श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीगदाधरभट्टजी) (१३७
स्याम रंग रंगी पद, सुनिकै गुसाँई जीव, पत्र दै पठाये, उभै साधु वेगि धाये हैं।
रैनी बिन रंग कैसे, चढ़यौ, अति सोच बढ़यौ, कागद में प्रेम मढ़यौ, तहाँ लैके आये है।।
पुर ढिंग कूप, तहाँ बैठे रसरूप लगे, पूछिवे कौ तिनहीं सौं, नाम लै बताये हैं।
रहौ कौन ठौर, सिरमौर वृन्दावन धाम, नाम सुनि मुरछा ह्वै, गिरे प्रान पाये हैं।। ५२३।।
काहू कही भट्ट, श्रीगदाधर जू एई जानौ मानौ, उही पाती चाह, फेरिकै जिवाये हैं।
दियौ पत्र हाथ, लियो सीस सौं लगाय चाय, बाँचत ही चले वेगि, वन्दावन आये हैं।।
मिले श्रीगुसाँई जू सौं, आँखें भरि आई नीर, सुधि न सरीर, धरि धीर वही गाये हैं।
पढ़े सब ग्रन्थ, संग नाना कृष्णकथा रंगरस की उमंग, अंग-अंग भाव छाये हैं।। ५२४।।
नाम हो कल्यानसिंह, जात राजपूत पूत, बैठ्यो आय कथा, सो अभूत रंग लाग्यौ है।
निपट निकट वास, धौरहा प्रकास गाँव, हास परिहास तज्यो, तिया दुख पाग्यो है।।
जानी भट्ट संग सौं, अनंग वास दूर भई, करौ लैके नई आनि, हिये काम जाग्यो है।
माँगत फिरत हुती, जुवती औ गर्भवती, कही लै रुपैया बीस, नेकु कहो राग्यो है।। ५२५।।
गदाधर भट्ट जू की, कथा में प्रकास कहो, अहौ कृपा करी, अब मेरी सुधि लीजिये।
दई लौंडी संग, लोभ रंग चित भंग किये, दिये लै बताय, बोली मेरौ काम कीजिये।।
बोले आप, बैठिये जू, जाप नित करौं हिये, पाप नहीं मेरौ, गई दरसन दीजिये।
श्रोता दुख पाय भाखैं, झूठी याहि मारि नाखैं, साँची कहि राखैं सुनि, तन-मन छीजिये।। ५२६।।
फाटि जाय भूमि, तौ समाय जायँ श्रोता कहैं, बहे दृग नीर, ह्वै अधीर सुधि गई है।
राधिकावल्लभदास, प्रगट प्रकास भास, भयौ दुखरासी सुनि, सौ बुलाय लई है।।
साँच कहि दीजै नहीं, अभी जीव लीजै डारि, सबै कहि दीयौ, सुख लियौ संज्ञा भई है।
काढ़ि तरवार तिया, मारिवे कल्यान गयौ, दयौ परबोध, हमें करी दया नई है।। ५२७।।
रहैं काहू देस में, महन्त आये कथा माँझ, आगें लै बैठाये, देखें सबै साधु भीजे हैं।
मेरे अश्रुपात क्यों न, होत सोच सोत परे, करे लै उपाय, दै लगाय मिर्च खीजे हैं।।
सन्त एक जानिकै, जताय दई भट्ट जू कौ, गये उठि सब, जब मिलि अति रीझे हैं।
ऐसी चाह होय, मेरे रोय कै पुकारि कही चली, जलधार नैन प्रेम आय धीजे हैं।।। ५२८।।
आयौ एक चोर, घर सम्पति बटोरि, गाँठि बाँधी लै मरोरि, किहूँ उठै नाहिं भारी है।
आयकै उठाय दई, देखी इन रीति नई, पूछ्यौ नाम प्रीति भई, भूलो मैं विचारी है।।
बोले आप लै पधारौ, होत ही सवारौ आवै, और दसगुनी मेरे, तेरी यह ज्यारी है।
प्राननि कौं आगें धरौ, आनिकै उपाय करौ, रहे समझाय भयौ, शिष्य चोरी टारी है।। ५२६।।