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शिवदृष्टि (सोमानन्दनाथ - उत्पलदेवाचार्य वृत्ति सहित काश्मीर प्रत्यभिज्ञा मूल दर्शन सटीक)

Shivadrishti of Somanandanatha with Utpaladeva Vritti

सोमानन्दनाथ (वृत्ति: उत्पलदेव) द्वारा

DevanagariHindipublished188 पृष्ठ

भूमिका
श्रीसोमानन्दप्रभुपाद द्वारा विरचित इस 'शिवदृष्टिः' नामक प्रस्तुत
ग्रन्थरत्न में सात आह्निक हैं और कुल ७२१ श्लोक अनुष्टुप् छन्द में
विद्यमान हैं।
प्रथम आह्निक में स्वात्मस्वरूप परमशिव के प्रति नमस्कार के
अनन्तर 'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः। अनिरुद्धेच्छाप्रसरः
प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः' ।। १-२ ।।
एक ही श्लोक में सूत्ररूप से समस्त शास्त्रार्थ का सयुक्तिक
प्रतिपादन कर, परमशिवदशा से लेकर घट-पटादि पर्यन्त शिवरूपता की
स्थिति का उल्लेख किया गया है। परमशिवतत्त्व का स्वरूप, उसका
विश्वोत्तीर्णदशा में भी विश्वात्मक रूप से अवस्थान, शैवकारणवाद एवं
सृष्टिप्रक्रिया आदि का विवेचन किया गया है।
द्वितीय आह्निक में ईश्वर अद्वयवाद ही युक्तियुक्त अनुभवसिद्ध है।
वैयाकरणों के शब्दाद्वैत का स्वरूप कथन और उसका युक्तिपूर्वक निराकरण
किया है तथा इसमें विवर्तवाद का खण्डन किया गया है एवं भर्तृहरि को
पश्यन्ती को परा मानने का खण्डन है।
तृतीय आह्निक में भट्ट प्रद्युम्न द्वारा स्वीकृत शाक्तवाद,
शिवाद्वायवाद के प्रतिपक्षी द्वैतवादी शैव और पातञ्जल मत के अनुयायियों
के सहित इक्कीस मत-मतान्तरों का दोषोद्भावनपूर्वक खण्डन एवं अपने
शैव अद्वैत सिद्धान्त का युक्तिपूर्वक मण्डन किया है।
चतुर्थ आह्निक में अन्य दर्शनों की प्रत्यभिज्ञादर्शन के विषय में
संभावित शङ्काओं का निराकरण कर 'अथेदानीं प्रवक्तव्यं यथा सर्वं
शिवात्मकम्'। इत्यादि पद्यों से परमशिव की सर्वरूपता का विवेचन करते
हुए शैवसिद्धान्त के मूलभूत तत्त्व तथा शैव सर्वेश्वरवाद को दिखाया है
यह सारा विश्व प्रपञ्च का विस्तार शिव द्वारा ही आभासित होता है।
पञ्चम आह्निक में 'अथ चेत् सर्वभावानां न विना तत्त्वमेककम् ।
समन्वयोऽस्ति तदिदं कथमैक्यं विभेदितम्' ।। ५-१ ।। इत्यादि श्लोकों
द्वारा एक परमतत्त्व प्रमाता ही समस्त वेद्यवस्तुओं में 'सूत्रे मणिगणा इव'
अनुस्यूत है एवं सर्वेश्वरवाद का ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।

२
षष्ठ आह्निक में वेदान्त, पाञ्चरात्र, जैन, सांख्य, न्याय, वैशेषिक
और बौद्ध आदि दर्शनों की परसत्तासम्बन्धी सिद्धान्तों को अनुपयुक्तता
दिखायी है। इस प्रकार कुछ ज्ञात एवं कुछ अज्ञात कालकारणिक और
सद्धामवादी सम्प्रदायों का उल्लेख करते हुए खण्डन किया है। इस प्रकार
शैव द्वैतवाद एवं द्वैताद्वैतवाद का खण्डन है।
सप्तम आह्निक में मोक्ष-साधक तान्त्रिक सिद्धान्त, साधन और
शैवयोग को दिखाते हुए सभी भाव-पदार्थों में व्याप्त परमशिवतत्त्व
की प्रतिपत्ति का रहस्य एवं उससे उपलब्ध होने वाली सर्वनिर्भरा
चिदानन्ददशा तथा पूर्ववर्त्ती शैवदर्शन के आचार्यों की वंश-परम्परा का
वर्णन है। जैसा कि इन्होंने कहा है—
'करोमि स्म प्रकरणं शिवदृष्ट्यभिधानकम्। (७-१२१)
इन्होंने जिन मौलिक सिद्धान्तों को प्रस्तुत ग्रन्थ में रत्नवत् गूँथे हैं, वे सब
शिवसमाविष्ट होकर ही किये हैं। इसका प्रणयन नवम शताब्दी के उत्तरार्ध
में हुआ है।
'शिवदृष्टिः' पर श्री उत्पलदेव कृत वृत्ति चतुर्थ आह्निक के ७४
श्लोक पर्यन्त ही उपलब्ध है। आगे की वृत्ति उपलब्ध न होने से प्रकाशित
नहीं की जाती है।
किन्तु वर्तमान प्रकाशित 'शिवदृष्टिः' में पूर्ववत् कश्मीर ग्रन्थावली
के प्रसिद्ध संपादक श्री मधुसूदन कौल शास्त्री की विशिष्ट टिप्पणियों का
भी समावेश किया गया है।
शिवसूत्र, स्पन्दकारिका आदि ग्रन्थों में शैवदर्शन का मौलिक
सिद्धान्त निरूपित किये गये हैं। श्री सोमानन्दप्रभुपाद ने प्रौढ दार्शनिक
स्वरूप देने के लिये प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का एक नूतन निर्माण किया है।
पूर्ववर्त्ती शास्त्रीय पक्षों का दोषोद्भावन के साथ खण्डन-मण्डन कर
शैवाद्वैत सिद्धान्त की दार्शनिक तर्कों द्वारा स्थापना 'शिवदृष्टिः' आदि
ग्रन्थों में देखी जाती है।
दुर्वासामुनि से लेकर श्रीसोमानन्दपाद पर्यन्त शैवदर्शन का
अध्ययन-अध्यापन कार्य मौखिक और वंशपरम्परागत ही सीमित रहा है।
किन्तु इन्होंने इस शैवागम दर्शन की धारा को एक नूतन दिशा में मोड़
दिया और वह नूतन धारा आज भी विश्व में प्रत्यभिज्ञादर्शन के रूप में

प्रवाहित होकर मुमुक्षुजनों को स्वरूपदर्शन कराती हुई आप्लावित
कर रही है। श्रीसोमानन्दपाद ने शैवदर्शन के मुख्य सिद्धान्तों को
दार्शनिक शैली में प्रतिपादन कर सर्वप्रथम 'शिवदृष्टिः' इस प्रस्तुत
ग्रन्थरत्न का सूत्रपात किया है।
साम्प्रदायिक जनश्रुति के अनुसार श्रीवसुगुप्तपाद श्रीसोमानन्दपाद
के गुरु थे। यह श्रीअभिनवगुप्तपाद ने क्रमकेलि की व्याख्या में
श्रीसोमानन्दपाद को श्रीगोविन्दराज का शिष्य दिखाया है। श्री-
गोविन्दराज को क्रमदर्शन का उपदेश उत्तरपीठाधीश्वर श्री शिवानन्दनाथ
की शिष्या पीठेश्वरी 'श्रीकेयूरवती' से प्राप्त हुआ है। श्रीअभिनवगुप्तपाद
क्रमदर्शन में श्रीगोविन्दराज के सब्रह्मचारी श्रीभानुक की शिष्या
पीठेश्वरी श्रीमदनिका की शिष्य परम्परा सन्तति में गिने जाते हैं।
यह सब वृत्तान्त तन्त्रालोक (४-१७३) की व्याख्या में जयरथ द्वारा
उद्धृत अभिनवगुप्तपाद विरचित क्रमकेलि व्याख्या के सन्दर्भ से अवगत
होता है।
श्री सोमानन्दपाद के प्रमुख शिष्य श्री उत्पलदेव थे। अपनी
तर्कपूर्ण शैली से मौलिक ग्रन्थों के निर्माण द्वारा इस दर्शन के साहित्य
संवर्धन प्रणाली को बृहत् रूप दिया है। इन्होंने शैवदर्शन पर स्वतन्त्र
रूप से ग्रन्थ लिखे और पूर्ववर्त्ती आचार्यों की मौलिक कृतियों पर वृत्तियाँ
लिखी हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ पर वृत्ति लिख कर प्रत्यभिज्ञादर्शन का व्यापक
विस्तार किया है। इसी शिवदृष्टिः के आधार पर ईश्वरप्रत्यभिज्ञा,
सिद्धित्रयी, शिवस्तोत्रावली आदि ग्रन्थों का निर्माण किया है और इन
पर व्याख्याएँ लिखी हैं। अत एव प्रत्यभिज्ञादर्शन की इस स्वतन्त्र
विचार शैली को आज भी महापुरुषों ने विच्छिन्न होने नहीं दिया है
और यह किसी भी उन्नतदेश के गौरव का कारण हो सकती है, इसलिये
प्रत्यभिज्ञादर्शन का साहित्य उच्चकोटि का है और महत्त्वपूर्ण है।
विजयादशमी
२०४२
कृष्णानन्द सागर

२
षष्ठ आह्निक में वेदान्त, पाञ्चरात्र, जैन, सांख्य, न्याय, वैशेषिक
और बौद्ध आदि दर्शनों की परसत्तासम्बन्धी सिद्धान्तों को अनुपयुक्तता
दिखायी है। इस प्रकार कुछ ज्ञात एवं कुछ अज्ञात कालकारणिक और
सद्भाववादी सम्प्रदायों का उल्लेख करते हुए खण्डन किया है। इस प्रकार
शैव द्वैतवाद एवं द्वैताद्वैतवाद का खण्डन है।
सप्तम आह्निक में मोक्ष-साधक तान्त्रिक सिद्धान्त, साधन और
शैवयोग को दिखाते हुए सभी भाव-पदार्थों में व्याप्त परमशिवतत्त्व
की प्रतिपत्ति का रहस्य एवं उससे उपलब्ध होने वाली सर्वनिर्भरा
चिदानन्ददशा तथा पूर्ववर्त्ती शैवदर्शन के आचार्यों की वंश-परम्परा का
वर्णन है। जैसा कि इन्होंने कहा है—
'करोमि स्म प्रकरणं शिवदृष्ट्यभिधानकम् । (७-१२१)
इन्होंने जिन मौलिक सिद्धान्तों को प्रस्तुत ग्रन्थ में रत्नवत् गूँथे हैं, वे सब
शिवसमाविष्ट होकर ही किये हैं। इसका प्रणयन नवम शताब्दी के उत्तरार्ध
में हुआ है।
'शिवदृष्टिः' पर श्री उत्पलदेव कृत वृत्ति चतुर्थ आह्निक के ७४
श्लोक पर्यन्त ही उपलब्ध है। आगे की वृत्ति उपलब्ध न होने से प्रकाशित
नहीं की जाती है।
किन्तु वर्तमान प्रकाशित 'शिवदृष्टिः' में पूर्ववत् कश्मीर ग्रन्थावली
के प्रसिद्ध संपादक श्री मधुसूदन कौल शास्त्री की विशिष्ट टिप्पणियों का
भी समावेश किया गया है।
शिवसूत्र, स्पन्दकारिका आदि ग्रन्थों में शैवदर्शन का मौलिक
सिद्धान्त निरूपित किये गये हैं। श्री सोमानन्दप्रभुपाद ने प्रौढ दार्शनिक
स्वरूप देने के लिये प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का एक नूतन निर्माण किया है।
पूर्ववर्त्ती शास्त्रीय पक्षों का दोषोद्भावन के साथ खण्डन-मण्डन कर
शैवाद्वैत सिद्धान्त की दार्शनिक तर्कों द्वारा स्थापना 'शिवदृष्टिः' आदि
ग्रन्थों में देखी जाती है।
दुर्वासामुनि से लेकर श्रीसोमानन्दपाद पर्यन्त शैवदर्शन का
अध्ययन-अध्यापन कार्य मौखिक और वंशपरम्परागत ही सीमित रहा है।
किन्तु इन्होंने इस शैवागम दर्शन की धारा को एक नूतन दिशा में मोड़
दिया और वह नूतन धारा आज भी विश्व में प्रत्यभिज्ञादर्शन के रूप में

३
प्रवाहित होकर मुमुक्षुजनों को स्वरूपदर्शन कराती हुई आप्लावित
कर रही है। श्रीसोमानन्दपाद ने शैवदर्शन के मुख्य सिद्धान्तों को
दार्शनिक शैली में प्रतिपादन कर सर्वप्रथम 'शिवदृष्टिः' इस प्रस्तुत
ग्रन्थरत्न का सूत्रपात किया है।
साम्प्रदायिक जनश्रुति के अनुसार श्रीवसुगुप्तपाद श्रीसोमानन्दपाद
के गुरु थे। यह श्रीअभिनवगुप्तपाद ने क्रमकेलि की व्याख्या में
श्रीसोमानन्दपाद को श्रीगोविन्दराज का शिष्य दिखाया है। श्री-
गोविन्दराज को क्रमदर्शन का उपदेश उत्तरपीठाधीश्वर श्री शिवानन्दनाथ
की शिष्या पीठेश्वरी 'श्रीकेयूरवती' से प्राप्त हुआ है। श्रीअभिनवगुप्तपाद
क्रमदर्शन में श्रीगोविन्दराज के सब्रह्मचारी श्रीभानुक की शिष्या
पीठेश्वरी श्रीमदनिका की शिष्य परम्परा सन्तति में गिने जाते हैं।
यह सब वृत्तान्त तन्त्रालोक (४-१७३) की व्याख्या में जयरथ द्वारा
उद्धृत अभिनवगुप्तपाद विरचित क्रमकेलि व्याख्या के सन्दर्भ से अवगत
होता है।
श्री सोमानन्दपाद के प्रमुख शिष्य श्री उत्पलदेव थे। अपनी
तर्कपूर्ण शैली से मौलिक ग्रन्थों के निर्माण द्वारा इस दर्शन के साहित्य
संवर्धन प्रणाली को बृहत् रूप दिया है। इन्होंने शैवदर्शन पर स्वतन्त्र
रूप से ग्रन्थ लिखे और पूर्ववर्त्ती आचार्यों की मौलिक कृतियों पर वृत्तियाँ
लिखी हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ पर वृत्ति लिख कर प्रत्यभिज्ञादर्शन का व्यापक
विस्तार किया है। इसी शिवदृष्टिः के आधार पर ईश्वरप्रत्यभिज्ञा,
सिद्धित्रयी, शिवस्तोत्रावली आदि ग्रन्थों का निर्माण किया है और इन
पर व्याख्याएँ लिखी हैं। अत एव प्रत्यभिज्ञादर्शन की इस स्वतन्त्र
विचार शैली को आज भी महापुरुषों ने विच्छिन्न होने नहीं दिया है
और यह किसी भी उन्नतदेश के गौरव का कारण हो सकती है, इसलिये
प्रत्यभिज्ञादर्शन का साहित्य उच्चकोटि का है और महत्त्वपूर्ण है।
विजयादशमी कृष्णानन्दसागर
२०४२

९
निर्देशिका
पृष्ठ संख्या
प्रथम आह्निक १
द्वितीय आह्निक २६
तृतीय आह्निक ७२
चतुर्थ आह्निक १०६
पञ्चम आह्निक १४०
षष्ठ आह्निक १४६
सप्तम आह्निक १५६

ॐ सच्चिदानन्दाय नमः
अथ
शिवदृष्टिः
श्रीमत्सोमानन्दविरचिता
श्रीमहामाहेश्वरोत्पलदेवाचार्यविरचितवृत्त्योपेता
प्रथमाह्निकम्
चिदाकाशमये स्वाङ्गे विश्वालेख्यविधायिने ।
सर्वार्द्भुतोद्भवभुवे नमो विषमचक्षुषे ॥ १ ॥
१ विषमचक्षुषे इति—यद्धि प्रमाणप्रमेयलक्षणं विश्वं तद्भेदाभासेन
मिथ्यैवेति नेत्रद्वितयेन द्योत्यते भगवता । परमार्थतस्तद्गतायामपि स्वात्म-
स्फुरत्तामात्ररूपत्वादस्य विश्वस्य न कापि भेदकलङ्कदोषकल्पनेति तृतीय-
नेत्रेण द्योत्यत इति । तच्च भगवत एवान्यस्य तु न भेदाधिष्ठातृत्वादिति ।
ततश्च तत्रैव नमस्कारो युक्तः, अन्यत्र तु किं फलमिति वाक्यार्थसमन्वय-
दीपिकायां निर्णीतमिति । तदेव समर्थयति 'स्वाङ्गे विश्वालेख्यविधायिने'
इति । स्वाङ्ग इति न तु व्यतिरिक्ते क्वचन । यदुक्तं पूर्वगुरुणा—
'निरुपादानसंभारमभित्तावेव तन्वते ।
जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाध्याय शूलिने ॥' ( स्त० चि० ५ )
इति । भगवता वीरेण व्यासेनापि—
'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥' ( भ० गी० १४।३ )
इति । कालिकाकारविश्वचित्रेणापि नास्य स्वरूपान्यथाभाव इत्याकाश-
साम्यं व्यतिरेकध्वनिश्च । निमित्तावेव चित्रविधानमिति महदाश्चर्यम् ।

२ शिवदृष्टिः [ आ०-१
विभ्रमाकरसंज्ञेन स्वपुत्रेणास्मि चोदितः ।
पद्मानन्दाभिधानेन तथा सब्रह्मचारिणा१ ॥ २ ॥
ईश्वरप्रत्यभिज्ञोक्तविस्तरे गुरुनिर्मिते ।
शिवदृष्टिप्रकरणे करोमि पदसंगतिम् ॥ ३ ॥
प्रकृतशास्त्रानुसारेणेष्टदेवतानमस्कारं२ करोति शास्त्रकारः--
अस्मद्रूपसमाविष्टः स्वात्मनात्मनिवारणे ।
शिवः करोतु निजया नमः शक्त्या ततात्मने ॥ १ ॥
योऽहं नमस्करोमि स शिवोऽस्मद्रूपेणैक्यं प्राप्तः । वस्तुस्थित्या हि
सर्वतत्त्वविग्रहो वक्ष्यमाणनीत्या शिवः । स३ संसारार्थं मायाशक्तिप्रकृतैक्या-
ख्यात्या भावानात्मस्थानाभासयति ईश्वरप्रत्यभिज्ञा प्रपञ्चितन्यायेन ।
ततस्तान्४ प्राणादीन् पुनः कांश्चिल्लोकयात्रासु५ अस्मद्रूपप्रमातृभेदेन
स्थापयिष्यन् भिन्नीकृतान्प्रमेयानपि घटपटादिवैलक्षण्येनात्मभेदेन पश्यन्
समाविशति इत्युच्यते । यावत्या च मात्रया समावेशस्तावन्मात्रसिद्धि-
संभवः । प्रथमस्तावत् कर्तृत्वानुसारी ज्ञानक्रियायोगः । यथोक्तं
स्पन्दशास्त्रे--
नहीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते ।
अपि त्वात्मबलस्पर्शात्पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ (१।८)
१ ‘एकब्रह्मव्रताचारा मिथः सब्रह्मचारिणः’ इति कोशः । २ प्रकृत-
शास्त्रं शैवाद्वयनयः । अयमत्र सूक्ष्मार्थः—शास्त्रादौ ‘श्रेयांसि बहुविघ्नानि’
इति नयेनावश्यं तदुत्पुंसनार्थं नमस्कारो विधेयः । येन प्रस्फुरत्तन्महौजसा
विघ्नाः कुण्ठशक्तयो न प्रभवन्ति । तत्र सर्वस्योर्पार्काशत्वेनासिद्धया
किं केन कस्य निरसनमित्याशयेनाह प्रकृतेत्यादि । तथा च विश्वात्मनो
विततरूपस्यानन्तशक्तेर्नमस्करणीयत्वम् । संकुचितसदाशिवादिज्ञानशक्ति-
स्वरूपपश्यन्तीधामासूत्रितस्वांतन्त्र्यहानिस्वातन्त्र्याबोधात्मकस्य पशोस्त-
त्कर्तृत्वं तस्यैव संकुचितस्यापि तद्गुणीकारस्वरूपेण विश्रमेण गृहीतस्पन्द-
स्वरूपशाक्तमहिम्नोऽपि करणत्वमिति । ३ स इति मायाशक्तिप्रकृतैक्याख्याति-
भाजनभूतास्मद्रूपप्रमातृभूमौ समाविष्टः । ४ ततं इति अनात्मस्थत्वे ।
५ प्रमेयभेदेनैव प्रमातृभेद इत्याशयं सूचयति लोकयात्रासु इत्यादिना ।
यात्रा—व्यवहारः ।

आ०-१ ] उत्पलदेवकृतवृत्त्योपेता ३
इति। तथाप्यत्रोक्तम् 'ऐश्वरी प्रवृत्तिः' इति। अनयैव¹ दृष्ट्या तत्तद्दृढचर्य-
मधिकतरः समावेशोऽभ्यसनीयः स्वप्रयत्नेनापीत्येतदपि सूचितम्। समा-
विष्टश्च शिवोऽपीत्युच्यते देवदत्तादिरपि च उभयोरैक्यगमनाविशेषात्।
स तथाविधः शिवस्ततात्मने परापररूपभगवत्सदाशिवादिप्रसरणमुखेना-
नन्तविस्ताराय निजस्वरूपाय परमशिवसंज्ञाय नमस्करोतु। लोट् निमन्त्र-
णादौ² नमस्तेऽस्तु इतिवत्। वयं शिवात्मानः परमेश्वराय नमस्करवामे-
त्यर्थः। परत्वेन प्रथमपुरुषप्रयोगोऽकिंचिद्रूपत्वेन कृत्रिमाहंभावस्य कर्तृता-
मात्रं तत्त्वमिति दर्शनार्थः। सर्वं च शिवमियमिति नमस्कारे वाङ्मनसादि
करणमपि शिव एव। तदाह स्वात्मना इति। विघ्ना अपि तदात्मान एव
निवार्याः। तदाह आत्मनिवारणे इति। नमस्कारे चास्मदीयेच्छादिशक्तिः
शैव्येवेत्याह निजया शक्त्या इति। एतेन³ सर्वा एव क्रियाः सकारकाः
सफलाश्च गमनभोजनादिका एवमेवानुगन्तव्या इति दर्शितम्॥ १॥
इदानीं समस्तशास्त्रार्थं संक्षेपेण सयुक्तिकं⁴ प्रतिजानीते--
आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निवृत्तचिद्विभुः⁵।
अनिरुद्धेच्छाप्रसरः⁶ प्रसरद्दृक्क्रियः⁷ शिवः⁸॥ २॥
१ यथा भिन्नीकृतानपि प्राणादीन्प्रमेयानात्माभेदेन पश्यति तथैव
सर्वमपि व्याप्यमित्यर्थः।
२ नियोगकरणं निमन्त्रणमावश्यके प्रेरणेत्यर्थः। ततश्चाप्रवृत्तप्रैष
इति फलितोऽर्थः, तेन प्रेषणानवकाश एवेत्यर्थः। तदुक्तं हरिणा--
'अप्रवृत्तस्य हि प्रैषे पृच्छादेर्लोङ्विधीयते।
प्रवृत्तस्य यदा प्रैषस्तदा स विषयो णिचः॥'
इति। तेन करोत्वित्यत्रान्यप्रेरकत्वमिति न भ्रमितव्यम्।
३ एतेनेति--अयं श्लोको नमस्कारैकपरमार्थोऽपि प्रयुक्त इहो-
दाहरणीकृत एव मन्तव्य इत्याह गमनभोजनादिका इति। तेन अभ्यव-
हारगमनजल्पसंवेशनादिकं कारकभेदप्रथाभासकं फलेन च कार्यकारण-
भावाभासकं तत्सर्वं तस्यैव ततात्मनः स्फुरणमात्रमेव मन्तव्यमिति भावः।
४ अनुभवानुसारी तर्को युक्तिः।
५ स्वप्रकाश एव। ६ अहंप्रथात्मत्वेन स्वातन्त्र्यात्। ७ घटादीनां
यत्पार्यन्तिकं पारमार्थिकं रूपं, स एव।
८ अयमर्थः--सर्वभावानां य आत्मा वेद्यतारूपः स एव शिव इति
तं विना 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इति नीत्या सर्वान्ध्यप्रसंगः। अत

४ शिवदृष्टिः [ आ०-१
सर्वभावेषु स्वात्मैव शिव इति व्यवहर्तव्यमिति प्रतिज्ञा¹। निर्वृत-
चिदित्यादिविशेषणकलापो हेतुः²। स्फुरन्निति धर्मिणो³ हेतोश्च⁴ स्वसंवे-
दनप्रत्यक्षं प्रमाणम्⁵। अत एव स्फुरन्निति पृथक्पदम्। निर्वृतचित्त्वाच्चैव⁶
च शिवत्वमित्यर्थाच्चिद्वलक्षणमपि दर्शितम्। तस्मिंश्च सिद्धे विषये, शिव-
त्वव्यवहारमात्रं तद्विषयं साध्यत ईश्वरप्रत्यभिज्ञोक्तक्रमेण। यथा च
चिन्निर्वृतीच्छाज्ञानक्रिया घटपटपर्यन्तसर्वभावेषु भासमानेषु स्फुरन्ति,
एव च न बाह्यं नाम किंचन परमार्थतो विद्यते। एवं चार्थस्य प्रकाशत्वे
प्रकाशोऽप्यर्थः अर्थोऽपि प्रकाश इति भावगर्भीकारेण व्यासमुनिना
गीतासूक्तं—
'यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।' (६।३०)
इति। तथा—
'सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।' (६।२९)
इति च। वृत्तिकृता चान्यत्रोक्तम् 'अर्थानां प्रकाशात्मतया परमात्मत्वेन
विश्वरूपत्वात्'। अन्यत्रोक्तम् 'एकैकत्र च तत्त्वे षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपता विद्यते'
इति। तथा वेदान्तिनोऽपि प्राहुः—
'प्रदेशोऽपि ब्रह्मणः सार्वरूप्यमनतिक्रान्तोऽविकल्प्यश्च।'
इति। अत एव च शरीरमेव च ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिवरूपतया पश्यन्ति
अर्चयन्ति, तेऽपि च सिद्ध्यन्ति घटादिकमपि वा तथाभिनिविश्य पश्यन्तीति
नास्त्यत्र विवादः।
१ परप्रतीतौ पञ्चावयवं वाक्यमुदाहरणीकरोति प्रतिज्ञेति, ससाध्यं
पक्षकथनं प्रतिज्ञा। २ लिङ्गवाचको हेतुः। ३ स्वात्मैव शिव इत्यस्य।
४ निर्वृतचिदित्यस्य। ५ अनुमानं हि प्रत्यक्षमूलम्। ६ निर्वृतिः
स्वप्रकाशस्वरूपविश्रान्तिरानन्दलक्षणा, तत्र नित्ययोगे मत्वर्थेऽच् प्रत्ययः।
तेन चितः समासकरणं वृत्तौ पदानामेकार्थीभावादत्यन्ता वियोगमेकार्थी-
भूततां च प्रकाशानन्दयोर्दर्शयद्विज्ञानानन्दरूपस्य भगवतो धर्मित्वं कथयति।
उक्तं चेश्वरप्रत्यभिज्ञायां—
'किंतु मोहवशात्तस्मिन्दृष्टेऽप्यनुपलक्षिते।
शक्त्याविष्करणेनेयं प्रत्यभिज्ञोपदर्श्यते॥' (१।१।३)
इति।

आ० - १ ] उत्पलदेवकृतवृत्त्योपेता ५
तथाग्रतो¹ वक्ष्यते । शक्ति²शक्तिमतोर्भेदाच्छक्तिमतश्चैक्यात्³ शक्तिपञ्चकं
परापरावस्था⁴ व्यवहर्तृप्रमात्रपेक्षयेतीश्वरप्रत्यभिज्ञोक्तनीत्या⁵ पुरस्ता-
द्द्रक्ष्यते । निर्वृता वेद्यनिराकांक्षा पूर्णा चिद्यस्य सः, तथा विभुरात्मसात्कृत-
समस्तवेद्यार्थः, अनिरुद्ध⁶ इच्छाप्रसरो यस्य, प्रसरन्त्यौ दृग्ज्ञानं⁷ क्रिया च
यस्य स तथालक्षणः शिवः सर्वेष्वात्मैव ॥ २ ॥
एवं सर्वं शिवरूपमिति स्वसंवेदनसिद्धे व्यवहारमात्रं साध्यमिति
स्थिते वाद्यन्तरविमतिं⁸ निराकरिष्यन् परदशातः प्रभृति घटपटादिस्थिति-
पर्यन्तमेवंरूपशिवतावस्थितिसादृश्यप्रतिपादनं प्रस्तौति—
स यदास्ते चिदाह्लादमात्रानुभवतल्लयः ।
तदिच्छा तावती तावज्ज्ञानं तावत्क्रिया हि सा ॥ ३ ॥
सुसूक्ष्मशक्तित्रितयसामरस्येन वर्तते ।
चिद्रूपाह्लादपरमो निर्विभागः परस्तदा ॥ ४ ॥
शिवैक्याख्यातिरूपभ्रान्तिमयसंसारावस्था यावन्नोन्मिषति, तावदपि
तावत्येवोक्तरूपशिवता९ । तथाच शक्तिपञ्चकमपि तदानीमेकरूपमपि व्यव-
हारापेक्षया कार्यसंभवादस्त्येव१० । तथा¹¹ हि परापरावस्थायां योऽहमिति
सहजप्रत्यवमर्शात्मा प्रकाशः, स एव परानपेक्षः पूर्णत्वादानन्दरूपो निर्वृत-
चिन्मयः स्थित एव । सैव स्वतन्त्रा मुख्या शिवता । तदुक्तं चिदाह्लादेति ।
पूर्णचिदानन्दमात्रेऽनुभवः प्रकाशनं नतु बाह्ये, तत¹² एव तत्रैव लयो यस्य
१ 'घटादिग्रह' इत्यादौ । २ अत्र शक्तिपञ्चकेनैव भेदमाशङ्क्याह ।
३ तस्य स्वात्मन्यपि भेदमाशङ्क्याह । ४ सदाशिवत्वमुद्रेकादित्यादौ ।
५ ऐक्ये सिद्धे पूर्णत्वस्य बलादेव लाभ इति व्यतिरिक्ताकांक्षावैकल्यात्—
प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिरहंभावो हि कीर्तितः ।
उक्ता च सैव विश्रान्तिः सर्वापेक्षानिरोधतः ॥
स्वातन्त्र्यमथ कर्तृत्वं मुख्यमीश्वरतापि च ।' (अ. प्र. सि. २३ का.)
इति परमानन्दस्वभाव इत्यर्थः ।
६ यतः सर्वभावेषु आत्मा अहमिति स्वतन्त्रस्तत एव । ७ प्रकाशो
विमर्शश्च ।
८ वेदान्तानां भिन्नवेद्यवादिनां च । ९ कथितव्याप्तिका । १०
कार्येण कारणानुमानम् । ११ तत्रादौ परापरावस्थायाः चिदानन्दतां समर्थ-
यति । १२ चिदानन्दमात्रव्यतिरिक्तस्य भिन्नज्ञानवदभावात्तत एव प्रकाश-
स्तत्रैव लयश्च ।

६ शिवदृष्टिः [ आ०-१

स तथा। अनेन निवृत्तचित्कथिता। इच्छाज्ञानक्रियास्तु भिन्नविषयाद्य-
पेक्षया¹ स्फुटीभवन्ति। परावस्थायां पुनः पूर्णोऽहमित्येव स्वस्वभावः
प्रकाशते, तावत्प्रकाशत्वात् तदेव ज्ञानं, संरम्भरूपत्वात्² सैव क्रिया, तत्स्व-
भावत्वेन तदभ्युपगमादिच्छापि स्थितैवेत्याह तदिच्छा तावतीति। तावच्च
स्वरूपं क्रियेति योज्यम्। अथवा तावज्ज्ञानमिति तावच्छब्दः³ क्रियायां
स्त्रीलिङ्गः परिणमनीयः। द्वितीयस्त्वन्ते तावच्छब्दः क्रमार्थः परापरा⁴-
द्यवस्थापेक्षः। अत एव भिन्नविषयाभावेऽपि अभ्युपगमप्रकाशसंरम्भाणां
सर्वदा प्रकाशमयत्वेनाविचलनादिच्छादिव्यवहारयोग्यतैवेत्युक्तं⁵
सुसूक्ष्मेति⁶। सुसूक्ष्मत्वमेषितव्याद्यभावेन विभागापरिकल्पनात्। अत एव
शक्तिसामरस्यं पूर्णचिन्मात्रप्रकाशनात्मकत्वात् चिद्रूपाह्लादपरत्वं चोक्तम्।
सैव च निर्विभागता परावस्था यदैवमास्ते परस्तदेत्युक्ता ॥ ३-४ ॥
अन्यदशायामपि⁷ सा तथाभूतज्ञेयादिशून्यशुद्धपरशिवावस्थास्ती-
त्याह—
न⁸ परं तदवस्थायां व्यवस्थैषा व्यवस्थिता।
यावत्समग्रज्ञानाग्रज्ञातृस्पर्शदशास्वपि । ५ ।।
स्थितैव लक्ष्यते सा च तद्विश्रान्त्या तथा फले।


१ तेन न भिन्नविषयाप्रविभागदशायां व्यभिचार इति भावः।
अनेन संविदानन्दात्मनः सर्वत्रैकरूपत्वेनानपायित्वेन धर्मिरूपेण शक्तिमदा-
त्मनावस्थितस्य भगवतः स्वातन्त्र्योद्रेकबलेनोन्मेष्यमाणानां चेच्छादीनां
शक्तित्वं द्योतितम्। २. स्वात्मोच्छलता।
३ तावती क्रियेत्यर्थः। ४ परावस्थायां क्रमाभावात्। अभ्युपगम
इच्छा। प्रकाशो ज्ञानम्। संरम्भः क्रिया। ५ अव्यभिचारात्। ६ सुसूक्ष्मेति
सूक्ष्मतयैवात्र स्थूलदर्शिनां विशुद्धबोधात्मवादिनां विकल्पपक्षीकृतविमर्शानां
भ्रान्तिरित्यर्थः। ७ घटपटादिरूपभेदप्रथारूपायाम्। ८ ननु पूर्वम् ‘आत्मैव
सर्वभावेषु’ इत्यनेन सर्वपदार्थानामात्माकार एव वेद्यतारख्योऽस्ति
शिव इति स्थापितं तदेव समर्थनीयं, कृतमनयोक्त्या ‘स यदास्ते’ इत्या-
दिकया' यतः प्रकृतमपहायान्यद् ब्रुवत उन्मत्तभाषणमिति प्रकृतविघाताख्यं
दोषमाशङ्क्याह न परमिति। तत्रादौ शक्तिमत्स्वरूपमेव व्यवस्थापितं,
तस्मिंश्च सिद्धे मूलकारणेऽन्यद्वर्ण्यमानं निर्भित्तिचित्रन्यायेनान्यथा घटमानं
सेत्स्यतीति भावः।

१. प्रथम-द्वितीय आह्निक: शिव-पारमार्थिक स्वरूप, स्वातन्त्र्य एवं सर्वमयता

आ०-१ ] उत्पलदेवकृतवृत्त्योपेता ७
न केवलं परापराद्यनाविर्भाव एवैवं नियमो¹, यावदपरावस्था-
यामपि । सर्वविकल्पादिज्ञानानामग्रत उत्पित्सावस्थायां² ज्ञानज्ञेयानाबिल-
ज्ञातृस्वरूपसंस्पर्शोऽवश्यंभावीति तदवस्थास्वपि परव्यवस्था । यद्यपि³ तदा
पुर्यष्टकलक्षणज्ञातृवस्थानात् सौषुप्तवत् न परावस्था, तथापि यदा ज्ञानाग्र-
भागेषु विश्राम्यति क्वचित्, तदा परता । न च प्रमाणभूमौ विश्रान्तिस्तत्रापि
प्राणस्पन्दनात्मकज्ञेयव्याकुलितत्वात् । ततः प्राणादिज्ञेयज्ञानस्यापि अग्रतो
विश्रान्तिः । वस्तुतः सौषुप्ताग्रभागिनी परता स्थितैव, लक्ष्यते च प्रकाश-
स्यालक्ष्यमाणत्वाभावात्, तथा फलेऽपि मयैतज्ज्ञातमिति प्रमाणफलभूत-
ज्ञानान्तरोदये तदा ज्ञानमात्रे निर्वृत्तिमति विश्रान्तया । अथवा यथा समग्र-
ज्ञानानामारम्भे, तथा फले परिसमाप्तौ तत्रैव विश्रान्तया । तद्विश्रान्तिं⁴
विना अर्थो ज्ञात एव न भवति । समग्रत्वमनेकप्रकारकत्वेन⁵ ज्ञानानां मध्य-
दशायामेव प्रत्यगात्मत्वेन । पूर्वापरकोट्योस्तु एकविशुद्धशिवतैव सर्वेषाम् ।
एतच्चेश्वरप्रत्यभिज्ञायां परीक्ष्यम् ॥ ५ ॥
सर्वत्र शक्तिपञ्चकस्वभावमुपसंहरन्नाह--
एवं⁶ न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ॥ ६ ॥
शक्त्या निर्वृत्तचित्तस्य तदभागविभागयोः ।
एवमुक्तप्रकारेण त्रितयात्मना इच्छाज्ञानक्रियारूपया शक्त्या न
वियोगः कदाचिदपि निर्वृत्तं चित्तं चिद्रूपत्वं निर्विवादं यस्य तथा चिदा-
नन्दशक्त्योः परापराद्यवस्थास्वपि समर्थनात्⁷ । केवलं परावस्थायामेषित-
व्याद्यभावादिच्छाद्यभावशङ्कायां तत्संभवो निगमितश्चिदानन्दानुवादेन⁸ ।
तासां शक्तीनामविभागविभागयोः परत्वापरत्वावस्थाभेदेषु ज्ञेयादिसद्भावे
शक्तीनां विभागव्यवहारात् तस्य प्रमातुरिच्छादिशक्तिभिर्न विरहः ॥ ६ ॥
१ सर्वशक्तिसामरस्यस्वरूपशक्तिमदवश्यंभावः । २ उत्पतितुमिच्छा
उत्पित्सा । ३ ननु चास्तु तत्र ज्ञानज्ञेयानाबिलज्ञातृरूपस्पर्शस्तथापि
कथं परव्यवस्था, नहि तेनैवं तद्भावः, अस्ति च तादृक्स्वरूपं सौषुप्तं,
यतो मलेन न्यक्कृतः कलया तु प्रबुद्ध इवात्र तन्न्यक्कारेण सुष्ठु सुप्त इति
तत्रापि ज्ञातृवस्थानेऽपि सुषुप्त इति कथ्यत इत्याशयेनाह यद्यपीति ।
४ यथोक्तं वृत्तिकृतैव । ५ का पुनरपरावस्था इत्याह ।
६ एवमिति अपूर्वप्रक्रियया सिद्धेऽर्थे सति । ७ तथाहीत्यादिना ।
८ निगमावयवेन निश्चायितः । ९ परावस्थायां पुनरित्यादिना ।

८ शिवदृष्टिः [ आ०-१
विभागे यथा शक्तिपञ्चकस्थितिस्तथा वक्तव्यं, तत्क्रमेणाह--
यदा$^१$ तु तस्य चिद्धर्मविभवामोदजृम्भया ॥ ७ ॥
विचित्ररचनानानाकार्यसृष्टिप्रवर्तने$^२$ ।
भवत्युन्मुखिता चित्ता सेच्छायाः प्रथमा त्रुटिः ॥ ८ ॥
चिद्रूपस्य शिवभट्टारकस्य धर्मः स्वभावो यो विभवः पञ्चविधकृत्य-
निर्वृत्तियोग्यता, तस्यामोदश्चमत्कारस्तथास्वरूपपरामर्गरूपस्तस्य जृम्भा
विश्वात्मतया विकसनम् । यदुक्तं मया स्तोत्रे--
'स्फारयस्यखिलमात्मना स्फुरन्
विश्वमामृशसि रूपमामृशन् ।
यत्स्वयं निजरसेन घूर्णसे
तत्तमुल्लसति भावमण्डलम् ॥'
( उ० स्तो. १३ स्तो. १५ )
इति । घूर्णनं जृम्भोक्ता, तया जृम्भया हेतुभूतया स्थितस्वरूपस्यैव मायीया-
भेदाख्यातिवैचित्र्यरचनोपलक्षिता तत्स्वभावा या नानाकार्यसृष्टिः,
तत्प्रवर्तने यदोन्मुखिता उन्मुखवदाचरिता वस्तुतो द्वितीयाभावात् नैरपेक्ष्ये-
णान्तर्मुखित्वात् चित्ता चैतन्यमेव, तदा सा त्रुटिः सूक्ष्मकालपरिच्छिन्न
इच्छाप्रथमभागः । अत्र$^३$ चैतावच्छक्तिकलापो व्यवहर्तॄणां परमार्थपद्मारु-
१ इत्थं शुद्धबोधस्वरूपात्मनि शिवतत्त्वे शक्तिपञ्चकमैक्यापादनाय
समर्थितं, तत्प्रसङ्गेन चापरावस्थायामपि तस्य तादृग्रूपताप्रतिपत्तिदार्ढ्यार्थं
पुनरपि समर्थितमिति सिद्धं परशिवापरनरावस्थायां शक्तिपञ्चकसाम-
रस्यात्मकं पूर्णमेवानन्दमयं चित्स्वरूपमास्त इति । तत्र या पुनः परापरा
स्पन्दात्मिका शक्तिलक्षणावस्था, तत्रापीच्छादिपञ्चकसंभवं साधयति यदा
त्वित्यादिना ।
२ अयमेव ह्यस्यान्यवादिन्यो विशेषः--
'सर्गसंहृतिकर्त्तारं प्रलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं वन्देऽहं भक्तवत्सलम् ॥'
इति ।
३ 'सक्रमत्वं हि लौकिक्याः क्रियायाः कालशक्तिः ।
घटते न तु शाश्वत्याः प्राभव्याः स्यात्प्रभोरिव ॥' ( ई० प्र० २।१।२ )
इति नीत्या यथा प्रभोः सक्रमत्वमसंभाव्यं, तथा तच्छक्त्या अपि स्वातन्त्र्ये-

आ०-१ ] उत्पलदेवकृतवृत्त्योपेता ६
रुक्षतां संभाव्यत इत्येवं निर्दिश्यते, न तु मायातत्त्वादूर्ध्वं कालविभाग-
संस्पर्शः । अथवा मायोर्ध्वेऽपि परापररूपत्वादवस्थाविशेषस्य कालविभागो-
ऽपि¹ स्यादित्यत एव त्रुटिरित्युक्तम् । सर्वं चैतत्प्रत्यभिज्ञायामुक्तम् ॥७-८॥
सा च दृश्या² हृद्देशे कार्यस्मरणकालतः ।
प्रहर्षवेदसमये³ दरसंदर्शनक्षणे⁴ ॥ ९ ॥
अनालोचनतो⁵ दृष्टे विसर्गप्रसरास्पदे ।
विसर्गोक्तिप्रसङ्गे च वाचने धावने तथा ॥ १० ॥
एतेष्वेव प्रसङ्गेषु सर्वशक्तिविलोलता⁶ ।
सा च सूक्ष्मोन्मुख्यशक्तिरूपा लक्ष्या हृत्प्रदेशे पूर्वचिकीर्षितविस्मृत-
कार्यस्मरणे, तथा प्रहर्षहेतुपुत्रजन्माद्यावेदनकाले, दरस्य भयस्य संदर्शन-
प्रारम्भक्षणे, अनालोचनतः सहसैवेष्टे दृष्टे, चरमधातुविसर्गस्थाने, तथा
च्छारूपाया इत्याशङ्क्याह अत्र चेत्यादि । कालयोगाद्धि तस्या अनित्यतापि
भवेदित्यर्थः । अथवा पक्षान्तरेण तां युक्त्याङ्गीकरोति 'मायोर्ध्वं' इति, तेन
परापरतयेदन्तोन्मेषे तत्रावश्यं सूक्ष्मकालशक्तिरस्त्येवेति भावः ।
१ अपिशब्देन विद्युदाभासवदस्यावस्थानं द्योतयति । २ दृश्या
स्फुटं लक्षणीया । ३ प्रियतमपुत्रमृतोत्थितिवार्ताश्रवणकाले । ४ भयारम्भ-
प्रथमक्षणे । ५ अश्रुतपूर्वाश्चर्यवस्तुनोऽकस्माद्दर्शने । ६ एवं वा निर्मातृता-
मयी अभ्युपगमलक्षणा प्रमातृता सैवेच्छा । सा च सहृदयानां स्वसंवेदन-
सिद्धत्वादपह्नुतस्वभावैव स्थिता—यथा गच्छामीत्यादौ सामान्यरूपत्वेन
यद्गन्तव्यादिकं ग्राह्यं शरीरेन्द्रियप्राणबुद्ध्यादि, विशेषानुल्लेखेन च यत्
ग्राहकं, तदन्योन्याभासासामान्यलक्षणं पश्यन्तीशब्दवाच्यमिच्छालक्षणं
प्रसरं विविच्य, तत्प्रत्यभिज्ञोपायं प्रबुद्धान्प्रति विषयाभिव्यक्तिपूर्वमाह सा
चेत्यादि । एतच्च—
'अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन् वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥' ( १।२२ )
इत्यादिना स्पन्दे संगृहीतम् । तथा—
'कामक्रोधैलोभमोहमदमात्सर्यगोचरे
बुद्धिं निस्तिमिरां कृत्वा तत्सत्त्वमवशिष्यते ॥ ( वि० भै० १०१ )

१० शिवदृष्टिः [ आ०-१
विसर्जनीयभाषणप्रसङ्गे, त्वरितग्रन्थवाचने, धावनविधौ चेति¹ । एतेष्वेवाव-
सरेषु सा पूर्वोक्तक्रमेण सर्वशक्तीनां विलोलता मिश्रीभावः ॥ ६-१० ॥
सुखदुःखात्मकत्वेनाशुद्धत्वाद्धेयेऽस्मिन्कार्ये कथमोन्मुख्यमित्याशङ्कां
निवारयन्नाह—
कुत्सितेऽकुत्सितस्य² स्यात्कथमुन्मुखतेति चेत् ॥ ११ ॥
रूपप्रसाररसतो³ गर्हितत्वमयुक्तिमत्⁴ ।
पञ्चप्रकारकृत्योक्तिशिवत्वान्निजकर्मणे ॥ १२ ॥
प्रवृत्तस्य निमित्तानामपरेषां क्व मार्गणम् ।
आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बान्धवे चिरात् ।
आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा तल्लयस्तन्मना भवेत् ॥ ( वि० भै० ७१ )
क्षुताद्यन्ते भये शोके वारे विद्रुते रणे ।
कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता समीपगा ॥' ( वि० भै० ११८ )
इति । अयमत्र भावः—सर्वशक्तिपरिपूर्णतात्मकं चितो यद्रूपं, तद्यदा
स्वातंत्र्यात् संवित्स्वभाव आमृशति, तत उन्मुखीभूतायां चिद्रूपतायां
तत्प्रसरप्रथमविकासलक्षणायामिच्छाकलिकायां स्थितः सर्वाविभागेन स्थितिं
भाविन उपयोगिरूपस्य प्रमातृप्रमाणप्रमातव्यवर्गस्य विमृशन् भाविभेदाः
शक्तीरभेदकल्पेनैव पिण्डीकृताः सतीर्गोलकशिम्बिकादिविकल्पेनोत्थापयति,
तत एव च भाविनियतक्रमककार्यं जायते—यथा श्लोकं स्मरेयममुमिति
सुस्मूर्षयैकयैव मध्यवर्तिषु वर्णपदादिषु प्रत्येकस्मृतिसन्ततिप्रबोधकारणमेषण-
मन्तरेणैव नियतक्रमकस्मरणपरम्परोदय इति ।
१ यदि हि धावनादौ अभिन्नस्य प्रमातृप्रमेयरूपस्यानिर्देशितविभाग-
स्यापि वस्तुतः प्रकाशो न स्यात्, तत्त्वरितं लिपिपाठे, वेगसरणे, त्वरिता-
भिधाने, रेखातो रेखान्तरं देशाद्देशान्तरं स्थानकरणादेः स्थानकरणान्तरं
च गच्छतस्तांस्तांस्त्यक्तव्यांस्त्यक्तवतोऽपरामर्शतस्तयोस्त्यागादानयोः कर्त्ता-
रमनभिमृशतस्तानि विचित्राणि त्यागोपादानानि कथं भवेयुः परामर्शपूर्व-
कतयैषां दृष्टत्वात् । तदिमानि भवन्ति स्वकारणमनुमापयन्ति, न चासौ
भेदेनैव परामर्श एषामिति । भेदेन हि परामर्शो वाचिकमानसपरिस्पन्दपर-
म्परातोऽभिलापसंकेतस्मरणप्रबन्धसद्भावे त्वरिततैव न निर्वहेत् ।
२ स्वस्वरूपानन्दविश्रान्तस्य । ३ स्वरूपप्रसरणमेवास्यानन्दास्वाद
इत्यतः । ४ अयुक्तिमदयोग्यमित्यर्थः ।

आ०-१ ] उत्पलदेवकृतवृत्त्योपेता ११
'मायाशक्तिकृतपूर्णस्वरूपाख्यातिमयचित्रकार्यतापन्नस्वरूपप्रसरण-
रसात्२ प्रभोरस्य तद्रूपस्य३ कार्यभेदस्य कुत्सितत्वमयुक्तम् । तथाहि परा-
परावस्थायां४ सदाशिवेश्वररूपत्वे विश्वमहमिति विश्वरूपत्वमेव संविदि
स्फुरति५ । अपरावस्थायामपि६ अहं घटमिमं वेद्मि घटोऽयमिति वा
द्वैतदृष्टौ चिदात्मकतां७ विना प्रकाशमानतैव नोपपद्यते इति तद्रूपतैव८,
किंतु९ मायाशक्तिवशादभेदापरामर्श१० इति सर्वदा११ स्वरूपप्रसरणमेवेति
कथं गर्हितत्वम् । अभेदापरामर्शनमेव भ्रान्तिरूपं कुत्सितं, तच्च१२ न
१ मीनाति पशुप्रमातॄनिति माया, सा चासौ शक्तिः । तेन
परमेश्वरस्य स्वातंत्र्यमेव यच्चिकीर्षालक्षणं, तेनाहमित्यखण्डितेऽपि स्वरूपे
भासमाने या तत्रैवेदमिति प्रतीतिः स्वरूपप्रसरणरूपा, सैव मायाप्रमातॄन्प्रति
मायाशक्तिः ।
२ तेन शक्तिमता स्वस्वातन्र्यरूपया मायाशक्त्या कृता या पूर्णस्या-
ख्यातिरिदमहमिति । ३ स्वरूपप्रसरणरूपस्य ।
४ परापरावस्थायां सदाशिवेश्वररूपत्वे । यद्यत्र शुद्धविद्यास्वरूपो-
न्मीलनं न कृतं, तथापि तदभावोऽपरावस्थात्वं तस्या न मन्तव्यं, यतो यथा
शिवतत्त्वस्य यदौन्मुख्यं सा शक्तिरिति भण्यते न परावस्थायां शिवतत्त्वात्
पृथग्गणनीयतां गता, तथा सदाशिवेश्वरयोरपि बहिरौन्मुख्यं विद्येति
भण्यत इति न तस्याः पृथगिह निर्देशः ।
५ तेन नात्र कापि कुत्सितत्वशङ्केत्यर्थः । ६ अत्रेमं घटमिति यदि
प्रमातृविश्रान्तः प्रकाशस्वरूपो न स्यात्, तर्हि अहमित्यत्राहन्ताश्लिष्टः कथं
भासेत । ७ नन्वस्तु सूक्ष्मो विमर्शोऽहन्ताविश्रान्तत्वादहं घटमिमं वेद्मी-
त्यत्र प्रकाशस्वरूपावेश्येव, यत्राहन्ताविश्रान्त्यभावात् स्थूलत्वेन घट
इति अयमिति च विकल्परूपता; तत्र शब्दोऽपि नीलवत्पृथगेव प्रतिभासते,
तत्र कथं प्रकाशात्मतेत्याशयगर्भीकारेणाह चिदात्मकतां विनेत्यादि । उक्तं
च प्रत्यभिज्ञायां--
'घटोऽयमित्यध्यवसा नामरूपातिरेकिणी-
परेशाशक्तिरात्मेव भासते न त्विदन्तया ।।' ( १।५।२० )
इति । ८ तद्रूपता चिद्रूपता । ९ यद्येवं, तर्हि केयमपरा नाम वराकीत्याशये-
नाह किंत्विति । १० इदन्तया भेदेनैव परामर्शः । ११ सर्वदेति परापरादौ ।
१२ तत् कुत्सितत्वम् । तथा च कुत्सितं स्वरूपव्यतिरिक्तत्वात्स्यादिति ।

१२ शिवदृष्टिः [ आ०-१
किञ्चित् अख्यातिरूपमात्रत्वात् । न तत्पूर्वस्य कस्यचित्प्रथा१ । विश्वा-
त्मत्वं च चिन्मयस्य प्रतिबिम्बानामिव२ दर्पणपरमार्थत्वेन भावानां
स्वच्छचिन्मात्रसतत्त्वतयावस्थानात् । एतच्च सर्वमीश्वरप्रत्यभिज्ञाटीकायां
निपुणमालोचितम् । सर्गस्थितिप्रलयानु३ग्रहतिरोधानलक्षणपञ्चप्रकारं
कृत्यं यस्य तस्योक्तिः पञ्चविधकृत्यो यदुच्यते तच्छेवत्वं ततः निज-
कर्मणे तत्त्वादिरूपप्रसरणरूपाय४ प्रवृत्तस्य निमित्तानां५ दयादीनां क्व
मार्गणं निमित्तान्वेषणप्रसङ्गस्यैवाभावात् कथमेवं प्रसरतीति न चोद्यमिति
तावदकुत्सितविषयमेवौन्मुख्यमिति समर्थितम्६ ॥ ११-१२ ॥
तदिदानीं निदर्शनेन स्फुटीकर्तुमाह—
गच्छतो निस्तरङ्गस्य जलस्यातितरङ्गिताम् ॥ १३ ॥
आरम्भे दृष्टिमापात्य तदौन्मुख्यं हि गम्यते ।
व्रजतो मुष्टितां पाणेः पूर्वं कम्पस्तदेक्ष्यते ॥ १४ ॥
१ प्रथा–प्रसरणम् । २ प्रतिबिम्बेति, यथोक्तमीश्वरप्रत्यभिज्ञायां—
‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् ।
अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ॥’ ( १।५।१० )
इति ।
३ बीजाङ्कुरादौ यो मायीयो व्यवहारो लौकिकदृशा भासते, स
तिरोधित्कृतः । यस्तु तत्रापि पारमार्थिकतयैव स्थितः, सोऽनुग्रहशक्ति-
कृतः । एतदेव हि अस्यान्यवादिभ्यो विशेषः, यत्सततमेव पञ्चकृत्यविधान-
मिति यदुक्तं—
‘मुहुर्मुहुरविश्वान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः ।
कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥’ (स्त० चि० ११२ )
इति । ४ सृष्ट्यादिरूपेण तत्त्वादिप्रसरणं, तत्र पारमार्थिककाल्पनिककार्य-
कारणभावादौ तिरोध्यनुग्रहशक्ती । ५ निमित्तानामिति । यदाहुरेके
‘ईश्वरः स्वात्मन्यवाप्तसर्वकामः, किमस्य सृष्ट्यादिना फलमिति । सर्वो
हि यः कश्चित्प्रवृत्तिकारी प्रयोजनमुद्दिश्यैवाभिमुखीभवति, तच्चास्या-
वाप्तकात्वान्न संभाव्यम्’ इति भगवांल्लोकानुग्रहार्थमेव प्रवर्तते इति
कथने दुःखमयीं कस्मात् सृष्टिं कुरुते दयालुत्वात्तस्येति दयादीनां निमित्तानां
क्वास्मिन्नये पर्येषणा ।
६ समर्थितमिति—अशक्यसाधनमपि साधितम् ।

आ०-१ ] उत्पलदेवकृतवृत्त्योपेता १३
बोधस्य स्वात्मनिष्ठस्य रचनां प्रति निर्वृतिः ।
तदास्थाप्रविकासो यस्तदौन्मुख्यं प्रचक्षते ॥ १५ ॥
किंचिदुच्छूनता सैव महद्भिः कैश्चिदुच्यते ।
तस्येच्छा कार्यतां यातः यया सेच्छः स जायते ॥ १६ ॥
औन्मुख्यस्य य आभोगः स्थूलः सेच्छा व्यवस्थिता ।
न चौन्मुख्यप्रसङ्गेन शिवः स्थूलत्वभाक् क्वचित् ॥ १७ ॥
यथा जलस्य पूर्वं निस्तरङ्गस्यातितरङ्गितां गच्छतः सूक्ष्मः पूर्वः
कम्प औन्मुख्यरूपः, पाणेश्च मुष्टितां गच्छतः पूर्वः सुसूक्ष्मः कम्प्रो दृश्यते,
तथा बोधस्य स्वरूपस्थस्य पूर्णस्य विश्वरचनां प्रति अभिलाषमात्ररचना-
योग्यताया यः प्रथमो विकासः प्रवृत्त्यारम्भस्तदौन्मुख्यं प्रचक्षते । प्रवृत्त्या-
रम्भश्च निर्वृतावप्यभेदाख्यातिधर्मत्वेन तस्याः १ प्रथनात् । यदेतदौन्मुख्यं,
सैव किंचिदुच्छूनता कथ्यते भट्टप्रद्युम्नेन तत्त्वगर्भे । अन्यैरपि तरङ्गो-
र्म्यादिशब्दैरपि । तस्यौन्मुख्यस्येच्छा कार्या । तस्य हि योऽसावाभोगो
ज्ञानादिकार्योत्पादनसमर्थो विस्तृतो दाढर्यमय उत्तरो भागोऽत एव
रचनास्थाविकासदाढर्यात् स्थूलः, सेच्छा व्यवस्थिता । न चोच्छूनतादि-
व्यपदेश्यौन्मुख्यप्रसङ्गेन शिवो बीजमिव स्थौल्यभाक् । इच्छाद्य२-
सद्भावे वा अन्यत्र क्वचित् वस्तुतो न स्थौल्यं चिदात्मनः प्रतिबिम्ब-
कल्पैर्भावैरनाधिक्यात् । नापि तदात्मताप्रथा भ्रान्तिरिति३ सर्वमुक्तं
टीकायाम् ॥ १३-१७ ॥
व्यावहारिकोऽपि नास्त्येवमादौ भेदस्तथापरामर्शानिवृत्तेरित्याह—
गोः स्तनात्पाततः क्षीरे विकारस्तत एव हि ।
न च न क्षीरमित्येष व्यपदेशोऽस्ति तत्क्षणम् ॥ १८ ॥
गोः स्तनात् पातात् क्षीरे विकारस्तत एव तदनन्तरमेव । न च
तत्क्षणं तत्र न क्षीरपरामर्शो, यावत्परामर्शैक्यं तावत्सर्वदैक्यमेव ॥ १८ ॥
१ तस्या निर्वृतेः ।
२ निराकाङ्क्षतादशायाम् ।
३ आभासमानत्वात् ।

१४ शिवदृष्टिः [ आ०-१
एवमौन्मुख्यमिच्छायां उक्तमिदानीमुपपादयन्नाह--
यत इच्छति तज्ज्ञातुं कर्तुं वाहेच्छया क्रियाम् ।
तस्याः पूर्वापरौ भागौ कल्पनीयौ पुरा हि या ॥ १९ ॥
तत्कर्मनिवृत्तिप्राप्तिरौन्मुख्यं तद्विकासिता ।
यस्मादिच्छति ईश्वरो ज्ञातुं वा कर्तुं वा इति यदुच्यते, तदाख्यात-
पदमिच्छया इच्छालक्षणां क्रियामाह । तस्या इच्छायाः पूर्वापरौ भागौ
कल्पनीयौ पूर्वापरीभूतावयवत्वात् क्रियायाः१ इच्छायाः क्रियात्वाभिधानेन ।
इच्छादीनामन्योन्यात्मता शक्त्यवस्थायां सुतरां स्यात् । ततश्च परमार्थत
एकैव शक्तिः शक्त एवास्तीति प्रतिपादितम् । उत्पत्तिकथायां तु इच्छायाः
पुरोभागे या तस्मिन् कर्मणि तत्कर्मनिष्ठा निर्वृत्तिप्राप्तिः, तदौ-
न्मुख्यं२, कर्मावच्छिन्ना निर्वृत्तिरौन्मुख्यम्, अनवच्छिन्ना निर्वृत्तिमात्र-
मानन्दशक्तिरिति यावत् । तदौन्मुख्यं विकासिता चिदास्थाप्रविकास
इत्युक्तम् ॥ १६ ॥
अनन्तरं हि तत्कार्यज्ञानदर्शनशक्तिता ॥ २० ॥
ज्ञानशक्तिस्तदर्थं हि योऽसौ स्थूलः समुद्यमः ।
सा क्रियाशक्तिरुदिता ततः सर्वं जगत्स्थितम् ॥ २१ ॥
परतस्तस्मिन् विश्वलक्षणे कार्ये यज्ज्ञानं, तत्प्रकाशनशक्तिरूपता
चिदात्मनः सर्वप्रतिपत्तॄणामवेद्यमन्तःकरण इव प्रकाशमानं तत् कार्यं यतः-
सा ज्ञानशक्तिः । अनन्तरं सर्वप्रमातृवेद्यस्थूलकार्यकारसंपत्तिफलः समुद्यम
इच्छाविषय एव क्रियाशक्तिः । तत एव परिसमाप्तिः व्यवहार्यकार्यलाभा-
दित्युक्तं ततः सर्वं जगत्स्थितमिति ॥ २०-२१ ॥
न केवलं जगन्निर्माण एवैवं, यावदेकैकघटकरणकालेऽपि एवं शक्ति-
रूपतेत्याह--
एवं सर्वसमुत्पत्तिकाले शक्तित्रयात्मता ।
न निवृत्ता, न चौन्मुख्यं निवृत्तं, नापि निर्वृत्ति ॥ २२ ॥
१ तदुक्तं--
'गुणभूतेरवयवैः समूहः क्रमजन्मनाम् ।
बुद्ध्या प्रकल्पिताभेदः क्रियेति व्यपदिश्यते ॥'
इति । २ पूर्णानन्दस्वरूपभेदाख्यातिरित्यर्थः ।