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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

१७२) (श्री भक्तमाल
आये रघुनाथ साथ, लछिमन चढ़े घोरे, पट, रंग बोरे हरे कैसे मन राखियै।
पाछे हनुमान आये, बोले देखे प्रान प्यारे, नेकु न निहारे मैं तौ, भलैं फेरि भाखियै।।५१०।।
हत्या करि विप्र एक, तीरथ करत आयौ, कहै मुख राम, भिच्छा डारियै हत्यारे कौ।
सुनि अभिराम नाम, धाम में बुलाय लियौ, दियौ लै प्रसाद, कियौ शुद्ध गायौ प्यारे कौ।।
भई द्विजसभा, कहि बोलिकै पठाये आप, कैसे गयौ पाप, संग लैके जेंये न्यारे कौ।
पोथी तुम बाँचौ, हिये भाव नहीं साँचौ, अजू ताते मति काँचौ, दूर करै न अंध्यारे कौ।।५११।।
देखी पोथी बाँच, नाम-महिमा हूँ कही साँच, ऐपै हत्या करै, कैसें तरै कहि दीजियै।
आवै जो प्रतीति, कहौ कही याके हाथ जेंवैं, शिव जू कौ बैल, तब पंगति में लीजियै।।
थार में प्रसाद दियौ, चले जहाँ पन कियौ, बोले आप नाम कै, प्रसाद मति भीजियै।
जैसी तुम जानो, तैसी कैसे कै बखानौं, अहो सुनिकै प्रसन्न, पायो जै-जै धुनि रीझियै।।५१२।।
आये निसि चोर, चोरी करन हरन धन, देखे स्याम घन, हाथ चाप सर लिये हैं।
जब-जब आवैं, बान साँधि डरपावैं एतौ अति मँड़रावै, ऐपै बली दूरि किये हैं।।
भोर आय पूछैं, अजू! साँवरो किशोर कौन, सुनि करि मौन रहे, आँसू डारि दिये हैं।
दई सो लुटाय, जानी चौकी राम राय दई, लई उन्ह दिच्छ,-सिच्छ शुद्ध भये हिये हैं।।५१३।।
कियौ विप्र तन त्याग, तिया चली संग लागि, दूरहीं ते देखि कियौ, चरन प्रनाम है।
बोले यों सुहागवती, मर्यौ पति होऊँ सती, अबतौ निकसि गई, ज्याऊँ सेवौ राम है।।
बोलिकै कुटुम्ब कही, जोपै भक्ति करौ सही, गही तब बात, जीव दियो अभिराम है।
भये सब साधु, व्याधि मेटि लै विमुखता की, जाकी वास रहै तौ न, सूझै स्याम धाम है।।५१४।।
दिल्लीपति पातसाह, अहदी पठाये लैन, ताकौ सो सुनायौ, सूबे विप्र ज्यायौ जानियै।
देखिवे कौं चाहै, नीकै सुख सौं निवाहै आय, कही बहु विनै गही, चले मन आनियै।।
पहुँचे नृपति पास, आदर प्रकास कियौ, दियौ उच्च आसन लै, बोल्यौ मृदु वानियै।।
दीजै करामात, जग ख्यात सब मात किये, कही झूठ बात, एक राम पहिचानियै।। ५१५।।
देखें राम कैसौ कहि कैद किये, किये हिये हूजिये कृपाल, हनुमान जू दयाल हो।
ताही समैं फैलि गये, कोटि-कोटि कपि नये, लोचैं तन खोचैं, चीर भयौ यों बिहाल हो।।
फोरैं कोट, मारैं चोट, किये डारैं, लोट-पोट, लीजै कौन ओट, जाय मान्योँ प्रलयकाल हो।
भई तब आँखैं, दुखसागर कौं चाखैं अब, वेई हमें राखैं, भाखैं वारौं धनमाल हो।। ५१६।।
आय पाँय लिये तुम, दिये हम प्रान पावैं, आप समझ़ावैं, करामात नेकु लीजियै।
लाज दबि गयो नृप, तब राखि लयौ कह्यौ, भयौ घर राम जू कौ, वेगि छोड़ि दीजियै।।

श्रीगोकुलनाथ गोसाँई जी) (१३३
सुनि तजि दयो और, कर्यौ लैकै कोट नयौ, अबहूँ न रहे कोऊ, वामै तन छीजिये।
काशी जाय वृन्दावन, आय मिले नाभा जू सौं, सुन्यौ हो कवित्त निज, रीझि मति भीजिये।।५१७।।
मदनगोपाल जू कौ, दरसन करि कही, सही राम इष्ट मेरे, दृष्टिभाव पागी है।
वैसे ही सरूप कियौ, दियौ ले दिखाय रूप, मन अनुरूप छबि, देखि नीकी लागी है।।
काहू कही कृष्ण, अवतारी जू प्रशंस महा, राम अंश सुनि, बोले मति अनुरागी है।
दसरथ सुत जानौं, सुन्दर अनूप मानौं, ईशता बताई रति, कोटिगुनी जागी है।।५१८।।
श्रीमानदासजी
गोप्य केलि रघुनाथ की, (श्री) मानदास परगट करी।।
करुना वीर सिंगार, आदि उज्ज्वल रस गायौ।
पर उपकारक धीर, कवित कविजन मन भायौ।।
कोशलेश पदकमल, अननि दासत व्रत लीनौ।
जानकी जीवन सुजस, रहत निसिदिन रँग भौनौ।।
रामायन नाटक रहसि, युक्ति उक्ति भाषा धरी।
गोप्य केलि रघुनाथ की, (श्री) मानदास परगट करी।।१३०।।
श्रीगिरिधरजी
(श्री) वल्लभ जू के वंश में, सुरतरु गिरिधर भ्राजमान।।
अर्थ धर्म काम मोक्ष, भक्ति अनपायनि दाता।
हस्तामल श्रुति ज्ञान, सबहि शास्त्रन के ज्ञाता।।
परिचर्या ब्रजराज, कुँवर कें मन कौं कर्षै।
दरसन परम पुनीत, सभा तन अमृत वर्षै।।
विट्ठलेश नन्दन सुभाव, जग कोऊ नहिं ता समान।
(श्री) वल्लभ जू के वंश में सुरतरु, गिरिधर भ्राजमान।।१३१।।
श्रीगोकुलनाथ गोसाँईजी
(श्री) वल्लभ जू के वंश में, गुननिधि गोकुलनाथ अति।।

१७४) (श्री भक्तमाल
उदधि सदा अक्षोभ, सहज सुन्दर मित भाषी।
गुरुवत्तन गिरिराज, भलप्पन सब जग साषी॥
विट्ठलेश की भक्ति, भयौ बेला दृढ़ ताकै।
भगवत् तेज प्रताप, नमित नरवर पद जाकैँ॥
निर्विलीक आसय उदार, भजनपुंज गिरिधरन रति।
(श्री) वल्लभ जू के वंश में, गुननिधि गोकुलनाथ अति।।१३२।।
आयौ कोऊ शिष्य होन, ल्यायो भेंट लाखन की, भाखन की चातुरी पै, मेरी मति रीझियै।
कहूँ है सनेह तेरो, जाके मिले बिना देह, व्याकुलता होय, जोपै तोपै दीच्छा दीजियै।।
बोल्यौ अजूनै मेरो काहू, वस्तु सौं न हेतु नेकु, नेति-नेति कही, हम गुरु ढूँढ़ि लिजियै।
प्रेम ही की बात इहाँ, कर ही पलटि जात, गयौ दुख गात, कहो कैसैं रँग भीजियै।। ५१६ ।।
कान्हा हो हलालखोर, घोरि दियौ मन लैकै, स्याम रससागर में, नागर रसाल है।
निसि को सुपन माँझ, निपुन श्रीनाथ जू नै, आज्ञा दई, भीत नई, भई ओट साल है।।
गोकुल के नाथ जू सौं, वेगि दै जताइ दीजै, कीजै याहि दूर, छबि पूर देखौ ख्याल है।
भोर जौ विचारै, नहिं धीरज कौ धारै, उहाँ जाऊँ कोऊ मारै, पैड़ें पर्यो यह लाल है।। ५२०।।
ऐसे दिन तीन, आज्ञा देते वे प्रवीन, नाथ हाथ कहा मेरे, बिन गये नही सरैगौ।
गये द्वार द्वारपाल, बोले जू विचार एक, दीजै सुधि कान, सुनि खीझै बात करैगौ ।।
काहू ने सुनाय दई, लीजिये बुलाय अहो, कहौ और दूर करौ, करे दूरि ढरैगौ।
जाय वही कही, लही अपनी पिछानि मिले, सुन्यौ मेरौ नाम श्याम कह्यौ नहीं टरैगौ।। ५२१।।
श्रीवनवारीदासजी
रसिक रँगीलौ भजनपुंज, सुठि वनवारी स्याम कौ।।
बात कवित बड़ चतुर, चोख चौकस अति जानै।
सारा सार विवेक, परमहंसनि परवानै ।।
सदाचार सन्तोष, भूत सबको हितकारी।
आरज गुन तन अमित, भक्ति दशधा व्रतधारी।।
दरसन पुनीत, आसय उदार आलाप रुचिर सुख धाम कौ।

श्रीबावनजी) (१३५

रसिक रँगीलौ भजनपुंज, सुठि वनवारी स्याम कौ ।। १३३ ।।

श्रीनारायण मिश्रजी
भागौत भलीविधि कथन कौ, धनि जननी एकै जन्यौ ।।
नाम नरायन मिश्र, वंश नवला जू उजागर।
भक्तन की अति भीर, भक्ति दशधा कौ आगर ।।
आगम निगम पुरान, सार शास्त्रनि सब देखे।
सुरगुरु शुक सनकादि, व्यास नारद जु बिसेखे ।।
सुधा बोध मुख सुरधुनी, जस वितान जग में तन्यौ।
भागौत भलीविधि कथन कौ, धनि जननी एकै जन्यौ ।। १३४ ।।

श्रीराधवदासजी
कलिकाल कठिन जग जीतियो, राधौ की पूरी परी ।।
काम क्रोध मद मोह, लोभ की लहर न लागी।
सूरज ज्यों जल संग्रहै, बहुरि ताही ज्यों त्यागी ।।
सुन्दर शील सुभाव, सदा सन्तैन सेवा व्रत।
गुरु धर्म निकष निर्वह्यौ, विश्व में विदित बड़ौ भृत ।।
अल्हराम रावल कृपा, आदि अन्त धुकती धरी।
कलिकाल कठिन जग जीतियो, राधौ की पूरी परी ।। १३४ ।।

श्रीबावनजी
हरिदास भलप्पन भजनबल, बावन ज्यौं बढ़यौ बावनौ ।।
अच्युतकुल सौं दोष, सुपनेहूँ उर नहिं आनै।
तिलक दाम अनुराग, सबनि गुरुजन करि मानै ।।
सदन माँहि वैराग्य, विदेहिन की सी भाँती।
रामचरण मकरन्द, रहति मनसा मदमाती ।।

१३६) (श्री भक्तमाल
जोगानन्द उजागर वंश, करि निसिदिन हरिगुन गावनौ।
हरिदास भलप्पन भजनबल, बावन ज्यों बढ़यौ बावनौ ॥१३६॥
श्रीपरशुरामजी
जंगली देश के लोग सब, श्रीपरशुराम किय पारषद॥
ज्यों चन्दन कौ पवन, नीम्ब पुनि चन्दन करई।
बहुत काल तम निबिड़, उदै दीपक ज्यों हरई॥
श्रीभट पुनि हरिव्यास, सन्त मारग अनुसरई।
कथा कीरतन नेम, रसन हरिगुन उच्चरई॥
गोविन्द भक्ति गद रोग गति, तिलक दाम सद्‌वैद हद।
जंगली देश के लोग सब, श्रीपरशुराम किय पारषद ॥१३७॥
राजसी महन्त देखि, गयौ कोऊ अन्त लैन, बोल्यौ जू अनन्त, हरि सगे माया टारियै।
चले संग वाके, त्यागि पहिरि कुपीन अंग, बैठे गिरि कन्दरा में, लागी ठौर प्यारियै॥
तहाँ बनिजारौ आय, सम्पति चढ़ाय दई, दई और पालकी हूँ, महिमा निहारियै।
जाय लपटायौ पाँय, भाव मैं न जान्यौ कछू, आन्यौ उर माँझ, आवै प्रान वारि डारियै॥५२२॥
मास परायण चौबीसवाँ विश्राम
नवाह परायण सप्तम विश्राम
श्रीगदाधरभट्टजी
गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद॥
सज्जन सुहृद् सुशील, वचन आरज प्रतिपालय।
निर्मत्सर निहकाम, कृपा करुणा कौ आलय॥
अनन्य भजन दृढ़ करनि, धर्यौ वपु भक्तनि काजै।
परम धरम कौ सेतु, विदित वृन्दावन गाजै॥
भागौत सुधा बरषै वदन, काहू कौं नाहिन दुखद।
गुननिकर गदाधरभट्ट अति, सबहिन कौ लागै सुखद ॥१३८॥

श्रीगदाधरभट्टजी) (१३७
स्याम रंग रंगी पद, सुनिकै गुसाँई जीव, पत्र दै पठाये, उभै साधु वेगि धाये हैं।
रैनी बिन रंग कैसे, चढ़यौ, अति सोच बढ़यौ, कागद में प्रेम मढ़यौ, तहाँ लैके आये है।।
पुर ढिंग कूप, तहाँ बैठे रसरूप लगे, पूछिवे कौ तिनहीं सौं, नाम लै बताये हैं।
रहौ कौन ठौर, सिरमौर वृन्दावन धाम, नाम सुनि मुरछा ह्वै, गिरे प्रान पाये हैं।। ५२३।।
काहू कही भट्ट, श्रीगदाधर जू एई जानौ मानौ, उही पाती चाह, फेरिकै जिवाये हैं।
दियौ पत्र हाथ, लियो सीस सौं लगाय चाय, बाँचत ही चले वेगि, वन्दावन आये हैं।।
मिले श्रीगुसाँई जू सौं, आँखें भरि आई नीर, सुधि न सरीर, धरि धीर वही गाये हैं।
पढ़े सब ग्रन्थ, संग नाना कृष्णकथा रंगरस की उमंग, अंग-अंग भाव छाये हैं।। ५२४।।
नाम हो कल्यानसिंह, जात राजपूत पूत, बैठ्यो आय कथा, सो अभूत रंग लाग्यौ है।
निपट निकट वास, धौरहा प्रकास गाँव, हास परिहास तज्यो, तिया दुख पाग्यो है।।
जानी भट्ट संग सौं, अनंग वास दूर भई, करौ लैके नई आनि, हिये काम जाग्यो है।
माँगत फिरत हुती, जुवती औ गर्भवती, कही लै रुपैया बीस, नेकु कहो राग्यो है।। ५२५।।
गदाधर भट्ट जू की, कथा में प्रकास कहो, अहौ कृपा करी, अब मेरी सुधि लीजिये।
दई लौंडी संग, लोभ रंग चित भंग किये, दिये लै बताय, बोली मेरौ काम कीजिये।।
बोले आप, बैठिये जू, जाप नित करौं हिये, पाप नहीं मेरौ, गई दरसन दीजिये।
श्रोता दुख पाय भाखैं, झूठी याहि मारि नाखैं, साँची कहि राखैं सुनि, तन-मन छीजिये।। ५२६।।
फाटि जाय भूमि, तौ समाय जायँ श्रोता कहैं, बहे दृग नीर, ह्वै अधीर सुधि गई है।
राधिकावल्लभदास, प्रगट प्रकास भास, भयौ दुखरासी सुनि, सौ बुलाय लई है।।
साँच कहि दीजै नहीं, अभी जीव लीजै डारि, सबै कहि दीयौ, सुख लियौ संज्ञा भई है।
काढ़ि तरवार तिया, मारिवे कल्यान गयौ, दयौ परबोध, हमें करी दया नई है।। ५२७।।
रहैं काहू देस में, महन्त आये कथा माँझ, आगें लै बैठाये, देखें सबै साधु भीजे हैं।
मेरे अश्रुपात क्यों न, होत सोच सोत परे, करे लै उपाय, दै लगाय मिर्च खीजे हैं।।
सन्त एक जानिकै, जताय दई भट्ट जू कौ, गये उठि सब, जब मिलि अति रीझे हैं।
ऐसी चाह होय, मेरे रोय कै पुकारि कही चली, जलधार नैन प्रेम आय धीजे हैं।।। ५२८।।
आयौ एक चोर, घर सम्पति बटोरि, गाँठि बाँधी लै मरोरि, किहूँ उठै नाहिं भारी है।
आयकै उठाय दई, देखी इन रीति नई, पूछ्यौ नाम प्रीति भई, भूलो मैं विचारी है।।
बोले आप लै पधारौ, होत ही सवारौ आवै, और दसगुनी मेरे, तेरी यह ज्यारी है।
प्राननि कौं आगें धरौ, आनिकै उपाय करौ, रहे समझाय भयौ, शिष्य चोरी टारी है।। ५२६।।

१३८) (श्री भक्तमाल
प्रभु की टहल निज, करनि करत आप, भक्ति कौ प्रताप जानें, भागवत गाई है।
देत हुते चौका कोऊ, शिष्य बहु भेंट ल्यायौ, दूर ही ते देखि, दास आयौ सो जनाई है।
धोवौ हाथ, बैठौ आप, सुनिकै रिसाय उठे, सेवा ही में चाय, वाकौं खीझि समझाई है।
हिये हितरासि जग, आस कौं विनास कियौ, पियौ प्रेमरस, ताकी बात लै दिखाई है।।५३०।।
चारण भक्तजी
चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुआ।।
चौमुख चौरा चण्ड, जगत् ईश्वर गुण जाने।
करमानन्द अरु कोल्ह, अल्ह अक्षर परवाने।।
माधौ मथुरा मध्य, साधु जीवानन्द सीवाँ।
दूदा नारायणदास, नाम मांडन नत ग्रीवाँ।।
चौरासी रूपक चतुर, बरनत वानी ज्यों जुवा।
चरण शरण चारण भगत, हरि गायक एता हुआ।। १३६।।
श्रीकरमानन्दजी
करमानन्द चारण की, वानी की उचारन में, दारुन जो हियौ होय सोऊ पिघलायकै।
दियौ गृह त्यागि, हरिसेवा अनुराग भरे, बटुवा सुग्रीव हाथ, छरी पधराइकै।।
काहू ठौर जाय, गाड़ि वहीं पधराये वापै, ल्याये उर प्रभु भूलि आये कहाँ पाइयै।
फेरि चाह भई, दई स्याम को जताय बात, लई मँगवाय देखि, मति लै भिजाइयै।।५३१।।
श्रीकोल्हजी, श्रीअल्हजी
कोल्ह अल्ह भाई दोऊ, कथा सुखदाई सुनौ, पहिलौ विरक्त, मद मांस नही खात है।
हरि ही के रूप, गुन वानी में उचार करै, धरै भक्तिभाव हिये, ताकी यह बात है।।
दूसरौ अनुज जानौ, खाय सब उन मानौ, नृप ही कौं गावै, प्रभु कभूँ गाय जात है।
बड़े के अधीन रहै, सोई करै जोई कहै, ईश करि चहै, आप दीनता में मात है।।५३२।।
बड़े आय कही, चलौ द्वारका निहारैं सही, मिथ्या जगभोग, यामें आयु ही बिहात है।
आज्ञा के अधीन चल्यौ, आये पुर लीन भये, नये चोज मन्दिर में, सुनौ कान बात है।।
कोल्ह ने सुनाये सब जे-जे नाना छन्द गाये, पाछे अल्ह दोय चार कहे सकुचात है।
भर्यो ही हुंकारौ प्रभु, कही माला गरें डारौ, ल्याये पहिरावैं, कह्यौ मेरौ बड़ौ भ्रात है।।५३३।।

श्रीपृथ्वीराजजी) (१३६
दयौ पै न याहि दयौ, बड़ौ अपमान भयो, गयौ बूड़ौ सागर में, दुख कौ न पार है।
बूड़त ही आगे, भूमि पाई चल्यो झूमि प्रीति, सो अनीति भूलै नाहिं मानो तरवार है।।
सौंही आये लैन, हरिजन मन चैन झिल्यो, मिल्यौ कृष्ण जाय, जायौ अति सुखसार है।
बैठे जब भोजन कौं, दई उभै पातर लै, दूसरी जू कैसी, कही वही भाई प्यार है।। ५३४ ।।
सबौ विष भयौ, दुख गयौ सोई हुयौ नयौ, दयौ परबोध, वाकी बात सुनि लीजियै।
तेरो छोटो भाई, मेरो भक्त सुखदाई, ताकी कथा लै जताई, जामें आप ही सौं धीजियै।।
प्रथम जनम माँझ बड़ौ, राजपुत्र भयौ गयौ, गृह त्यागि सदा मोसों मति भीजियै।
आयौ वन कोऊ भूप, संग रागरंग रूप, देखि चाह भई देह, दई भोग दीजियै ।। ५३५ ।।
तेरई वियोग, अन्न-जल सब त्यागि दियौ, जियौ नही जात, वापै वेगि सुधि लीजियै।
हाथ पै प्रसाद दीनों, आय घर चीन्ह लीनों, सुपनौ सौ गयौ, बीति प्रीति वासौं कीजियै।
द्वारका को संग सुनि, आवत ही आगै चल्यौ, मिल्यौ भूमि पर दृग, भरि वहै दिजियै।
कही सब बात, स्याम धाम तज्यौ ताही छिन, कर्यौ वनवास दोऊ, अति मति भीजियै।। ५३६ ।।
श्रीनारायणदासजी
अल्ह ही के वंश में, प्रशंस याहि जानि लेव, बड़ौ और भाई छोटौ, श्रीनरायन दास है।
दीर्घ कमाऊ, लघु उपज्यौ उड़ाऊं, भाभी दियो सीरौ भोजन, लै भयौ दुखरासि है।।
देवौ मोकौं तातौ करि, बोली वह क्रोध भरि, यहूँ जा हुंकारौ भरवावै कियो हास है।
गयौ गृह त्यागि, हरि पाणि कर्यो वैसे ही जू, भक्तिवश स्याम, कह्यौ प्रगट प्रकास है।। ५३७ ।।
श्रीपृथ्वीराजजी
नरदेव उभै भाषा निपुन, पृथीराज कविराज हुव।।
सवैया गीत श्लोक, बेलि दोहा गुन नवरस।
पिंगल काव्य प्रमान, विविध विधि गायौ हरि जस।।
पर दुख विदुख श्लाघ्य, वचन रचना जु विचारै।
अर्थ विचित्र निमोल, सबै सांरग उर धारै।।
रुक्मिनी लता बरनन अनूप, बागीश वदन कल्यान सुव।
नरदेव उभै भाषा निपुन, पृथीराज कविराज हुव।। १४० ।।

१४०) (श्री भक्तमाल
मारवार देश बीकानेर कौ नरेस बड़ौ, पृथीराज नाम भक्तराज कविराज है।
सेवा अनुराग, और विषय वैराग ऐसौ, रानी पहिचानी नाहिं, मानौं देखी आज है॥
गयौ हो विदेश तहाँ, मानसी प्रवेस कियौ, हियौ नहीं छुवै, कैसे सरै मन काज है।
बीते दिन तीन, प्रभु मन्दिर न दीठि परै, पाछै हरि देखि भयौ, सुख कौ समाज है॥५३८॥
लिखिकै पठायौ देश, सुन्दर सन्देस यह, मन्दिर न देखे, हरि बीते दिन तीन हैं।
लिख्यौ आयौ साँच, बाँचि अति ही प्रसन्न भये, लगे राज बैठे प्रभु, बाहर प्रवीन हैं॥
सुनौ एक और, यों प्रतिज्ञा करी हिये धरी मथुरा सरीर त्याग करें रसलीन हैं।
पृथीपति आनिकै मुहीम, दई काबुल की, बल अधिकाई, नहीं काल के अधीन हैं॥५३६॥
जीवन अवधि रहै, निपट अलप दिन, कलप समान बीतै, पल न बिहात है।
आगम जनाय दियौ, चाहै इन्हें साँचौ कियौ लियौ, भक्तिभाव जाके, छायौ गात-गात है॥
चल्यौ चढ़ि साँड़िनी पै, लई मधुपुरी आनि, करिकै अस्नान प्रान, तजे सुनि बात है।
जै-जै धुनि भई व्यापि, गई चहुँओर अहो, भूपति चकोर जस, चन्द दिन-रात है॥५४०॥
श्रीसीवाजी
द्वारका देखि पालण्टी, अचढ़ सीवैं कीधी अटल॥
असुर अजीज अनीति, अगिनि में हरिपुर कीधौ।
सांगन सुत ने साद, राय रनछोरै दीधौ॥
धरा धाम धन काज, मरन बीजा हूँ माँडै।
कमधुज कुटकै हुवौ, चौक चतुरभुजनी छाँडै॥
बाढ़ेल बाढ़ कीवी कटक, चाँद नाम चाँड़े सबल।
द्वारका देखि पालण्टी, अचढ़ सीवैं कीधी अटल॥१४१॥
कावापति सींवा सुत, साँगन कौ प्यारौ हरि, द्वारावति ईश यों, पुकारै रक्षा कीजिये।
सदा भगवान् आप, भक्त प्रतिपाल करें, करौ प्रतिपाल मेरौ, सुनि मति भीजिये॥
तुरक अजीज नाम, धाम कौ लगाई आगि, लई बाग धोरन की, आये टूक कीजिये।
दुष्ट सब मारे, प्रभु कष्ट ते उवारे, निज प्रान वारि डारे, यह नयौ रस पीजिये॥५४१॥
मास परायण पच्चीसवाँ विश्राम

श्रीमती रत्नावतीजी) (१४१

श्रीमती रत्नावतीजी

पृथीराज नृप कुलबधू, भक्तभूप रतनावती।।
कथा कीरतन प्रीति, भीर भक्तनि की भावै।
महा महाच्छौ मुदित, नित्य नँदलाल लड़ावै।।
मुकुन्द चरण चिन्तवन, भक्ति महिमा ध्वजधारी।
पति पर लोभ न कियौ, टेक अपनी नहीं टारि।।
भलपन सबै विशेष ही, आमेर सदन सुन खाजिती।
पृथीराज नृप कुलबधू, भक्तभूप रतनावती।। १४२।।
मानसिंह राजा ताकौ, छोटौ भाई माधौसिंह, ताकी जानौ तिया, जाकी बात लै बखानियै।
ढिंग जो खवासिनि सौं, स्वांसनि भरत नाम, रटति जटिल प्रेम, रानी उर आनियै।।
नवलकिशोर कभूँ, नन्द के किशोर कभूँ, वृन्दावनचन्द कहि, आँखैं भरि पानियै।
सुनत विकल भई, सुनिवे की चाह भई, रीति यह नई कछु, प्रीति पहिचानियै।। ५४२।।
बार-बार कहै, कहा कहै, उर गहै मेरौ, बहै दृग नीर, हो सरीर सुधि गई है।
पूछौ मत बात, सुख करौ दिन-रात, यह सहै निज गात, रागी साधु कृपा भई है।।
अति उतकण्ठा देखि, कह्यौ सो विशेष सब, रसिक नरेसनि, की वानी कहि दई है।
टहल छुटाई औ, सिरहाने लै बैठाई वाहि, गुरू बुद्धि आई, यह जानौ रीति नई है।। ५४३।।
निसिदिन सुन्यौ करै, देखिवे को अरबरै, देखे कैसैं जात, जल जात दृग भरे हैं।
कछुक उपाय कीजै, मोहन दिखाय दीजै, तबही तौ जीजै, वेतौ आनि उर अरे हैं।।
दरसन दूर, राज छोड़ै लौटैं धूर, पै न पावैं छबि पूर, एक प्रेमवश करे हैं।
करौ हरिसेवा, भरि भाव धरि मेवा, पकवान रस खान दै, बखान मन धरे हैं।। ५४४।।
इन्द्रनीलमनी रूप, प्रगट सरूप कियौ, लियौ वहै भाव, यों सुभाव मिलि चली है।
नानाविधि रागभोग, लाड़कौ प्रयोग जामें, जामिनी सुपन जोग, भई रँगरली है।।
करत सिंगार छबि, सागर न पारावार, रहत निहारि वाही, माधुरी सौं पली है।
कोटिक उपाय करैं, जोग जज्ञ पार परै, ऐपै नही पावै यह, दूर प्रेम गली है।। ५४५।।
देख्योई चहति तऊ, कहति उपाय कहा? अहो चाह बात कहौ, कौन को सुनाइयै।
कही जू बनावौ ढिंग, महल कै ठौर एक, चौकी लै बैठावौ, चहुँओर समुझाइयै।।

१४२) (श्री भक्तमाल
आवैं हरिप्यारे तिन्हें, ल्यावैं वे लिवाय इहाँ, रहें ते धुवाय पाँय, रुचि उपजाइयै।
नानाविधि पाक सामा, आगै आनि धरें आप, डारि चिक देखौ, स्याम दृगनि लखाइयै॥५४६॥
आवैं हरिप्यारे, साधुसेवा करि टारे दिन, किहूँ पाँव धारे जिन्हें, ब्रजभूमि प्यारियै।
जुगलकिशोर गावैं, नैननि बहावैं नीर, ह्वै गई अधीर, रूप दृगनि निहारियै॥
पूछी वा खवासिन सौं, जू रानी कौन अंग? जाके इतनी अटक, संग भंग सुख भारियै।
चली उठि हाथ गह्यौ, रह्यौ नहीं जात अहो, सह्यो दुख लाज बड़ी, तनक विचारियै॥५४७॥
देख्यौ मैं विचारि, हरिरूप रससार ताकौ, कीजिये अहार, लाज कानि नीकें टारियै।
रोकत उतरि आई, जहाँ साधु सुखदाई, आनि लपटाई पाँय, विनती लै धारियै॥
सन्तनि जिंवायवे की, निज कर अभिलाष, लाख-लाख भाँतिन सौं, कैसे कै उच्चारियै।
आज्ञा जोई दीजै, सोई कीजै सुख वाही में जु, प्रीति अवगाही कही, करौ लागी प्यारियै॥५४८॥
प्रेम में न नेम, हेम थार लै उमगि चली, चली दृगधार सो, परोसिकै जिंवाये हैं।
भीजि गये साधु, नेह सागर अगाध देखि, नैननि निमेख तजी, भये मनभाये हैं॥
चन्दन लगाय, आनि बीरीऊ खवाय, स्याम चरचा चलाय, चख रूप सरसाये हैं।
धूम परी गाँव, झूम आये सब देखिवे कौं, देखि नृप पास, लिखि मानस पठाये हैं॥५४६॥
ह्वै करि निशंक रानी, बंकगति लई नई, दई तजि लाज, बैठी मोड़नि की भीर में।
लिख्यौ लै दिवान, नर आये सो बखान कियो बाँचि सुनि आँच लागी नृप के सरीर में॥
प्रेमसिंह सुत ताही काल सो रसाल आयौ, भाल पै तिलक माल कण्ठी कण्ठ तीर में।
भूप को सलाम कियौ नरनि जताय दियौ बोल्यौ आव मोड़ी के रे पर्यौ मन पीर में॥५५०॥
कोप भरि राजा गयौ भीतर सो सोच नयौ पाछे पूछि लयौ कह्यौ नरनि बखानिकै।
तबतौ विचारी अहो मोड़ा ही हमारी जाति भयौ दुख गात भक्तिभाव उर आनिकै॥
लिख्यौ पत्र माजी कौं जु प्रीति हिये साजी जोपै सीस पर बाजी आय राखौ तजि प्रानिकै।
सभा मधि भूप कही मोड़ी को विरूप भयौ रहैं अब मोड़ी के ही भूलौ मति जानिकै॥५५१॥
लिख्यौ दे पठाये वेगि मानस लै आये जहाँ रानी भक्ति सानी हाथ दई पाती बाँचिये।
आयो चढ़ि रंग बाँचि सुत कौ प्रसंग बार भीजे जे फुलेल दूर किये प्रेम साँचिये॥
आगे सेवा पास निसि महल बसत जाय ल्याय याही ठौर प्रभु नीके गाय नाचिये।
नृप अन्न त्यागि दियौ, दियौ लिखि पत्र पुत्र भई मोड़ी आज तुम हित करि जाँचिये॥५५२॥
गये नर पत्र दियौ सीस सौं लगाय लियौ बाँचिकै मगन हियौ रीझि बहु दई है।
नौबत बजाई द्वार बाँटत बधाई काहू नृपति सुनाई कही कहा रीति नई है॥

श्रीजगन्नाथ पारीषजी) (१४३
पूछे भूप लोग कह्यौ, मिटे सब सोग भये, मोड़ी के जू जोग, स्वांग कियौ बनि गई है।
भूपति सुनत बात, अति दुखगात भयौ, लयौ बैरभाव, चढ़यौ त्यारी इत भई है॥५५३॥
नृप समझाय राख्यो, देश में चवाब ह्वैहै, बुधिवन्तजन आय, सुत सौं जताई है।
बोल्यो, विषै लागि कोटि-कोटि तन खोये एक, भक्ति पर आवै काम, यह मन आई है॥
पाँय परि माँगि लई, दई जो प्रसन्न तुम, राजा निसि चल्यो जाय, करौ जिय भाई है।
आयौ निज पुर, ढिंग ढुरि नर मिले आनि, कह्यौ सो बखानि सब, चिन्ता उपजाई है॥५५४॥
भवन प्रवेस कियौ, मन्त्री जो बुलाय लियौ, दियौ कहि कटी नाक, लोहू निरवारियै।
मारिवौ कलंक हू न आवै यों सुनावै भूप, काहू बुधिवन्त नै, विचारि लै उचारियै॥
नाहर जु पींजरा में, दीजै छाँड़ि लीजै मारि, पाछे ते पकरि वह, बात दाबि डारियै।
सबनि सुहाई जाय, करी मनभाई आयौ, देख्यौ वा खवासी कही, सिंह जू निहारियै॥५५५॥
करै हरिसेवा, भरि रंग अनुराग दृग, सुनी यह बात नेकु, नैन उन टारे हैं।
भाव ही सौं जाने उठि, अति सनमाने अहो!, आज मेरे भाग, श्रीनृसिंह जू पधारे हैं॥
भावना सचाई वही, सोभा लै दिखाई, फूलमाल पहिराई, रुचि टीकौ लागे प्यारे हैं।
भौन ते निकसि धाये, मानौ खम्भ फारि आये, विमुख समूह, ततकाल मारि डारे हैं॥५५६॥
भूप कौं खबरि भई, रानी जू की सुधि लई, सुनी नीकी भाँति, आप नम्र ह्वैकै आये हैं।
भूमि पर साष्टांग, करी, हरि मति भई, दया, आप आय वाके, वचन सुनाये हैं॥
करत प्रणाम राजा, बोली अजू लाल जू कौं, नेकु फिरि देखौ, एक ओर ये लगाये हैं।
बोल्यौ नृपराज, धन सबही तिहारो धारौ, पति पै न लोभ, कही करौ सुखभाये हैं॥५५७॥
राजा मानसिंह, माधौसिंह उभै भाई चढ़े, नाव पर कहूँ तहाँ बूड़िवे कौं भई है।
बोल्यौ बड़ौ भ्राता, अब कीजिये जतन कौन? भौन तिया भक्त, कहि छोटे सुधि दई है॥
नेकु ध्यान कियौ, तब आनिकै किनारौ लियौ, हियौ हुलसायौ जेठ, चाह नई लई है।
कर्यौ आय दरसन, बिनै करि गयौ भूप, अति ही अनूप कथा, हिये व्यापि गई है॥५५८॥
श्रीजगन्नाथजी पारीष
पारीष प्रसिद्ध कुल काँथड्या, जगन्नाथ सीवाँ धरम॥
(श्री) रामानुज की रीति, प्रीति पन हिरदैं धार्यौ।

१४४) (श्री भक्तमाल
संस्कार सम तत्व, हंस ज्यौं बुद्धि विचार्यौ।।
सदाचार मुनिवृत्ति, इन्दिरा पधति उजागर।
रामदास सुत सन्त, अनन्य दशधा कौ आगर।।
पुरूषोत्तम परसाद तें, उभै अंग पहिर्यौ वरम।
पारीष प्रसिद्ध कुल काँथड्या, जगन्नाथ सीवाँ धरम ।।१४३।।
श्रीमधुरादासजी
कीरतन करत कर सुपनेहूँ, मथुरादास न माँड़ियौ।।
सदाचार सन्तोष, सुहृद् सुठि शील सुभासै।
हस्तक दीपक उदय, मेटि तम वस्तु प्रकासै।।
हरि कौ हिय विस्वास, नन्द-नन्दन बल भारी।
कृष्ण कलस सौं नेम, जगत जानै सिर धारी।।
(श्री) वर्द्धमान गुरु वचन रति, सो संग्रह नहिं छाँड़ियौ।
कीरतन करत कर सुपनेहूँ, मथुरादास न माँड़ियौ ।।१४४।।
वास कै तिजारे माँझ, भक्ति रसरासि करी, करी एक बात, ताकौ प्रगट सुनाइये।
आयौ भेषधारी कोऊ, करै सालग्राम सेवा, डोलत सिंहासन पै, आनि भीर छाइयै।।
स्वामी के जु शिष्य भयौ, तिनहूँ कै भाव देखि, वाही कौ प्रभाव आय, कह्यौ हिय भाइयै।
नेकु आप चलौ, उह रीति कौ विलोकियै जु, बड़े सरवज्ञ कही, दूखै नहीं जाइयै।।५५६।।
पाँय परि गये लैकै, जाय ढिंग ठाढ़े भये, चाहत फिरायौ, पे न फिरैं सोच पर्यौ है।
जानि गयौ आप, कछु याही कौ प्रताप ऐपे, मारौं करि जाप, यों विचार मन धर्यौ है।।
मूठ लै चलाई, भक्ति तेज आगे आई, नाहिं वाही लपटाई, भयौ ऐसौ मानौ मर्यौ है।
ह्वै करि दयाल, जा जिवायौ समझायौ प्रीति, पन्थ दरसायौ हिय भायौ, शिष्य कर्यौ है ।।५६०।।
श्रीनारायणदासजी नृतक
नृतक नारायणदास कौ, प्रेमपुंज आगे बढ़्यौ।।
पद लीनौ परसिद्ध, प्रीति जामें दृढ़ नातो।
अक्षर तनमय भयौ, मदनमोहन रँगरातौ।।

संसार से निवृत्त भक्तजन जी) (१४५
नाचत सब कोउ आहि, काहि पै यह बनि आवै।
चित्र लिखित सौ रह्यौ, त्रिभंग देसी जु दिखावै॥
हँड़िया सराय देखत दुनी, हरिपुर पदवीं कौं चढ़यौ।
नृतक नारायणदास कौ, प्रेमपुंज आगे बढ़यौ॥१४५॥
हरि ही कें आगे नृत्य करें, हिये धरैं यही, ढरै देश देशनि में, जहाँ भक्त भीर है।
हँड़िया सराय मध्य, जाइकै निवास लियौ, लियौ सुनि नाम सो, मलेच्छ जाति मीर है॥
बोलिकै पठाये महाजन, हरिजन सबै, आयौ है सदन गुनी, ल्यावौ चाह पीर है।
आनिकै सुनाई भई, बड़ी कठिनाई अब, कीजै जोई भाई वह, निपट अधीर है॥५६१॥
बिना प्रभु आगें नृत्य, करियै न नेम यहै, सेवा वाके आगें कहौ, कैसें बिसतारियै।
कियो यों विचार, ऊँचे सिंहासन माला धारि, तुलसी निहारि, हरिगान कर्यो भारियै॥
एक ओर बैठ्यौ मीर, निरखैं न कोर दृग, मगन किशोर रूप, सुनिलै बिसारियै।
चाहै कछु वारौं, परे औचक ही प्रान हाथ, रीझि सनमान कीनौ, मीच लागी प्यारियै॥५६२॥
मास परायण छब्बीसवाँ विश्राम
भूरिदा भक्तजनजी
गुनगन विशद् गोपाल के, एते जन भये भूरिदा।।
वोहिथ रामगुपाल कुँवँरवर, गोविन्द मांडिल।
छीति स्वामि जसवन्त, गदाधर अनन्तानन्द भल।।
हरिनाभ मिश्र दीनदास, बछपाल कन्हर जस गायन।
गोसू रामदास नारद, स्याम पुनि हरिनारायन।।
कृष्णजीवन भगवान जन, स्यामदासविहारी अमृतदा।
गुनगन विशद् गोपाल के, एते जन भये भूरिदा।। १४६।।
संसार से निवृत्त भक्तजनजी
निरवर्त्त भये संसार ते, ते मेरे जजमान सब।।
उद्धव रामरेनु परसराम, गंगा धूषेत निवासी।
अच्युतकुल ब्रह्मदास विश्राम, सेषसाई के वासी।।

१४६) (श्री भक्तमाल
किंकर कुण्डा कृष्णदास, खेम सोठा गोपानन्द।
जैदेव राघौ विदुर, दयाल दामोदर मोहन परमानन्द ।।
उद्धव रघुनाथी चतुरोनगन, कुँज ओक जे बसत अब।
निरवर्त्त भये संसार ते, ते मेरे जजमान सब ।।१४७ ।।
श्री जयतारन विदुरजी
झीथड़ै ढिंग ही में जैतारन विदुर भयौ, भयौ हरि भक्त साधुसेवा मति पागी है।
बरषा न भई, सब खेती सूखि गई, चिन्ता नई प्रभु आज्ञा दई, बड़ौ बड़भागी है।।
खेत कौ कटावौ, औ गहावो, लै उड़ावौ, पावौ, दो हजार मन, अन्न, सुनी प्रीति जागी है।
करी वही रीति, लोग देखैं न प्रतीति होत, गाये हरि मीत, रासि लागी अनुरागी है।।५६३ ।।
स्वामी श्रीचतुरोनगनजी
श्री स्वामी चतुरोनगन मगन, रैन दिन, भजन हित ।।
सदा युक्त अनुरक्त, भक्त मण्डल को पोषत।
पुर मथुरा ब्रजभूमि, रमत सबहिं को तोषत ।।
परम धरम दृढ़ करन, देव श्रीगुरू आराध्यौ।
मधुर वैन सुठि ठौर-ठौर, हरिजन सुख साध्यौ ।।
सन्त महन्त अनन्त जन, जस विस्तारन जासु नित ।
श्रीस्वामी चतुरोनगन, मगन रैन दिन, भजन हित ।। १४८ ।।
आयौ गुरु गेह यों सनेह सौं ले सेवा करैं, धरैं साँचौ भाव हियें, अति मति भीजियै।
टहल लगाय दई, नई रुपवती तिया, दियौ वासौं कहि, स्वामी कहैं सोई कीजियै।।
सेवा कै रिझाये याते, प्रेम उर नित नयो, दयौ घर धन, बधू कृपा करि लीजियै।
धाम पधराय सुख, पायकै प्रनाम करी, धरी ब्रजभूमि उर, बसे रस पिजियै ।।५६४।।
श्रीगोविन्दचन्द जू कौ, भोर ही दरस करि केशव सिंगार, राजभोग नन्दग्राम में।
गोवर्धन राधाकुण्ड, ह्वैकै आवैं वृन्दावन, मन में हुलास नित, करैं चारि जाम में ।।
रहे पुनि पावन पै, भूखे दिन तीन बीते, आये दूध ले प्रवीन, एऊ रँगे स्याम में।
माँग्यौ नेकु पानी, ल्यावौ फेरि वह प्रानी कहाँ? दुख मतिसानी निसि कही, कियौ काम में ।।५६५।।

श्रीकूब़ाजी केवलदास) (१४७
पानी सौं न काज, ब्रजभूमि में विराज दूध, पीवै घर-घर यह, आज्ञा प्रभु दई है।
एतौ ब्रजवासी, सब क्षीर के उपासी, कैसें मोको लेन दैहैं कही दैहैं, सुनी नई है।।
डोलैं धाम-धाम, स्याम कह्यौ जोई मानि लियौ, दियौ परचे हूँ, परतीति तब भई है।
जहाँ जा छिपावैं पात्र, वेगि आप ढूँढ़ि ल्यावैं, अति सुख पावैं, कीनी लीला रसमई है।।५६६।।
भक्तसेवी मधुकरिया भक्तजी
मधुकरी माँगि सेवैं, भगत, तिन पर हौं, बलिहार कियौ।।
गोमा परमानन्द प्रधान, द्वारका मथुरा खोरा।
कालुख सांगानेर भलौ, भगवान् को जोरा।।
बीठल टोंड़े खेम, पण्डा गूनौरै गाजै।
स्यामसेन के वंश, चीधर पीपोर विराजै।।
जैतारन गोपाल के, केवल कूबै मोल लियौ।
मधुकरी माँगि सेवैं भगत, तिन पर हौं बलिहार कियौ।।५४६।।
श्रीकूबा (केवलदासजी)
कहत कुम्हार जग, कुल निसतार कियौ, केवल सुनाम, साधुसेवा अभिराम है।
आये बहु सन्त, प्रीति करी लै अनन्त जाकौ, अन्त कौन पावै, ऐपै सीधौ नहीं धाम है।।
बड़ी ए गरज चले, करज निकासिवे कौं, बनिया न देत, कुँवा खोदौ कीजै काम है।
कही बोल कियौ, तोल लियौ नीके रोल करि, हित सौं जिमाये, जिन्हें प्यारो एक स्याम है।।५६७।।
गये कुँवा खोदिवे कौं, सुवा ज्यौं उचारै नाम, हुआ काम जान्यौ, वानै भयौ सुख भारी है।
आई रेत भूमि, झूमि माटी गिरि दबे वामें, केतिक हजार मन, होत कैसे न्यारी है।।
शोक करि आये धाम राम-नाम धुनि काहूँ, कान परी बीत्यो, मास, कही बात प्यारी है।
चले वाही ठौर, स्वर सुनि प्रीति भौर परे, रीति कछु और, यह, सुनि बुधि टारी है।।५६८।।
माटी दूर करी सब, पहुँचे निकट जब, बोलिकै सुनायौ, हरे वानी लागी प्यारियै।
दरसन भयौ जाय, पाँय लपटाय गये, रही मिहराबसी ह्वै, कूबहूँ निहारियै।।
धर्यौ जलपात्र एक, देखि बड़े पात्र जाने, आने निज गेह, पूजा लागी अति भारियै।
भई द्वार भीर, नर उमड़ि अपार आये, महिमा विचारि बहु, सम्पति लै वारियै।।५६६।।

१४८) (श्री भक्तमाल
सुन्दर स्वरूप स्याम ल्याये पधरायवे कौं, साधु निज धाम आय, कूब्रा जू के बसे हैं।
रूप कौं निहारि, मन में विचार कियौ आप, करै कृपा मोकौं प्रभु, अचल ह्वै लसे हैं।।
करत उपाय सन्त, टरत न नेक किहूँ, कही जू अनन्त हरि, रीझे स्वामी हँसे हैं।
धर्यौ जानराय नाम, जानि लई जिय की बात, अंग में न मात, सदा सेवासुख रसे हैं।।५७०।।
चले द्वारावति छाप, ल्यावैं यह मति भई, आज्ञा प्रभु दई, फिरी घर ही को आये हैं।
करौ साधुसेवा, धरौ भाव दृढ़ हिये माँझ, टरौ जिनि कहूँ कीजै, जे-जे मन भाये हैं।।
गेह ही में शंख चक्र, आदि निज देह भये, नये-नये कौतुक, प्रगट जग गाये हैं।
गोमती कौ सागर सौं सगंम हो रह्यौ सुन्यौ, सुमिरनी पठायकै यों, दोऊ लै मिलाये हैं।।५७१।।
भये शिष्य शाखा, अभिलाषा साधुसेवा ही की, महिमा अगाध जग, प्रगट दिखाई है।
आये घर सन्त, तिया करति रसोई कोई, आयौ वाको भाई, ताकौं खीर लै बनाई है।।
कूब़ाजी निहारि जानी, याकौ हित सोदर सौं, कीजियै विचार एक, सुमति उपाई है।
कही भरि ल्यावो जल, गई डरि कलपै न, लई तसमई सब, भक्तनि जिंवाई है।।५७२।।
वेगि जल ल्याई, देखि आगि-सी बराई हियें, झाँके मुँह भाई, दुखसागर बुड़ाई है।
विमुख विचारि, तिया कूब़ा जू निकारि दई, गई पति कियो और, ऐसी मन आई है।।
पर्य्यौई अकाल, बेटा-बेटी सो न पालि सकैं, तकै कोऊ ठौर मति, अति अकुलाई है।
लिये संग कर्यौ जोई पुत्र सुता भूख भोई आय परी झींथड़ा में स्वामी को सुनाई है।।५७३।।
नानाविधि पाक होत, सन्त आवैं जेसें सीत, सुख अधिकाई, रीति कैसे जात गाई है।
सुनत वचन वाके, दीन दुखलीन महा, निपट प्रवीन मन, माँझ दया आई है।।
देखि पति मेरौ, और तेरौ पति देखि याहि, कैसे कै निबाहि, सके परी कठिनाई है।
रहौ द्वार झाऱ्यौ करौ पहुँचै अहार तुम्हें महिमा निहारि दृगधार लै बहाई है।।५७४।।
कियौ प्रतिपाल तिया, पूरी कौ अकाल मास, भयौ जब समैं, विदा कीनी उठि गई है।
अति पछितायत वह, बात अब पावै कहाँ ? जहाँ साधु संग, रंग सभा रसमई है।।
करैं जाकौं शिष्य, सन्तसेवा ही बतावैं करौ, जो अनन्त रूप, गुन चाह मन भई है।
नाभा जू बखान कियौ, मोकौं इन मोल लियौ, दियौ दरसाय सब, लीला नित नई है।।५७५।।
सप्ताह परायण छठवाँ विश्राम

श्रीकान्हरजी) (१४६
श्रीअग्रदेवजी के शिष्य
श्रीअग्र अनुग्रह तें भये, शिष्य सबै धर्म की धुजा।।
जंगी प्रसिद्ध प्रयाग, विनोदी पूरन वनवारी।
नरसिंह भल भगवान, दिवाकर दृढ़व्रत धारी।।
कोमल हृदै किशोर, जगत् जगन्नाथ सलूधौ।
औरौ अनुग उदार, खेम खीची धरमधीर लघु ऊधौ।।
त्रिविध ताप मोचन सबै, सौरभ प्रभु निज सिर भुजा।
श्रीअग्र अनुग्रह तें भये, शिष्य सबै धर्म की धुजा।। १५० ।।
श्रीटीलाजी का वंश
भरतखण्ड भूधर सुमेर, टीला लाहा की पद्धति प्रगट।।
अंगद परमानन्द, दास जोगी जग जागै।
खरतर खेम उदार, ध्यान केसौ हरिजन अनुरागै।।
सस्फुट त्योला शब्द, लोहकर वंश उजागर।
हरिदास कपि प्रेम, सबै नवधा के आगर।।
अच्युतकुल सेवैं सदा, दासन तन दसधा अघट।
भरतखण्ड भूधर सुमेर, टीला लाहा की पद्धति प्रगट ।। १५१।।
श्रीकान्हरदासजी
मधुपुरी महोच्छौ मंगलरूप, कान्हर को सौ को करें।
चारि वरन आश्रम, रंक राजा अँन पावै।
भक्तनि कौ बहु मान, विमुख कोऊ नहिं जावै।।
बीरी चन्दन वसन, कृष्ण को कीरतन बरखैं।
प्रभु के भूषन देय, महामन अतिसय हरखैं।।
वीठल सुत विमल्यौ फिरै, दास चरणरज सिर धरैं।
मधुपुरी महोच्छौ मंगलरूप, कान्हर को सौ को करें ।। १५२ ।।

१५०) (श्री भक्तमाल
श्रीनीवाजी
भक्तनि सौं कलिजुग भलें, निबाही नीवा खेतसी ।।
आवहिं दास अनेक, उठि सु आदर करि लीजै।
चरण धोय दण्डौत, सदन में डेरा दीजै।।
ठौर-ठौर हरिकथा, हृदै अति हरिजन भावैं।
मधुर वचन मुँह लाय, विविध भाँतिन्ह जू लड़ावैं।।
सावधान सेवा करैं, निर्दूषन रति चेतसी।
भक्तनि सौं कलिजुग भलें, निबाही नीवा खेतसी ।। १५३ ।।
श्री तूँवर भगवान्‌जी
बसन बढ़े कुन्ती बधू, त्यों तूँवर भगवान् के।।
यह अचरज भयौ एक, खाँड़ घृत मैदा बरषै।
रजत रुक्म की रेल, सृष्टि सबही मन हरषै।।
भोजन रास विलास, कृष्ण को कीरतन कीनौ।
भक्तनि कौ बहुमान, दान सबही कौ दीनौं।।
कीरति कीनी भीम सुत, सुनि भूप मनोरथ आनके।
बसन बढ़े कुन्ती बधू, त्यों तूँवर भगवान् के ।। १५४ ।।
बीतत बरस मास, आवै मधुपुरी नेम, प्रेम सौं महोच्छौ, रास हेमहीं लुटाइयै।
सन्तनि जिंवाय, नाना पट पहिराय, पाछे द्विजन बुलाय, कछु पूजैं, पै न भाइयै।
आयौ कोऊ काल, धनमाल जा बिहाल भये, चाहैं पन पार्यौ, आये अलप कराइयै।
रहे विप्र दूषि, सुनि भयौ सुख, भूख बढ़ी, आयौ यों समाज करौ, ख्वारी मन आइयै ।। ५७६ ।।
अति सनमान कियौ, ल्याये जोई सौंपि दियौ, लियौ गाँठ बाँधि, तब विनती सुनाइयै।
सन्तनि जिवावौ, भावै रास लै करावौ, भावै जेंवौ सुख पावौ, कीजै बात मन भाइयै।
सीधौ लाय कोठे धर्यो, रोक ही, सो थैली भर्यो, द्विजन बुलाय देत, किहूँ निघटाइयै।
जितनौ निकासैं, ताते सौगुनौ बढ़त और, एक-एक ठौर, बीसगुनो दै पठाइयै ।। ५७७ ।।

५. अर्वाचीन भक्त एवं भक्तमाल उपसंहार

श्रीहरीदासजी) (१५१
श्रीजसवन्तजी
जसवन्त भक्ति जयमाल की, रूड़ा राखी राठवड़॥
भक्तनि सौं अति भाव, निरन्तर अन्तर नाहीं।
करजोरे इक पाँय, मुदित मन आज्ञा माहीं॥
श्रीवृंदावन वास, कुँज क्रीड़ा रुचि भावै।
राधावल्लभलाल, नित्तप्रति ताहि लड़ावै॥
परम धरम नवधा प्रधान सदन साँच निधि प्रेम जड़।
जसवन्त भक्ति जयमाल की रूड़ा राखी राठवड़॥ १५५॥
श्रीहरीदासजी
हरीदास भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ॥
अमित महागुन गोप्य, सार वित सोई जानै।
देखत कौ तुलाधार, दूर आसै उनमानै॥
देय दमामौ पैंज, विदित वृन्दावन पायौ।
राधावल्लभ भजन, प्रगट परताप दिखायौ॥
परम धरम साधन सुदृढ़, कलियुग कामधेनु में गन्यौ।
हरीदास भक्तनि हित, धनि जननी एकै जन्यौ॥ १५६॥
हरीदास बनिक सो, काशी ढिंग वास जाकौ, ताकौ यह पन, तन त्यागौं ब्रजभूमहीं।
भयौ ज्वर नाड़ी छीन, छोड़ि गये वैद तीन, बोल्यौ यों प्रवीन, वृन्दावन रस झूमहीं।।
बेटी चारि सन्तनि कौ, दई अंगीकार करौ, धरौ डोली माँझ मोको, ध्यान दृग धूमहीं।
चले सावधान राधावल्लभ कौ गान करै, करै अचरज लोग परी गाँव धूमहीं॥ ५७८॥
आवत ही मग माँझ, छूटि गयौ तन पन, साँचौ कियौ स्याम वन, प्रगट दिखायौ है।
आय दरसन कियौ, इष्ट गुरु प्रेम भरि, नेम पर्यौ पूरौ, जाय चीरघाट न्हायौ है।।
पाछें आये लोग, शोक करत भरत नैन, बैन सब कही, कही ताहि दिन आयौ है।
भक्ति कौ प्रभाव यामें, भाव और आनौ जिनि, बिन हरिकृपा यह, कैसे जात पायौ है।। ५७९।।