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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 519 में से

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पृष्ठ 140

प्रथमः निष्यन्दः ३९
वह शङ्कर की अव्यतिरिक्ता शक्ति है—'सा च अव्यतिरिक्ता शङ्करस्य शक्तिः।' इस
शक्ति का ज्ञान ही आत्मा के ऐश्वर्य एवं प्रत्यभिज्ञा की सिद्धि का उपाय है। यहाँ पर
सांसारिक पुरुषों में आविर्भूत इच्छा के साथ सादृश्य दिखाने हेतु 'इच्छा' शब्द का प्रयोग
किया जा रहा है जिस प्रकार पुरुष की अपनी इच्छावस्था में इष्यमाण पदार्थ अपने
स्वरूप में पुरुष के साथ अव्यतिरिक्त रूप से स्थित रहता है। इसी प्रकार 'शक्ति'
भगवान् की 'इच्छा' के रूप में उसमें अभिन्न रूप से स्थित रहती है। भगवान् के भीतर
स्थित जो इच्छारूपकात्मक शक्ति है उसी के भीतर अनन्तावभासात्मक जगत् स्वरूपतः
अव्यतिरिक्त रूप से स्थित रहता है 'भगवतः शक्तौ अनन्तावभासविशेषचित्रं जगत् ...
स्वरूपात् अव्यतिरेकेणैव अवतिष्ठते।'
वह यह शक्ति पारमार्थिकी 'शिवदशा' है। उसी की विद्वानों द्वारा इस प्रकार स्तुति
की गई है— 'सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासने।
सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः॥'
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है—
'या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता।
अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः॥'
इस प्रकार एक ही अद्वैत पारमेश्वरी पराशक्ति के इच्छा-ज्ञान एवं क्रिया विभिन्न
व्यपदेश हैं और माया शक्ति के द्वारा 'इदन्ता' के रूप में आविर्भूत होते हैं इसी माया
शक्ति के द्वारा परमार्थस्वरूप एक ही शिवतत्त्व में सदाशिवादि तत्त्वान्तर का प्रक्रिया-शास्त्र
में व्यपदेश किया गया है। इस प्रकार के लक्षणों वाली पारमेश्वरी शक्ति अपनी लीला से
उल्लसित जगत् के अवस्थाद्वय के कारण स्वयं भी दो स्वरूपों वाली कही जाती है।
अतः इस कारिका के प्रथमार्द्ध का अर्थ निम्नानुसार है—
'जिसकी इच्छा मात्र से जगत् की सृष्टि एवं प्रलय हुआ करते हैं—मैं उसका
स्तवन करता हूँ।' ('यस्य इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ तं स्तुमः ।) उन्मेष—उदय।
निमेष—प्रलय। उन्मेष-निमेष दो नहीं हैं एक ही है और इस रूप में वह इच्छामात्र है।
'इच्छामात्रौ उन्मेषनिमेषौ'। भट्टकल्लट ने भी 'संकल्पमात्रेण ...' कहकर इसी तथ्य का
प्रतिपादन किया है। इस कारिका द्वारा शङ्कर के पारमार्थिक धर्म के रूप में उन्मेष एवं
निमेष को प्रतिपादित किया गया है।
नित्य, अव्यभिचारी एक स्वभाव भगवान् शङ्कर के समान ही शक्ति को भी उसी
स्वरूप का स्वीकार किया गया है क्योंकि दोनों में अभेद है।
शिव की ऐश्वर्यमयता का प्रतिपादन—
'चक्रविभवं' द्वारा ईश्वर के निरतिशय ऐश्वर्य को सूचित किया गया है। भले ही
जगत् शङ्कर एवं शक्ति से भिन्न प्रतीत हो किन्तु है उससे अभिन्न ही—
'परमेश्वरता जयत्यपूर्वा तव सर्वेश यदीशितव्यशून्या।
अपरापि तथैव ते ययेदं जगदाभाति यथा तथा न भाति॥'