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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 195 में से

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पृष्ठ 149

१७४) (श्री भक्तमाल
उदधि सदा अक्षोभ, सहज सुन्दर मित भाषी।
गुरुवत्तन गिरिराज, भलप्पन सब जग साषी॥
विट्ठलेश की भक्ति, भयौ बेला दृढ़ ताकै।
भगवत् तेज प्रताप, नमित नरवर पद जाकैँ॥
निर्विलीक आसय उदार, भजनपुंज गिरिधरन रति।
(श्री) वल्लभ जू के वंश में, गुननिधि गोकुलनाथ अति।।१३२।।
आयौ कोऊ शिष्य होन, ल्यायो भेंट लाखन की, भाखन की चातुरी पै, मेरी मति रीझियै।
कहूँ है सनेह तेरो, जाके मिले बिना देह, व्याकुलता होय, जोपै तोपै दीच्छा दीजियै।।
बोल्यौ अजूनै मेरो काहू, वस्तु सौं न हेतु नेकु, नेति-नेति कही, हम गुरु ढूँढ़ि लिजियै।
प्रेम ही की बात इहाँ, कर ही पलटि जात, गयौ दुख गात, कहो कैसैं रँग भीजियै।। ५१६ ।।
कान्हा हो हलालखोर, घोरि दियौ मन लैकै, स्याम रससागर में, नागर रसाल है।
निसि को सुपन माँझ, निपुन श्रीनाथ जू नै, आज्ञा दई, भीत नई, भई ओट साल है।।
गोकुल के नाथ जू सौं, वेगि दै जताइ दीजै, कीजै याहि दूर, छबि पूर देखौ ख्याल है।
भोर जौ विचारै, नहिं धीरज कौ धारै, उहाँ जाऊँ कोऊ मारै, पैड़ें पर्यो यह लाल है।। ५२०।।
ऐसे दिन तीन, आज्ञा देते वे प्रवीन, नाथ हाथ कहा मेरे, बिन गये नही सरैगौ।
गये द्वार द्वारपाल, बोले जू विचार एक, दीजै सुधि कान, सुनि खीझै बात करैगौ ।।
काहू ने सुनाय दई, लीजिये बुलाय अहो, कहौ और दूर करौ, करे दूरि ढरैगौ।
जाय वही कही, लही अपनी पिछानि मिले, सुन्यौ मेरौ नाम श्याम कह्यौ नहीं टरैगौ।। ५२१।।
श्रीवनवारीदासजी
रसिक रँगीलौ भजनपुंज, सुठि वनवारी स्याम कौ।।
बात कवित बड़ चतुर, चोख चौकस अति जानै।
सारा सार विवेक, परमहंसनि परवानै ।।
सदाचार सन्तोष, भूत सबको हितकारी।
आरज गुन तन अमित, भक्ति दशधा व्रतधारी।।
दरसन पुनीत, आसय उदार आलाप रुचिर सुख धाम कौ।