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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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की भी प्रतीति हो जाय तो घोड़ा के समान हाथी को भी चाबुक से
हाँकने की चेष्टा हो सकती है तथा घोड़े को अंकुश से । क्यों कि भिन्न
प्रकार की स्मृति तो रहेगी नही] यदि प्रत्येक संवेदन को एक विशेष संवे-
दन मानेंगे तो प्रत्यक्ष की विशिष्टार्थ विषयता माननी पड़ेगी । सभी
प्रतीतियों की एक विषयता मानने में एक ही प्रतीति से सभी विषयों की
प्रतीति हो जानी चाहिए जिसके फलस्वरूप अंधे, बहरे आदि भेदों का
अभाव हो जाना चाहिए [पर ऐसा होता नहीं, इसलिए उक्त सभी
संभावनाये शक्य नहीं हैं]
न च चक्षुषा सन्मात्रं गृह्यते, तस्यरूपरूपिरूपैकार्थ ग्राहित्वात्
नापि त्वचा, स्पर्शवद् वस्तुविषयत्वात् । श्रोत्रादीन्यपि न सन्मात्र
विषयाणि; किन्तु शब्दरसगंधलक्षणविशेषविषयान्येव । अतः
सन्मात्रस्य ग्राहकं न किंचिदिह दृश्यते ।
शुद्ध सद् वस्तु नेत्र से तो देखी नहीं जा सकती क्यों कि नेत्र रूप
और रूप युक्त वस्तु को ही देख पाते हैं । त्वचा से भी ग्राह्य नहीं है क्यों
कि त्वचा स्पर्शवान