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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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संसार से निवृत्त भक्तजन जी) (१४५
नाचत सब कोउ आहि, काहि पै यह बनि आवै।
चित्र लिखित सौ रह्यौ, त्रिभंग देसी जु दिखावै॥
हँड़िया सराय देखत दुनी, हरिपुर पदवीं कौं चढ़यौ।
नृतक नारायणदास कौ, प्रेमपुंज आगे बढ़यौ॥१४५॥
हरि ही कें आगे नृत्य करें, हिये धरैं यही, ढरै देश देशनि में, जहाँ भक्त भीर है।
हँड़िया सराय मध्य, जाइकै निवास लियौ, लियौ सुनि नाम सो, मलेच्छ जाति मीर है॥
बोलिकै पठाये महाजन, हरिजन सबै, आयौ है सदन गुनी, ल्यावौ चाह पीर है।
आनिकै सुनाई भई, बड़ी कठिनाई अब, कीजै जोई भाई वह, निपट अधीर है॥५६१॥
बिना प्रभु आगें नृत्य, करियै न नेम यहै, सेवा वाके आगें कहौ, कैसें बिसतारियै।
कियो यों विचार, ऊँचे सिंहासन माला धारि, तुलसी निहारि, हरिगान कर्यो भारियै॥
एक ओर बैठ्यौ मीर, निरखैं न कोर दृग, मगन किशोर रूप, सुनिलै बिसारियै।
चाहै कछु वारौं, परे औचक ही प्रान हाथ, रीझि सनमान कीनौ, मीच लागी प्यारियै॥५६२॥
मास परायण छब्बीसवाँ विश्राम
भूरिदा भक्तजनजी
गुनगन विशद् गोपाल के, एते जन भये भूरिदा।।
वोहिथ रामगुपाल कुँवँरवर, गोविन्द मांडिल।
छीति स्वामि जसवन्त, गदाधर अनन्तानन्द भल।।
हरिनाभ मिश्र दीनदास, बछपाल कन्हर जस गायन।
गोसू रामदास नारद, स्याम पुनि हरिनारायन।।
कृष्णजीवन भगवान जन, स्यामदासविहारी अमृतदा।
गुनगन विशद् गोपाल के, एते जन भये भूरिदा।। १४६।।
संसार से निवृत्त भक्तजनजी
निरवर्त्त भये संसार ते, ते मेरे जजमान सब।।
उद्धव रामरेनु परसराम, गंगा धूषेत निवासी।
अच्युतकुल ब्रह्मदास विश्राम, सेषसाई के वासी।।