स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ स्पन्दकारिका
'आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापन-विलापनतस्तानि ।। ११ ।।'१
परमात्मा के पञ्चकृत्य
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सृष्टि संहार विलय स्थिति अनुग्रह
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।'२
'नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्यविधायिने ।
चिदानन्दघनस्वात्म परमार्थविभासिने ।।'
'शङ्कर'—शं + करं ।। 'शं'—अशेष उपद्रव (भेदप्रथनात्मक उपद्रव) से रहित
परमानन्दाद्वय चैतन्य प्रकाश प्रत्यभिज्ञापनात्मक अनुग्रह । 'करं'—करोति इति करः ।
करने वला । 'तं' = स्वात्मपरमार्थ शङ्कर को । 'स्तुमः' = समस्त देह—प्राणादि
परिमित-प्रमातृ पदं को अधस्पदीकृत करके विकल्प-अविकल्प आदि समस्त रूपों में एवं
समस्त दशाओं में 'सर्वोत्कृष्ट होने के कारण मन ही मन सोचता हूँ' ।।
'स्तुमः'—परामृशामः । 'स्तुमः'—पद में बहुवचन का प्रयोग क्यों ? 'तं' =
असाधारण स्वरूपप्रत्यभिज्ञापनार्थ' 'शक्तिचक्र' = इन्द्रिय वर्ग ।
'प्रलयोदयौ' = प्रलयोदय । निमज्जन-उन्मज्जन । समावेश ।
(१) चिदात्मा का उन्मज्जन = 'समावेश' है ।
(२) जगत् का उन्मज्जन = 'व्युत्थान' है ।
(३) अभिन्नता का जो उन्मेष है वही जगत् का 'प्रलय' है ।३
(क) वेदान्तियों का ब्रह्म—'विश्वातीतः'
(ख) तांत्रिकों का परमशिव—१) विश्वमय २) विश्वातीत ।
त्रिकनय में 'परमपद' का स्वरूप—आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि न तो
'विश्वमय' और न तो 'विश्वातीत' प्रत्युत् 'विश्वमयविश्वातीत' पद ही परमपद है । शिव
विश्वमय एवं विश्वातीत दोनों है । शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ।' 'जगत्
परमात्मा की शक्ति है ।'
मूल में दो ही विद्यायें हैं—(१) 'कादिविद्या' (२) 'हादिविद्या' । कादि विद्या
में सृष्टि का उदय 'काम' (संकल्प) से माना गया है । हादि विद्या में सृष्टि—आकाशवत्
अव्यक्त शिव की माया शक्ति से माना गया है । उपनिषदों में भी कादि विद्या का समर्थन
किया गया है—
(१) तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति'४ अर्थात् उसने इच्छा की कि सृष्टि करने हेतु मैं
एक से अनेक होकर उत्पन्न हो जाऊँ ।
१. आचार्य क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । २. स्वच्छन्दतंत्र (पटल १) ।
३. स्पन्दसन्दोह (पृ० १४)। ४. छान्दोग्योपनिषद (६।२।३) ।