श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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किं च—अहमर्थो न चेदात्मा प्रत्यक्त्वं नात्मनो भवेत् ।
अहम्बुद्ध्या परागर्थात् प्रत्यगर्थोहि भिद्यते । निरस्ताऽखिल दुःखोऽह
मनन्तानन्दभाक् स्वराट् । भवेयमिति मोक्षार्थी श्रवणादौ प्रवर्त्तते ।
अहमर्थ विनाशश्चेन्मोक्ष इत्यध्यवस्यति । अपसर्पेदसौ मोक्षकथा-
प्रस्ताव गन्धतः । मयिनष्टेऽपि मत्तोऽन्या काचित्ज्ञप्तिरवस्थिता,
इति प्राप्तयेत्नः कस्यापि न भविष्यति । स्वसम्बन्धितयाह्यस्याः
सत्ताविज्ञप्तितादि च, स्वसम्बन्ध वियोगेतुज्ञाप्तिरेव न सिद्ध्यति ।
छेत्तुश्छेद्यस्य चाभावे छेदनादेरसिद्धिवत् अतोऽहमर्थो ज्ञातैव प्रत्य-
गात्मेति निश्चितम् । विज्ञातारमरे केन जानात्येवेति च श्रुतिः,
एतद्योवेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति च स्मृतिः । नात्माश्रुतेरित्यारभ्य
सूत्रकारोऽपि वक्ष्यति, ज्ञोऽत एवेत्यतोनात्मा ज्ञप्तिमात्रमितिस्थितम् ।
अहं का अर्थ आत्मा नहीं है, तथा प्रत्यगात्मा परमात्मा नहीं हो
सकता, अहं बुद्धि से एक दूसरी ही वस्तु की प्रतीति होती है, अहं के अर्थ
से प्रत्यगात्मा का भिन्न अर्थ है। “मैं समस्त दुःखों से मुक्त हो गया,
अनंत आनंद युक्त स्वच्छन्द हूँ” ऐसे मोक्ष की कामना वाला श्रवण
आदि नवधा भक्ति में संलग्न होता है । “अहं अर्थ का विनाश ही मोक्ष
है” ऐसे मोक्ष कथा के प्रस्ताव की गंध भी जहाँ हो, वहाँ से दूर ही भागना
चाहिए। “अहंता” के नष्ट हो जाने पर भी यदि “अहं” से भिन्न किसी
प्रकार की ज्ञप्ति होती है तो, ऐसी प्राप्ति के लिए प्रयास किसी में भी
नहीं हो सकता । ज्ञान की सत्ता और विज्ञप्ति आदि सब जीव की सत्ता
पर ही निर्भर है, यदि इन सबका जीव से संबंध विच्छेद हो जाय तो,
ज्ञप्ति की सिद्धि नहीं हो सकती जैसे कि—वृक्ष और वृक्ष के काटने वाले
के अभाव में काटना आदि कार्य नहीं हो सकते । इसलिए “अहं” अर्थ
का ज्ञाता जीवात्मा ही निश्चित होता है । “विज्ञातारमरे केन जानाति
एव” ऐसा श्रुति वचन तथा “एतद्योवेत्तित्तं प्राहुः क्षेत्रज्ञः” ऐसा गीता
स्मृति का वचन उक्त कथन में प्रमाण है सूत्रकार भी “नात्माश्रुतेः” से
लेकर “ज्ञोऽतएव” सूत्र तक, आत्मा ज्ञप्ति मात्र ही नहीं हैं, ऐसा निर्णय
करते हैं ।
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