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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

श्रीपृथ्वीराजजी) (१३६
दयौ पै न याहि दयौ, बड़ौ अपमान भयो, गयौ बूड़ौ सागर में, दुख कौ न पार है।
बूड़त ही आगे, भूमि पाई चल्यो झूमि प्रीति, सो अनीति भूलै नाहिं मानो तरवार है।।
सौंही आये लैन, हरिजन मन चैन झिल्यो, मिल्यौ कृष्ण जाय, जायौ अति सुखसार है।
बैठे जब भोजन कौं, दई उभै पातर लै, दूसरी जू कैसी, कही वही भाई प्यार है।। ५३४ ।।
सबौ विष भयौ, दुख गयौ सोई हुयौ नयौ, दयौ परबोध, वाकी बात सुनि लीजियै।
तेरो छोटो भाई, मेरो भक्त सुखदाई, ताकी कथा लै जताई, जामें आप ही सौं धीजियै।।
प्रथम जनम माँझ बड़ौ, राजपुत्र भयौ गयौ, गृह त्यागि सदा मोसों मति भीजियै।
आयौ वन कोऊ भूप, संग रागरंग रूप, देखि चाह भई देह, दई भोग दीजियै ।। ५३५ ।।
तेरई वियोग, अन्न-जल सब त्यागि दियौ, जियौ नही जात, वापै वेगि सुधि लीजियै।
हाथ पै प्रसाद दीनों, आय घर चीन्ह लीनों, सुपनौ सौ गयौ, बीति प्रीति वासौं कीजियै।
द्वारका को संग सुनि, आवत ही आगै चल्यौ, मिल्यौ भूमि पर दृग, भरि वहै दिजियै।
कही सब बात, स्याम धाम तज्यौ ताही छिन, कर्यौ वनवास दोऊ, अति मति भीजियै।। ५३६ ।।
श्रीनारायणदासजी
अल्ह ही के वंश में, प्रशंस याहि जानि लेव, बड़ौ और भाई छोटौ, श्रीनरायन दास है।
दीर्घ कमाऊ, लघु उपज्यौ उड़ाऊं, भाभी दियो सीरौ भोजन, लै भयौ दुखरासि है।।
देवौ मोकौं तातौ करि, बोली वह क्रोध भरि, यहूँ जा हुंकारौ भरवावै कियो हास है।
गयौ गृह त्यागि, हरि पाणि कर्यो वैसे ही जू, भक्तिवश स्याम, कह्यौ प्रगट प्रकास है।। ५३७ ।।
श्रीपृथ्वीराजजी
नरदेव उभै भाषा निपुन, पृथीराज कविराज हुव।।
सवैया गीत श्लोक, बेलि दोहा गुन नवरस।
पिंगल काव्य प्रमान, विविध विधि गायौ हरि जस।।
पर दुख विदुख श्लाघ्य, वचन रचना जु विचारै।
अर्थ विचित्र निमोल, सबै सांरग उर धारै।।
रुक्मिनी लता बरनन अनूप, बागीश वदन कल्यान सुव।
नरदेव उभै भाषा निपुन, पृथीराज कविराज हुव।। १४० ।।