श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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स्वरूप लक्षण बोधक (सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म) वाक्य अखंड, एकरस अद्वैत
ब्रह्म का प्रतिपादक है ।
ननु च—सत्यज्ञानादिपदानां स्वार्थप्रहाणेन स्वार्थविरोधि-
व्यावृत्तवस्तुस्वरूपोपस्थापनपरत्वे लक्षणा स्यात् । नैष दोषः,
अभिधानवृत्तेरपि तात्पर्यवृत्तेर्बलीयस्त्वात् । सामानाधिकरण्यस्य हि
ऐक्य एव तात्पर्यमिति सर्वसम्मतम् ।
(शंका) सत्य ज्ञान आदि पद यदि अपने शब्दार्थ का परित्याग कर
स्वार्थ विरुद्ध किसी विशेष वस्तुस्वरूप का स्थापन करते है तो, उन पदों
में लक्षणा करनी होगी ।
(समाधान) उक्त दोष नहीं होगा, क्योकि अभिधा वृत्ति (शब्द के
मुख्यार्थ) से तात्पर्यार्थ वृत्ति (तात्पर्यार्थ) बलवान होती है । सामानाधिकरण्य
(अभेद विशेषण विशेष्य मानने) में ऐसा ही तात्पर्य होता है, ऐसा सर्व-
सम्मत सिद्धान्त है ।
ननु च—सर्वपदानां लक्षणा न दृष्टचरी । ततः किम् ? वाक्य-
तात्पर्याविरोधे सत्येकस्यापि न दृष्टा, समभिव्याहृतपदसमुदाय-
स्यैतत्तात्पर्यमिति निश्चिते सति द्वयोस्त्रयाणां सर्वेषां वा तदविरोधाय
एकस्यैव लक्षणा न दोषाय, तथा च शास्त्रस्थैरभ्युपगम्यते । ( कार्य-
वाक्यार्थवादिभिर्लौकिकवाक्येषु सर्वेषां पदानां लक्षणा समाश्रीयते,
अपूर्वकार्य एव लिंगादेर्मुख्यवृत्तत्वात् लिंगादिभिः क्रियाकार्यं लक्षणया
प्रतिपाद्यते । कार्यान्वितस्वार्थाभिधायिनां चेतरेषां पदानामपूर्वकार्या-
न्वित एव मुख्यार्थ इति क्रियाकार्यान्वितप्रतिपादनं लाक्षणिकमेव ।
अतो वाक्यतात्पर्याविरोधाय सर्वपदानां लक्षणापि न दोषः, अत
इदमेवार्थजातं प्रतिपादयन्तो वेदान्ताः प्रमाणम् । )
(शंका) सभी पदों की लक्षणा तो कही भी नहीं देखी जाती । (उत्तर)
इससे क्या होता है ? वाक्य के विरुद्ध तात्पर्य होने पर तो एक पद की
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लक्षणा भी नहीं देखी जाती। वस्तुतः एक साथ प्रयुक्त पदों के वाक्य का
यही तात्पर्य है, ऐसा निश्चित हो जाने पर दो या तीन या सभी पदों
की, उनके अविरुद्धार्थ प्रकाशन के लिए, एक जैसी लक्षणा करना
दोष नहीं है, ऐसा शास्त्रज्ञ भी स्वीकार करते हैं। कार्य वाक्यार्थ-
वादी तो लौकिक वाक्यों में सभी पदों की लक्षणा स्वीकार करते
हैं। उनके मत में लिंग आदि (विविध प्रत्यय) का मुख्य अर्थ “अपूर्व
कार्य" ही है, इससे ज्ञात होता है कि लिंग आदि से यज्ञादि क्रिया का जो
कार्य निश्चित होता है, वह भी लक्षणा द्वारा ही होता है। अन्यान्य यज्ञादि
क्रिया बोधक वाक्यों से संबद्ध पदों का जब अपूर्वकार्य संबद्ध अर्थ ही
मुख्यार्थ होता है तो, जो पद एक मात्र अनुष्ठेय कर्म संबंधी अर्थ का ही
प्रतिपादन करते हैं, वे तो लाक्षणिक ही होंगे। इसलिए वाक्य तात्पर्य
के विरोध निवारण के लिए सभी पदों की लक्षणा भी दोषावह नहीं होगी।
इस पूर्व मीमांसा के सिद्धांत का प्रतिपादन करने से ही वेदांत वाक्य
प्रामाणिक हैं।
प्रत्यक्षादि विरोधे च शास्त्रस्य बलीयस्त्वमुक्तम्, सति च
विरोध बलीयस्त्वं वक्तव्यम्, विरोध एव न दृश्यते, निर्विशेषसन्मात्र-
ब्रह्मग्राहित्वात्प्रत्यक्षस्य ।
प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के पारस्परिक विरोध होने पर शास्त्र प्रमाण की
बलवत्ता कही गयी है। विरोध होने पर ही बलवान प्रमाण की बलवत्ता
माननी चाहिए, यहाँ तो कोई विरोध ही नहीं दीखता, निर्विशेष सत् स्व-
रूप ब्रह्म ही एकमात्र प्रत्यक्ष प्रमाण से ग्राह्य है।
ननु च-घटोऽस्ति पटोऽस्तीति नानाकारवस्तुविषयं प्रत्यक्षं
कथमिव सन्मात्रग्राहीत्युच्यते । विलक्षणग्रहणाभावे सति सर्वेषां
ज्ञानानामेकविषयत्वेन धारावाहिकविज्ञानवदेकव्यवहारहेतुतैव स्यात् ।
(उक्त मत पर आपत्ति) घट और पट के अस्तित्व के समान अनेक
जागतिक आकारों की प्रत्यक्ष प्रतीति होती है, तो यह कैसे कहा कि-
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"निर्विशेष सत् ही एक मात्र प्रत्यक्ष प्रमाण ग्राह्य है ? यदि उक्त बात ही
सही होती, कि समस्त जगत में विभिन्नताओं की प्रतीति का अभाव
तथा एक मात्र सत् की ही प्रतीति होती, तो जगत् संबंधी सारी प्रतीतियाँ
एक ही प्रकार की होतीं, सभी में सदा प्रवाहमय एक सी ही प्रतीति होनी
रहती तथा सभी पदार्थों में एक सा ही व्यवहार होता रहता [सो तो
है नहीं अतः उक्त कथन निराधार है] ।
' सत्यम्; तथैवात्र विविच्यते । कथम् ? घटोऽस्तीत्यत्र अस्तित्वं तद्-
भेदश्च व्यवह्रियते; न द्वयोरपि व्यवहारयोः प्रत्यक्षमूलत्वम् संभवति
तयोः भिन्नकालज्ञानफलत्वात्, प्रत्यक्षज्ञानस्य चैकक्षणवर्त्तित्वात्
तत्र स्वरूपं वा भेदो वा प्रत्यक्षस्य विषय इति विवेचनीयम् । भेद-
ग्रहणस्य स्वरूपग्रहणतत्प्रतियोगिस्मरणसापेक्षत्वादेव स्वरूप विषय-
त्वमवश्यामाश्रयणीयमिति । न भेदः प्रत्यक्षेण गृह्यते, अतो भ्रान्तिमूल
एव भेदव्यवहारः ।
(उक्त आपत्ति का निराकरण) ठीक है, आपकी शंकानुसार हम
यहाँ उक्त विचार का विवेचन करते हैं। मैं पूछता हूँ कि "घट है" इस
प्रतीत में उस वस्तु के अस्तित्व और उस वस्तु की अन्य वस्तु से भिन्नता
का व्यवहार किस आधार पर करते हो ? दो वस्तुओं का एककालिक
व्यवहार प्रत्यक्ष मूलक तो हो नहीं सकता (अर्थात् दो वस्तुएं एक साथ
ही देख कर समझी नहीं जा सकतीं) क्योंकि प्रत्यक्ष ज्ञान एक क्षण में एक
ही वस्तु का संभव है तथा दो वस्तुओं की भिन्न काल में ही प्रतीति होती
है। इसलिए वस्तु का स्वरूप या भेद प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय है या नहीं ;
यह विवेचन का विषय है। वस्तु की स्वरूपानुभूति और जिस वस्तु से
उसका भेद करना है, ऐसी प्रतियोगी वस्तु को भूल जाने के बाद तो कभी
भेद निर्धारण किया नहीं जा सकता, इसलिए वस्तु के स्वरूप को ही केवल
प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय मानना चाहिए, भेद को नहीं, क्योंकि भेद की
प्रत्यक्ष प्रतीति तो होती नहीं ; इससे सिद्ध होता है कि भेद का व्यवहार
भ्रान्ति मूलक ही है।
किंच-भेदो नाम कश्चित् पदार्थों न्यायविद्भिर्निरूपयितुं न
शक्यते । भेदस्तावन्न वस्तुस्वरूपम्, वस्तुस्वरूपे गृहीते स्वरूपव्यवहारं
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वत् सर्वस्माद् भेदव्यवहार प्रसक्तेः । न च वाच्यम्-स्वरूपे गृहीतेऽपि
भिन्न इति व्यवहारस्य प्रतियोगिस्मरणसव्यपेक्षत्वात्, तत्स्मरणा-
भावेन तदानीमेव न भेदव्यवहार इति । स्वरूपमात्रभेदवादिनो हि
प्रतियोग्यपेक्षा च नोत्प्रेक्षितुं क्षमा, स्वरूपभेदयोः स्वरूपत्वाविशेषात् ।
यथा स्वरूपव्यवहारो न प्रतियोग्यपेक्षः, भेदव्यवहारोऽपि तथैव स्यात्
हस्तः कर इतिवत् घटोभिन्न इति पर्यायत्वं च स्यात् । नापि धर्मः
धर्मत्वे सति तस्य स्वरूपाद् भेदोऽवश्यमाश्रयणीयः अन्यथा स्वरूपमेव
स्यात् । भेदे च तस्यापि भेदस्तद्धर्मः तस्यापीत्यनवस्था । किं च,
जात्यादिविशिष्टवस्तुग्रहणे सति भेदग्रहणं, भेदग्रहणे सति जात्यादि-
विशिष्टवस्तुग्रहणमित्यन्योन्याश्रयणम् अतो भेदस्य दुर्निरूपत्वात्
सन्मात्रस्यैव प्रकाशकं प्रत्यक्षम् ।
नैयायिक विद्वान भेदनामक किसी पदार्थ विशेष का निरूपण नहीं
कर सकते, क्योंकि भेद कोई वस्तु रूप तो है नही, यदि उसे वस्तु
रूप मान लेंगे तो, स्वरूप व्यवहार की तरह, सभी पदार्थों से सभी का
भेदव्यवहार सिद्ध हो जायगा । यह नहीं कह सकते कि स्वरूप का ग्रहण
होने पर भी “यह वस्तु अमुक से भिन्न है” ऐसी प्रतीति में प्रतियोगी
वस्तु की स्मृति अपेक्षित है, क्योंकि उस वस्तु की यदि विस्मृति हो
गई तो उस समय भेद करना कठिन हो जाता है । जो लोग केवल
स्वरूप में ही भेद मानते हैं वे भी प्रतियोगी की अपेक्षा के बिना भेद
का निर्णय नहीं कर सकते, क्योंकि स्वरूप भेद में कोई विशेष स्वरूपता
तो होती नहीं (अर्थात् एक घट से दूसरे घट का भेद करने में भी यह
स्मरण रखना आवश्यक हो जाता है कि अमुक घट, अमुक घट से
अमुक कारण से भिन्न है, अन्यथा घटों का स्वरूप तो प्रायः समान ही
होता है उसमें भेद करना कठिन होगा) जैसे स्वरूप के व्यवहार में
प्रतियोगी वस्तु अपेक्षित नहीं है, केवल उसकी स्मृतिमात्र अपेक्षित है,
उसी प्रकार भेद व्यवहार में भी स्मृतिमात्र अपेक्षित है । हाथ और कर
के पर्याय के समान, दो भिन्न घट भी एक दूसरे के पर्याय मात्र ही हैं;
[भिन्न वस्तु नहीं हैं] भेद कोई धर्म भी नहीं है, यदि उसकी धर्मता हो
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जायगी तो उस धर्म का स्वरूप से भी भेद मानना पडेगा (क्योकि
धर्म और धर्मी मे भेद होता है), अन्यथा भेद ही वस्तु का स्वरूप हो
जायेगा, और फिर भेद मे भेद होते चले जायेगे जिससे अव्यवस्था
(गडबड़ घोटाला) हो जायगी। घट आदि एक जाति मे शुक्लना आदि
विशेष गुणो के आधार पर ही उनके स्वरूपगत भेद की प्रतीति होती है
उस भेद प्रतीति से ही जाति विशिष्ट वस्तु का ज्ञान होता है—इस प्रकार
अन्योन्याश्रय दोष घटित होता है। इस तरह भेद का विवेचन दुरूह है,
[स्वरूप, जाति आदि भेदो को एक मिथ्या भ्रान्ति ही मानना चाहिए]
वस्तुतः सत् वस्तु ही प्रत्यक्ष लब्ध है [समस्त विभिन्नताये उसी की
रूपान्तरमात्र है]
किं च—घटोऽस्ति पटोऽस्ति, घटोऽनुभूयते पटोऽनुभूयते इति
सर्वे पदार्थाः सत्तानुभूतिघटिता एव दृश्यन्ते । अत्र सर्वासु प्रतिपत्तिषु
सन्मात्रमनुवर्तमानं दृश्यत इति तदेव परमार्थं । विशेषास्तु व्यावर्त्त-
मानतया अपरमार्था. रज्जुसर्पादिवत् । यथा रज्जुरधिष्ठानतयाऽनु-
वर्त्तमाना परमार्थसती; व्यावर्त्तमानास्सर्फभूदलनाम्बुधारादयो
अपरमार्था. ।
घट है-पट है, घट की अनुभूति होती है-पट की अनुभूति होती है
इस प्रकार सभी पदार्थ अस्तित्व और अनुभवगम्य प्रतीत होते है। इन
सबकी प्रतीति मे एक अस्तित्ववान् सन् वस्तु अनुस्यूत है, ऐसा निश्चित
है; वह अनुस्यूत सत् ही परमार्थ है, यह मानना चाहिए। बाकी जो वस्तु-
गत विशेषतायें है, जो कि एक दूसरे से भिन्न प्रतीति कराने वाली है;
वे सब, रज्जु सर्प की तरह मिथ्या है। जैसे कि सर्प की अधिष्ठान रज्जु
सत्तावाली होने से सत्य मानी जाती है तथा परिवर्तन शील सर्प, भू भ्रं श
रेखा और जलधारा आदि भ्रामक होने से असत्य माने जाते हैं।
ननु च रज्जुसर्पादौ रज्जुरियं न सर्प इत्यादिरज्वाद्यधिष्ठा-
नयाथाथ्र्यज्ञानेन बाधितत्वात् सर्पादिरपारमार्थ्यम्, न व्यावर्तमान-
त्वात्, रज्वादेरपि पारमार्थ्यं नानुवर्त्तमानतया, किन्तु अबाधितत्वात्।
अत्र त घटादीनामबाधितानां कथमपारमार्थ्यम् ?
(आपत्ति) आपने जो रज्जुसर्प का उदाहरण प्रस्तुत किया उसमें
तो-"यह रज्जु है सर्प नही" इत्यादि अवगति मे रज्जु आदि अधिष्ठान
के यथार्थ ज्ञान हो जाने पर सर्प आदि सबंधी असत्य भ्रान्ति का निरा
करण हो जाता है,परिवर्तन शील होने से उक्त भ्रान्ति का निराकरण
होता हो सो तो है नही । रज्जु आदि की जो यथार्थ रूप से सर्व प्रतीति
है,वह सत्तात्मक नही है अपितु अबाधित है (अर्थात सर्पाकृति रज्जु मे
जिस समय सर्प प्रतीति होती है, उस समय यथार्थ ज्ञान रूपी बाधा तो
उपस्थित होती नही जिससे रज्जु की रज्जुता का ज्ञान हो सके उस
समय तो रज्जु मे सर्प की ही यथार्थ प्रतीति होती है जो कि तात्कालिक
भ्रान्तिमात्र है) पर घट आदि वस्तुओ मे जो भिन्नता की प्रतीति होती है
वह तो नितान्त अबाधित है (अर्थात इसमे तो रज्जु मे सर्प प्रतीति की
भांति कोई दूसरी प्रकार की प्रतीति होती नही जो बाध्य होने पर भ्रान्त
सिद्ध हो सके' यहाँ तो प्रारंभ से अ त तक घट मे घट की ही प्रतीति होती
है) इसलिए इन पदार्थों की भेद प्रतीति को कैसे मिथ्या कहते है ?
उच्यते-घटादौ दृष्टा व्यावृत्तिः सा किंरूपेति विवेचनीयम् ।
किं घटोऽस्तीत्यत्र पटाद्यभावः ? सिद्धं तर्हि घटोऽस्तीत्यनेन पटा-
दीनां बाधितत्वम्; अतो बाधफलभूता विषयनिवृत्तिर्व्यावृत्तिः । सा
व्यावर्तमानानामपारमार्थ्यं साधयति । रज्जुवत्सन्मात्रमबाधितम-
नुवर्त्तते । तस्मात्सन्मात्रातिरेकि सर्वमपरमार्थः । प्रयोगश्च भवति-
सत् परमार्थः, अनुवर्त्तमानत्वात्, रज्जुसर्पादौ रज्ज्वादिवत् , घटाद-
योऽपरमार्थाः व्यावर्तमानत्वात्, रज्जवाद्यधिष्ठान सर्पादिवत् इति ।
एवं सति अनुवर्त्तमानाऽनुभूतिरेव परमार्था, सैव सती ।
(उक्त आपत्ति का निराकरण) घट आदि में दीखने वाली भिन्नता
किस प्रकार की है,यह विवेचनीय विषय है । "घट है" ऐसी प्रतीति में,
क्या पट आदि के अभाव का बोध होता है? यदि ऐसी बात है तो,,-
"घट है" इतना कहने से ही पट आदि के अस्तित्व में बाधा उपस्थित हो
जाती है,जिससे निष्कर्ष निकलता है कि-पटादि विषयक निषेधात्मक जो
व्यावृत्ति (भिन्नता ) है वह घट आदि की बाधता के फल स्वरूप ही
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जो कि पट आदि की व्यावर्त्तमान असत्यता को व्यक्त करती है। रज्जु
की तरह अबाधित सत्ता मात्र का अनुवर्त्तन (अनुसरण) करती है (कोई नई
बात तो करती नही) इससे सिद्ध होता है कि-“सत्” के अतिरिक्त बाकी सब
कुछ असत्य है। ऐसा कहा भी जाता है कि-“सत्” ही एक मात्र सत्य है,
इसी की हर जगह अनुवृत्ति होती है, जैसे कि रज्जु सर्प में रज्जु सत्ता
की अनुवृत्ति है। घट आदि पदार्थ मिथ्या है, क्यो कि वे भी रज्जु आदि
आश्रयो मे व्यावर्तितं सर्प की भाति व्यावर्त्तमान है। इस से निष्कर्ष
निकलता है कि वस्तु में होने वाली अनुभूति वास्तविक सत्य है, और
वही सत् है।
ननु च-सन्मात्रमनुभूतेर्विषयतया ततो भिन्नम्। नैवम्; भेदो हि
प्रत्यक्षाविषयत्वादुर्निरुपत्वाच्च पुरस्तादेव निरस्तः। अत एव
सतोऽनुभूतिविषयभावोऽपि न प्रमाणपदवीमनुसरति; तस्मात्सदनु-
भूतिरेव। सा च स्वतः सिद्धा अनुभूतित्वात्। अन्यतः सिद्धौ घटा-
दिवदननुभूतित्वप्रसंगः। किं च अनुभवापेक्षा चानुभूतेर्न शक्या
कल्पयितुम, सत्तयैव प्रकाशमानत्वात्। न हि अनुभूतिर्वर्त्तमाना
घटादिवदप्रकाशा दृश्यते येन परायतप्रकाशाऽभ्युपगम्येत।
(आपत्ति) यदि आपके मत से एकमात्रसत् ही अनुभूति का विषय
है तब वह भिन्न रूप वाला ही है (क्योकि-जागतिक अस्तित्व वाले
पदार्थों मे भिन्नता का प्रत्यक्ष अनुभव होता है)
(निराकरण) ऐसी बात नही है; प्रत्यक्ष का अविषय तथा दुर्बोध
होने से भेद का निराकरण पहले ही किया जा चुका है। सत् अनुभूति
का विषय होते हुए भी प्रमाणित नही किया जा सकता, सत् की अनुभूति
ही उसका स्वतः प्रमाण है क्योंकि उसकी अनुभूति होती है यदि सत् की
अनुभूति अन्य प्रमाणों से सिद्ध होने लगे तो उसकी घट आदि स्थूलों की
सी अनुभूति होगी, जो कि उसके अपने वास्तविक स्वरूप से नितान्त
विपरीत होगी। अस्तित्त्व की अनुभूति अपनी सत्ता से ही स्वयं प्रकाशित
होती है, इसके लिए अन्य प्रकार की अनुभूति की कल्पना भी शक्य नही
है। घट आदि की अनुभूति की तरह, इस अनुभूति का प्रत्यक्ष प्रकाश
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भी नहीं होता, जिससे उसके प्रकाश को परायत (पराश्रित) कहा
जा सके।
अथैवं मनुषे—उत्पन्नायामप्यनुभूतौ विषयमात्रमवभासते घटो-
ऽनुभूयते इति। न हि कश्चिद् घटोऽयमिति जानन् तदानीमेवाविषय-
भूतामनिदम्भावामनुभूतिमप्यनुभवति । तस्माद् घटादिप्रकाशानि-
ष्पत्तौ चक्षुरादिकरणसन्निकर्षवदनुभूतेः सद्भाव एव हेतुः । तदन-
न्तरमर्थगतकादाचित्कप्रकाशातिशयलिंगेनानुभूतिरनुमीयते ।
यदि ऐसा मानें कि—अनुभूति के होने पर केवल विषय की ही
प्रतीति होती है, जैसे कि घट अनुभूत होता है, सो तो है नहीं। घट की
अनुभूति में नेत्र आदि इन्द्रियों का संपर्क रहता है वैसा इस अलौकिक
सद् अनुभूति में तो होना नहीं यह तो अतीन्द्रिय अनुभूति है, इसका
अस्तित्व मात्र ही अवभासित होता है। घट आदि अनुभूतियों से विल-
क्षण, जागतिक पदार्थों के क्रियाकलापों के अन्दर ही आकस्मिक अलौकिक
प्रकाश के रूप में सत् की अनुभूति की अनुमिति होती है।
एवं तर्हि अनुभूतेरजडाया अर्थवज्जडत्वमापद्यत इति चेत्;
किमिदमजडत्वं नाम ? न तावत् स्वसत्तायाः प्रकाशाकाभिचारः,
सुखादिष्वपि तत्संभवात्, नहि कदाचिदपि सुखादयस्सन्तो नोपल-
भ्यन्ते, अतोऽनुभूतिः स्वयमेव नानुभूयते, अर्थान्तरं स्पृशतोऽङ्गुल्यग्रस्य
स्वात्मस्पर्शवदशक्यत्वादिति ।
यदि कहो कि उक्त मत स्वीकारने से, घट आदि विषयों की तरह,
चिन्मय अनुभूति भी जड़ हो जायगी तो उसकी अजड़ता (चिन्मयता)
का स्वरूप क्या है ? स्वयं प्रकाशित शुद्ध अस्तित्व को तो चिन्मयता कह
नहीं सकते, यदि ऐसा मानेंगे तो सुखादि में भी चिन्मयता की संभावना
हो जायेगी; सुख आदि अनुभूतियाँ कभी भी अनुपलब्ध तो होती नहीं
(उनकी तो सदा उपलब्धि होती है) अनुभूति स्वयं ही अपना भान नहीं
कर पाती जैसे कि-अंगुली के अग्रभाग से समस्त पदार्थों की स्पर्शानुभूति
होती है, पर स्वयं अपने को स्पर्श करने की क्षमता अंगुली में नहीं होती ।
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तदिदमनाकलितानुभवविभवस्य स्वमतिविजृम्भितम्, अनु-
भूतिव्यतिरेकिणो विषयधर्मस्य प्रकाशस्य रूपादिबदनुपलब्धेः
उभयाभ्युपेतानुभूत्यैवाशेषव्यवहारोपपत्तौ प्रकाशस्य धर्मकल्पना-
नुपपत्तेश्च । अतो नानुभूतिरनुमीयते, नापि ज्ञानान्तरसिद्धा, अपितु
सर्वं साधयन्त्यनुभूतिः स्वयमेव सिद्ध्यति । प्रयोगश्च अनुभूतिरन्या-
धीनस्वधर्मव्यवहाराः, स्वसंबन्धादर्थान्तरे तद्धर्मव्यवहारहेतुत्वात्,
यः स्वसंबन्धादर्थान्तरे यद्धर्मव्यवहारहेतुः, स तयोः स्वस्मिन्ननन्या-
धीनो दृष्टः, यथा रूपादिश्वाक्षुषत्वादौ । रूपादिर्हि पृथिव्यादौ स्व-
संबन्धाच्चाक्षुषत्वादि जनयन् स्वस्मिन् न रूपादि संबन्धाधीनश्चाक्षु-
षत्वादौ, अतोऽनुभूतिरात्मनः प्रकाशमानत्वे प्रकाशत इति व्यवहारे
च स्वयमेव हेतुः ।
उक्त प्रकार की आपत्तियां, अनुभूति के महत्व को न जानने वालों
की मनगढन्त कल्पनामात्र हैं । अनुभूति से भिन्न, स्थूल विषयों की, रूप
आदि धर्मों से जैसी अभिव्यक्ति होती है, वैसी उपलब्धि अनुभूति की
तो होती नही। यदि (वादी-प्रतिवादी) दोनों की अनुभूति चिन्तन
के आधार पर ही सारे व्यवहारों की सिद्धि हो जायतो विषय प्रकाशक
नामक अतिरिक्त धर्म कल्पना की आवश्यकता ही क्या है ? अनुभूति
का अनुमान नहीं किया जा सकता और न किन्ही अन्य प्रकार के ज्ञान
से ही उसे सिद्ध किया जा सकता है, अपितु सभी व्यवहारों की साधिका
अनुभूति स्वयं सिद्ध वस्तु है । इसके लिए ऐसा कहा जा सकता है
कि—अनुभूति अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति में किसी अन्य के अधीन नहीं
है, अनुभूति तो अपने से संबद्ध अन्य विषयों के व्यवहार की कारण है ।
जो अन्य विषयों के व्यवहार का हेतु है, वह अपने धर्म और व्यवहार में
दूसरे के अधीन नहीं हो सकती। जैसे कि—श्वेत पीत आदि रूप, जो
स्वसंबंधी पृथिवी आदि का चाक्षुष प्रत्यक्ष कराते हैं, वे स्वयं किसी
पृथक् कारणों की अपेक्षा नहीं करते । इससे सिद्ध होता है कि—
अनुभूति स्वयं प्रकाश होने से, “प्रकाशते” इस व्यवहार की स्वयं ही
कारण है ।
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सेयं स्वयंप्रकाशाऽनुभूतिर्नित्या च, प्रागभावाद्यभावात् ।
तदभावश्च स्वतस्सिद्धत्वादेव । न हि अनुभूतेः स्वतस्सिद्धायाः
प्रागभावः स्वतोऽन्यतो वाऽवगन्तुं शक्यते । अनुभूतिः स्वाभावमवग-
मयन्ती, सती तावन्नावगमयति । तस्याः सत्त्वे विरोधादेव तदभावो
नास्तीति कथं सा स्वाभावमवगमयति ? एवमसत्यपि नावगमयति,
अनुभूतिः स्वयमसती स्वाभावे कथं प्रमाणं भवेत् । नाप्यन्यतोऽव-
गन्तुं शक्यते, अनुभूतेरनन्यगोचरत्वात् । अस्याः प्रागभावे साधयत्
प्रमाणम् “अनुभूतिरियम्” इति विषयीकृत्य तदभावं साधयेत् ।
स्वतस्सिद्धत्वेन इयमिति विषयीकारानर्हत्वात्, न तत्प्रागभावोऽन्यतः
शक्यावगमः, अतो अस्याः प्रागभावाभावात् उत्पत्तिर्न शक्यते
वक्तुम् इति, उत्पत्ति प्रतिबद्धाश्चान्येऽपि भावविकारास्तस्या न
सन्ति ।
ऐसी स्वयं प्रकाशा अनुभूति नित्या है क्योंकि इसमें प्रागभाव आदि
अभावों का अभाव है। यह स्वतः सिद्ध है, इसीलिए इसमें किसी प्रकार
के अभाव नहीं हैं। स्वतः सिद्ध अनुभूति का प्रागभाव,स्वयं यां किसी अन्य
साधन से जाना नहीं जा सकता। अनुभूति अपने अभाव को जानती हुई
भी स्वयं उतना नहीं जानती । क्योंकि, अनुभूति के अस्तित्व में तो उसका
अभाव रहता नहीं,इसलिए वह अपने अभाव को जाने भी कैसे? इसी प्रकार
वह अपने अनस्तित्व को भी नहीं जान सकती। अनुभूति जब स्वयं
अस्तित्व हीन होती है उस समय अपने अभाव को प्रमाणित भी कैसे कर
सकती है ? उसके अभाव को किसी अन्य साधन से भी नहीं जान सकते,
क्यों कि-अनुभूति किसी अन्य से ज्ञेय नहीं है । कोई भी प्रमाण इसके प्राग-
भाव को बतलाने के प्रथम “वह अनुभूति है” ऐसा अस्तित्व का अनुभव करके
ही उसका अभाव बतला सकता है; पर जो स्वयं सिद्ध वस्तु है, उसे “यह”
कहकर संबोधित करना भी शक्य नहीं है । इसलिए अनुभूति के प्रागभाव
को अन्य किसी भी प्रमाण से प्रमाणित नहीं कर सकते । इस प्रकार जब
इसका प्रागभाव ही नहीं सिद्ध होता, तो इसकी उत्पत्ति की बात भी कैसे
कही जा सकती है, और जब इसकी उत्पत्ति असिद्ध हो जाती है, तब अन्य
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(वृद्धिक्षय आदि) होने वाले विकार भी इसमें नहीं है यह भी निश्चित
बात है ।
अनुत्पन्नेयमनुभूतिरात्मनि नानात्वमपि न सहते, व्यापक-
विरुद्धोपलब्धेः । न हि अनुत्पन्नं नानाभूतं दृष्टम् । भेदादे. ।मनुभा-
व्यत्वेन च रूपादेरिवानुभूतिधर्मत्वं न संभवति, अतोऽनुभूतेरनुभव-
स्वरूपत्वादेवान्योऽपि कश्चिदनुभाव्यो नास्या धर्मः यतो निद्धू ्तनि-
खिलाभेदा संवित् । अतएव नास्याः स्वरूपातिरिक्त आश्रयो ज्ञाता
नाम कश्चिदस्तीति स्वप्रकाशरूपा सैवात्मा अजडत्वाच्च । अना-
त्मत्वव्याप्तं जडत्वं संविदि व्यावर्तमानमनात्मत्वमपि हि संविदि
व्यावर्तयति ।
जन्म रहित यह अनुभूति अपने मे अनेकता भी नही सह सकती' क्योकि
अनेकता होने से उसकी व्यापक उपलब्धि से विरुद्धता होती है । जन्म
रहित वस्तु की अनेकता देखी भी नही जाती । अनुभव से होने वाले
भेद आदि की, रूप रस आदि की
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पिण्डात्माभिमानवत् ज्ञातृत्वमपि अध्यस्तम् । ज्ञातृत्वं हि ज्ञानक्रिया-
कर्तृत्वम्, तच्च विक्रियात्मकं जडं विकारिद्रव्याहंकारग्रन्थिस्थम्
अविक्रिये साक्षिणि चिन्मात्रात्मनि कथमिव संभवति ?
(शं०- "मैं जानता हूं" ऐसी ज्ञातृता तो प्रतीति सिद्धा है (फिर कैसे
कहते हैं कि-अनुभूति स्वयं सिद्ध वस्तु है, किसी अन्य से ज्ञेय नहीं है ?)
(समाधान) बात ऐसी नहीं है सीप के टुकड़े में जैसी चांदी की भ्रांति
होती है, वैसी ही" मैं जानता हूं" इस प्रतीति में आत्मज्ञान की भ्रांति
होती है । आत्मा में स्वतंत्र अनुभूति करने का अभाव है । मैं मनुष्य हूं"
ऐसी जो प्रतीति होती है, वह आत्मा से अत्यन्तभिन्न, मनुष्यता आदि
विशिष्ट गुणों से युक्त पांचभौतिक शरीर में होती है जो कि वस्तुतः
आत्मा नहीं है; शरीर में अहं की प्रतीति आत्माभिमान मात्र है जो कि
भ्रांति है । उसी तरह" मैं जानता हूं" यह प्रतीति भी मिथ्या भ्रांति है ।
ज्ञान क्रिया कर्तृत्व ही तो ज्ञातृता है, जो कि विक्रियात्मक, जड, विकारी
द्रव्य अहंकार ग्रन्थि में स्थित है, अविकृत साक्षिस्वरूप चिन्मात्र आत्मा
में ऐसी विकृत ज्ञातृता कैसे संभव है ? (अर्थात विकारी अहंकार ग्रन्थि
में स्थित ज्ञातृता अनात्म है, इसलिए वह भ्रांत और अप्रामाणिक है ।
अनुभूति आत्म स्वरूप है अतः वही सत्य और प्रामाणिक है)
दृश्याधीनसिद्धित्वादेव रूपादेरिव कर्तृत्वादेर्नात्मधर्मत्वम् सुषुप्ति-
मूर्च्छादौ अहं प्रत्ययापाये अपि आत्मानुभवदर्शनेन नात्मनोऽहंप्रत्यय-
गोचरत्वम् । कर्तृत्वेऽहंप्रत्ययगोचरत्वे चात्मनोऽभ्युपगम्यमाने देहस्येव
जडत्वपराक्त्वानात्मकत्वादिप्रसङ्गो दुष्परिहरः । अहंप्रत्यय-
गोचरात् कर्तृतया प्रसिद्धात् देहात् तत्क्रियाफलस्वर्गादेः भोक्तुः
आत्मनोऽन्यत्वं प्रामाणिकानां प्रसिद्धमेव । तथाऽहमर्थात् ज्ञातुरपि
विलक्षणः साक्षी प्रत्यगात्मेति प्रतिपत्तव्यम् ।
ज्ञानाधीन रूप रस आदि की प्रतीति जैसे आत्मा का धर्म नहीं है
वैसे ही ज्ञानाधीन प्रतीति के विषय कर्तृत्व आदि भी आत्मा के धर्म
नहीं है । सुपुप्ति, मूर्च्छा आदि अवस्थाओं में "अहं" प्रत्यय का अभाव रहने
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से आत्मानुभूति नहीं होती, इससे स्पष्ट है कि “अहं” प्रतीति का विषय
आत्मा नही है । आत्मा में कर्तृंता, अहं प्रतीति विषयता, मानने
से देह की तरह जडता, वाह्यपदार्थता और अनात्मता आदि दोष
उसमें घटित हो जावेंगे, जिन्हें उसमें से अलग करना कठिन हो जायेगा
अहं बुद्धि के विषय, कर्त्ता रूप से प्रसिद्ध देह से, उसकी क्रियाओं के
फलस्वरुप प्राप्त होने वाले स्वर्गादि फलो के भोक्ता आत्मा का, जो
प्रभेद है, उसे प्रमाग ज्ञाता लोग जानते ही है उसी प्रकार "अह"
अर्थात ज्ञाता(अहंकार)से भी विलक्षण, साक्षी प्रत्यगात्मा (जीव) है,
ऐसा जानना चाहिए ।
एवमविक्रियाऽनुभवस्वरूपस्यैवा।भिव्यंजको जडोऽप्यहंकारः
स्वाश्रयतयातमभिव्यनक्ति । आत्मस्थतयाऽभिव्यंग्याभिव्यंजनमभिव्यं-
जकानां स्वभावः । दर्पणजलखंडादिर्हि मुखचंद्रबिंबगोत्वादिकं
आत्मस्थतयाऽभिव्यनक्ति । तत्कृतोऽयंजानाम्यहमिति भ्रमः ।
स्वप्रकाशाया अनुभूतेः कथमिव तदभिव्यंग्यजडरूपाहंकारेण अभि-
व्यंगत्वमिति मावोचः, रविकरनिकराभिव्यंग्यकरतलस्य तदभिव्यं-
जकत्वदर्शनात् जालकरंध्रनिष्क्रान्त द्युमणिकरणानां तदभिव्यंगेनापि
करतलेन स्फुटतरप्रकाशो हिद्रष्टचरः । यतोऽहं जानामीति ज्ञाताऽय-
महंमर्थः चिन्मात्रात्मनो न पारमार्थिको धर्मः । अतएव सुषुप्ति-
मुक्त्योः न अन्वेति । तत्र हि अहमर्थोल्लेखविगमेन स्वाभाविका-
नुभवमात्ररूपेण आत्माऽवभासते । अतएव सुप्तोत्थितः कदाचिन्मा-
मप्यहं न ज्ञातवानिति परामृशति, तस्मात् परमार्थतो निरस्त-
समस्तभेद विकल्पनिर्विशेष चिन्मात्रैकरसकूटस्थ नित्य संविदेव
भ्रान्त्या ज्ञातृज्ञेयज्ञान रूप विविध विचित्रभेदा विवर्त्तत इति,
तन्मूलभूता अविद्या निवहंणाय नित्य शुद्धबुद्धमुक्त स्वभाव-
ब्रह्मात्मैकत्व विद्या प्रतिपत्तये सर्वे वेदान्ताः आरभ्यन्ते इति ।
इसी प्रकार अविकृत अनुभव के स्वरूप का अभिव्यंजक, अहंकार
स्वयं जड होते हुए भी, अपने आश्रय से उस अनुभव को, अभिव्यक्त
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करता है। अभिव्यंग्य वस्तु को आत्मस्थरूप से अभिव्यंजित करना ही
अभिव्यंजक का स्वभाव होता है। दर्पण, जल आदि मुख, चन्द्र आदि
को आत्मस्थ रूप से ही अभिव्यक्त करते हैं। इसी प्रकार "मैं जानता हूं"
ऐसी प्रतीति भी व्यंग्यव्यंजक भाव कृत भ्रममात्र है।
स्वयं प्रकाश अनुभूति अपने अभिव्यंग्य जड रूप अहंकार से कैसे
अभिव्यंजित हो सकती है ? ऐसा संशय नहीं करना चाहिए क्योंकि-
सूर्य किरणों से अभिव्यंग्य करतल की अभिव्यंजकता देखी जाती
है। खिड़की के छिद्रों से आने वाली सूर्य किरणों से करतल प्रका-
शित होता है, उस करतल से वे किरणें और अधिक प्रकाशित
होती हैं।
“मैं जानता हूं" इस प्रतीति का ज्ञाता “अहं” आत्मा का
स्वाभाविक धर्म नहीं है, इसलिए सुषुप्ति और मुक्ति में वह संबद्ध
नहीं रहता; उन परिस्थितियों में “अहं” प्रतीति नहीं रहती, आत्मा
केवल स्वभाव सिद्ध अनुभव के रूप में स्वयं प्रकाशित रहता है ।
इसीलिए प्रगाढ निद्रा से उठा हुआ व्यक्ति कभी “मैं अपने को भी
नहीं जानता” ऐसा परामर्श (संदेहात्मक विचार) करता है।
इससे सिद्ध होता है कि-सब प्रकार की भेद कल्पनाओं से रहित
निर्विशेष, चिन्मयमात्र एकरस, कूटस्थ नित्य संवित् (अनुभूति) ही भ्रांति-
वश ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान रूप अनेक विभिन्न भेदों में विवर्त्तित
होती हैं(अर्थात् स्वभाव से उसी प्रकार रहते हुये केवल रूपान्तरित
होती रहती है) उक्त अनुभूति विवर्त्त की मूल कारण अविद्या की
निवृत्ति के लिए ही, नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव ब्रह्मात्मा के अद्वैत
ज्ञान को बतलाने के लिए समस्त वेदांत वाक्य प्रयास करते हैं।
महासिद्धान्तः—तदिदमौपनिषद परमपुरुष वरणीयता हेतु गुण
विशेष विरहिणामनादिपापवासनादूषिताशेषशेमुषीकाणामनधिगतपद
वाक्यस्वरूपतदर्थं याथात्म्य प्रत्यक्षादि सकल प्रमाणवृत्ततदितिक-
र्त्तव्यता रूप समीचीन न्यायमार्गाणां विकल्पासहविविधकुतर्क
कल्ककल्पितमिति न्यायानुगृहीत प्रत्यक्षादि सकल प्रमाणवृत्तया-
थात्म्यविद्भिः अनादरणीयम् ।
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महासिद्धान्त ( शांकरमत निरसन ) उपनिषद प्रतिपाद्य परम
पुरुष की प्राप्ति हेतु उनके गुण ही है' अनादि पाप वासना से दूषित'
खोखली बुद्धि वाले लोग ही उन्हें 'निर्गु ण मानकर' शास्त्र वचनों की
साररहित, कुतर्क पूर्ण काल्पनिक व्याख्या करते है; उन्हें शास्त्र के
प्रकृत पद, वाक्य, वाक्यार्थ तात्पर्य, प्रत्यक्ष आदि प्रमाण और तज्जन्य
ज्ञान के रूप और उनकी इतिकर्त्तव्यता आदि का यथार्थ ज्ञान नहीं
रहता । जो लोग न्यायानुसार समस्त वाक्य और प्रत्यक्ष आदि
प्रमाणों से लब्ध ज्ञान के यथार्थ मर्म को जानते है, उनकी दृष्टि मे
उनका मत अनादरणीय है ।
तथा हि निर्विशेषवस्तुवादिभिर्निविशेषे वस्तुनि इदं प्रमाणम्
इति न शक्यते वक्तुम् । सविशेषवस्तु विषयत्वात् सर्व प्रमाणानाम् ।
यस्तु स्वानुभवसिद्ध इति स्वगोष्ठी निष्ठः समयः सोऽप्यात्मसाक्षिक
सविशेषानुभवादेव निरस्तः । इदमहमदर्शमिति केनचिद् विशेषेण
विशिष्टविषयत्वात् सर्वेषामनुभवानां स विशेषोऽप्यनुभूयमानोऽनुभवः
केनचिद् युक्त्याभासेन निर्विशेष इति निष्कृष्यमाणः सत्ताऽतिरेकिभिः
स्वासाधारणैः स्वभावविशेषैः निष्कृष्टव्यः, इति निष्कर्ष हेतुभूतैः
सत्ताऽतिरेकिभिः स्वासाधारणैः स्वभावविशेषैः सविशेष एवाव-
तिष्ठते । अतः कैश्चिद् विशेषैर्विशिष्टस्यैववस्तुनोऽन्ये विशेषा निर-
स्यंत इति न क्वचिन्निर्विशेषवस्तु सिद्धिः ।
निर्विशेष वस्तु का प्रतिपादन करने वाले, निर्विशेष की वस्तु
सिद्धि में" अमुक प्रमाण है" ऐसा नही कह सकते । क्यों कि-शास्त्र
के समस्त प्रमाण सविशेष वस्तु परक ही हैं। और जो उस निर्विशेष
वस्तु को" स्वानुभव सिद्ध" ही अपने मत का परम्परित सिद्धान्त
बतलाते हैं, वह भी आत्म प्रतीति सिद्ध सविशेष के अनुभव से निरस्त
हो जाता है। "मैंने इसे देखा है" ऐसे अनुभव में किसी विशेषण
से विशिष्ट वस्तु की ही प्रतीति होती है (अर्थात अनुभव सगुण वस्तु
पर ही आधारित रहता है, जो वस्तु कभी भी दृश्य संभव नहीं है'
उसके लिए" अनुभवसिद्ध" कैसे कह सकते हैं) अनुभव गम्य सविशेष
( ६१ )
वस्तु को यदि किसी थोथी युक्ति से निर्विशेष सिद्ध किया जाय तो
वैसा करने में भी अस्तित्व हीन उस वस्तु को अपने से विलक्षण
स्वभाव विशेष विशेषित मानना पड़ेगा और तब वह अस्तित्वहीन
वस्तु अपने से विलक्षण स्वभाव विशेष से विशेषित होने पर स्वतः
ही सविशेष सिद्ध हो जायगी । वस्तु के, किसी भी विशेषण से
विशेषित होने पर उस वस्तु की अन्य विशेषतायें निरस्त हो
जाती हैं इसलिए किसी भी प्रकार निर्विशेष वस्तु की सिद्धि नहीं हो
सकती [अर्थात् वस्तु की सत्ता मानने पर, उसमें कोई न कोई विशेषता
तो स्वीकारनी ही पड़ेगी अन्यथा उसकी सत्ता सिद्ध न हो सकेगी,
सत्ता मानना ही उसे सविशेष स्वीकारना है]
धियो हि धीत्वं स्वप्रकाशता च ज्ञातुर्विषय प्रकाशनस्वभावतयोप-
लब्धेः । स्वापमदमूर्च्छासु च सविशेषएवानुभवः इति स्वावसरे
निपुणतरमुपपादयिष्यामः । स्वाभ्युपगताश्च नित्यत्वादयो हि अनेके
विशेषाः सन्त्येव । ते च न वस्तुमात्रम् इति शक्योपपादनाः, वस्तु-
मात्राभ्युपगमे सत्यपि विधाभेद विवाददर्शनात् स्वाभिमततद् विधा-
भेदैश्च स्वमतोपपादनात्, अतः प्रामाणिक विशेषैर्विशिष्टमेव वस्तु
इति वक्तव्यम् ।
ज्ञातव्य विषय को प्रकाशित करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति के
कारण, ज्ञाता की ज्ञातव्यता और स्वप्रकाशता सदा बनी रहती है । निद्रा
मद मूर्च्छा आदि में जो अनुभूति होती है वह भी सविशेष ही होती है,
इन विषयों के विवेचन के अवसर में भलीभाँति सतर्क विवेचन करेंगे ।
वस्तु में अपनी अभिन्न नित्यता आदि अनेक विशेषतायें तो रहती ही हैं ।
वे विशेषतायें वस्तुमात्र में ही नहीं रहतीं (सभी जगह रहती हैं) ऐसा
प्रतिपादन करने की चेष्टा करोगे तो सामान्य वस्तुओं में जो विभिन्नभेद
देखे जाते हैं वे सभी भेद तुम्हारी स्वीकृत अपनी वस्तु में भी घटित होंगे
जिससे यह सिद्ध हो जायगा कि तुम अपने मत में विभिन्न भेदों को भी
स्वीकारते हो । फिर तो तुम्हें "वस्तु प्रामाणिक विशेषताओं से विशिष्ट
है" ऐसा भी कहना पड़ेगा ।
( ५२ )
शब्दस्य तु विशेषेण सविशेष एवं वस्तुनि अभिधान सामर्थ्यम्
पदवाक्यरूपेणप्रवृत्तेः। प्रकृति प्रत्यययोगेन हि पदत्वम् । प्रकृतिप्रत्ययोरर्थ
भेदेन पदस्यैव विशिष्टार्थप्रतिपादमवर्जनीयम् । पदभेदश्चार्थभेदनिब-
न्धनः, पदसंघातरूपस्य वाक्यस्यानेकपदार्थसंसर्गविशेषाभिधायित्वेन
निर्विशेष वस्तु प्रतिपादनासामर्थ्यात् न निर्विशेषवस्तुनि शब्दः
प्रमाणम् ।
शब्द की, विशेष रूप से, सविशेष वस्तु के प्रतिपादन में ही, अभि-
धा शक्ति होती है (अर्थात् शब्द सविशेष वस्तु का ही बोध करा सकता
है) क्यों कि-वह पद और वाक्यों के रूप से ही वस्तु का वर्णन करता
है । प्रकृति और प्रत्यय के योग से ही शब्द पदरूप प्राप्त करता है ।
प्रकृति और प्रत्यय में स्वाभाविक अर्थ भेद रहता है, जिससे पद को
विशिष्ट अर्थ प्रतिपादकता अनिवार्य हो जाती है (अर्थात् पद विशिष्ट का
ही प्रतिपादन करता है, ऐसा निश्चित हो जाता है क्यों कि विशेषण और
विशेष्य भाव में दोनों पदों का अर्थ भिन्न होता है, जैसे नील कमल, यहाँ
कमल पद विशेष्य और नील पद विशेषण है, दोनों पद क्रमशः पुष्प और
वर्ण विशेष के बोधक हैं । "जलज" पद में "जल" प्रकृति और "ज"
प्रत्यय है, ये दोनों ही विभिन्न अर्थविबोधक हैं, दोनों प्रकृति के संहित रूप
"जलज" पद का अर्थ जल से उत्पन्न होने वाला होता है) अर्थ भेद से ही
पद भेद होता है, तथा अनेक पदों का संहित रूप वाक्य होता है जोकि
अनेक पदों के अर्थों का बोध कराता है । इससे सिद्ध होता है कि वाक्य भी
विशेष अर्थविबोधक होता है, उसमें निर्विशेष वस्तु के प्रतिपादन की
क्षमता नहीं है । इसलिए निर्विशेष वस्तु में शब्द प्रभाव नहीं है; यह
निश्चित बात है ।
प्रत्यक्षस्य निर्विकल्पकसविकल्पकभेदभिन्नस्य न निर्विशेष
वस्तुनि प्रमाणभावः । सविकल्पकं जात्यादि अनेकपदार्थविशिष्ट
विषयत्वादेव सविशेष विषयम् । निर्विकल्पकमपि सविशेषविषयमेव,
सविकल्पके स्वस्मिन्ननुभूतपदार्थविशिष्टप्रतिसंधान हेतुत्वात् ।
निर्विकल्पकं नाम केनचिद् विशेषेण वियुक्तस्य ग्रहणम् , नसर्वविशेष
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रहितस्य, तथाभूतस्य कदाचिदपि ग्रहणादर्शनादनुपपत्तेश्च केनचिद्
विशेषेण इदमित्थमिति हि सर्वा प्रतीतिरूपजायते, त्रिकोण सास्नादि
संस्थान विशेषेण विना कस्यचिदपि पदार्थस्य ग्रहणायोगात्-
अतोनिर्विकल्पकमेकजातीय द्रव्येषु प्रथम पिण्ड ग्रहणम् । द्वितीयादि
पिण्डग्रहणं सविकल्पमित्युच्यते । तत्र प्रथम पिण्डग्रहणे गोत्वादेरनु-
वृत्ताकारता न प्रतीयते । द्वितीयादि पिण्डग्रहणेष्वेवानुवृत्तिप्रतीतिः
प्रथम प्रतीत्यनुसंहितवस्तुसंस्थानरूपगोत्वादेरनुवृत्तिधर्मं विशिष्टत्वं
द्वितीयादि पिण्ड ग्रहणावसेयमिति, द्वितीयादि ग्रहणस्य सविकल्पकत्वं
सास्नादिवस्तुसंस्थानरूप गोत्वादेरनुवृत्तिर्न प्रथम पिण्ड ग्रहणे
गृह्यत इति, प्रथम पिण्ड ग्रहणस्य निर्विकल्पकत्वम् । नपुनः संस्थानरूप
जात्यादेरग्रहणात् संस्थान रूप जात्यादेरपि-ऐन्द्रियकत्वाविशेषात् ,
संस्थानेन विना संस्थानिनः प्रतीत्यनुपपत्तेश्च प्रथम पिण्ड
ग्रहणेऽपि ससंस्थानमेव वस्तु इत्थम् इति गृह्यते, अतोद्वितीयादि पिण्ड
ग्रहणेषु गोत्वादेरनुवृत्तिधर्मविशिष्टता संस्थानिवत् संस्थानवच्च सर्वदैव
गृह्यत इति तेषु सविकल्पकत्वमेव । अतः प्रत्यक्षस्य कदाचिदपि न
निर्विशेष विषयत्वम् ।
निर्विकल्पक सविकल्पक भेद वाले प्रत्यक्ष की निर्विशेष वस्तु में
प्रमाणता नहीं हो सकती । सविकल्प प्रतीति, जाति आदि अनेक विशेष-
ताओं से विशिष्ट विषय वाली होती है, इसलिए वह तो सविशेष विषयक
ही है । निर्विकल्पक भी सविशेष विषयक ही है क्यों कि -सविकल्पक
प्रतीति में जात्यादि विशिष्ट विषयों की, निर्विकल्पक प्रतीति, की
स्मृति होती है । किसी एक विशिष्ट विशेषता से रहित वस्तु, संबंधी
ज्ञान को निर्विकल्पक ज्ञान कहते हैं, समस्त सामान्य विशेषताओं से रहित
को नहीं । समस्त सामान्य विशेषताओं से रहित वस्तु तो कभी उपलब्ध
हो ही नहीं सकती । “अमुक वस्तु” ऐसी प्रतीति में किसी न किसी प्रकार
की विशेषता से युक्त वस्तु की ही उपलब्धि होती है । सास्ना आदि चिन्ह्
विशेष के बिना गो पदार्थ की प्रतीति नहीं हो सकती । एक जातीय द्रव्य
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में सर्व प्रथम जो स्वरूप ज्ञान होता है वह निर्विकल्पक तथा द्वितीय स्व-
रूप ज्ञान सविकल्पक होता है। प्रथम बार स्वरूप देखने पर गाय के परि-
चायक समस्त चिन्हों की सहसा प्रतीति नही होती, द्वितीय आदि दृष्टियों
में समस्त विशेषताओं की प्रतीति हो जाती है। प्रथम प्रतीति में वस्तु की
संस्थान (अवयव संयोजन रूप) जिस गोत्व की प्रतीति होती है द्वितीय
आदि दृष्टियो में उस संस्थान की पूर्ण उपलब्धि हो जाती है, वही सवि-
कल्पकता है। सास्ना लांगूल ककुद खुर विषाण आदि चिन्हों वाली गौ
प्रथम दृष्टि मे ही प्रतीत नहीं हो पाती, यही निर्विकल्पकता है। संस्थान
(आकृति) की जाति आदि की प्रतीति न होने से निर्विकल्पकता होती हो
सो बात नहीं है; जात्यादि की प्रतीति भी इन्द्रियवेद्य ही होती है, आकृति
प्रतीति के बिना ,आकृति विशेष की प्रतीति तो संभव है नहीं प्रथम
आकृति दर्शन में भी आकृति ही “यह वस्तु ऐसी है” उस वस्तु विशेष की
प्रतीति होती है। द्वितीय तृतीय आदि गोपिड दर्शनों में जैसे संस्थान
(अवयव विन्यास) और सस्थानी (गौ) की प्रतीति होती है, वैसी ही
धर्मानुगत गोत्व प्रतीति सदा होती है यही सविकल्पक विषयक प्रतीति है।
इससे सिद्ध होता है, कि प्रत्यक्ष कभी भी निर्विशेष विषयक नहीं होता।
अत एव सर्वत्रभिन्नाभिन्नत्वमपि निरस्तम् । इदमित्थं इति
प्रतीतौ इदमित्थम्भावयोरैक्यं कथमिव प्रत्येतुं शक्यते ? तत्रेत्थंभावः
सास्नादिसंस्थानविशेषः, तदविशेष्यंद्रव्यमिदमंशइत्यनयोरैक्यं
प्रतीतिपराहतमेव । तथाहि प्रथममेव वस्तु प्रतीयमानं सकलेतर
व्यावृत्तमेव प्रतीयते । व्यावृत्तिश्च गोत्वादिसंस्थानविशेष
विशिष्टतयेत्थमिति प्रतीतेः । सर्वत्र विशेषणविशेष्यभाव
प्रतिपत्तौ तयोर्त्यन्तभेदः प्रतीत्यैव सुव्यक्तः । तत्र दंड कुंडला-
द्यः पृथक् संस्थान संस्थिताः स्वनिष्ठाश्च कदाचित् क्वचित्
प्रकारान्तर विशेषण तयावतिष्ठन्ते । गोत्वादयस्तु द्रव्यसंस्थानत-
यैव पदार्थभूतास्संतो द्रव्यविशेषणतया अवस्थिताः । उभयत्र
विशेषणविशेष्यभावः समानः तत एव तयोर्भेद प्रतीतिश्च ।
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इयांस्तु विशेषः पृथक्स्थिति प्रतिपत्तियोग्या दंडादयः, गोत्वादयस्तु
नियमेन तदनर्हाः इति । अतो वस्तु विरोधः प्रतीतिपराहत एव
प्रतीतिप्रकार निह्नवोच्यते । प्रतीतिप्रकारो हि इदमित्थं इत्येव
सर्व सम्मतः । तदेत्सूत्रकारेण “नैकस्मिन्न संभवात्” इति सुव्यक्त-
मुपपादितम् । अतः प्रत्यक्षस्य सविशेषविषयत्वेन प्रत्यक्षादि दृष्ट
संबंधविशिष्टविषयत्त्वादनुमानमपि सविशेषविषयमेव । प्रमाण-
संख्याविवादेऽपि सर्वाभ्युपगत प्रमाणानामयमेव विषय न केनापि
प्रमाणेन निर्विशेष वस्तुसिद्धिः । वस्तुगतस्वभावविशेषैस्तदेव
वस्तु निर्विशेषमिति वदन् जननीवंध्यात्व प्रतिज्ञायामिव स्ववाग्विरोध-
मपि न जानाति ।
जो लोग सब जगह भेदाभेद संबंध मानते हैं, उक्त विचार के आधार
पर, वह मत भी परास्त हो जाता है । “इदं-इत्थं” इस प्रकार की
प्रतीति में “इदं और इत्थं” इन दो भावों की एकता कैसे कही जा सकती
है ? सास्नादि संस्थान विशेष “इत्थं” पद वाच्य तथा उससे अविशिष्ट
द्रव्य “इदं” पद वाच्य है, इन दोनों की ऐक्य प्रतीति असंभव ही है।
जब वस्तु की प्राथमिक प्रतीति होती है, वह सबसे विलक्षण होती है।
गोत्वादि संस्थान विशेष विशिष्टता ही विलक्षणता का कारण है जो कि
“इत्थं” रूप से प्रतीत होती है। सब जगह विशेषणविशेष्य भाव की
प्रतिपत्ति में, विशेषणविशेष्य के अत्यन्त भेद की सुस्पष्ट प्रतीति होती
है। दंड कुंडल आदि, पृथक संस्थान संस्थित और स्वनिष्ठ आकृतियाँ हैं,
कभी कहीं दूसरे द्रव्य के विशेषण के रूप से भी स्थित रहती हैं। तथा
गोत्व आदि द्रव्य संस्थान, पदार्थ भूत होकर उसी द्रव्य के विशेषण रूप
से स्थित रहते हैं। दोनों ही जगह विशेषणविशेष्य भाव समान है तथा
उसी प्रकार विशेषणविशेष्य भाव की भेद प्रतीति भी समान है
विशेषता केवल इतनी ही है कि-दंड कुंडल आदि पृथक् पृथक् संस्थान
संस्थित होने से, प्रतिपत्ति करने योग्य हैं गोत्व आदि एक संस्थान में
नियमित होने से, प्रतिपत्ति योग्य नहीं है। इसलिए वस्तु की भिन्नता की
बात, परास्त हो जाती है; प्रतीति का प्रकार जरा छिपा कर
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