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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 519 में से

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पृष्ठ 144

प्रथमः निष्यन्दः ४३
(१) अभिनवगुप्तपादाचार्य ‘परात्रिंशिका विवृति’ में कहते हैं-
संवित्सत्तत्त्वं ‘स्पन्द’ इत्युपदिशन्ति । स्पन्दनं च किञ्चिच्चलनं स्वरूपाच्च यदि
वस्त्वन्तराक्रमणं तच्चलनमेव न किञ्चित्त्वं, नो चेत् चलनमेव न किञ्चित्, तस्मात् स्वरूप
एवं क्रमादिपरिहारेण चमत्कारात्मिका-उच्छलता ऊर्मिरिति मत्स्योदरीति प्रभृतिशब्दै-
रागमेषु निदर्शितः ‘स्पन्द’ इत्युच्यते-किञ्चिच्चलनात्मकत्वात् स च शिवशक्तिरूपः
सामान्यविशेषात्मा ।। (पृ० २०८ : परात्रिं० वि०)।
(२) अभिनवगुप्तपादाचार्य- 'तन्त्रालोक' (द्वि० भाग प्र० आ०) में कहते हैं-
जो इदमात्मक विमर्श है यही 'विशेष' नामक 'स्पन्द' है और इसे ही 'औन्मुख्य' भी
कहते हैं-
ततः स्वातन्त्र्यनिर्मेये विचित्रार्थक्रियाकृति ।
विमर्शनं विशेषाख्यः स्पन्द औन्मुख्यसंज्ञितः ।। (८१)
यह इदमात्मक विशेष विमर्श जिसे 'स्पन्द' और 'औन्मुख्य' संज्ञाओं से
विभूषित किया गया है वस्तुतः यह विच्छिन्न विमर्श है । इदमात्मक विश्रान्ति की इस
भूमि पर उल्लसित अहमात्मक परामर्श में अन्तर्लक्ष्य योगी ही विश्राम करता है-
‘ततः समनन्तरोक्ताद्वैतोः स्वातन्त्र्योत्थापिते तत्तदर्थक्रियाकारिणि भावजाते यदिद-
मिति विमर्शनं स विशेषाख्य स्पन्द... औन्मुख्यसंज्ञितः' । १
इस पुरुष के स्वरूप (स्वभाव) को आच्छादित करने के लिए ये शब्दरूप शक्तियाँ
सर्वदा उद्यत रहती हैं अर्थात् क्रियाशक्ति के द्वारा ये पुरुषरूप को सदैव आच्छादित करना
चाहती रहती है क्योंकि बिना शब्दानुवेध के (अर्थात् बना वर्णानुगम के) किसी ज्ञान
संवेदनरूप प्रत्यय का उदय नहीं हो सकता । वस्तुतः ये शब्द ही एक ही तत्त्व को
वाच्य-वाचक विभाग से दो रूपों में बाँटकर प्रकट करते हैं ।
'वाक्यपदीय' में ठीक ही कहा गया है-'ऐसा कोई प्रत्यय नहीं होता जिसमें
शब्द का अनुगम न हो । सभी ज्ञान शब्दानुविद्ध देखे जाते हैं ।'
'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वशब्देन दृश्यते ॥'
इस विश्व-व्यवहार का कारण 'वाक्' ही है । अन्यत्र भी कहा गया है—हे देव!
चित् की उन्मुखता में सर्वदा बोध ही वाग् रूप होता है । वस्तुतः वही प्रत्यवमर्शिनी
शक्ति है उसके बिना प्रकाश भी प्रकाशित नहीं हो सकता । २
विशेष ध्यातव्य-यद्यपि प्राथमिक सूत्रों में 'स्पन्द' शब्द का प्रयोग तो नहीं किया
गया है तथापि 'स्पन्दकारिका' 'स्पन्दशास्त्र' एवं 'स्पन्दसूत्र' में 'स्पन्द' शब्द व्यवहृत हुआ
है—अतः उस पर भी यत्किंचित विचार कर लेना आवश्यक है । 'रामकण्ठाचार्य' ने
१. तन्त्रालोक (अभिनवगुप्त) 'विवेक'।
२. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका ।