सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

२४ स्पन्दकारिका
(२) प्रथमाभासित नील तद्ग्राहकभावापेक्षा से संहर्तृत्व है ।
(३) अवभासमान पीत तद्ग्राहकभावापेक्षा से स्रष्टृत्व है ।
(४) विच्छिन्नताभासापेक्षा से स्थिति हेतुता है ।
(५) अन्तःसंस्काररूपतापादित आभासापेक्षा से विलयकारित्व है ।१
(६) शुद्धसंविदैक्यापन्न प्रविलापित स्मृत्यादि बीजाभावाभास की अपेक्षा से
अनुग्रहीतृत्व है ।२
इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि ऐसी कोई भी दशा नहीं है जिसमें कि
परमात्मा का पञ्चकृत्यकारित्व सिद्ध न हो—'सर्वदा सर्वासु दशासु पञ्चविधकृत्यकारित्व
माहेश्वरमेव एक रूपं सर्वत्र जृंभमाणमेव स्थितम् इति ।।'३
चिच्चक्रैश्वर्यात्मा में स्वस्वभाव शङ्कर रूप स्वप्रकाश में किसी योगी की धिषणा
अधिरोहण करती है किन्तु संसारी लोगों की नहीं ।४ जो कुछ भी आभासित होता है वह
सब कुछ 'प्रकाश' मात्र है क्योंकि अप्रकाश में प्रकाश की वर्तमान युक्ति संगत नहीं है—
'यावत् किञ्चित आभासते तत् सर्वं प्रकाशमयमेव अप्रकाशस्य प्रकाशनानुपपत्ते इति युक्ति-
वशेन स्वप्नसंकल्पादिदौ संविद एव आभासोल्लासहेतुत्वं दृष्टम् ।'५ अर्थात् संकल्पादि में
भी संवित् तत्त्व का उल्लास ही मूल कारण है ।६
सामान्य अनुभव भी यही ज्ञापित करता है कि प्रकाशस्वरूप भगवान् शिव का
प्रकाश यह विश्व है: 'अनुभवानुसारेण च प्रकाशस्यैव भगवतः प्रकाशमानं विश्वम् ।'७
'शक्तिचक्रविभवप्रभवं'—उस परमात्मा की शक्तियों का चक्र (संयोजनादि-
वैचित्र्य-व्यवस्थित समुदाय) । 'विभव' = वह विश्व समुदाय ही उसका वैभव या
स्फीतता है । 'प्रभवः'—उसकी उत्पत्ति । (प्रभवति अस्मात् इति प्रभवः) 'अवभासन'
परमार्थस्वस्वभाव ही है जो उसको । कहा भी गया है—
'यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवः ।
तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥'
'शक्तिचक्र'—(दूसरा अर्थ)—इन्द्रिय वर्ग । 'विभव'—निज निज विषय
प्रवृत्त्यादिक वैभव ।। 'प्रभवं'—उसका प्रादुर्भाव । कहा भी गया है—
'यतः करणवर्गोऽयं विमूढो मूढवत् स्वयम् ।
सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहतीः ॥' (१।६)८
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि इस श्लोक के द्वारा 'विश्वोत्तीर्ण' एवं 'विश्वमय'
शिव का ही कुलत्रिकादि प्रतिपादन किया गया है । आम्नायों के उपदेशों के द्वारा
स्वस्वभाव शङ्कर का ही यहाँ प्रतिपादन किया गया है न कि वेदान्तियों के ब्रह्म का ।
क्योंकि वेदान्तियों का ब्रह्म विश्वातिरिक्त है—'विश्वं यत्र तदेव ब्रह्म' ।९ क्षेमराज अपने
शब्दों में कहते हैं—
'शङ्करः इति उपपादितम् न तु वेदान्तवादिवत् 'विश्वं यन्न तदेव ब्रह्म ।'१०
१-७. स्पन्दसन्दोह । ८. स्पन्दकारिका । ९-१०. स्पन्दसन्दोह ।

प्रथमः निष्यन्दः २५
'शक्तिचक्रस्य' = करणेopenedचक्र का—अर्थात् करणरूप शक्तिवर्ग का । 'विभव' =
विचित्र सृष्टिसंहारादिकारित्व । 'प्रभवं' = उसके क्रमार्थावभासनकारित्वकृत अक्रम महा-
प्रकाशमय को । कहा भी गया है—'सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहती:' (१।६)१
'चक्र'—आन्तरचक्र (न कि अन्तःकरणत्रय क्योंकि वह करणवर्ग के रूप में स्वीकृत है ।)
'शक्तिचक्रं'—मन्त्रगण में मुद्रासमूह । 'विभव:'—उसका जो विभव है अर्थात्
त्रिविध सिद्धि-साधन-समर्थत्व । 'प्रभवं'—क्षितोत्पत्तिविश्रानितस्थान ।२ कहा भी गया
है— 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्त्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ।। (२६)३
'अत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः ।' (२।१)
'विभव'—त्रिविधा सिद्धि—१. पर २. अपर ३. परापर । ('विभव' ) ।।
आचार्य क्षेमराज का कथन है कि—'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ'
श्लोक में यद्यपि परमात्मा के मात्र दो कृत्यों (१) सृष्टि एवं (२) प्रलय मात्र का ही उल्लेख
किया गया है तथापि यह पञ्चकृत्यों का सूचक (उपलक्षणक) है । परमात्मा के पञ्चकृत्य हैं
क्या?—'आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापन-विलापनात्म-पञ्चविधकृत्यानि' ।
'ईश्वराद्वयदर्शन' एवं ब्रह्मवादी दर्शन में भेद-दृष्टि—ईश्वराद्वयवादी परमात्मा में
पञ्चकृत्यों की विद्यमानता स्वीकार करते हैं किन्तु ब्रह्मवादी वेदान्ती नहीं स्वीकार करता ।
'तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति ।। १० ।।
इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्यः श्रयमेव विशेषः यत्—
'सृष्टि-संहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।'
इति श्रीमत्स्वच्छादि शासनेाक्तनीत्या सदा पञ्चविधकृत्यकारित्वं चिदात्मनो भग-
वतः । यथा च भगवान् शुद्धेतराध्व स्फारक्रमेण स्वस्वरूपविकासरूपाणि सृष्ट्यादीनि
करोति, 'तथा'—संकुचितचिच्छक्तितया संसारभूमिकायामपि 'पञ्चकृत्यानि' विधत्ते ।'४
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—देह प्राणादि पद में प्रविष्ट होते हुए, चिदात्मा
महेश्वर, बहिर्मुख होने की दशा में नीलादि वस्तु को नियत देश एवं नियत काल में वस्तु
का आभास होना ही 'सृष्टि' है । नियत देशकाल में भिन्न अन्य आभासांश ही 'संहार'
है । नीलाद्याभासांश में स्थापकता, वस्तुओं का ऐक्यभाव से प्रकाशन ही 'अनुग्रह' है ।
इसके अतिरिक्त भगवान् के सतत पञ्चविध कृत्यकारित्व का विस्तार से मैंने 'स्पन्द-
सन्दोह' में निर्णय किया है ।'५
परमात्मा के पञ्चकृत्य
आभासन रक्ति विमर्शन बीजावस्थापन विलापन
१. स्पन्दकारिका । २. स्पन्दसन्दोह ।
३. स्पन्दकारिका । ४-५. आचार्य क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्।

२६ स्पन्दकारिका
'आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापन-विलापनतस्तानि ।। ११ ।।'१
परमात्मा के पञ्चकृत्य
┌──────┬──────┬──────┬──────┐
सृष्टि संहार विलय स्थिति अनुग्रह
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।'२
'नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्यविधायिने ।
चिदानन्दघनस्वात्म परमार्थविभासिने ।।'
'शङ्कर'—शं + करं ।। 'शं'—अशेष उपद्रव (भेदप्रथनात्मक उपद्रव) से रहित
परमानन्दाद्वय चैतन्य प्रकाश प्रत्यभिज्ञापनात्मक अनुग्रह । 'करं'—करोति इति करः ।
करने वला । 'तं' = स्वात्मपरमार्थ शङ्कर को । 'स्तुमः' = समस्त देह—प्राणादि
परिमित-प्रमातृ पदं को अधस्पदीकृत करके विकल्प-अविकल्प आदि समस्त रूपों में एवं
समस्त दशाओं में 'सर्वोत्कृष्ट होने के कारण मन ही मन सोचता हूँ' ।।
'स्तुमः'—परामृशामः । 'स्तुमः'—पद में बहुवचन का प्रयोग क्यों ? 'तं' =
असाधारण स्वरूपप्रत्यभिज्ञापनार्थ' 'शक्तिचक्र' = इन्द्रिय वर्ग ।
'प्रलयोदयौ' = प्रलयोदय । निमज्जन-उन्मज्जन । समावेश ।
(१) चिदात्मा का उन्मज्जन = 'समावेश' है ।
(२) जगत् का उन्मज्जन = 'व्युत्थान' है ।
(३) अभिन्नता का जो उन्मेष है वही जगत् का 'प्रलय' है ।३
(क) वेदान्तियों का ब्रह्म—'विश्वातीतः'
(ख) तांत्रिकों का परमशिव—१) विश्वमय २) विश्वातीत ।
त्रिकनय में 'परमपद' का स्वरूप—आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि न तो
'विश्वमय' और न तो 'विश्वातीत' प्रत्युत् 'विश्वमयविश्वातीत' पद ही परमपद है । शिव
विश्वमय एवं विश्वातीत दोनों है । शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ।' 'जगत्
परमात्मा की शक्ति है ।'
मूल में दो ही विद्यायें हैं—(१) 'कादिविद्या' (२) 'हादिविद्या' । कादि विद्या
में सृष्टि का उदय 'काम' (संकल्प) से माना गया है । हादि विद्या में सृष्टि—आकाशवत्
अव्यक्त शिव की माया शक्ति से माना गया है । उपनिषदों में भी कादि विद्या का समर्थन
किया गया है—
(१) तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति'४ अर्थात् उसने इच्छा की कि सृष्टि करने हेतु मैं
एक से अनेक होकर उत्पन्न हो जाऊँ ।
१. आचार्य क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । २. स्वच्छन्दतंत्र (पटल १) ।
३. स्पन्दसन्दोह (पृ० १४)। ४. छान्दोग्योपनिषद (६।२।३) ।

प्रथमः निष्यन्दः २७
(२) स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति, स इमान लोकानसृजत् । (उसने इच्छा की कि
लोकों की सृष्टि करूँ । उसने लोकों की सृष्टि की)१
(३) स ईक्षांचक्रे, स प्राणमसृजत् ॥२
(उसने इच्छा की और प्राण का सृजन किया)
आदि इच्छाशक्ति महात्रिपुरसुन्दरी हैं । ‘तं’ = उन भगवान् परमशिव को ।
‘स्तुमो’ (नुमः) = नमस्कार करते हैं । ‘शङ्करं’ = ‘शं’ = ‘भोगापवर्गाख्यं शं’ = श्रेय
या सुख ॥ (‘भोगापवर्गाख्यं शं श्रेयः सुखं वा करोतीति शङ्करः’)३ ‘स्तुमः’—कैसी
स्तुति? ‘तत्स्वरूपानुवेश एव स्तुतिः । कः स्तोता? कः स्तुत्यः? का वा स्तुतिः?—
क्योंकि—भगवद्व्यतिरेकेण न च स्तुत्योऽस्ति मानिनाम् ।’४ स्तुति क्यों ? क्योंकि वह
‘भगवान’ है । भगवान् क्यों है? क्योंकि—उसमें छः भग विद्यमान हैं—भग क्या है?
‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य ज्ञानस्य यशसः श्रियः ।
वैराग्यस्य च मोक्षस्य षण्णां भग इति स्मृतः ॥५
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य भूतानामगतिमगतिम् ।
वेत्ति विद्यामविद्या च स वाच्यो भगवानिति ॥६
‘शक्तिचक्रविभवप्रभव शङ्कर’—भगवान् शङ्कर ‘प्रभव’ (शक्तियों के उत्पत्ति-
स्थान्) हैं वे अपने को ७ प्रमाताओं के रूप में प्रकट करते हैं जो निम्न हैं—१. शिव
२. मन्त्रमहेश्वर ३. मन्त्रेश्वर ४. मन्त्र ५. विज्ञानाकल ६. प्रलयाकल ७. सकल ॥ वे
समस्त शक्तियों के स्वामी हैं—उनके बीज हैं ।
‘शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः’—‘शक्तिचक्र विभवप्रभव’ शङ्कर की ही वन्दना
क्यों ? शक्ति-रहित स्वतन्त्र शङ्कर की वन्दना क्यों नहीं ? क्योंकि—
१. शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥७
भाव यह कि यदि ‘शिव’ शक्ति से युक्त न रहे तो वे इतने अशक्त एवं असमर्थ हो
जायेंगे कि अपने स्थान से हिल भी नहीं सकते ॥
२. ‘शिव’ पद में इकार शक्ति का वाचक है । यदि इसे निकाल दिया जाय तो
‘शिव’ ‘शव’ मात्र शेष रह जायेंगे ।
‘तं स्तुमः’—‘तं कम्’ (उस किसको?)८ ‘उसको’ जिसके उन्मेष से—औन्मुख्य
से, जगत् का (विश्व का) ‘प्रभव’—(सन्तति) निष्पादित होता है: ‘यदुन्मेषादौन्मुख्या-
ज्जगतो विश्वस्योदयः प्रभवः सन्ततिरिति यावत् ॥९ ‘निमेषात्’—‘जिसके विश्राम से
१. ऐतरेयोपनिषद (१।१।१) । २. प्रश्नोपनिषद (६।३) ।
३-५. स्पन्दप्रदीपिका में उद्धृत । ६. विष्णुपुराण ।
७. शंकराचार्य (सौन्दर्यलहरी) ८-९. स्पन्दप्रदीपिका ।

२८ स्पन्दकारिका
प्रलय हो जाता है । (‘निमेषाद्विश्रामात् प्रलयोऽप्ययः ।’)^१ इन शङ्कर के अतिरिक्त अन्य
किसी के द्वारा जगत् की सृष्टि एवं प्रलय हो पाना संभव नहीं है (‘न ह्येतद्व्यतिरिक्तस्य
जगतोऽस्त्युदयोऽप्ययो वा’:) ‘किन्त्वीशशक्ति प्रसरविरामौ प्रभवाप्ययौ ।’
कहा भी गया है—
‘समुदेति जगदशेषं तवोदयविमलसंविदाकारे ।
अस्तं याति समस्तं पुनरपि निजरूपरूढायाः ॥’
‘तत्त्वविचार’ में कहा गया है—
‘शक्तिप्रसरसंकोचनिबद्धावुदयव्ययौ ।
यस्यात्मा स शिवो ज्ञेयः सर्वभावप्रवर्तकः ॥’^२
‘कक्ष्यास्तोत्र’ में भी कहा गया है—
त्वदाशयोन्मेषनिमेषमात्रमयौ जगत्सर्गलयावितीदृक् ।
स्फुटे स्फुटं त्वन्महिमाऽवभाति विचित्रनिर्माणनिदर्शनेन ॥
ज्ञानक्रियादिगर्भेच्छा शक्तिर्यः प्रसरात्मकः ।
संकल्पोक्तः स उन्मेषः प्रोक्तं ह्येतत् स्वतन्त्रके ।
यत्र यत्र भवेदिच्छा ज्ञानं तत्र प्रवर्तते ।
क्रियाकरणसंयोगात् पदार्थस्योदयो भवेत् ॥^३
‘निमेष’ = उन्मेष से विरति ।^४
प्रश्न—ग्रन्थकार ने ‘उदयप्रलयौ’ न कहकर ‘प्रलयोदयौ’ क्यों कहा? पहले ‘उदय’
होता है फिर ‘प्रलय’ । लेकिन ग्रन्थकार ने ‘उदयप्रलयौ’ कहने के स्थान में ‘प्रलयोदयौ’
इसलिए कहा क्योंकि अन्यथा इस श्लोक में वृत्त-भंग दोष आ जाता ?^५ हाँ यह बात ही
ध्यातव्य है कि ग्रन्थकार ने ‘प्रलय’ शब्द के प्राथमिक प्रयोग से बचने के लिए श्लोकारंभ
में ‘उन्मेष’ शब्द का प्रयोग किया जो कि मंगलवाची है ।^६
उन्मेष-निमेष—पदों के प्रयोग में रहस्यार्थ—ग्रन्थकार ने ‘उन्मेष’ एवं ‘निमेष’
शब्द का ग्रन्थारंभ में (मंगलाचरण में) प्रयोग करके एक ओर तो वेदान्त के निष्क्रिय ब्रह्म
की अमान्यता एवं शिवाद्धयवादोक्त ब्रह्म की सक्रिया, (पञ्चकृत्यकारित्व) को संकेतित
किया वहीं उन्होंने इन शब्दों द्वारा परम पुरुषार्थों की ओर भी इंगित किया है क्योंकि
‘उन्मेष’ एवं ‘निमेष’ का अर्थ ‘भोग-मोक्ष’ भी है ‘जगत्सृष्टिसंहरयोः कारणभावः प्रोक्तो
भुक्तिमुक्तौ च । तत्रोन्मेषाद्भोगो नानाविधः । निमेषान्मोक्षो निस्तरंगरूपता ।’^७
शक्तिचक्रविभवप्रभव—‘शक्ति’-‘शक्तिचक्र’ ‘इच्छाख्यैका विभोः शक्तिः प्राग्द्विधा
ज्ञ क्रियाभिदा’ इस शक्ति के विभिन्न रूप हैं इसीलिए ‘शक्तिचक्र’ (शक्तिसमूह) कहा गया ।
‘मालिनीविजय’ में इसी अद्वितीया शक्ति के नानात्व का इस प्रकार वर्णन किया गया है।
१. स्पन्दप्रदीपिका । २. तत्त्वविचार ।
३. कक्ष्यास्तोत्र । ४-७. स्पन्दप्रदीपिका ।

प्रथमः निःष्यन्दः २९
या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।
इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥
सैकाऽपि सत्यनेकत्वं यथा गच्छति तच्छृणु ।
एवमेतदिति ज्ञेयं नान्यथेति सुनिश्चितम् ॥
ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते ।
एवं भवत्विदं सर्वमिति कार्योन्मुखी यदा ॥
जाता तदैव सा तद्वत् कुर्वन्त्यपि क्रियोच्यते ।
एवमेषा द्विरूपाऽपि पुनर्भेदैरनेकताम् ॥
अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ।
तत्र मातृत्वमापन्ना पञ्चाशद्वर्णमालिनी ॥१
'शक्तीनां चक्रं शक्तिचक्रं'—मातृवर्ग ॥२ इसके मुख्यतः ४ प्रकार हैं—
खेचरी गोचरी चाथ दिक्त्वरीभूचरीभिदा ।
परादिभारतीसंस्थं शक्तिचक्रं चतुर्विधम् ॥
'शक्तिचक्र' = मातृवर्ग
खेचरी  गोचरी  दिक्त्वरी  भूचरी
शक्तिचक्र
परा  पश्यन्ती  मध्यमा  वैखरी
शक्तिचक्र
आनन्दशक्ति  इच्छाशक्ति  ज्ञानशक्ति  क्रियाशक्ति
'आनन्देच्छाः ज्ञक्रियाख्यं खेचर्याद्यं चतुष्टयम्'
'विभव'—'विभूतिर्विस्तारः' । 'प्रभवम्' = प्रभवति अस्मादिति प्रभवः उत्पत्ति-
स्थानम् ।'३
खेचरी, गोचरी, दिक्त्वरी, भूचरी = परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी इन्हीं में
आनन्द, इच्छा, ज्ञान, एवं क्रिया निवास करती है । ये सभी शक्तियाँ आत्मसंवित् से
अभिन्न हैं । पाँचभौतिक शरीर से रहित केवल चिदात्मा में परमानन्दोल्लास है वही 'परा
वैष्णवी' शक्ति है । इन्हीं शक्तियों से संवित् विग्रह धारण करती है । हितकारिणी इन्हीं
शक्तियों से संवित् विग्रह धारण करती है । हितकारिणी होने से इन्हीं शक्तियों को 'माता'
कहा जाता है । ये शक्तियाँ विज्ञानदेह हैं । भिन्न-भिन्न मतों में—खेचरी, इच्छा, परा,
अघोरा, वामा, ब्राह्मी, वैष्णवी, शैवी, सौरी, बौद्धी आदि अनेक शक्तियाँ हैं । इन सभी
शक्तियों के मूल कारण 'स्पन्द' रूप भगवान् ही है । शक्तिसमूह ही अनन्तरूप में
१. मालिनीविजय । २-३. स्पन्दप्रदीपिका ।

३० स्पन्दकारिका

स्फुरित हो रहा है । शक्तिमान आत्मा महेश्वर है और शक्तियाँ जगत् है । जिस
प्रकार श्रेष्ठ सुन्दरी के अंग प्रत्यंग से राशि-राशि लावण्य छलकता है वैसे ही परमात्मा
की चिन्मात्रता ही जगत् के रूप में छलक रही है । शक्तियों के बल से ही आत्मा की
संज्ञा 'प्रभु' पड़ी है ।
प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् ।
तत्तत् प्रसिद्धावयवातिरिक्तमाभाति लावण्यमिवाङ्गनासु ॥
तेनैतदेव शक्तीनां यतोऽन्तः प्रसरोदयौ ।
तद्बलालम्भनात्तासां प्रभुत्वं प्राप्यतेऽचिरात् ॥
‘उन्मेष-निमेष’ के सम्बन्ध में स्पन्दप्रदीपिकाकार की दृष्टि—
(१) उन्मेष (उन्मुखता) से विश्व का उदय होता है और परम्परा चलती रहती है ।
निमेष से (विश्राम से) प्रलय हो जाता है । मूल वही ‘शङ्कर’ है ।
उन्मेष-निमेष उसी प्रकार हैं यथा जाग्रत काल में दृश्य का उदय एवं सुषुप्ति
काल में दृश्य का प्रलय । आत्म संवित् के उन्मेष एवं निमेष से अतिरिक्त उत्पत्ति-प्रलय
नामक कोई अन्य वस्तु नहीं है । यह अत्मरूप ईश्वर की शक्ति का प्रसार एवं विराममात्र
है । विमल संवित् के ये दोनों ही आकार हैं । ‘तत्त्वविचार’ में ठीक ही कहा गया है
कि—जगत् का उदय और विलय शक्ति के प्रसार एवं संकोच के साथ बँधे हुए हैं ।
‘कक्ष्यास्तोत्र’ में भी कहा गया है कि—तुम्हारे आशय के उन्मेष-निमेष मात्र को ही सृष्टि
और प्रलय कहते हैं । ‘उन्मेष’ में ज्ञान-क्रिया आदि से गर्भित इच्छा शक्ति का निवास है
और वह फैलती है । इच्छा से ज्ञान प्रवृत्त होता है और क्रिया-करण के संयोग से पदार्थ
की उत्पत्ति होती है । इसका विराम ही प्रलय है ।१
(२) ‘उन्मेष’ में भुक्ति है और ‘निमेष’ में मुक्ति है । सृष्टि और संहार भी इसी
भुक्ति-मुक्ति के अपर पर्याय हैं—‘आभ्यां जगत्सृष्टिसंहारयोः कारणभावः प्रोक्ते भुक्तिमुक्तौ
च । तत्रोन्मेषाद् भोगो नानाविधः । निमेषान्मोक्षो निस्तरंगरूपता ।।'२ जिस निमेष को
‘मोक्ष’ कहा गया है वह ‘मोक्ष’ क्या है ? उत्पलदेव कहते हैं—
‘इह कि जीवन्मुक्ततैव मोक्षः ।' ‘स्पन्दकारिका’ में भी यही कहा गया है—
‘इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥३
‘शक्तिचक्र विभवं’ वाक्य में ‘शक्तिचक्र’ का क्या अर्थ है?—इसका सुनिश्चित
अर्थ न बताकर स्पन्दप्रदीपिकाकार ने कहा है कि ‘शक्तिचक्र’ निम्न सभी चतुष्कों का
अर्थ-बोधन करता है—
१. खेचरी २. गोचरी ३. दिक्चरी ४. भूचरी शक्ति ।
१. इच्छा २. ज्ञान ३. क्रिया ४. चित् शक्ति ।
१-२. स्पन्दप्रदीपिका । ३. स्पन्दकारिका ।

प्रथमः निष्यन्दः ३१
१. परा २. पश्यन्ती ३. मध्यमा ४. वैखरी वाक् ।
अघोरा } 'स विसर्गो महादेवि यत्र विश्रान्तिमुच्छति ।
वामा } गुरुवक्त्रं तदेवोक्तं शक्तिचक्रं तदुच्यते ॥' (परा०वि० अभिनवगुप्त)
१. ब्राह्मी २. वैष्णवी ३. माहेश्वरी ४. कौमारी :
ये वैष्णव, शैव, सौर एवं बौद्ध दर्शनों में वर्णित शक्तियाँ हैं ।
शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥१
इस कारिका में उल्लिखित अकाराद्यक्षररूपा वर्णात्मक शक्तियाँ ।
करण—इन्द्रिय-ग्राम ।
[शक्तयश्च खेचर्याद्या वेच्छाद्या वा पराद्या वा अघोराद्या वा वामाद्या वा ब्राह्म्याद्या
वा अन्या वैष्णव शैव-सौर-बौद्धाद्युक्ता वा । अथवा—
'शब्दराशिसमुत्थस्य' (स्पन्द प्रदी० श्लोक सं० ४५)
इत्यादिना वक्ष्यमाण । अकाराद्यक्षररूपा करणरूपा वा भवन्तु ।'] २
उत्पलाचार्य का कथन है कि इन शक्तियों का उल्लेख केवल इस प्रयोजन से
किया गया है कि यह बताया जा सके कि इन समस्त विश्वव्यापी महान् शक्तियों की भी
उत्पत्ति स्पन्द रूप भगवान् से ही होती है । 'माया वामन संहिता' में कहा भी गया है
कि—विष्णु, शिव, सूर्य, बुद्धादि के रूप में अपनी-अपनी शक्तियों के परिवार से युक्त
एवं इन शक्तियों के आदि कारण भगवान् मात्र एक हैं, केवल ध्यान-भेद से ही भिन्न-
भिन्न रूप से उपास्य स्वीकार किये गये हैं । 'कुलयुक्ति' में कहा भी गया है—
वेदान्ते वैष्णवे शैवे सौरे बौद्धेऽन्यतोऽपि च ।
एक एव परः स्वात्मा ज्ञाता ज्ञेयं महेश्वरि ॥
'शक्ति'—शब्द का प्रयोग करके कारिकाकार ने सृष्टि की समस्त सत्ताओं एवं
निःशेष जगत् का भी उल्लेख कर दिया है क्योंकि समस्त विश्व में मात्र दो ही सत्तायें
हैं—१. शक्ति और २. शक्तिमान् ।
शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते ।
शक्तयश्च जगत् सर्वं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥३
शक्तिसमूह ही अनन्तरूप में स्फुरित हो रहा है । 'शक्तिमान्' आत्मा है और
शक्तियाँ जगत् हैं । इन्हीं शक्तियों से संवित् विग्रह धारण करती है । ये सब शक्तियाँ
'विज्ञानदेह' हैं । शक्तियों के बल से ही आत्मा 'प्रभु' कही जाती है ।
'स्पन्दसंदोह' में 'शक्तिचक्र' की यह भी व्याख्या की गई है—'शक्तिचक्रेण' ।
शक्तिचक्र द्वारा ।
'विभव'—समापत्ति आदि के द्वारा प्राप्त (दीक्षानुग्रहजन्य) देव-तादात्म्यरूप
सम्पत्ति । इसी तथ्य की ओर कारिकाकार का० (२।६) (२।७) में इस प्रकार कहते हैं—
१. स्पन्दकारिका (४५) । २-३. स्पन्दप्रदीपिका ।

३२ स्पन्दकारिका
जो साधक या ध्याता मन्त्रात्मा से एकत्व चाहता है, उसकी यही तदात्मता या
ध्येयस्वरूपापत्ति है । ध्येय का चिन्तन करते-करते जो उसके साथ तदात्मतापत्ति है
अर्थात् एकता है, वही उसका 'उदय' है । मन्त्रोच्चारण की इच्छा से मन्त्रदेवता के साथ
जो तादात्म्य है वह संवेदन द्वारा उससे एकता प्राप्त करता है ।१ यह जो स्वरूप-संवेदन
है यही आत्मा की अमृतत्त्व-प्राप्ति है ।२
'विभव' 'प्रभाव' - 'आचार्य क्षेमराज' कहते हैं - समापत्त्यादिना सामर्थ्यसंपदा
विभवो यस्य आचार्यस्य उदयः तस्य प्रभवं' ।३
इस कारिका की अन्य व्याख्या करते हुए आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि शक्तियाँ
मातृकाएं हैं ।
१. 'शक्तियाँ' - ब्राह्मी, वैष्णवी आदि शक्तियाँ - ये कादिक्षान्त वर्णमाला रूपा
हैं । वामेश्वरी, खेचरी, गोचरी, दिक्‍चरी, भूचरी ।
(१) 'वामेश्वरी' - यत्र वमन्ति विश्वं भेदाभेदमयं भेदसारं च, गृणन्ति उच्चैर्गिरन्ति
च भेदसारं, भेदाभेदमयं च अभेदसार आपादयन्ति इति संसार वामाचाराः वामाः शक्तयः
तासाम् ईश्वरी स्वामिनी एकैव भगवती-तदधिष्ठत्वात् वामा चक्रमपि वामेश्वरी चक्रम्
अभिधीयते इति ॥
(२) 'खेचरी' - खे बोधगगने चरन्ति इति खेचर्यः प्रमातृभूमिस्थिताः, परशक्ति-
पात पवित्रितानां चिदानन्द प्रसरोद्गमनसारा अकालकलितत्वाद् भेदसर्वकर्तृत्वसर्वज्ञत्वपूर्ण-
त्वव्यापकत्वस्वरूपोन्मीलनपरमार्थः । माया मोहितानां तु आनन्दप्रदाः शून्य प्रमातृ भूमि-
चारिण्यः काल-कला-शुद्धविद्या राग नियति मयतया बन्धयित्र्यः ॥'४
(३) 'गोचरी' - गौः 'वाक् तदुपलक्षितासु सङ्कल्पमयीषु बुद्धयाहंकार मनोभूमिष
चरन्ति इति गोचर्यः शक्तिपातवतां शुद्धाध्यवसायाभिमानसंकल्पप्ररोहिण्यः, परेषां तु
विपर्यासिन्यः ॥५
(४) 'दिक्‍चरी' - दिक्षु च दशसु बाह्येन्द्रियभूमिषु चरन्ति इति दिक्‍चर्यः
अनुगृहीतानां अद्वयप्रथनसाराः, परेषां तु द्वय प्रतीतिपातिन्यः ॥६
'शक्तिचक्रविभवप्रभव' की अन्य प्रकार से 'व्याख्या करते हुए स्पन्दसन्दोहकार
कहते हैं-
'शक्तिचक्रस्य-आगमसंप्रदायप्रसिद्धनानादेवता परमार्थस्य रागद्वेषविकल्पादिप्रत्यय-
ग्रामस्य, तथा देहाश्रिता तत्तद्देवता-परमार्थनानाधात्वादिगणस्य, यो विभवः तत्तदुपनिष-
त्सिद्धः प्रभावविशेषः, ... ... ... प्रतिबन्धहेतुत्वं च, तस्य उभयस्यापि प्रभवम् । तदेतत्
उपदेक्ष्यति-'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः ... संश्रयात् । (१।१९) इत्यादि । '... संसार-
वर्त्मनि ॥' (१।२०)-इत्यन्तम् तथा-'सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य... (३।१६)
इत्यादि । अन्यत्रापि आगमेषूक्तम्-
१-२. स्पन्दप्रदीपिका (श्लोक ३१)। ३-६. स्पन्दसन्दोह ।

प्रथमः निष्यन्दः ३३
'कुलसारमजानन्तो हृद्द्रये विपतन्ति ये ।
स्वचित्तोत्थविकल्पान्धा निरये निपतन्ति ते ॥
तथा—येन येन निबध्यन्ते जन्तवो रौद्रकर्मणा ।
सोपायेन तु तेनैव मुच्यन्ते भवबन्धनात् ॥
'शक्तिचक्र'— आगम प्रसिद्ध देवों के रागद्वेष विकल्पादि प्रत्यय ग्राम एवं
देहाश्रित तत्तद्देवता परमार्थ नाना धातुवादि गण ।
'विभव'— उपनिषदों में वर्णित सिद्धिज प्रभाव विशेष ॥
(५) 'भूचरी'— भूः रूपादिपञ्चात्मकं मेयपदं, तत्र चरन्ति तदाभोगमय्य आश्या-
नीभावेन तन्मताम् आपन्ना भूचर्यः, इतरेषां सर्वतो व्यवच्छेदकतां दर्शयन्त्यः ।
इत्येवं वामेश्वरी शक्त्या प्रसारितानि आन्तराणि अपर-परापर-पर प्रथा हेतुत्वात्
अघोर-घोर-घोरतर नाम निरुक्तानि चत्वारि खेचरी-गोचरी-भूचरी दिक्‌चरी चक्राणि तथा-
विध वीरव्रातसहितानि तानि । यथोक्तं श्रीपूर्वशास्त्रे—
विषयेष्वेव संलीनानधोधः पातयन्त्यणून ।
रुद्राणून्द्याः समालिंग्य घोरतर्येऽपराः स्मृताः ॥
मिश्रकर्मकलासक्तिं पूर्ववज्जनयन्ति याः ।
मुक्तिमार्ग निरोधिन्यस्ताः स्युर्घोराः परापराः ॥
पूर्ववज्जन्तुजातस्य शिवधामफलप्रदः ।
पराः प्रकथितास्तज्जैरघोराः शिवशक्तयः ॥
एतद् वामेश्वरी अधिष्ठितान्ति एव— खेचरी, भूचरी, गोचरी, दिक्‌चरी चक्राणि ।
(क) तत्र— आकाशे चरन्त्योऽशरीराः खेचर्यः, यदिच्छामात्राधिष्ठित मिथुनं
संप्रयोगजः प्रबुद्धशुद्धविद्योदयो योगिनीगर्भोद्भूतो भवति । यथोक्तं श्रीतन्त्रालोके—
अन्याश्च गुरुतत्पत्न्यः श्रीमत्कालीकुलोदिताः ।
अनन्तदेहाः क्रीडन्यस्तैस्तैर्देहेरशंकितैः ।
प्रबोधित तदिच्छाके तज्जं कौलं प्रकाशते ॥
(ख) 'गोचरी'— गोचर्यस्तु गोशब्दवाच्य पशुहृदयसाराहरणरताः तेनैव क्रमेण
स्वात्मनः पशूनां च तत्तत्सिद्धिसाधनप्रवण एकजन्मनः प्रभृति सप्तजन्मानमपि पशु-
माहरन्त्यः ॥
'शक्तिचक्र' की निम्नांकित रूप से भी व्याख्या की गई है—'शक्तिचक्र' =
'स्वतन्त्राद्वय निजमहाप्रकाशानुप्रवेशकारि स्वमरीचिनिचय' (स्पन्द प्र०) ।
'विभव'—'स्वामोदजृंभात्मकविभव' (स्पन्द प्र०)
'शक्तिचक्रे'—खेचरी, गोचरी, दिक्‌चरी, भूचर्यादि बाह्यान्तरताभेदभिन्न योगिनियों
का समूह एवं तदुपलक्षित वीरव्रात । 'विभव'—उनका विभव । अर्थात् 'अतीतानागत-
स्पं० ३

३४ स्पन्दकारिका
ज्ञान-अणिमादिकप्रप्ति स्वविषयाभोगसमयपूर्णप्रथावाप्त्याद्यनन्त क्षुद्राक्षुद्रसिद्धि लाभ या
ऐश्वर्य प्राप्ति ।'—
'अनन्त क्षुद्राक्षुद्रसिद्धि लाभम् ऐश्वर्यं प्राति पूरयति यः, स शक्तिचक्रविभवप्रः स च
असौ ... भवति तेन तेन रूपेण इति कृत्वा, 'तं' = शक्तिचक्रविभव प्रभवं' इति ।'
इसी की पुष्टि में विभूतिस्पन्द में कहा गया है—
(१) यथेच्छाभ्यर्थितो धाता ... (३।१)
(२) कुतः सा स्यादहेतुका । (३।८) आदि ।
इस श्लोकाष्टक द्वारा इस दृष्टि को ही प्रतिपादित किया गया है । ('स्पन्द-
संदोह'—आचार्य क्षेमराज)
आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दसन्दोह' में इस आद्य कारिका के सात अर्थ बताए हैं ।
इस कारिका का अर्थबोधन कराने हेतु इसकी सप्तविध व्याख्यायें प्रस्तुत की हैं ।
(ग) 'दिक्चरी'—दिक्ार्यस्तु भ्रान्तचक्रवत् सर्वत्र चरन्त्यः परापरसिद्धिप्रवणाः ।
(घ) 'भूचरी'—भूचर्यस्तु स्वस्वभावतयैव कुंकुमनारिकेलादिवत् तत्तत्पीतादिभूमि-
जाताः पूर्णत्वादिनानाभेदितत्तद्देवतांशकोद्भूताः ॥
(१) 'शक्ति'—ब्राह्म्यादि देवी (कादि क्षान्त मातृका वर्ग) ब्रह्मादिकारणमाला ।
'चक्र'—उनसे सम्बद्ध चक्र । 'शक्तयो ब्राह्म्यादि देव्यो (कादि क्षान्त तत्तद्वाचकात्मनः)
ब्रह्मादिकारणमाला च' तासां सम्बन्धिचक्रं स्वभावशून्यपशुप्रमातुः अद्वयरूपोर्ध्वभूम्यता-
रोहणक्षमो भेदमयाधस्सरणिसंचारचतुरश्च व्यूहः' तस्य यो विभवः तथाकार्यकारित्वं तस्य
प्रभावं । तद्वक्ष्यति—'शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य ... (३।१३) इत्यादि । 'बन्धयित्री
... (३।१६) तन्मात्रोदयः ... (३।१७) प्रचक्ष्महे (३।१८) इत्यन्तं च ।।' ('स्पन्दसन्दोह')
आचार्य क्षेमराज ने इस प्रथम कारिका की व्याख्या को 'आदिसूत्र की व्याख्या'
का अभिधान दिया है ।
शाङ्कर अद्वैतवाद का खण्डन—आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दसंदोह' में कहा है कि
इस श्लोक भाग के द्वारा कारिकाकार ने परमात्मा को 'विश्वोत्तीर्ण' एवं 'विश्वमय' दोनों
सिद्ध किया है । उन्होंने वेदान्त सम्मत उस निष्क्रिय ब्रह्म का प्रतिपादन नहीं किया है
जिसके विषय में कहा गया है कि—'विश्वं यन्न तदेव ब्रह्म' अर्थात् 'जो विश्व नहीं है (जो
विश्वातीतर है) वही ब्रह्म है।'
'एवमनेन श्लोकभागेन ... विश्वोत्तीर्णोविश्वमयश्च उत्तमाकुलत्रिकाद्याम्नायोपदेशदिशा
स्वस्वभाव एव शङ्करः इति उपपादितम न तु वेदान्तवादितवत—'विश्वं यन्न तदेव ब्रह्म'।१
'विश्वं यन्न' में जो अभाववाद का आभास मिलता है उसका कारिकाकार ने अपनी
निम्न कारिका द्वारा प्रतिषेध भी किया है—
१. स्पन्दसन्दोह—क्षेमराज ।

प्रथमः निष्यन्दः ३५
'नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता ।' (१।१२) और आगे इसी की पुष्टि में
पुनः कहा है—'न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥' (१।१३) न तो 'विश्वातीत' ही
परम तत्त्व है और न तो 'विश्वमय' ही—(१) 'नापि सिद्धान्तदृष्टिवत् विश्वोत्तीर्णमेव परं
तत्त्वम् इत्येवं रूपं—
'तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदा व्यभिचारिणी (१।१७)' इस वाक्य के द्वारा,
विरुद्धत्वापत्ति के कारण, 'विश्वातीत' को 'परमपद' नहीं कह सकते ।
(२) 'नापि अप्रकटिताकुलस्वरूपकुलप्रक्रियाशास्त्रवत् विश्वमयमेव पूर्णरूपम् इत्येवं
स्वभावम्—'। 'यदा क्षोभः प्रलीयेत् तदा स्यात्परमं पदम् । (१।९) इस कारिका के द्वारा
'विश्वमय' स्वरूप को भी 'परमपद' नहीं कह सकते अतः परमपद वह है जो-विश्वातीत
एवं विश्वमय दोनों हैं ।¹
'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ' वाक्य की अर्थ विशेषता—आचार्य
क्षेमराज कहते हैं कि कारिकाकार ने समस्त शास्त्रार्थ को केवल एक वाक्य द्वारा पर्या-
लोचति करके सर्वदा एवं सभी दशाओं में कारिकाकार ने 'अख्यातिवाद' का भी (इस
कारिका द्वारा) खण्डन किया है क्योंकि—'न तु सा दशास्ति यत्र शिवता न स्फुरति इति
उपदिष्टं भवति' अर्थात् ऐसी कोई दशा ही नहीं है जहाँ शिवत्व स्फुरित न होता हो ।
स्वच्छशास्त्र भी कहता है—
यत्र यत्र निलीयेत् मनस्तत्रैव भावयेत् ।
चलित्वा यास्यति कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥²
कारिकाकार स्वयं कहते हैं—'न साऽवस्था न यः शिवः ।' (२।४) (२९) ॥
शिव-सूत्रकार भी इस सिद्धान्त का संसार का जागरण (Waking of the
universe) जो कि शिव में पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों से निर्मित है, शिव की शक्तियों
के कारण होता है ।
देवियाँ श्रीमन्मन्थानभैरव चक्रेश्वर का आलिंगन करके संसार की सृष्टि आदि
क्रीड़ाओं का निष्पादन करती हैं फिर 'परमात्मा से ही सृष्टि-संहार निष्पादित होते
हैं'—ऐसा क्यों कहा गया? इसी का उत्तर देने के लिए कारिकाकार ने
'शक्तिचक्रविभव प्रभवं शङ्कर स्तुमः' कहा । परमेश्वर के भीतर परमेश्वर के साथ
अभिन्नतया स्थित शक्तियों का चक्र है । इसीलिए परमात्मा को अनन्त शक्तिमान कहा
गया है ।³ भाव यह है सृष्टि की विधात्री इन शक्तियों का भी विधाता परमेश्वर है । इसे
दिखाने के लिए ही कारिकाकार ने परमात्मा को 'शक्तिविभवप्रभव' कहा ॥
'शक्तिचक्र'—आभासपरमार्थ विश्व ।
'विभव'—परस्परसंयोजनावियोजना-वैचित्य के अनन्त प्रकार 'प्रभव' = कारण ।
वही भगवान् विज्ञान देहात्मक एवं स्वात्मैकात्म्यपूर्वक स्थित विश्वरूप आभासों को
१-२. स्पन्दसन्दोह—क्षेमराज । ३. स्पन्दनिर्णय ।

३६ स्पन्दकारिका
अनेकविध वैचित्र्यों के साथ संयुक्त एवं वियुक्त करते हुए विश्व के उदय एवं हेतु का
कारण बनता है ।१ श्री भट्टकल्लट ने कहा भी है— 'विज्ञानदेहात्मकस्य शक्ति-
चक्रैश्वर्यस्योत्पत्तिहेतुत्वम्' 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नम्' ऐसा कहकर एवं— 'न सावस्था न
यः शिवः' कहकर अगम ने शिव को जगदात्मा कहा है ।
'विभव' = माहात्म्य ।। 'प्रभव' = 'तत्र प्रभवतीति प्रभवं' शक्ति चक्र का विभव
क्या है? 'स्वतन्त्र्य' ('पशु' जीव स्वतन्त्र नहीं परतन्त्र हैं) ।
'शक्तिचक्र' = रश्मिपुञ्ज । 'विभव' = अन्तर्मुख विकास । 'प्रभवः' = विभव
से होने वाला उदय या अभिव्यक्ति । (रश्मिपुञ्ज के अन्तर्मुख विकास से होने वाले उदय
या अभिव्यक्ति वाले ।) अन्तर्मुखतत्स्वरूपनिभालन से परमेश्वर के स्वरूप का प्रत्यभिज्ञान
अनायास होता है ।२
चिदानन्दघन आत्मा के उन्मेष-निमेषों से अर्थात् स्वरूपोन्मीलन एवं निमीलनों से
('यदन्तस्तद्बहिः' की युक्ति के अनुसार) जगत् रूप शरीर के एवं बाह्य विश्व के भी
प्रलय एवं उदय (मज्जनोन्मज्जन) में उत्पन्न होने वाले शक्तिचक्र के मूल कारण ।
'शक्तिचक्रविभव' = पर संवित् का स्फार ॥
आचार्य क्षेमराज प्रथम कारिका की व्याख्या करते हुए कहते हैं— 'यस्य स्वात्मनः
संबंधिनो बहिर्मुखता प्रसररूपादुन्मेषाज्जगत् उदयोऽन्तर्मुखतारूपाच्च, निमेषात्प्रलयः तं
विश्वसर्गादि कार्युन्मेषादिस्वरूप संविद्देवी महात्म्यस्य हेतुं शङ्करं स्तुमः ॥'३
'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ'—
इस श्लोक द्वारा कारिकाकार ने शङ्कर-स्तुति के बहाने 'समावेश' को भी संकेतित
किया है—
'अत्र च शङ्करस्तुतिः समावेशरूपा' ।४
'शक्तिचक्र के विभव से प्रभव है जिसका' (बहुव्रीहि समास) शक्ति चक्र विकास ही
उस 'समावेश' का उपाय है । 'शक्तिचक्रविभवस्य'—परसंविद्देवता के स्फार के । ऐसे
भक्तों के 'प्रभव' (प्रकाशक) । (तत्पुरुष स०) 'ततश्चक्रेश्वरो भवेत्, (३।१९) सूत्र इसी
समावेश का संकेतक है । यहाँ 'उपायोपेयभाव' दोनों का सामरस्य है ।५
बहुव्रीहि समास करने पर 'शक्तिचक्रविभवप्रभव' का अर्थ निम्नानुसार होगा—
'जिस शङ्कर की अभिव्यक्ति शक्ति-समूह के 'विभव' (महात्म्य । यश) द्वारा होती है।'
ये इन आन्तरिक शक्तियों का विकास करने से ही शांकर समावेश रूप जीवन्मुक्ति
प्राप्त हो पाती है । प्रथम कारिका में शांकर-स्तवन, शांकर समावेश का प्रतीक है और
यही स्पन्दशास्त्र का अंतिम लक्ष्य भी है । इस परमलक्ष्य को कारिकाकार ने अपनी प्रथम
कारिका में ही प्रस्तुत कर दिया है ।
'शक्तिचक्र के वैभव को उत्पन्न करने वाला है'—
१-५. स्पन्दनिर्णय ।

प्रथमः निष्यन्दः ३७
यह अर्थ करने पर शङ्कर की स्वातन्त्र्य शक्ति को संकेतित करके यह द्योतित किया
गया है कि मात्र शङ्कर ही ऐसे हैं जो कि अपने वैभव में 'स्वतन्त्र' है। अन्य प्राणी
स्वतन्त्र नहीं प्रत्युत परतन्त्र हैं। 'स्वातन्त्र्य' परमात्मा की एक शक्ति है जिसका अर्थ है—
परमुखापेक्षिता से स्वतन्त्र ॥
जिसका जागरण या जिसकी अभिव्यक्ति महाप्रकाश के आन्तरिक उद्घाटन (Un-
foldment) पर आश्रित है वह है—'शक्तिचक्रविभव।'
कारिका का यह भी अर्थ किया गया है—
जो भक्तों के स्वस्वभाव (वास्तविक प्रकृति) को प्रकट करता है, जो कि परमशक्ति
की अभिव्यक्ति का कारण है (या परा चेतना की अभिव्यक्ति का आधार है) जो अपने
स्वस्वरूप को अभिव्यक्त करने या तिरोहित रखने पर भी आनन्दरूप है और जो कि विश्व
की सृष्टि एवं संहार का कारण है—हम उन शङ्कर का स्तवन करते हैं।
इस कारिका का यह भी अर्थ किया गया है—
हम उन शङ्कर का स्तवन करते हैं जो कि जागृतादि अवस्थाओं से अभिन्न रूप
वाली चेतना की शक्ति की महानता के मूल कारण हैं, जिनके जागरण या बाह्यमुखी
क्रियाओं से विश्व की सृष्टि एवं जिनके सोने या अन्तर्मुखी होने से विश्व का प्रलय हो
जाता है।
सारांश यह कि—बहिर्मुखता प्रसार रूप 'उन्मेष' से जगत् का 'उदय' (सृष्टि)
होता है और अन्तर्मुखता रूप 'निमेष' से 'प्रलय' हो जाता है। विश्वसर्गादिकार्यरूप
उन्मेष के स्वरूप वाली संविद्देवी के माहात्म्य के कारण भगवान् शिव हैं। हम उनकी
स्तुति करते हैं। १
स्वसम्बद्ध ध्वनियों से प्रादुर्भूत होने वाली मान्त्री शक्तियों के समूह को भी 'शक्ति-
चक्र' माना जा सकता है।
'शक्तिचक्रस्य' = करणेश्वरी चक्र का। करणशक्ति वर्ग का ॥ 'यो विभवो' =
जो विचित्र सृष्टि संहारादिकारित्व । 'तस्य प्रभवं' = उसका क्रमार्थावभासनकारित्व कृत-
मक्रम महाप्रकाशमय । कहा भी गया है—'सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहतीः ॥ लभते
... (१।६) यहाँ 'चक्र' का अर्थ है—आन्तर चक्र। अन्तःकरण त्रय का करण वर्ग में
परिगणिन भी किया गया है। करणवर्ग की प्रवृत्ति धर्मा है। करणेश्वरी चक्र सृष्टि आदि
कार्यों में प्रवृत्त रहती है।
'शक्तिचक्र' = मन्त्रगण में मुद्रासमूह। तस्य 'विभव' = त्रिविध सिद्धि साधन
समर्थत्व । तस्य 'प्रभवम्' = प्रभवोपलक्षित उत्पत्तिविश्रान्तिस्थान । कहा भी गया है—
'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः ... । (२।१) ... निरञ्जनाः (२।१) त्रिविध = 'पर'—'अपर'—
'परापर' ॥ त्रिधा सिद्धि ॥२
१. स्पन्दनिर्णय। २. स्पन्दसन्दोह।

३८ स्पन्दकारिका
भट्टकल्लट ने ‘स्पन्दकारिकावृत्ति’ (स्पन्दसर्वस्व) में इस संपूर्ण कारिका की
व्याख्या इस प्रकार की है—
‘अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः कारणत्वं,
विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्योत्पत्तिहेतुत्वं नमस्कारेण प्रतिपाद्यते ।।'¹ भट्टकल्लट
स्पन्दशास्त्र में ‘ईश्वरसंकल्पसृष्टिवाद’ का प्रतिपादन करते हैं ।² वे कहते हैं कि इस
कारिका में दो बातें प्रमुख रूप से कही गई हैं ।³
(क) स्वस्वभाव शिव के ‘शिवात्मक संकल्प’ से ही जगत् की उत्पत्ति हुई है ।⁴
अतः शिव को जगत् की उत्पत्ति संहार का कारण सिद्ध किया गया है ।⁵
(ख) विज्ञानदेहात्मक (विमर्शात्मक स्फुरणा) शक्ति चक्र के ऐश्वर्य (अनन्तरूपों में
प्रवहमान होने एवं एक ही साथ भेदशून्य सामान्य भूमिका में विश्रान्त भी रहने की एक
साथ दो) भूमिकायें निभाने के स्वातन्त्र्य चमत्कार के भी वे मूलोद्गम शङ्कर ही हैं ।⁶
‘तं शङ्करं’—(श्रेयसःकर्तारं) श्रेयसम्पाक ।
‘स्तुमः’ (प्रशंसामः)—प्रशंसा करता हूँ । जगतो = (विश्वस्य)—संसार के ।
‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां’—(शक्तिप्रसरप्रलयाभ्यां) शक्ति के प्रसार एवं शक्ति के
संकोच ।। ‘प्रलयोद्भवौ’ = विनाश एवं प्रादुर्भाव ।।
‘शक्तिचक्रविभवप्रभवं’—वक्ष्यमाणस्वरूप वाली शक्तियों के
चक्र = समूह ।। ‘विभव’—ऐश्वर्य । ‘प्रभवं’—कारण ।
प्रश्न—शङ्कर भगवान् तो नित्य, अव्यभिचारी रूप से एकस्वभाव, अद्वैत (‘एक
एव’) पदार्थ हैं फिर उनके साथ परस्परविरुद्ध अनित्य, निमेषोन्मेषात्मक अवस्थाओं का
संबन्ध कैसे प्रतिपादित किया गया ?
‘शङ्कर उन्मिषित भी होते हैं और निमिषित भी’ यह कैसे संभव है? यदि
कर्तृत्वप्रथा के कारण ऐसा कहा गया तो नित्यात्मक भगवान् के साथ अनित्यावस्था-
योगित्व कैसा ? कैसे कहा गया ?—‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्याम्’ ? यह क्यों कहा गया ?
उत्तर—इस संदर्भ में प्रयुक्त ये ‘उन्मेष-निमेष’ शब्द उपचारित वृत्ति द्वारा शङ्कर
की इच्छामात्र के बोधक हैं । यह तो उनका नित्यधर्म या स्वभाव है—‘स च तस्य
नित्योधर्मः स्वभावभूतः ।।' उन्मेषनिमेषशब्दवाच्यत्व उपचार की दृष्टि से संगत है ।
यह जगत् परमेश्वर की मायाशक्ति के द्वारा उद्भावित एक कार्य है और इसलिए
इसका प्रादुर्भाव एवं प्रलय दोनों होने से यह अनित्य है ।
‘उन्मेषोन्मेष’—ये दोनों ईश्वरेच्छामात्रनिमित्तक हैं । जो उदयात्मक उन्मेष है और
जो प्रलयात्मक निमेष है ये दोनों ही ईश्वरेच्छामात्र है—‘उदयात्मकोन्मेषहेतुत्वात् ईश्वरेच्छैव
उन्मेषशब्देन, प्रलयात्मकनिमेषहेतुत्वात् निमेषशब्देन च उपचर्यते ।।'
१-६. स्पन्दकारिकावृत्ति (भट्टकल्लट) ।

प्रथमः निष्यन्दः ३९
वह शङ्कर की अव्यतिरिक्ता शक्ति है—'सा च अव्यतिरिक्ता शङ्करस्य शक्तिः।' इस
शक्ति का ज्ञान ही आत्मा के ऐश्वर्य एवं प्रत्यभिज्ञा की सिद्धि का उपाय है। यहाँ पर
सांसारिक पुरुषों में आविर्भूत इच्छा के साथ सादृश्य दिखाने हेतु 'इच्छा' शब्द का प्रयोग
किया जा रहा है जिस प्रकार पुरुष की अपनी इच्छावस्था में इष्यमाण पदार्थ अपने
स्वरूप में पुरुष के साथ अव्यतिरिक्त रूप से स्थित रहता है। इसी प्रकार 'शक्ति'
भगवान् की 'इच्छा' के रूप में उसमें अभिन्न रूप से स्थित रहती है। भगवान् के भीतर
स्थित जो इच्छारूपकात्मक शक्ति है उसी के भीतर अनन्तावभासात्मक जगत् स्वरूपतः
अव्यतिरिक्त रूप से स्थित रहता है 'भगवतः शक्तौ अनन्तावभासविशेषचित्रं जगत् ...
स्वरूपात् अव्यतिरेकेणैव अवतिष्ठते।'
वह यह शक्ति पारमार्थिकी 'शिवदशा' है। उसी की विद्वानों द्वारा इस प्रकार स्तुति
की गई है— 'सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासने।
सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः॥'
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है—
'या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता।
अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः॥'
इस प्रकार एक ही अद्वैत पारमेश्वरी पराशक्ति के इच्छा-ज्ञान एवं क्रिया विभिन्न
व्यपदेश हैं और माया शक्ति के द्वारा 'इदन्ता' के रूप में आविर्भूत होते हैं इसी माया
शक्ति के द्वारा परमार्थस्वरूप एक ही शिवतत्त्व में सदाशिवादि तत्त्वान्तर का प्रक्रिया-शास्त्र
में व्यपदेश किया गया है। इस प्रकार के लक्षणों वाली पारमेश्वरी शक्ति अपनी लीला से
उल्लसित जगत् के अवस्थाद्वय के कारण स्वयं भी दो स्वरूपों वाली कही जाती है।
अतः इस कारिका के प्रथमार्द्ध का अर्थ निम्नानुसार है—
'जिसकी इच्छा मात्र से जगत् की सृष्टि एवं प्रलय हुआ करते हैं—मैं उसका
स्तवन करता हूँ।' ('यस्य इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ तं स्तुमः ।) उन्मेष—उदय।
निमेष—प्रलय। उन्मेष-निमेष दो नहीं हैं एक ही है और इस रूप में वह इच्छामात्र है।
'इच्छामात्रौ उन्मेषनिमेषौ'। भट्टकल्लट ने भी 'संकल्पमात्रेण ...' कहकर इसी तथ्य का
प्रतिपादन किया है। इस कारिका द्वारा शङ्कर के पारमार्थिक धर्म के रूप में उन्मेष एवं
निमेष को प्रतिपादित किया गया है।
नित्य, अव्यभिचारी एक स्वभाव भगवान् शङ्कर के समान ही शक्ति को भी उसी
स्वरूप का स्वीकार किया गया है क्योंकि दोनों में अभेद है।
शिव की ऐश्वर्यमयता का प्रतिपादन—
'चक्रविभवं' द्वारा ईश्वर के निरतिशय ऐश्वर्य को सूचित किया गया है। भले ही
जगत् शङ्कर एवं शक्ति से भिन्न प्रतीत हो किन्तु है उससे अभिन्न ही—
'परमेश्वरता जयत्यपूर्वा तव सर्वेश यदीशितव्यशून्या।
अपरापि तथैव ते ययेदं जगदाभाति यथा तथा न भाति॥'

४० स्पन्दकारिका
अन्यत्र भी कहा गया है—
'लिखते जगतित्रतयचित्रमद्भुत
प्रतिभापरिस्फुरितशंंसिते नमः ।
सुसितैकसूक्ष्मनिजशक्तिवर्तिका,
रचितावभासशतशोभि शंभवे ॥'
'शक्तीनां चक्रम्' = वह परमेश्वर से स्वरूप में अभिन्न 'शक्ति'—'इदम्' के
परामर्शभेद से उत्पन्न नाना नाम रूप भेदों से अवभासमाना होने पर ही है तो एक, किन्तु
बहुत्व में व्यक्त होने के कारण बहुरूपात्मिका होने से 'शक्तीनां चक्रम्' कही गई है ।
'शक्ति' शब्द भावाभिव्यक्ति के समय परमेश्वर से भिन्न दिखाई पड़ती हुई भी
उनसे अभिन्न है—यही अभेदाभाव प्रतिपादन ग्रन्थकार का प्रयोजन है । यही ईश्वर का
विभव है और उसी से ईश्वर वैभवशील कहलाता है । पारमेश्वर में भी कहा गया है—
'शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते ।
शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांश्च महेश्वरः ॥'
'विभवप्रभव'—इस प्रकार स्वशक्ति भूतविभव का 'प्रभव' (उत्पत्ति का कारण),
न कि स्वरूप व्यतिरिक्त एवं अन्य स्थल से प्राप्त वैभव का प्रभव ।
'यस्य'—जिस जगत्कारण रूप शङ्कर का । शङ्कर का—स्वशक्तिचक्रात्मक
ऐश्वर्यभूत जगत् का प्रभव ॥
उन्मेष एवं निमेष का कार्य क्या है? उद्भव एवं विनाश—
'उन्मेषे क्रियाशक्ति प्रतिसंहारात् स्वरूपविकासे जगतः प्रलयो विनाशः, निमेषे
प्रसृतक्रियाशक्तित्वात् स्वरूप संकोचरूपे जगतः उदय उद्भवः ।'
शक्तिचक्र का ऐश्वर्य—शक्तियों के समूह की विभूतियाँ—
'विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्य । उत्पत्तिहेतुत्वम्'
'विज्ञानदेहो' = विशुद्ध संविन्मात्रमूर्ति महेश्वर ।
'विज्ञानदेहात्मक' = विशुद्धसंविन्मात्र वह महेश्वर जिसका स्वस्वभाव आत्मा
हो वहः ॥ 'आत्मा' = स्वभाव ॥ विज्ञानदेह महेश्वर केवल आत्मा ही है अन्य नहीं है ।
'स च आत्मैव नान्यः ।' 'यस्य' = जिसके । किसके ? विज्ञानदेहात्मकस्य
शक्तिचक्रैश्वर्यस्य'—के स्वभाव वाले शङ्कर के । ('यस्य' शब्द इसी भाव का द्योतक
है) क्योंकि इन पचासों कारिकाओं में प्रपंचित अर्थ की पर्यालोचना से यही शिव-
स्वभाव द्योतित होता है ।
वृत्तिकार ने भी यही कहा है—'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' ।
'स्वस्य'= आत्मा का । 'स्व' = आत्मीयभाव यथा स्वरूप अर्थात् स्वस्वभाव ।
प्रथम श्लोक का यही तात्पर्यार्थ है 'परमेश्वरः इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ विदधाति,
लब्धस्थितिकमपि जगत् तच्छक्तिविभूतिरेकैव मायावशात् तु नानात्वेन अवभासते ॥'

प्रथमः निष्यन्दः ४१
इस प्रकरण में ये ही दो अर्थ उपबृंहित किए गए हैं—'इदमेव अर्थद्वयम् अत्र
प्रकरणे विस्तार्यते ॥'
(१) माया के वशीभूत होकर स्वरूपप्रत्यवमर्श के अनुल्लास के कारण, वेद्य
पदार्थ (देहादि) के साथ अव्यतिरेक (एकात्मता) के साथ प्रतिभासमान आत्मा का
व्यतिरेक प्रदर्शित किया गया है ।
(२) 'वेद्य' (जगत्) की 'वेदक' के साथ तात्विक स्वभाव के कारण शक्तिभाव की
दृष्टि से अपृथकता (अव्यतिरिक्तत्व) सिद्ध होती है ।
—इन्हीं दोनों अर्थों को प्रथम श्लोक में विस्तारित किया गया है—इसके द्वारा
चतुर्निष्यन्द स्पन्दसिद्धान्त इस श्लोक द्वारा आसूत्रित हुआ है ।
उपाय एवं उपेय—इस दर्शन में उपाय-उपेय क्या है?
(१) उपाय 'श्रेयःशास्त्ररूपं' (२) उपेय—'आत्मैश्वर्यप्रत्यभिज्ञारूपं'—इन 'उपाय'
एवं 'उपेय' क द्योतक 'शं' (शम्) है और इसी 'श' के कर्ता ही हैं—'शङ्कर' (तस्य कर्ता
शङ्करः ... इयं संज्ञा परमेश्वरस्य) 'शङ्कर'—परमेश्वर ॥ अतः इस स्पन्दशास्त्र के श्रेय के
साक्षात् कर्ता परमेश्वर ही हैं—। इस प्रकार ईश्वर एवं शास्त्र में कर्ता एवं कार्य का
सम्बन्ध है—यही 'स्तुमः' शब्द द्योतित करता है । 'स्तुमः' कहकर जो स्तुति की गई है
उसका प्रयोजन या अर्थ क्या है? 'उपादेय-वस्तु स्वरूप प्रतिपादनमेव स्तुत्यर्थः ।'—
उपादेय-वस्तुस्वरूप की प्रतिपादन ॥ अतः शास्त्राभिधेय प्रतिपाद्य एवं प्रतिपादक भाव ही
सम्बन्ध है । प्रयोजन क्या है ? आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मक शङ्कर पदः 'प्रयोजनं च
आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मकं शङ्करपदादेव अवसीयते ॥' दूसरे के श्रेय के संपादक भी ईश्वर
ही हैं—अतः इसमें अभिधेय-प्रयोजन दोनों में उपायोपेयभावलक्षण सम्बन्ध है । इस
प्रकार तीन प्रकार के सम्बन्ध हैं ।
इस शास्त्र का नाम है 'स्पन्द' 'अभिधानमस्य शास्त्रस्य स्पन्द' इति (१ नि० २१
का० २ पा०) ॥
स्पन्दतत्त्व—'स्पन्द' शब्द स्वस्वभाव परमर्शमात्र, नित्य, शून्यताव्यतिरेचनकारण-
भूत, उतनी ही मात्रा में संरभात्मा एवं 'शक्ति' नामक अन्य नाम वाले पारमेश्वर धर्म के
किंचित् स्पन्दनात्मक होने के कारण उसे 'स्पन्द' कहा गया है (किंचिच्चलनात् स्पन्द
इति') । इस प्रतिपाद्य 'स्पन्दतत्त्व' का प्रतिपादन करने के करण इस शास्त्र को भी
'स्पन्द' शब्द से पुकारा गया ('तत्प्रतिपादनहेतुत्वात् शास्त्रमपि इदं स्पन्दशब्देन
अभिधीयते ।')
इस शास्त्र का 'अधिकारी' कौन है?—'विषय' (अधिकारी) ॥ अन्य शास्त्रों में
तो विवक्षित या प्रतिपाद्य तत्त्व को विषय कहते हैं किन्तु यहाँ पर 'विषय' का अर्थ है
'अधिकारी' ॥
(१) विशुद्ध श्रद्धा-भक्ति-प्रकर्ष (२) परमेश्वर पर शक्तिपात प्रोन्मील्यमान-
स्वभावालोक वाला (३) तिरस्कृतसकल संदेहांधकार वाला होने के कारण प्रबुद्ध (४)

४२ स्पन्दकारिका
सम्यगुपनत दीक्षादिसंस्कारवान् (५) गुरुवचन चोदनमात्रावशेष (६) स्वात्मैश्वर्योपलब्धि के
लक्ष्य वाला—व्यक्ति ही इस शास्त्र का अधिकारी ('विषय') है ।१ 'तन्त्रालोक' में कहा
गया है कि 'स्पन्द' का विलास ही जगत् है । अनन्त स्पन्दों की तरंगों से ही विश्व
निर्मित है ।
'काल प्राण में, प्राण स्पन्द में एवं स्पन्द शून्य में एवं शून्य चिति में प्रतिष्ठित
है—समस्त षडध्वचक्रचिन्मात्र में प्रतिष्ठित है ।२ 'शून्य' 'स्पन्द' एवं 'प्राण' में निखिल
विस्तार स्थित है—
'स स्पन्दे खे स तच्चित्यां तेनास्यां विश्वनिष्ठितः ॥'३
यथा— वातग्निसंपर्कादयः पिण्डोऽग्निवद्भवेत् ।
दाहपाकप्रकाशादौ शक्तस्तद्वयं गणः ॥'४
भला यह सोचिए कि जो दूसरों को चैतन्य बनाने में समर्थ है वह निःस्वभाव कैसे
हो सकता है ? इसका अभिप्राय यह है कि सभी चेष्टायें ज्ञानपूर्वक हैं । ज्ञानहीन शरीर
मृत्तिका का खण्ड मात्र रह जाता है । निश्चय ही चैतन्य जड़वर्ग का अधिष्ठाता एवं धारक
है । अन्यथा पत्थर का टुकड़ा आकाश में स्थिर क्यों नहीं हो जाता ? अतः उद्योग एवं
श्रद्धा दोनों के द्वारा इस तत्त्व का परीक्षण एवं समीक्षण करना आवश्यक है—
'स्वदेहसाक्षिकं चैतत् सर्वस्य ज्ञानचेष्टितम् ।
ज्ञानानधिष्ठितः कायो लुठत्येव यतो धृतः ॥
अतएव जडानामप्यधिष्ठातृकृता धृतिः ।
गम्यते गमने ग्रावा न धायेताऽन्यथा कथम् ॥'५
इस सिद्ध पुरुष की वाणी पर भी विचार कीजिए—'ब्रह्म नेत्र के समान ही अदृश्य
है और नेत्र के समान ही द्रष्टा है अपने आप में ही इसकी उपलब्धि है यह घटादिक के
समान दृश्य नहीं है—
'अदृश्यं नेत्रवद् ब्रह्म द्रष्टृत्वं चास्ति नेत्रवत् ।
स्वात्मन्येवोपलम्भोऽस्य दर्शनं घटवन्न तु ॥'६
इसकी स्थिति अकृत्रिम एवं स्वतन्त्र है । जैसे यह देहस्थ करणवर्ग को चैतन्य
बनाने में स्वतन्त्र है वैसे ही संपूर्ण लोक-लोकोत्तर और दृश्य वर्ग को भी चेतन बनाने में
समर्थ है ।७
'स्पन्दतत्त्व'—क्षेमराज 'स्पन्दनिर्णय' में कहते हैं कि—वह संवित् तत्त्व स्पन्द-
शक्तिगर्भिकृत, अनन्त सर्गसंहारैकघन एवं अहन्ताचमत्कारानन्दरूपा है—
'सा चैष स्पन्दशक्तिगर्भकृतानन्तसर्गसंहारैकघनाहन्ताचमत्कारानन्दरूपा ॥'
स्पन्दशास्त्र में परमशिव की स्वभावभूत 'स्वातन्त्र्य शक्ति' का अभिधान ही
'स्पन्द' है ।
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' । २. तन्त्रालोक : विवेक ।
३. अभिनवसुखपाद—'श्रीतन्त्रालोक' । ४-७. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।

प्रथमः निष्यन्दः ४३
(१) अभिनवगुप्तपादाचार्य ‘परात्रिंशिका विवृति’ में कहते हैं-
संवित्सत्तत्त्वं ‘स्पन्द’ इत्युपदिशन्ति । स्पन्दनं च किञ्चिच्चलनं स्वरूपाच्च यदि
वस्त्वन्तराक्रमणं तच्चलनमेव न किञ्चित्त्वं, नो चेत् चलनमेव न किञ्चित्, तस्मात् स्वरूप
एवं क्रमादिपरिहारेण चमत्कारात्मिका-उच्छलता ऊर्मिरिति मत्स्योदरीति प्रभृतिशब्दै-
रागमेषु निदर्शितः ‘स्पन्द’ इत्युच्यते-किञ्चिच्चलनात्मकत्वात् स च शिवशक्तिरूपः
सामान्यविशेषात्मा ।। (पृ० २०८ : परात्रिं० वि०)।
(२) अभिनवगुप्तपादाचार्य- 'तन्त्रालोक' (द्वि० भाग प्र० आ०) में कहते हैं-
जो इदमात्मक विमर्श है यही 'विशेष' नामक 'स्पन्द' है और इसे ही 'औन्मुख्य' भी
कहते हैं-
ततः स्वातन्त्र्यनिर्मेये विचित्रार्थक्रियाकृति ।
विमर्शनं विशेषाख्यः स्पन्द औन्मुख्यसंज्ञितः ।। (८१)
यह इदमात्मक विशेष विमर्श जिसे 'स्पन्द' और 'औन्मुख्य' संज्ञाओं से
विभूषित किया गया है वस्तुतः यह विच्छिन्न विमर्श है । इदमात्मक विश्रान्ति की इस
भूमि पर उल्लसित अहमात्मक परामर्श में अन्तर्लक्ष्य योगी ही विश्राम करता है-
‘ततः समनन्तरोक्ताद्वैतोः स्वातन्त्र्योत्थापिते तत्तदर्थक्रियाकारिणि भावजाते यदिद-
मिति विमर्शनं स विशेषाख्य स्पन्द... औन्मुख्यसंज्ञितः' । १
इस पुरुष के स्वरूप (स्वभाव) को आच्छादित करने के लिए ये शब्दरूप शक्तियाँ
सर्वदा उद्यत रहती हैं अर्थात् क्रियाशक्ति के द्वारा ये पुरुषरूप को सदैव आच्छादित करना
चाहती रहती है क्योंकि बिना शब्दानुवेध के (अर्थात् बना वर्णानुगम के) किसी ज्ञान
संवेदनरूप प्रत्यय का उदय नहीं हो सकता । वस्तुतः ये शब्द ही एक ही तत्त्व को
वाच्य-वाचक विभाग से दो रूपों में बाँटकर प्रकट करते हैं ।
'वाक्यपदीय' में ठीक ही कहा गया है-'ऐसा कोई प्रत्यय नहीं होता जिसमें
शब्द का अनुगम न हो । सभी ज्ञान शब्दानुविद्ध देखे जाते हैं ।'
'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वशब्देन दृश्यते ॥'
इस विश्व-व्यवहार का कारण 'वाक्' ही है । अन्यत्र भी कहा गया है—हे देव!
चित् की उन्मुखता में सर्वदा बोध ही वाग् रूप होता है । वस्तुतः वही प्रत्यवमर्शिनी
शक्ति है उसके बिना प्रकाश भी प्रकाशित नहीं हो सकता । २
विशेष ध्यातव्य-यद्यपि प्राथमिक सूत्रों में 'स्पन्द' शब्द का प्रयोग तो नहीं किया
गया है तथापि 'स्पन्दकारिका' 'स्पन्दशास्त्र' एवं 'स्पन्दसूत्र' में 'स्पन्द' शब्द व्यवहृत हुआ
है—अतः उस पर भी यत्किंचित विचार कर लेना आवश्यक है । 'रामकण्ठाचार्य' ने
१. तन्त्रालोक (अभिनवगुप्त) 'विवेक'।
२. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका ।