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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 696 में से

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पृष्ठ 118

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प्रकारान्तर से बतलाया गया है; वस्तुतः कोई भेद नही है। “इदं-
इत्थं” ही सर्व सम्मत प्रतीति का प्रकार है। इस तथ्य को सूत्रकार
“नैकस्मिन्न संभवात्” में सुस्पष्ट रूप से समर्थन करते है। प्रत्यक्ष
की सविशेषप्रमाणता निश्चित हो जाने से, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से
ज्ञात संबन्ध विशेष वाले अनुमान की भी सविशेष प्रमाणता निश्चित हो
जाती है, प्रमाणों की संख्या के विषय में शास्त्रकारों का मतभेद है,
पर जितने भी भेद हैं; सभी सविशेष वस्तु को ही प्रमाणित करते है;
किसी भी प्रमाण से निर्विशेष वस्तु की सिद्धि नही हो सकती। प्रत्येक
वस्तु का अपना एक विशेष स्वभाव होता है, यदि ऐसी विशेष स्वभाव
वालो वस्तु को निर्विशेष कहा जाता है तो वह वैसी ही अज्ञानता है, जैसे
कोई प्रतिज्ञा करे कि “मै बन्ध्या का पुत्र हूँ”। इस बेचारे को अपने
वाग् विरोध तक का ज्ञान नही होता ।
यत्तु प्रत्यक्षं सन्मात्रग्राहित्वेन न भेदविषयम्, भेदश्च
विकल्पासहत्वादुर्निरूपः इत्युक्तम्, तदपि जात्यादिविशिष्टस्यैव
वस्तुनः प्रत्यक्षविषयत्वाज्जात्यादेरेव प्रतियोग्यपेक्षया वस्तुनः
स्वस्य च भेदव्यवहारहेतुत्वाच्च दूरोत्सारितम् संवेदनवद्
रूपांदिवच्च परम्व्यवहारविशेषहेतोः स्वस्मिन्नपि तद् व्यवहार
हेतुत्वं युष्माभिरभ्युपेतं भेदस्यापि संभवत्येव; श्रत एव च मानव-
स्थान्योन्याश्रयणंच। एकक्षणवर्त्तित्वेऽपि प्रत्यक्षज्ञानस्य तस्मि-
न्ने वक्षणे वस्तुभेदरूप तत्संस्थानरुप गोत्वादेर्गृहीतत्वात् क्षणान्तर
ग्राह्यं न किंचिदिह तिष्ठति ।
जो यह कहा कि प्रत्यक्ष प्रमाण सद्‌वस्तु मात्र ग्राही होता है, इस-
लिए भेद विषयक नही है, तथा भेद विकल्प को न सहने से दूर्निरूप है।
सो इसमें भी, कथन यह है कि—जात्यादि विशिष्ट वस्तु की ही प्रत्यक्ष
विषयता होती है वे जाति आदि ही उस वस्तु की अन्य वस्तुओं से
भिन्नता ज्ञापन करते है। संवेदन और रूपरस आदि जैसे आश्रय के
परिचय विशेष का ज्ञापन करके अपना भी परिचय ज्ञापन करते हैं उसी
प्रकार अन्य पदार्थ भी अपरवस्तु के व्यवहार विशेष का ज्ञापन करके