“नैकस्मिन्न संभवात्” में सुस्पष्ट रूप से समर्थन करते है। प्रत्यक्ष
की सविशेषप्रमाणता निश्चित हो जाने से, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से
ज्ञात संबन्ध विशेष वाले अनुमान की भी सविशेष प्रमाणता निश्चित हो
जाती है, प्रमाणों की संख्या के विषय में शास्त्रकारों का मतभेद है,
पर जितने भी भेद हैं; सभी सविशेष वस्तु को ही प्रमाणित करते है;
किसी भी प्रमाण से निर्विशेष वस्तु की सिद्धि नही हो सकती। प्रत्येक
वस्तु का अपना एक विशेष स्वभाव होता है, यदि ऐसी विशेष स्वभाव
वालो वस्तु को निर्विशेष कहा जाता है तो वह वैसी ही अज्ञानता है, जैसे
कोई प्रतिज्ञा करे कि “मै बन्ध्या का पुत्र हूँ”। इस बेचारे को अपने
वाग् विरोध तक का ज्ञान नही होता ।
यत्तु प्रत्यक्षं सन्मात्रग्राहित्वेन न भेदविषयम्, भेदश्च
विकल्पासहत्वादुर्निरूपः इत्युक्तम्, तदपि जात्यादिविशिष्टस्यैव
वस्तुनः प्रत्यक्षविषयत्वाज्जात्यादेरेव प्रतियोग्यपेक्षया वस्तुनः
स्वस्य च भेदव्यवहारहेतुत्वाच्च दूरोत्सारितम् संवेदनवद्
रूपांदिवच्च परम्व्यवहारविशेषहेतोः स्वस्मिन्नपि तद् व्यवहार
हेतुत्वं युष्माभिरभ्युपेतं भेदस्यापि संभवत्येव; श्रत एव च मानव-
स्थान्योन्याश्रयणंच। एकक्षणवर्त्तित्वेऽपि प्रत्यक्षज्ञानस्य तस्मि-
न्ने वक्षणे वस्तुभेदरूप तत्संस्थानरुप गोत्वादेर्गृहीतत्वात् क्षणान्तर
ग्राह्यं न किंचिदिह तिष्ठति ।
जो यह कहा कि प्रत्यक्ष प्रमाण सद्वस्तु मात्र ग्राही होता है, इस-
लिए भेद विषयक नही है, तथा भेद विकल्प को न सहने से दूर्निरूप है।
सो इसमें भी, कथन यह है कि—जात्यादि विशिष्ट वस्तु की ही प्रत्यक्ष
विषयता होती है वे जाति आदि ही उस वस्तु की अन्य वस्तुओं से
भिन्नता ज्ञापन करते है। संवेदन और रूपरस आदि जैसे आश्रय के
परिचय विशेष का ज्ञापन करके अपना भी परिचय ज्ञापन करते हैं उसी
प्रकार अन्य पदार्थ भी अपरवस्तु के व्यवहार विशेष का ज्ञापन करके
तदनुरूप अपने व्यवहार का भी ज्ञापन करते हैं, इससे तो आपको यह
मानना ही पड़ेगा कि प्रत्यक्ष, भेद को भी प्रमाणित करता है। इस
प्रकार भेद ग्रहण में न तो अनवस्था दोष होता है और न अन्योन्याश्रय
दोष। प्रत्यक्ष ज्ञान एक क्षणवर्त्ती होते हुए भी, उसी क्षण में उस वस्तु
का भेद, आकृति, धर्म आदि सभी वस्तुओं का ग्राहक होता है, दूसरे क्षण
उसके लिए ग्रहण करने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता ।
अपि च—सन्मात्र इति ग्राहित्वे घटोऽस्ति पटोऽस्तीति विशिष्ट
विषयाप्रतीतिर्विरुध्यते । यदि च सन्मात्रातिरेकवस्तुसंस्थानरूप
जात्यादिलक्षणोभेदः प्रत्यक्षेण गृहीतः किमित्यश्वार्थी महिष
दर्शने निवर्त्तते , सर्वासुप्रतिपत्तिषु सन्मात्रमेव विषयश्चेत् तत्
तत्प्रतिपत्तिविषयसहचारिणः सर्वे शब्दाः एकैकप्रतिपत्तिषु किमिति
न स्मर्य्यन्ते ?
तथा प्रत्यक्ष को सन्मात्र ग्राही मानेंगे तो "घट है" "पट है" ऐसी
विशिष्ट विषयक प्रतीति के विरुद्ध होगा । यदि सन्मात्र के अतिरिक्त,
वस्तु संस्थान रूप जाति आदि लक्षण भेदों की प्रतीति, प्रत्यक्ष से संभव
न होती तो, घोड़ा को चाहने वाला कोई व्यक्ति घुड़साल में बंधे भैंसे को
देखकर लौट नहीं सकता । यदि कहो कि—सभी प्रतीतियाँ सन्मात्र विष-
यक हो होती है ; तो फिर भिन्न भिन्न प्रतीति विषयक शब्द, हर प्रति-
पत्ति में स्मृत क्यों नहीं होजाते ?
किं च अश्वे हस्तिनि च संवेदनयोरेक बिषयत्वेनोपरितन-
स्य गृहीत ग्राहित्वात् विशेषाभावाच्च स्मृति वैलक्षण्यं न स्यात् । प्रति
संवेदनं विशेषाभ्युपगमे प्रत्यक्षस्य विशिष्टार्थ बिषयत्वमेवभ्युपगतं
भवति सर्वेषां संवेदनामनेकविषयतायामेकेनैव संवेदनेनाशेषग्रहणा
दंधबधिराद्यभावश्च प्रसज्येत् ।
घोड़ा और हाथी की प्रतीतियं यदि एक प्रकार ही मानली जाएं तो
गृहीत, ग्राहिता तथा विशेषता के अभाव से किसी प्रकार की स्मृति विलक्ष-
णता न रह जाएगी [अर्थात् घोड़ा संबंधी प्रतीति के समान ही यदि हाथी
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की भी प्रतीति हो जाय तो घोड़ा के समान हाथी को भी चाबुक से
हाँकने की चेष्टा हो सकती है तथा घोड़े को अंकुश से । क्यों कि भिन्न
प्रकार की स्मृति तो रहेगी नही] यदि प्रत्येक संवेदन को एक विशेष संवे-
दन मानेंगे तो प्रत्यक्ष की विशिष्टार्थ विषयता माननी पड़ेगी । सभी
प्रतीतियों की एक विषयता मानने में एक ही प्रतीति से सभी विषयों की
प्रतीति हो जानी चाहिए जिसके फलस्वरूप अंधे, बहरे आदि भेदों का
अभाव हो जाना चाहिए [पर ऐसा होता नहीं, इसलिए उक्त सभी
संभावनाये शक्य नहीं हैं]
न च चक्षुषा सन्मात्रं गृह्यते, तस्यरूपरूपिरूपैकार्थ ग्राहित्वात्
नापि त्वचा, स्पर्शवद् वस्तुविषयत्वात् । श्रोत्रादीन्यपि न सन्मात्र
विषयाणि; किन्तु शब्दरसगंधलक्षणविशेषविषयान्येव । अतः
सन्मात्रस्य ग्राहकं न किंचिदिह दृश्यते ।
शुद्ध सद् वस्तु नेत्र से तो देखी नहीं जा सकती क्यों कि नेत्र रूप
और रूप युक्त वस्तु को ही देख पाते हैं । त्वचा से भी ग्राह्य नहीं है क्यों
कि त्वचा स्पर्शवान
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निर्विशेष सन्मात्र को प्रत्यक्ष से ही ग्राह्य प्रमाणित करने वाला,
शास्त्र अनुवादक मात्र ही है, क्योंकि—उक्त विषय की प्राप्ति की जान-
कारी तथा सन्मात्र ब्रह्म का प्रमेय भाव, उसमें बतलाया गया है। उक्त
शास्त्र को सही मान लेने से, उस सन्मात्र ब्रह्म में जड़ता क्षीणता आदि
दोष तुम्हीं बतलाने लगोगे । इससे सिद्ध होता है कि, वस्तु संस्थान रूप
जाति आदि लक्षण भेदों वाला विशिष्ट विषय ही प्रत्यक्ष द्वारा प्रमाणित
है । भिन्न आकृति वाली अनेक वस्तुओं में एकाकार बुद्धि विषयक ज्ञान
नहीं हुआ करता, तभी गोत्व आदि जातियों का व्यवहार उपपन्न होता
है । संस्थान से अतिरिक्त जातिवाद मानने से भी संस्थान की स्थिति पूर्व
वत् रहती है, इसलिए संस्थान ही एक जाति होती है। अपने असाधारण
विशिष्ट रूप को ही संस्थान कहते हैं। वस्तु के स्वरूपानुसार उसके
संस्थान को जानने की चेष्टा करनी चाहिए । जाति संबंधी ज्ञान से ही
भिन्नता के व्यवहार का परिज्ञान होता है। संस्थान के अतिरिक्त वस्तु को
जाति मानने पर भी; संस्थान के अतिरिक्त, जाति नामक किसी वस्तु की
प्रतीति न होने से तथा एक मात्र संस्थान में ही जाति की प्रतीति होने
से गोत्व आदि भेदों की प्रतीति होती है ।
ननुच जात्यादिरेव भेदश्चेत्, तस्मिन् गृहीते तद्व्यवहार-
वद् भेदव्यवहारः स्यात् । सत्यम् भेदश्च व्यवह्रियत एव गोत्वादि
व्यवहारात् । गोत्वादिरेव हि सकलेतरव्यावृत्तिः , गोत्वादौ गृहीते
सकलेतरसजातीयबुद्धिव्यवहारयोर्निवृत्तेः । भेदग्रहणेनैव हि अभेद
निवृत्तिः । "अयम् अस्मात् भिन्नः,, इति व्यवहारे प्रतियोगी निर्देशस्य
तदपेक्षत्वात् प्रतियोगी अपेक्षा भिन्न इति व्यवहार इत्युक्तम
(शंका) जाति आदि ही भेद हैं ऐसा मनाने से तो यह भी मानना
पड़ेगा कि जाति आदि व्यवहार की तरह, भेद का भी व्यवहार होता है।
(समाधान) ठीक है; गोत्व आदि के व्यवहार से ही भेद व्यवहृत
होता है। गोत्व आदि ज्ञान ही अन्य वस्तुओं से उसकी विभिन्नता बत-
लाता है ; गोत्वादि में जानकारी हो जाने पर अन्यान्य समस्त वस्तुओं
में, सजातीय बुद्धि और व्यवहार की निवृति हो जाती है। भेद ज्ञान
से ही अभेद भाव की निवृत्ति होती है। "यह वस्तु अमुक वस्तु से भिन्न
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है" ऐसे व्यवहार मे भेद प्रतीति के लिए ही वस्तु के प्रतियोगी "अमुक"
का निर्देश किया जाता है, तभी "अमुक प्रतियोगी से यह वस्तु भिन्न है"
ऐसा व्यवहार किया जाता है ।
यत्पुनर्घटादीनां विशेषाणा व्यावर्त्तमानत्वेनापारमार्थ्यमुक्तं तदा-
नालोचितबाध्यबाधकभावव्यवहृत्यनुवृत्तिविशेषस्य भ्रांति
परिकल्पितम् । द्वयोर्ज्ञानयोर्विरोधे हि बाध्यबाधक भाव. । बाधितः
स्यैव्यावृत्तिः । अत्र घट पटादिषु देश काल भेदेन विरोध एव नास्ति ।
यस्मिन् देशे यस्मिन् काले यस्यसद्भाव. प्रतिपन्न. तस्मिन् देशे तस्मिन
काले तस्याभाव. प्रतिपन्नश्चेत् तत्र विरोधात् बलवतो बाधकत्वं
बाधितस्य च निवृत्ति. । देशान्तर कालान्तर सबंधितयानुभूतस्यान्य-
देशकालयोरभावप्रतीतौ न विरोध इति कथमत्र बाध्यबाधक
भाव. ?अन्यत्र निवृत्तस्यान्यत्र निवृत्तिर्वा कथमुच
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है, तो बाध्य बाधक भाव कैसे घटित होगा ? एक स्थान के अभाव को,
दूसरे स्थान का कैसे कह सकते हैं ? रज्जुसर्प आदि दृष्टान्त में तो,
एक ही स्थान और एक ही समय में, सर्प रज्जु का व्यावर्तक है, इसीलिए
रज्जु के अभाव की प्रतीति होती है, तभी विरोध, बाधक भाव होते हैं,
और व्यावृत्ति होती है । स्थान और समय की भिन्नता में व्यावृत्ति,
मिथ्यात्व और व्याप्ति का कहीं भी उदाहरण नहीं मिलता । इसलिए
केवल व्यावृत्ति ही अपारमार्थिकता की हेतु नहीं है ।
यत्तु अनुवर्त्तमानत्वात् सत्परमार्थ इति, तत् सिद्धमेवेति न
साधनमर्हति अतो न सन्मात्रमेव वस्तु अनुभूति सद्विषयोश्च
विषयविषयिभावेन भेदस्यप्रत्यक्षसिद्धत्वात् अबाधितत्वाच्च
अनुभूतिरेवसतीत्येतदपि निरस्तम् ।
और जो, अनुवर्त्तमान होने से सत् की परमार्थता है वह तो सिद्ध ही
है, उसको प्रमाणित करने की कोई आवश्यता नहीं है, इसलिए सत् ही
एक मात्र वस्तु है, ऐसा नहीं कह सकते । अनुभूति और सत् में विषय
और विषयी का भाव होने से उन दोनों का भेद प्रत्यक्ष सिद्ध है, जो
किसी भी प्रकार बाधित नहीं हो सकता । इसलिए, अनुभूति ही सत् है,
यह बात भी कट जाती है ।
यस्त्वनुभूतेः स्वयम्प्रकाशत्वमुक्तं, तद्विषयप्रकाशनवेलायां-
ज्ञातुरात्मनस्तथैव, न तु सर्वेषां सर्वदा तथैवेति नियमोऽस्ति परानु-
भवस्य, हानोपानादिलिंगकानुमानज्ञानविषयत्वात् स्वानुभवस्या-
प्यतीतस्य अज्ञासिषमितिज्ञानविषयत्वदर्शनाच्च, अतोऽनुभूतिश्चेत्
स्वतःसिद्धेति वक्तुं न शक्यते ।
और जो, अनुभूति की स्वयं प्रकाशता बतलाई सो, विषय प्रकाशन
के समय ज्ञाता की स्वतः जैसी स्थिति होती है; सभी की सदा वैसी ही
स्थिति हो ऐसा कोई नियम नहीं है । क्यों कि, परकीय अनभव तो
प्रवृत्ति निवृत्ति लिंगक होने से केवल अनुमान प्रमाण का विषय होता
है तथा स्वानुभव भी (अनुभव के) द्वितीय क्षण में “मैंने जान लिया”
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ऐसे ज्ञान का विषय होता है। इसलिए अनुभूति स्वतः सिद्ध वस्तु है,
ऐसा नहीं कह सकते।
अनुभूतेरनुभाव्यत्वेऽननुभूतित्वमित्यपि दुरुक्तम्, स्वगताती-
तानुभावानां परगतानुभावानांच अनुभाव्यत्वेन अननुभूतित्वप्रसं-
गात् । परानुभवानुमानानभ्युपगमे च शब्दार्थसंबंधग्रहणाभावेन
समस्तशब्दव्यवरोच्छेद प्रसंगः। आचार्यस्य ज्ञानवत्वं अनुमाय तदु-
पसत्तिश्च क्रियते, सा च नोपपद्यते । न च अन्यविषयत्वेऽननुभूति-
त्वम्, अनुभूतित्वं नाम वर्तमानदशायां स्वसत्तयैव स्वाश्रयं प्रति
प्रकाशमानत्वं, स्वसत्तयैव, स्वविषय साधनत्वं वा । ते च अनुभवा-
न्तरानुभाव्यत्वेऽपि स्वानुभवसिद्धेनापगच्छत इति नानुभूतित्वमपग-
च्छति घटादेस्त्वननुभूतित्वमेतत्स्वभाव विरहात् नानुभाव्यत्वात् ।
तथा अनुभूतेरननुभाव्यत्वेऽपि अननुभूतित्वप्रसंगो दुर्वारः गगनकुसु-
मादेरननुभाव्यस्याननुभूतित्वात् ।
अनुभूति, अनुभाव्य है; इसलिए अनुभूति कोई वस्तु नही है, ऐसा
कहना भी कठिन है। अपने अतीत तथा दूसरों के अनुभवों के अनुभाव्य
होने से अननुभूति की बात उठती है (अर्थात जो अपने अतीत अनुभव
हैं, तथा दूसरों के अनुभवों को हम अननुभूति कहते हैं) परंतु अपने बीते
हुए अनुभवों के अनुमान तथा दूसरों के अनुभवों को अस्वीकार करने से
(जो कि शाब्दिक ही होते हैं) शब्दार्थ संबंध के ग्रहण का अभाव हो जायेगा
जिसके फलस्वरूप, स्वानुभव और परानुभव पर आधारित जितना भी
वाङ्मय है उसकी महत्ता ही समाप्त हो जायेगी तथा आचार्य के वैदुष्य
का, अनुमान कर जो छात्र समुदाय, आचार्य के निकट विद्याभ्यास के
लिए जाया करता है, वह भी समाप्त हो जायगा।
अन्य विषयता होने से भी अननुभूति की बात नही उठाई जा सकती
क्योंकि-वर्तमान दशा में अपनी सत्ता से ही जो अपनी आध्रय वस्तु को
प्रकाशित करे अथवा अपनी सत्ता से अपने विषय को सिद्ध करे उमे अनु-
भूति कहते है। अन्यान्य अनेक अनुभूतियो के होते हुए भी, जो अनुभूति
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पहले हो चुकी हैं, उन स्वानुभूतियों का अभाव कभी नहीं होता । घट
आदि पदार्थ स्वयं अनुभूति नहीं कर पाते, वे सब जीव रहित जड़ हैं,
पर वे अनुभाव्य तो हैं ही। अनुभूति स्वयं अनुभाव्य नहीं हैं, फिर भी
उसकी अनुभूति नहीं होती, ये नहीं कहा जा सकता। आकाश पुष्प
आदि असंभव वस्तुएँ तो अनुभाव्य ही नही है, इसलिये उनका अनुभव
नहीं होता।
गगनकुसुमादेरननुभूतित्वमसत्त्वप्रयुक्तम् नानुभाव्यत्वप्रयुक्त-
मिति चेत्, एवं तर्हि घटादेरप्यज्ञानाविरोधित्वमेवाननुभूतित्वनिबन्ध-
नम् नानुभाव्यत्वमित्यास्थीयताम् । अनुभूतेरनुभाव्यत्वे अज्ञाना-
विरोधित्वमपि तस्याः घटादेरिव प्रसज्यते इति चेत्, अननुभाव्य-
त्वेपि गगनकुसुमादेरिवाज्ञानाविरोधित्वमपि प्रसज्यते एव अतोऽनु-
भाव्यत्वेऽननुभूतित्वमिति उपहास्यम् ।
गगन कुसुम आदि में जो अनुभूति राहित्य है, वो तो, असत् प्रयुक्त
है, अनुभाव्य प्रयुक्त नहीं है, यदि ऐसा मानते हो तो घट आदि की जो
अननुभूतिता है, वह अज्ञान के कारण है, अनुभाव्यता से नहीं है, ऐसा
भी मानना पड़ेगा। यदि कहो कि— अनुभूति की अनुभाव्यता स्वीकारने
से, घट आदि को तरह उसमें भी अज्ञान की बात लागू हो सकती है [ तो
मैं कहता हूँ कि अनुभूति कोई „गगनकुसुम की तरह असंभव वस्तु नही
है जो उसकी अनुभाव्यता न मानी जाय ] यह कथन नितान्त हास्यास्पद
है कि अनुभूति अनुभाव्य है, इसलिए अनुभूति नाम की कोई वस्तु
नहीं है।
यत्तु संविदः स्वतस्सिद्धायाः प्रागभावाद्यभावात् उत्पत्तिर्निरस्यते ।
तदन्धस्य जात्यन्धेन यष्टिः प्रदीयते । प्रागभावस्य ग्राहकाभावाद-
भावो न शक्यते वक्तुम्, अनुभूत्यैव ग्रहणात् कथमनुभूतिस्सती
तदानीमेव स्वाभावं विरुद्धमवगमयतीति चेत्; न हि अनुभूतिः स्व
समकालवर्त्तिनमेव विषयीकरोतीत्यस्ति नियमः अतीतानागतयोर-
विषयत्वप्रसंगात् ।
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और जो, प्रागभाव आदि के न होने से, स्वयं सिद्धा अनुभूति, की
उत्पत्ति का खंडन किया, वह भी ऐसी ही बात है जैसे कोई जन्मान्ध,
दूसरे अन्धे को लाठी का सहारा दे । प्रागभाव इसलिए अभाव है, कि
उसमें ग्राहकता का अभाव है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि अनुभूति का
ग्रहण उसमें होता है (अर्थात् अनुभूति अतीत भी होती है) अनुभूति स्वयं
स्थित रहकर उसी समय अपने अभाव को कैसे बतला सकती है, यह
विरुद्ध भाव है ? ऐसी शंका भी नहीं कर सकते क्योंकि—अनुभूति सम-
कालीन विषयक ही हो ऐसा कोई नियम नहीं है। यदि ऐसा मान लेगें
तो अतीत और अनागत विषयक अनुभूति की बात तो एक दम ही
समाप्त हो जायगी ।
अथमन्यसे—अनुभूति प्रागभावादेः सिद्ध् यतः तत् समकाल-
भावनियमोऽस्तीति; किं त्वयाक्वचिदेवं दृष्टं ? यन्नियमं ब्रवीषि । हन्त
तर्हि तत् एव दर्शनात् प्रागभावादिः सिद्ध इति, न तदपह्नवः । तत्
प्रागभावं च तत् समकालवर्त्तिनं, अनुन्मत्तः कोब्रवीति ?
यदि अपने बचाव के लिए यह मानों कि—उपलब्धि के बिना
किसी वस्तु की प्रतीति नहीं होती, इसलिए अनुभूति प्रागभाव आदि सभी
में रहती है ऐसा नियम है; तो क्या तुमने कहीं ऐसा देखा है ? जो नियम
बतला रहे हो। यदि देखा है, तो बड़ी प्रसन्नता की बात है, तुम्हारे उस
दर्शन से ही अनुभूति के प्रागभाव आदि सिद्ध हो जाते हैं, जिन्हें तुम
छिपा नहीं सकते । अभाव और उसके साथ उस अनुभूति का भाव, दोनों
एक साथ रहते हैं, ऐसा पागल के अतिरिक्त दूसरा और कौन कह
सकता है ?
इन्द्रिय जन्मनः प्रत्यक्षस्य हि एष स्वभाव नियमः, यत् स्वसम-
कालवर्त्तिनः पदार्थस्य ग्राहकत्वम्, न सर्वेषांज्ञानानां प्रमाणानाञ्च,
स्मरणानुमानागमयोगिप्रत्यक्षादिषु कालान्तरवर्त्तिनोऽपि ग्रहणदर्श-
नात् । अतएव च प्रमाणस्य प्रमेयाविनाभावः, नहि प्रमाणस्य
स्वसमकालवर्त्तिनाऽविनाभावोऽर्थ संबंधः, अपितु यत् देशकालादि
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संबन्धितया योऽर्थोऽवभासते, तस्य तथाविधाकारमिथ्यात्वप्रत्यनीकता,
अत इदमपि निरस्तम् “स्मृतिर्नवाह्यविषया” नष्टेत्यर्थे स्मृति दर्शनात्
इति ।
इन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष का ही यह स्वाभाविक नियम है कि, उसमें
समकालीन पदार्थ की प्रतीति होती है, सभी ज्ञानों और प्रमाणों का ऐसा
नियम नहीं है; स्मरण, अनुमान, आगम, योगिप्रत्यक्ष आदि में काला-
न्तरवर्ती वस्तु का साक्षात्कार भी होता है। इसी से प्रमाण का प्रमेय
के साथ अविनाभाव ( नियत संबंध ) सिद्ध होता है। अपनी समकालीन
वस्तु के साथ ही प्रमाण का अविनाभाव संबंध होता हो ऐसा कोई नियम
नहीं है, अपितु जिस किसी भी देश काल आदि से संबंधी जो भी पदार्थ
प्रतिभासित होता है, उसकी उसी प्रकार के मिथ्यात्व की निवृत्ति करना
प्रमाण का कार्य है। इससे बौद्धों का यह मत भी निरस्त हो जाता है
कि—“स्मृति वाह्य पदार्थ विषयक नहीं होती” नष्ट पदार्थ कीं भी स्मृति
हुआ करती है।
अथोच्येत, न तावत् संवित् प्रागभावः प्रत्यक्षावसेयः लिंगाद्यभा-
वात् । न हि संवित् प्रागभावव्याप्तिमिहलिंगमुपलभ्यते, न चागमस्तद्
विषयो दृष्टचरः । अतस्तत्प्रागभावः प्रमाणाभावात् एव न सेत्स्यति,
इति । यद्येवं स्वतस्सिद्धत्वविभवं परित्यज्य प्रमाणाभावेऽवरूढश्चेत्
योग्यानुपलब्ध्यैवाभावः समर्थितः इत्युपशाम्यतु भवान् ।
यदि कहो कि—संवित् का प्रागभाव, लिंग आदि के अभाव के
कारण, प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा निरूपित नही हो सकता। न प्रागभाव में
संवित् की व्याप्ति ही रहती है जिससे उसका लिंग उपलब्ध हो सके,
और न उसके विषय में कोई शास्त्र वचन ही मिलता है। इसलिए
संवित् का प्रागभाव, प्रमाणों के अभाव से सिद्ध नहीं होता [उत्तर] यदि
ऐसा ही है कि आप अनुभूति की स्वतः सिद्धता को छोड़कर प्रमाणों के
अभाव पर ही अड़ गये हैं तो प्रमाणों की अनुपलब्धि ही ऐसा प्रमाण
है, जिससे अभाव का समर्थन हो जाता है, अतः आपका चुप रहना ही
हितकर है।
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किञ्च प्रत्यक्षज्ञानं स्वविषयं घटादिकं स्वसत्ताकाले संतं साध-
यत्तस्य न सर्वदा सत्तामवगमयद् दृश्यत इति घटादेः पूर्वोत्तरकाल-
सत्ता न प्रतीयते । तदप्रतीतिश्च संवेदनस्य कालपरिच्छिन्नतया
प्रतीतेः । घटादिविषयमेव संवेदनं स्वयंकालानवच्छिन्नं प्रतीत चेत्;
संवेदन विषयो घटादिरपि कालानवच्छिन्नः प्रतीयेतेति नित्यः स्यात् ।
नित्यं चेत् संवेदनं स्वतःसिद्धं नित्यमित्येव प्रतीयेत, न च तथा
प्रतीयते ।
देखा जाता है, कि—प्रत्यक्ष ज्ञान के विषय घट आदि जब तक
रहते हैं तभी तक उनका अस्तित्व रहता है, प्रत्यक्ष ज्ञान ही उस अस्तित्व
का ज्ञापक होता है, फिर भी वह, उनकी सत्ता को सर्वकालीन नहीं
बतलाता, इसी से घट आदि की अतीत और आगत सत्ता की प्रतीति
नही होती । संवेदन ( अनुभव ) की कालपरिच्छिन्नता से ही उस प्रतीति
का भान होता है [ अर्थात् संवेदन कालान्तर में बदलता रहता है इसी
से पदार्थों की अप्रतीति होती है अर्थात् घट बनने के पूर्व का अनुभव और
घटध्वंस के बाद का अनुभव, घटस्थिति के अनुभव से भिन्न होता है,
जिससे अभाव की प्रतीति होती है, अतः मनुष्य की प्रतीति घटनाओं के
आधार पर समय-समय पर बदलती रहती है ] घट आदि विषयक
संवेदन यदि स्वयं ही, काल से अनवच्छिन्न हों, तो संवेदन के विषय घट
आदि भी काल से अनवच्छिन्न प्रतीत हों, इस प्रकार नित्य हो जाएं ।
स्वतः सिद्ध संवेदन यदि नित्य होता तो, उसकी प्रतीति भी नित्य होती,
पर वैसा होता नहीं [ इससे सिद्ध होता है कि संवित् नित्य वस्तु
नहीं है ]
एवं अनुमानादि संविदोऽपि कालानवच्छिन्नाः प्रतीताश्चेत् स्व-
विषयानपि कालानवच्छिन्नान् प्रकाशयन्तीति, तेच सर्वेकालानवच्छिन्ना
नित्याः स्युः, संविदनुरूपस्वरूपत्वात् विषयाणाम् । न च निर्विषया
काचित् संविदस्ति, अनुपलब्धेः । विषय प्रकाशनतयैवोपलब्धेरेव हि
संविदः स्वयम्प्रकाशता समर्थिता । संविदो विषयप्रकाशनता
[email protected]
स्वभावविरहेसति स्वयंप्रकाशत्वासिद्धेः अनुभूतेरनुभावन्तराननु-
भाव्यत्वाच्च संविदस्तुच्छतैव स्यात् । न च स्वापमदमूर्च्छादिषु
सर्वविषयशून्या केवलैव संवित्परिसफुरतीति वाच्यम्, योगानुपलब्धि-
पराहतत्वात् । तावपि दशास्वनुभूतिरनुभूता चेत्, तस्याः प्रबोध
समयेऽनुसंधानं स्यात् न च तदस्ति ।
इसी प्रकार अनुमान आदि जन्य संविद् भी यदि काल से अन-
वच्छिन्न प्रतीत होती तो अपने विषयों को भी काल से अनवच्छिन्न ही
प्रकाशित करती, जिससे वे सारे ही विषय काल से अनवच्छिन्न (अबाध्य)
नित्य होते, क्योंकि विषयों का स्वरूप संविद के अनुरूप ही होता है।
कोई भी संवित् निर्विषयक नहीं होती; ऐसा प्रमाण भी नहीं मिलता।
विषय प्रकाशन से ही उपलब्धि होती है तथा संविद् की स्वयम्प्रकाशिता
सिद्ध होती है। संविद का विषय प्रकाशनता का स्वभाव यदि समाप्त
हो जाय तो, उसकी स्वयं प्रकाशता ही असिद्ध हो जायगी। तथा
अनुभूति के
विगमाद्वेति शक्यते वक्तुम् । अर्थान्तरानुभवस्यार्थान्तराभावस्य
चानुभूतार्थान्तरास्मरण हेतुत्वाभावात् । तास्वपि दशासु अहमर्थोऽ-
नुवर्त्तत इति न वक्ष्यते ।
( शंका ) अनुभूत पदार्थों का स्मरण सदा रहे ही ऐसा तो कोई
नियम है नहीं, और जिस वस्तु की स्मृति ही नही रहेगी, तो अनुभव
हुआ ही नहीं, ऐसा निर्णय कैसे किया जा सकता है !
( उत्तर ) निद्रा आदि अवस्थाओं में देह आदि से असंबद्ध होने के
कारण सारे संस्कार तिरोहित हो जाते है, उससे भी विस्मृति होती है
इससे भी अनुभव का अभाव सिद्ध होता है । केवल स्मरणाभाव के नियम
से ही अनुभव का अभाव ज्ञात होता हो, ऐसी बात नहीं है अपितु “मुझे
इतनी देर कुछ भी ज्ञात नहीं रहा” ऐसे सोकर उठे हुए व्यक्ति के कथन
से भी अनुभव का अभाव सिद्ध होता है ।
यह भी नहीं कह सकते कि—निद्रा आदि अवस्थाओं में अनुभव तो
होता है, पर विषय निर्धारण के अभाव और अहंकार के विगम ( प्रतीति
न होने ) से विस्मृति हो जाती है । अन्य वस्तु की अनुभूति का अभाव
और अन्य वस्तु का विनाश कभी अन्य अनुभूत पदार्थ के विस्मरण का
हेतु नहीं हो सकता । निद्रा आदि दशाओं में भी अहंकार रहता है, ऐसा
आगे बतलावेंगे ।
ननु—स्वापादिदशास्वपि सविशेषोऽनुभवोऽस्तीति पूर्वमुक्तम् ।
सत्यमुक्तम्, सत्वात्मानुभवः । स च विशेष एवेति स्थापयिष्यते ।
इह तु सकलविषयविरहिणी निराश्रया च संविद् निषिध्यते ।
केवलैव संविदात्मानुभव इति चेत् न, सा च साश्रयेतिर्हि उपपाद-
यिष्यते । अतोऽनुभूतिः सती स्वयं स्वप्राग्भावं न साधयति इति
प्राग्भावासिद्धिर्नशक्यते वक्तुम् । अनुभूतेरनुभाव्यत्वसंभवोपपादने
नान्यतोऽप्यसिद्धिर्निरस्ता; तस्मात् न प्राग्भावाद्यासिद्ध्या संविदोऽनु-
त्पत्तिरुपपत्तिमती ।
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यदि कहो कि—पहिले तो कहा था कि निद्रा आदि दशाओं में
सविशेष अनुभव रहता है ? ( उत्तर ) ठीक है, कहा था, वह तो आत्मा-
नुभव का प्रसंग था । उसमें तो सविशेष अनुभव होता ही है इस बात को
तो आगे भी कहूँगा । यहाँ तो समस्त विषयों से रहित निराश्रित संवित्
के निषेध का प्रसंग है। केवल संविद ही आत्मानुभव है, ऐसा नहीं है;
आत्मानुभवरूप संवित् तो साश्रया है, इसका आगे उपपादन करूँगा ।
अनुभूति स्वयं स्थित रहते हुए अपने प्रागभाव को सिद्ध नहीं कर
सकती अतः अनुभूति का प्रागभाव सिद्ध नहीं होता ऐसा नहीं कह सकते ।
अनुभूति की अनुभाव्यता के उपपादन से भी तथा अन्य युक्तियों से भी
अनुभूति की नित्यता की सिद्धि की बात निरस्त हो जाती है । प्रागभाव
आदि की असिद्धि से संवित् की अनुत्पत्ति का समर्थन नहीं किया
जा सकता ।
यद्यप्यस्यानुत्पत्त्या विकारान्तरनिरसनम्, तदप्यनुपपन्न, प्राग-
भावे व्यभिचारात् । तस्य हि जन्माभावेऽपि विनाशोदृश्यते । भावे-
ष्विति विशेषणे तर्ककुशलताऽविष्कृता भवति । तथा च भवदभिमताऽ-
विद्यानुत्पन्नैव, विविधविकारास्पदं तत्त्वज्ञानोदयादन्तवती चेतितस्या-
मनैकान्त्यम् । तद्विकाराः सर्वे मिथ्याभूता इति चेत्; किं भवतः
परमार्थभूतोऽप्यस्ति विकारः ? येनैतद् विशेषणमर्थवद् भवति । न
हि असावभ्युपगम्यते ।
यद्यपि संवित् की अनुत्पत्ति की स्वीकृति से, संवित् में संभावित
अन्यान्य विकारों का भय समाप्त हो जाता है, फिर भी अनुत्पत्ति की
बात सिद्ध नहीं हो पाती, क्योंकि संवित् का प्रागभाव सिद्ध हो चुका है ।
इसके जन्म के अभाव को मान लेने पर भी, प्रत्यक्ष ज्ञात होने वाला
इसका जो विनाश है, उसको अस्वीकार नहीं कर सकते । [ जो वस्तु
'विनाशशील है, वह उत्पत्तिशील भी निश्चित है । ]
यदि कहो कि, उक्त बात तो संवित् की नित्यता के विषय में भी
कही जा सकती है; मेरी समझ में तो ऐसा नहीं आता, हाँ तर्क कुशलता
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( ७० )
अवश्य लक्षित होती है। दूसरी बात ये है कि, आपकी अभिमत अविद्या
जन्म रहित होते हुए भी अनेक विकारों वाली और तत्त्वज्ञान से नष्ट हो
जाने वाली है, संविद् की नित्यता भी इसी से मिलती जुलती है क्या ?
यदि कहें कि अविद्या के सारे विकार तो मिथ्या होते हैं; तो आपकी
दृष्टि में कोई विकार सत्य भी हैं क्या ? जिससे आपका उक्त विशेषण
सार्थक हो सके, सो इसे आप स्वीकार नहीं करेंगे।
यदपि, अनुभूतिरजत्वात् स्वस्मिन् विभागं न सहते इति,
तदपिनोपपद्यते, अजस्यैवात्मनोदेहेन्द्रियादिभ्यो विभक्तत्वात् अनादि-
त्वेन चाभ्युपगतायाअविद्याया आत्मनो व्यतिरेकस्य अवश्याश्रय-
णीयत्वात्। स विभागो मिथ्यारूप इति चेत्, जन्मप्रतिबद्धः परमार्थ
विभागः किं क्वचिद् दृष्टः त्वया ? अविद्याया आत्मनः परमार्थतो
विभागाभावे वस्तुतो हि अविद्याैवस्यादात्मा अबाधित प्रतिपत्तिसिद्ध
दृश्यभेद समर्थनेन दर्शनभेदोऽपि समर्थित एव छेद्यभेदाच्छेदनभेद-
नवत् ।
“अनुभूति अजन्मा होने के कारण अपने में भेद को सहन नहीं
करती” आपका यह कथन भी सही नहीं है, क्योंकि—जन्मरहित परमात्मा
भी देह इन्द्रियादि भागों में विभक्त होता है, अविद्या को अनादि मानकर
उसकी परमात्मा से भिन्नता माननी ही पड़ेगी। यदि कहो कि—वह भेद
तो काल्पनिक मिथ्या है तो जन्म से प्रतिबद्ध वास्तविक भेद की कहीं
आपने देखा है क्या ? अविद्या से आत्मा का वास्तविक भेद न मानने से,
वह अविद्या वस्तु ही आत्मा हो जायगी । प्रत्यक्ष सिद्ध दृश्य घट पट
आदि भेदों के समर्थन से दर्शन भेद भी समर्थित ही है, जैसे कि—छेद्य
वृक्ष आदि के भेदानुसार छेदन की क्रियायें भिन्न-भिन्न प्रकार की
होती हैं।
यदपि—"नास्या दृशेदृँशिश्वरूपाया दृश्यः कश्चिदपिधर्मोऽस्ति,
दृश्यत्वादेवेतेषां न दृशिधर्मत्वं” इति च। तदपि स्वाभ्युपगतैः
प्रमाणसिद्धैः नित्यत्व स्वयंप्रकाशत्वादिधर्मैरुभयमनैकांतिकम्। न
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( ७१ )
च ते संवेदनमात्रम्, स्वरूपभेदात् । स्वसत्तयैव स्वाश्रयं प्रति कस्यचिद्
विषयस्य प्रकाशनं हि संवेदनम् । स्वयं प्रकाशता तु स्वसत्तयैव
स्वाश्रयाय प्रकाशमानता । प्रकाशश्च चिदचिदशेषपदार्थ साधारणं
व्यवहारानुगुण्यम् ।
जो यह कहा कि—"अनुभूति स्वयं दृष्टि स्वरूप ( ज्ञान स्वरूप )
है इसके लिए कोई भी दृश्य धर्म नहीं है, तथा इसकी जो नित्यता स्वयं
प्रकाशता आदि विशेषतायें हैं यदि उन्हें ही दृश्य कहा जाय तो वे भी
उक्त मतानुसार दृष्टि स्वरूप अनुभूति से दृश्य नहीं हो सकतीं" आपकी
यह उक्ति भी अनुभूति की स्वीकृत प्रमाण सिद्ध नित्यता और स्वयं
प्रकाशता आदि धर्मों से अनिश्चित हो जाती है । नित्यता,
स्वयं प्रकाशता आदि संवेदन ही हैं ऐसा भी नहीं कह सकते क्योंकि इनसे
संवेदन का स्वरूप भेद है । अपनी सत्ता से अपने आश्रित पदार्थ में किसी
विषय को प्रकाशित करना संवेदन है तथा अपनी सत्ता से ही अपने
आश्रित पदार्थ को प्रकाशित करना स्वयं प्रकाशता है तथा प्रकाश जड़
चेतन सभी सामान्य पदार्थों के व्यवहार के अनुरूप होता है ।
सर्वकालवर्त्तमानत्वं हि नित्यत्वम् । एकत्वमेक संख्यावच्छेद
इति । तेषां जडत्वादिभावरूपतायामपि तथाभूतैरपि चैतन्यधर्मभूतैः
तैरनैकान्त्यमपरिहार्यम्, संविदि तु स्वरूपातिरेकेण जडत्वादि
प्रत्यनीकत्वमित्यभावरूपोभावरूपो वा धर्मोनाभ्युपेतश्चेत्;
तत्तन्निषेधोक्त्या किमपि नोक्तं भवेत् ।
सर्वकाल वर्त्तमानता ही नित्यता है एक संख्या से परिमित होना
ही एकत्व है । इन सबका जड़ता आदि भाव रूप होते हुए भी ये चैतन्य
के धर्म हैं; इस प्रकार चैतन्य धर्मता को प्राप्त इन सबकी एकता अनिवार्य
हो जाती है । संवित् में तो, स्वरूप से भिन्न जड़ता आदि उक्त समस्त
धर्म भाव रूप हों या अभाव रूप, यदि उनका संवित के साथ संबंध नहीं
मानेंगे तो, उन सबकी अनुभूति धर्मता का प्रत्याख्यान करना
कठिन होगा ।
( ७२ )
अपि च—संवित् सिद्ध्यति वा न वा ? सिद्ध्यति चेत्
सधर्मता स्यात् । न चेत्तुच्छता गगनकुसुमादिवत् । सिद्धिरेव
संविदिति चेत्, कस्य कं प्रति वक्तव्यम्, यदि न कस्यचित् कंचित्
प्रति सा तर्हि न सिद्धिः । सिद्धिर्हि पुत्रत्वमिव कस्यचित् कंचित्
प्रति भवति । आत्मनि इति चेत्, कोऽयमात्मा ? ननु संविदेत्युक्तम् ।
सत्यमुक्तम् दुरुक्तंतत् । तथाहि, कस्यचित् पुरुषस्य किंचिदर्थजातं
प्रति सिद्धिरूपतया तत्संबंधिनी सा संवित् स्वयं कथमिवात्मभाव-
मनुभवेत् ? एतदुक्तं भवति, अनुभूतिरिति स्वाश्रयं प्रति स्वसद्भावेनैव
कस्यचित् वस्तुनोव्यवहारानुगुण्यापादनस्वभावो ज्ञानावगति संवि-
दाद्यपरनामा सकर्मकोऽनुभवितुरात्मनो धर्मविशेषो, घटमहं
जानामीममर्थमवगच्छामि पटमहं संवेद्मीति सर्वेषामात्मसाक्षिकः
प्रसिद्धः । एतत् स्वभावतया हि तस्याः स्वयंप्रकाशता भवताप्युप-
पादिता । अस्यसकर्मकस्य कर्तृधर्मविशेषस्य कर्मत्ववत् कर्तृत्वमपि
दुर्घटमिति ।
वह संवित् प्रमाण द्वारा सिद्ध होती है या नही ? यदि होती है,
तो वह सधर्मा है । यदि नहीं तो वह गगन कुसुम आदि की तरह तुच्छ
काल्पनिक वस्तु है । यदि कहो कि सिद्धि ही संवित् है, तो किसके प्रति
किसकी सिद्धि है ? यदि वह किसी के प्रति नहीं है, तो वह सिद्धि नहीं
है । सिद्धि तो पुत्रता की तरह, किसी की किसी के प्रति होती हैं । यदि
कहो कि आत्मा में होती है, तो बतलाओ उस आत्मा का क्या स्वरूप
है ? यदि कहो कि सिद्धि ही संवित् का आत्मा है, तो ठीक ही कहा,
उसी बात को पुनः दोहरा दिया । जरा विचारो तो, किसी पुरुष की किसी
विषय की सिद्धि रूप, उससे सबंधिनी वह अनुभूति, स्वयं अपने भाव
का अनुभव कैसे कर सकेगी ? कथन यह है कि—अनुभूति अपने सद्भाव
से अपनी आश्रित किसी वस्तु को व्यवहार योग्य कर देती है । ज्ञान,
अवगति, संवित् आदि सब उसी के दूसरे नाम हैं, वह बिना कर्म के
स्थिर नहीं रहती, इसलिए वह सकर्मक है, अनुभव कर्त्ता आत्मा का धर्म
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( ७३ )
विशेष ही अनुभूति है “मैं घट को जानता हूँ”—इस विषय का मैं ज्ञाता
हूँ—“पट का अनुभव करता हूँ” इत्यादि सभी आत्माओं की प्रतीति के
रूप में अनुभूति की प्रसिद्धि है आपभी इसके इस स्वभाव के कारण,
इसकी स्वयं प्रकाशता का प्रतिपादन करते हैं। कर्तृगत धर्म विशेष,
कर्मसापेक्ष अनुभूति, जैसे स्वयं कर्म नहीं हो सकती, वैसे ही इसमें कर्तृता
भी असंभव है।
तथाहि, अस्यकर्त्तुः स्थिरत्वं कर्तृधर्मस्य संवेदनाख्यस्य सुख
दुःखादेरिवोत्पत्तिस्थितिनिरोधाश्च प्रत्यक्षमीक्ष्यन्ते। कर्तृ स्थैर्यंतावत्
स एवायमर्थः पूर्वंमयानुभूत इति प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्षसिद्धम्। अहं
जानामि अहमज्ञासिषम्, ज्ञातुरेव ममेदानींज्ञानंनष्टमिति च
संवित् उत्पत्त्यादयः प्रत्यक्षसिद्धा इति कुतस्तदैक्यम्। एवं क्षणभंगिन्याः
संविदः आत्मत्वाभ्युपगमे पूर्वेद्युर्दृष्टमपरेद्युरिदमदर्शमिति प्रत्यभिज्ञा
च न घटते, अन्येनानुभूतस्य न हि अन्येन प्रतिज्ञान संभवः।
तथा, संवित् का कर्त्ता स्थिर होता है, कर्त्ता के संवेदन नामक धर्म
के सुख दुःख आदि की तरह, उत्पत्ति, स्थिति और विनाश प्रत्यक्ष दीखते
हैं। कर्त्ता की स्थिरता “यह वही पदार्थ है जिसकी मैंने पहिले अनुभूति
की थी इस प्रत्यभिज्ञा से प्रत्यक्ष सिद्ध है।” मैं जानता हूँ—“मैं इस विषय
का ज्ञाता हूँ”—“यह वस्तु मेरी जानी हुई है, इस समय मैं इसे भूल
रहा हूँ” ऐसी अनुभूतियों से अनुभूति की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश
प्रत्यक्ष सिद्ध है, इसलिए ज्ञाता और ज्ञान की एकता कैसे संभव है ?
ऐसी क्षणस्थायी संविद् को यदि आत्मा मान लिया जाय, तो पहिले दिन
के दृष्ट पदार्थ की दूसरे दिन “मैंने इसे देखा था” ऐसी प्रतीति संभव
नहीं हैं। अन्य की अनुभूत वस्तु की कोई अन्य व्यक्ति तो प्रत्यभिज्ञा कर
नहीं सकता।
किं च अनुभूतेरात्मत्वाभ्युपगमे तस्या नित्यत्वेऽपि प्रतिसंधान
असंभवस्तदवस्थः। प्रतिसंधानं हि पूर्वापरकाल स्थायिनमनुभवितार-
मुपस्थापयति, नानुभूतिमात्रम्।
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अहमेवेदं, पूर्वमप्यन्वभूवमिति । भवतोऽप्यनुभूतेर्नहि अनुभवि-
तृत्वमिष्टम् अनुभूतिरनुभूतिमात्रमेव । संविन्नाम काचिन्निराश्रया
निर्विषया वा अत्यंतानुलब्धेर्न संभवतीत्युक्तम् । उभयाभ्युपेता
संविदेवात्मेत्युपलब्धि पराहतम् । अनुभूतिमात्रमेव परमार्थ इति
निष्कर्षंक हेत्वाभासाश्च निराकृताः ।
अनुभूति को आत्मा मानकर उसकी नित्यता हो भी जाय फिर भी
उसमें प्रत्यभिज्ञा की असंभावना तो बनी ही रहेगी । प्रत्यभिज्ञा, अनुभव
करने वाले की, पूर्व पर कालीन उपस्थिति बतलाती है; केवल अनुभूति
की ही स्थिति नही बतलाती । “मैंने इसे पहिले भी जाना था” ऐसी
अनुभूति को अनुभविता कहना तो संभव; आपको भी अभिप्रेत न
होगा; अनुभूति केवल अनुभूति ही है । निराश्रय और निर्विषय संवित्
कभी संभव नही है, उसकी ऐकांतिक उपलब्धि नही होती । “आश्रय
और विषय युक्त संविद ही आत्मा है” ऐसा सिद्धान्त प्रतीति सिद्ध
भेदानुभव द्वारा पराभूत हो गया तथा “अनुभूति मात्र ही परमार्थ है”
इस मत की स्थापना में उपस्थित किये जाने वाले गलत तर्क भी निराकृत
हो गए ।
ननु च—अहंजानामीत्यस्यस्मत्प्रत्यये योऽनिदमंशः प्रकाशैकरसः
चित् पदार्थः स आत्मा । तस्मिन् तद्बलनिर्भासिततया युष्मदर्थलक्ष-
णोऽहं जानामीति सिद्धयन्नहमर्थः चिन्मात्रातिरेकी युष्मदर्थ एव ।
नैतदेवं, अहंजानामि इति धर्मधर्मितया प्रत्यक्ष प्रतीति विरोधादेव ।
(वाद) “मैं जानता हूँ” इस कथन में जो “अहं” रूप चैतन्यांश
प्रकाशैकरस पदार्थ है वही आत्मा है।” मैं जानता हूँ “इस प्रतीति में
जो अर्थ निहित है वह, उस चैतन्य आत्मा द्वारा ही समुद्भासित होता
है, अतः “अहं” का तात्पर्य चिन्मात्र अखंड आत्मा ही है।
(विवाद) “मै जानता हूँ” इस प्रत्यभिज्ञा में, धर्म और धर्मी
की प्रत्यक्ष भिन्न प्रतीति हो रही है इसी से आपकी उक्त बात कट
जाती है ।
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किं च—अहमर्थो न चेदात्मा प्रत्यक्त्वं नात्मनो भवेत् ।
अहम्बुद्ध्या परागर्थात् प्रत्यगर्थोहि भिद्यते । निरस्ताऽखिल दुःखोऽह
मनन्तानन्दभाक् स्वराट् । भवेयमिति मोक्षार्थी श्रवणादौ प्रवर्त्तते ।
अहमर्थ विनाशश्चेन्मोक्ष इत्यध्यवस्यति । अपसर्पेदसौ मोक्षकथा-
प्रस्ताव गन्धतः । मयिनष्टेऽपि मत्तोऽन्या काचित्ज्ञप्तिरवस्थिता,
इति प्राप्तयेत्नः कस्यापि न भविष्यति । स्वसम्बन्धितयाह्यस्याः
सत्ताविज्ञप्तितादि च, स्वसम्बन्ध वियोगेतुज्ञाप्तिरेव न सिद्ध्यति ।
छेत्तुश्छेद्यस्य चाभावे छेदनादेरसिद्धिवत् अतोऽहमर्थो ज्ञातैव प्रत्य-
गात्मेति निश्चितम् । विज्ञातारमरे केन जानात्येवेति च श्रुतिः,
एतद्योवेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति च स्मृतिः । नात्माश्रुतेरित्यारभ्य
सूत्रकारोऽपि वक्ष्यति, ज्ञोऽत एवेत्यतोनात्मा ज्ञप्तिमात्रमितिस्थितम् ।
अहं का अर्थ आत्मा नहीं है, तथा प्रत्यगात्मा परमात्मा नहीं हो
सकता, अहं बुद्धि से एक दूसरी ही वस्तु की प्रतीति होती है, अहं के अर्थ
से प्रत्यगात्मा का भिन्न अर्थ है। “मैं समस्त दुःखों से मुक्त हो गया,
अनंत आनंद युक्त स्वच्छन्द हूँ” ऐसे मोक्ष की कामना वाला श्रवण
आदि नवधा भक्ति में संलग्न होता है । “अहं अर्थ का विनाश ही मोक्ष
है” ऐसे मोक्ष कथा के प्रस्ताव की गंध भी जहाँ हो, वहाँ से दूर ही भागना
चाहिए। “अहंता” के नष्ट हो जाने पर भी यदि “अहं” से भिन्न किसी
प्रकार की ज्ञप्ति होती है तो, ऐसी प्राप्ति के लिए प्रयास किसी में भी
नहीं हो सकता । ज्ञान की सत्ता और विज्ञप्ति आदि सब जीव की सत्ता
पर ही निर्भर है, यदि इन सबका जीव से संबंध विच्छेद हो जाय तो,
ज्ञप्ति की सिद्धि नहीं हो सकती जैसे कि—वृक्ष और वृक्ष के काटने वाले
के अभाव में काटना आदि कार्य नहीं हो सकते । इसलिए “अहं” अर्थ
का ज्ञाता जीवात्मा ही निश्चित होता है । “विज्ञातारमरे केन जानाति
एव” ऐसा श्रुति वचन तथा “एतद्योवेत्तित्तं प्राहुः क्षेत्रज्ञः” ऐसा गीता
स्मृति का वचन उक्त कथन में प्रमाण है सूत्रकार भी “नात्माश्रुतेः” से
लेकर “ज्ञोऽतएव” सूत्र तक, आत्मा ज्ञप्ति मात्र ही नहीं हैं, ऐसा निर्णय
करते हैं ।
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