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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

६६ : शिवसूत्र विमर्श
अर्थ—परमार्थ अभ्यास आदि क्रमों को त्याग कर (ऐसे) लोग अविद्या में ही रहते
हैं। इस प्रकार अपने से ही उत्पन्न कामादि दोषों के कारण एक योनि से दूसरी योनि में
जाकर नरक-क्लेशों के भागी बनते हैं। अनुत्तर शिव-दशा तो कोसों दूर रहती है ॥४०॥
सम्बन्ध—जब योगी परमेश्वर के शक्तिपात से उदित स्वरूप का ही विमर्श करता
है तब किसी व्यक्तिगत अभिलाषा के अभाव से बहिर्मुख नहीं होता है अपितु आत्मा में
ही नित्य रमणशील रहता है। अब यह कहते हैं।
तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसंक्षयः ॥४१॥
तत्—तुर्यानन्द दशा में
आरूढप्रमितेः—संवित्-विमर्श में लगे योगी की
तत्—(व्यक्तिगत) अभिलाषा के
क्षयात्—नष्ट होने से
जीव—पुर्यष्टक प्रमातृभाव का
संक्षयः—शमन होता है।
व्याख्या—तुर्य-दशा में संवित्-धाम पर आरूढ़ योगी की अभिलाषाएँ क्षीण होती
चली जाती हैं। उसके पुर्यष्टक प्रमातृभाव अर्थात् कर्मों का बोझ ढोने वाले पशुभाव
का शमन होता है। उसका स्फुरण वित्प्रमातृभाव में ही सदा रहता है क्योंकि वह
कालग्रास—समाधि में तत्पर होता है और संसार-भाव से छूट जाता है। जैसे 'कालिका-
क्रम' में कहा है :
यथा स्वप्नानुभूतार्थान् प्रबुद्धो नैव पश्यति ।
तथा भावनया योगी संसारं नैव पश्यति ॥
अर्थ—जैसे अत्यन्त अल्प प्रदेश हृदय में, स्वप्नकाल के ही प्रकाश में आये हुए;
विचित्र उपवन, नदी, पर्वत, नगर आदि को मनुष्य जाग जाने पर नहीं देख पाता, वैसे
ही योगी चिद्रूपता की स्वतन्त्र भावना में चिन्मयता के अतिरिक्त संसार भाव को नहीं
पहचानता है।
चिद्रूपभाव में स्थित होते ही संसारभाव नष्ट होता है।
इस तरह कालग्रास-समाधि में तत्पर योगी कैवल्य पद का भोगी बनता है। उसे
इन्द्रिय और तन्मात्राओं के बोझ से पीड़ित नहीं होना पड़ता। उसके विकल्प ही विमर्श
होते हैं। वह प्राणापानरूपी जीवकला से ऊपर उठता है ॥४१॥
सम्बन्ध—अब प्रश्न उठता है कि जीवभाव के नष्ट होने पर देहपात होना चाहिये,
परन्तु इस सुप्रबुद्ध योगी का देह तो वर्तमान ही रहता है, ऐसी दशा में वह संवित्-धाम
में आरूढ़ कैसे रह सकता है ? इसके उत्तर में कहते हैं।

तृतीय विकास : ६७
भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः ॥४२॥
तदा—तब (अभिलाषा के क्षय होने पर)
भूतकञ्चुकी—शरीर को ठहराने वाले पंच-भूतों के बने कञ्चुक (आवरण
रूप पोशाक) को धारण करने वाला
(अयं)—(यह योगी)
विमुक्तः- -मुक्ति का अधिकारी (बन जाता है)
(यतः)--(क्योंकि यह)
भूयः—(अभ्यास की) बहुलता से
पतिसमः—शिव के समान
परः--पूर्ण (होता है) ।
व्याख्या—अभिलाषा का क्षय होने पर अर्थात् जीवभाव के लय होने से पुर्यष्टक
(पांच ज्ञानेन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंकार) प्रमातृ‌ता गल जाती है। तब योगी शरीर
को ऐसे बनाये रखता है जैसे एक साधारण मनुष्य अपने शरीर पर चादर ओढ़ता है।
उसे फिर 'भूतकञ्चुकी' कहते हैं। वह पंच-महाभूतों से बने शरीर को आवरण
(पोशाक) की तरह धारण करता है। वह शरीर के साथ अहंता को नहीं जोड़ता है।
उसका कल्पित पुर्यष्टक आदि शरीर पर पशुजन की तरह किया परिमित अहंभाव गल
जाता है। ऐसा योगी मुक्ति का भाजन बन जाता है क्योंकि उसे चिद्धनरूप परमेश्वर
के स्वरूप का आवेश होता है। उसी से वह पूर्ण-स्वरूप होता है। शिवभाव में ठहरे
हुए इस जीवन्मुक्त की शरीर में, जीवन के साधारण नियम के अनुसार ही स्थिति होती
है। जैसे इसी विकास के २६वें सूत्र में कहा है : 'शरीरवृत्तिर्वृतम्' ।
जैसे साँप को अपनी छोड़ी हुई पुरानी केंचुल (त्वचा) पर अहंता का अभिमान
नहीं रहता वैसे ही इस शिवयोगी को शिव-स्वरूप में गहन अभ्यास के फलस्वरूप पृथक्
देहादि पर प्रमातृता के अभिमान का अभाव रहता है। अथवा यों कहें कि जैसे खड्ग
के म्यान में होते हुए भी म्यान खड्ग से अलग है वैसे ही देह-भाव के गलने से योगी को
उसका प्रमातृभाव (अभिमानत्व) स्पर्श नहीं करता । वह विश्वात्मा शिव के साथ एक
होता है। एक अद्वैतशास्त्र भैरवतन्त्र (श्री कुलरत्नमाला) में कहा है :
यदा गुरुवरः सम्यक् कथयेत्तन्न संशयः ।
मुक्तस्तेनैव कालेन यन्त्रस्तिष्ठति केवलम् ॥
किं पुनश्चैकतानस्तु परे ब्रह्मणि यः सुधी ।
क्षणमात्रस्थितो योगी स मुक्तो मोचयेत्प्रजाः ॥
अर्थ—जब शक्तिपात के अवसर पर सद्गुण एक सत्-शिष्य को आवेश-पर्यन्त
शिवभाव की प्राप्ति कराता है तब निःसंदेह वह उसी समय मुक्त होता है और शरीर

६८ : शिवसूत्र विमर्श
को केवल यन्त्रवत् धारण करता है। फिर तो ऐसे सुबुद्धि का कहना ही क्या है जो
परब्रह्म स्वरूप में अनन्यवृत्ति हो ! ऐसा योगी क्षणमात्र के लिए ही स्वरूप में ठहरे तो
वह मुक्त होता है और सारी प्रजा को मुक्त करता है १ ॥४२॥
सम्बन्ध — अब प्रश्न है कि इस परमयोगी का 'भूतकञ्चुक' (शरीररूपी आवरण)
भी स्वरूपलाभ के अवसर पर ही क्यों नहीं हट जाता है ? इसके उत्तर में कहते हैं।
नैसर्गिकः प्राणसम्बन्धः ॥४३॥
(अस्य) — (इस महायोगी जीवन्मुक्त के शरीर में)
प्राणसम्बन्धः — प्राणों का सम्बन्ध (श्वास और उच्छ्वास का प्रवहन)
नैसर्गिकः — परमेश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति का स्वभाव ही है।
व्याख्या — 'संवित् भगवती ने विश्ववैचित्र्य का अवभासन करने की इच्छा से पहले
प्राण को निमित्त बनाया' — श्री भट्टकल्लट ने 'तत्त्वार्थ चिन्तामणि' ग्रन्थ में यह बात
युक्तियुक्त कही है (प्राक् संवित् प्राणे परिणता) । अपने सहज स्वातन्त्र्य से संवित्
देवी ने प्रपंच की विचित्रता को प्रकट करने की इच्छा से संकोच ग्रहण किया। शिव-
दशा से विसर्ग रूप में आकर सृष्टि, स्थिति तथा संहार रूप इस जीव दशा का ग्रहण
किया। इस प्रकार सारे विश्व में प्राणन-शक्ति को ग्रहण कर ग्राह्यरूप जगत् में यह
भासमान होने लगी। अपनी स्वतन्त्रता में यह प्रथम अवभासन संवित्-देवी का प्राण-
स्पन्द है। जैसे 'वाजसनेया' ग्रन्थ में कहा है :
या सा शक्तिः परा सूक्ष्मा व्यापिनी निर्मला शिवा ।
शक्तिचक्रस्य जननी परानन्दामृतात्मिका ॥
महाघोरेश्वरी चण्डा सृष्टिसंहारकारिका ।
त्रिवहं त्रिविधं त्रिस्थं बलात्कालं प्रकर्षति ॥
१. वेदान्त सिद्धान्त मुक्तावली में कुछ यही विचार मिलते हैं :
स्नातं तेन समस्ततीर्थसलिले दत्ता च सर्वावनि-
र्यज्ञानां च .कृतं सहस्रमखिलाः देवाश्च संतर्पिताः ।
संसाराच्च समुद्धृताः स्वपितरः त्रैलोक्यपूज्योऽप्यसौ
यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि स्थैर्यं मनः प्राप्नुयात् ॥
अर्थ — जिस किसी साधक का मन एक क्षणमात्र भी परब्रह्म के विमर्श में
स्थिरता प्राप्त करे उसने (वस्तुतः) समस्त पुण्य तीर्थों का स्नान किया, सब पृथ्वी
को दान में दिया, हज़ारों यज्ञों के कर्म का फल प्राप्त किया, सब देवताओं को तृप्त
किया और अपने पितरों को भवपाश से उद्धार किया। ऐसा साधक सब जगत् का
पूजनीय है।

तृतीय विकास : ६९
अर्थ—कल्याणस्वरूपा, निर्मल, व्यापक अत्यन्तसूक्ष्म पराशक्ति रूप संवित्-देवी
शक्तिचक्र¹ को जन्म देती है । यह देवी प्राणों में परिणत जीवन-शक्ति है और तीन
छायाओं में सर्वत्र ईशन करती है—
[क] १. अघोरा—परानन्द अमृत स्वरूपा
२. घोरा—अन्तर्मुख आनन्द स्वरूपा
३. घोरतरी—बहिर्मुख संसार रूपा —महाघोरेश्वरी
[ख] अपने स्वरूप को छिपाने की चातुर्य-शक्ति —चण्डा
[ग] त्रुटि आदि शक्तिरूप काल का परिमाण करने वाली कालकर्षिणी, जो सृष्टि,
स्थिति और संहार रूप से काल का कर्षण करती है । —सृष्टिसंहारकारिणी
परा-शक्ति इडा, पिगला और सुषुम्णा मार्गों में वहन करने से 'त्रिवह', सोम, सूर्य
और अग्नि रूप होने से 'त्रिविध' तथा अतीत, वर्तमान और अनागत में स्थित होने से
'त्रिस्थ' कहलाती है ।
प्राण सम्बन्ध की अवधि तक ही शरीर रूप कञ्चुक भी ठहरता है, परन्तु संवित्-
स्वरूप में ठहरे परमयोगी के श्वास-उच्छ्वास स्वभाव से ही इस ज्ञान-क्रिया रूप विश्व
में संविन्मय होते हैं । प्राणों के साहचर्य से मितप्रमाता (जीव) कर्मों का पाश बनाता
है और फिर उसके अधीन होता है। पहले किये हुए संचित और मिश्र कर्मों से
प्रारब्ध-कर्म और उनके भोगने के लिए घर अर्थात् शरीर उत्पन्न होता है । प्रारब्ध
कर्मों का उनके भोगने से ही क्षय होता है अन्यथा नहीं । इसलिए इस तत्त्ववित् योगी
का शरीर प्रारब्ध के अनुसार ही ऐसे ठहरता है जैसे चक्र को घुमा कर उसके अन्तिम
कुछ घुमाव स्वयं ही कुछ देर तक देखने में आते हैं । स्वयं तो वह कर्म-पाश से मुक्त
स्वरूपसंविन्मय ही रहता है । वह देह पर दृष्टि कभी नहीं डालता है । श्रीमद् भागवत
में इस सिद्धयोगी की अवस्था का वर्णन इस श्लोक में है :
देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा
सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत् स्वरूपम् ।
दैवादपेतमुत दैववशादुपेतं
वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥
(एकादशस्कन्द-१३-३६)
१. शक्तिचक्र में संवित्-देवी की शक्तियों के विकास का क्रम यों है :—
(क) खेचरी—अन्तःकरण के शक्तिचक्र का विकास
(ख) गोचरी—ज्ञानेन्द्रियों के शक्तिचक्र का विकास
(ग) दिग्धरी—कर्मेन्द्रियों के शक्तिचक्र का विकास
(घ) भूचरी—पंचमहाभूतों के शक्तिचक्र का विकास

७० : शिवसूत्र विमर्श
अर्थ—जैसे मदिरा पीकर उन्मत्त पुरुष यह नहीं देखता कि मेरे द्वारा पहना वस्त्र
शरीर पर है या गिर गया वैसे ही सिद्ध पुरुष जिस शरोर से उसने अपने स्वरूप का
साक्षात्कार किया है वह प्रारब्ध-वश खड़ा है, बैठा है या दैववश कहीं गया है या आया
है—नश्वर शरीर सम्बन्धी इन बातों पर दृष्टि नहीं डालता।
अतः स्वरूप लाभ बनकर योगी का प्राणों से जो सम्बन्ध रहता है वह नैसर्गिक
अर्थात् संवित्-स्वभाव वाला ही होता है ॥४३॥
सम्बन्ध—प्राणन-रूप ग्राहक भूमिका में स्थित यह स्वरूपविमर्श वाला योगी
अलौकिक होता है—अब यह कहते हैं।
नासिकान्तर्मध्यसंयमात् किमत्र सव्यापसव्य सौषुम्नेषु ॥४४॥
नासिका—कुटिल रूप से वहन करने वाली प्राणशक्ति (की)
अन्तः—आन्तरी संवित् (के)
मध्य—(अन्तरतम) मध्यधाम में
संयमात्—विमर्श (बार-बार अनुसन्धान) करने की अपेक्षा
किमत्र—और अधिक क्या है (जो)
सव्य—इड़ा नाड़ी
अपसव्य—पिंगला नाड़ी
सौषुम्नेषु—(और) सुषुम्ना नाड़ी में (अभ्यास करने से प्राप्त हो सकता
है।)
व्याख्या—नेत्र आदि के रोमरन्ध्रों के अन्त तक सब नाड़ीचक्र¹ में प्रधान इड़ा,
पिंगला और सुषुम्ना में जो कुटिलवाहिनी प्राणशक्ति है उसकी आन्तरी संवित् के अन्त-
र्गत मध्यधाम में बार-बार अनुसन्धान करने से परमयोगी स्वात्म-संविन्मय बन जाता
है। ऐसे महायोगी के विषय में 'श्रीकालिकाक्रम' में कहा है :
तस्य देवादिदेवस्य परबोधस्वरूपिणः ।
विमर्शः परमाशक्तिः सर्वज्ञानशालिनी ॥
अर्थ—परबोधमय उस देवों के देव की विमर्शमयता, सर्वज्ञता के ज्ञान से
शोभायमान परमशक्ति है।
ऐसी विमर्शमय दशा में इड़ा (प्राण), पिंगला (अपान) और सुषुम्ना (मध्यनाड़ी)
में अभ्यास करने से ऐसे योगी को क्या लाभ हो सकता है। उसे आन्तर और बाह्य
अभ्यास फिर नहीं करने पड़ते। वह अन्तर्मुख और बहिर्मुख भावों की सब दशाओं में
१. नाडीचक्र में नाडियों की संख्या ७२००० बताई गई है।

तृतीय विकास : ७१
स्वरूप-विमर्शमान रहता है। यही उसकी निर्व्युत्थान समाधि है जिसे पर-समाधि भी
कहते हैं। सामान्य जीवों की अपेक्षा योगी की विशेषता 'विज्ञानभैरव' में कही है :
ग्राह्यग्राहकसंविन्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् ।
योगिनां तु विशेषोऽयं सम्बन्धे सावधानता ॥
अर्थ—सदाशिव से कीट तक सब देहधारियों में प्रमाता-प्रमेय भाव सामान्य है परन्तु
योगी में विशेषता है कि वह इनकी सन्धि में सावधान रहता है—वह परप्रमातृभाव में
स्थिति रखता है।
सार यह है कि सिद्ध योगी के लिए ध्यान, धारणा और समाधि की कोई आवश्य-
कता नहीं है। वह इन तीनों में प्रधान अन्तरतम मध्यधाम में संविन्निष्ठ होता१ है।
वह व्युत्थान दशा में भी समाधि-दशा की तरह स्वरूप में समाहित रहता है। यही
उसकी निर्व्युत्थान समाधि है ॥४२॥
सम्बन्ध—अब इस परमयोगी के योग का फल बताते हुए इस प्रकरण का उपसंहार
करते हैं।
भूयः स्यात्प्रतिमीलनम् ॥४५॥
भूयः—फिर (इस शिवयोगी की)
प्रतिमीलनम्—अन्तर्मुख रूप निमीलन और बहिर्मुख रूप उन्मीलन अथवा
दोनों में स्थिति
स्यात्—निरन्तर होती है।
व्याख्या—अब यह शिवयोगी चेतनता का ही स्वरूप है (चैतन्यमात्मा—१-१)।
उसे स्वरूप में सदा सावधान रहने से ज्ञानरूप क्रिया में स्वातन्त्र्य है। चैतन्य आत्मा के
स्वरूप से उदित विश्व के भेद-संस्कार के विगलन से इस परमयोगी का चैतन्य से ही
निमीलन और चैतन्य से ही उन्मीलन होता है। इसे प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में 'क्रम-मुद्रा'
कहते हैं। योगी को अब संसारभाव कोई बाधा नहीं करता। समना से पर यही उन्मना
दशा है। स्वच्छन्द तन्त्र में कहा है :
उद्बोधितो यथा वह्निर्निर्मलोऽतीव भास्वरः ।
न भूयः प्रविशेत्काष्ठे तथात्माध्वन उद्धृतः ॥
मलकर्मकलाद्यैस्तु निर्मलो विगतक्लमः ।
तत्रस्थोऽपि न बाध्यते यतोऽतीव सुनिर्मलः ॥
१. 'त्रयमेकत्र संयमः'—तीनों एक ही में स्थित हैं।
—(योगसूत्र : विभूतिपाद ४)

सूत्र में 'भूयः स्यात्' का यह भी आशय है कि योगी का शिवत्व कुछ नया नहीं

७२ : शिवसूत्र विमर्श
अर्थ—जैसे अग्नि अत्यन्त प्रज्ज्वलित होकर बहुत ही निर्मल दीप्तिमय बनकर फिर
उस काष्ठ में (जो जला होता है) प्रवेश नहीं करती, वैसे ही योगी संसार के छः अध्वा से
उठा होता है । वह मल, कर्म और छः कञ्चुकों से निर्मल होकर लेपरहित होता है ।
अत्यन्त निर्मल (पवित्रतम) चैतन्यरूप होने से वह शरीर आदि में प्रारब्ध के समाप्त
होने तक ठहरा हुआ भी कर्मादि से बाधित नहीं होता ।
सूत्र में 'भूयः स्यात्' का यह भी आशय है कि योगी का शिवत्व कुछ नया नहीं
है जिसका पहले अभाव था। शिवता तो आत्मा का स्वभाव ही है (चैतन्यमात्मा—१-१)।
अतः वह केवल मायाशक्ति से उत्पन्न अपने विकल्प के दुर्भाव से भासमान शिवता
का विमर्श भी नहीं करता । वह स्वरूप-साक्षात्मय होता है । जगदानन्द दशा में वह
जीवन्मुक्त है ॥४५॥
इस प्रकार शिवसूत्र का आणवोपाय
प्रकाशन नामक तीसरा विकास
समाप्त हुआ
शुभं भवतु सर्वेषाम्
शिवसूत्रसार
मोहशान्तौ सकलकलना शान्तिमेति चिराय
पूर्णा संवित् स्वरसरसिका स्वानुभूत्यैव सम्यक् ।
शैवं धाम भजति सहसा निर्वृ ताऽनन्तवृत्त्या
यस्मात् स्पृष्ट्वा स्वतनग्विभवं धामगर्भं तनोति ॥
अविद्यारूप माया-मोह के शमन होने पर विज्ञानाकल प्रमाता की अवस्था में
अन्तर्मुख और बहिर्मुख होने की कल्पनाएँ सदा के लिए एक-सी बन कर शान्त
होती हैं ।
संवित्-देवी अन्तः और बाह्य अपने ही स्वाभाविक अनुभवों में चिदानन्द-रस का
आस्वादन करती है—शुद्धविद्या से शिवतत्त्व तक शिव की पाँच विभूतियों में पूर्णरूप से
आह्लादमय रहती है ।
वह अनन्यवृत्ति से नित्य-निरन्तर स्वरूपविमर्श-पूर्ण दशा में, शिव के शक्तिपात से,
क्षणमात्रसंभव पर-शिवधाम को भजती है जिसके स्पर्शमात्र से अपने ही अन्तरतम
स्वरूप की विभूति को विश्वरूपता में प्रकट करती है ।
अतः आत्मा का स्वरूप ज्ञानरूप क्रिया में स्वातन्त्र्य है—चैत्यमात्मा ॥
इति शिवम्

परिशिष्ट (क)
शिवसूत्रों का अकारादिक्रम
वि० सू० सं० पृ०
१. अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य ३ ४० ६५
२. अविवेको मायासौषुप्तम् १ १० ६
३. आत्मा चित्तम् ३ १ २४
४. आसनस्थः सुखं हृदे निमज्जति ३ १६ ३८
५. इच्छा शक्तिरुमा कुमारी १ १३ ८
६. उद्यमो भैरवः १ ५ ३
७. कथा जपः ३ २७ ४९
८. करणशक्तिः स्वतोऽननुवात् ३ ३७ ५८
९. कलादीनां तत्त्वानामाविवेको माया ३ ३ २५
१०. कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः ३ १९ ४०
११. गर्भे चित्तविकासाऽविशिष्टविद्यास्वप्नः २ ४ १७
१२. गुरुरुपायः २ ६ २०
१३. चित्तं मन्त्रः २ १ १४
१४. चित्तस्थितिवच्छरीकरणबाह्येषु ३ ३९ ६३
१५. चैतन्यमात्मा १ १. १
१६. जाग्रत्स्वप्न-सुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः १ ७ ५
१७. जाग्रत् द्वितीयकरः ३ ८ ३४
१८. ज्ञानं जाग्रत् १ ८ ६
१९. ज्ञानमन्नम् २ ९ २२
२०. ज्ञानं बन्धः १ २ २
२१. ज्ञानं बन्धः ३ २ २५
२२. ज्ञानाधिष्ठानं मातृका १ ४ ३
२३. तत्प्रवृत्तावपि अनिरासः संवेत्तृभावात् ३ ३२ ५३
२४. तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसंक्षयः ३ ४१ ६६
२५. तद्विमुक्तस्तु केवली ३ ३४ ५६
२६. त्रितयभोक्ता वीरेशः १ ११ ७

  • ७४ -
    वि० सू० सं० पृ०
    २७. त्रिपदाद्यनुप्राणनम् २ ३८ ५९
    २८. त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम् ३ २० ४०
    २९. दानमात्मज्ञानम् ३ २८ ५०
    ३०. दृश्यं शरीरम् १ १४ ८
    ३१. धीवशात् सहैव सिद्धिः ३ १२ ३६
    ३२. नर्तक आत्मा ३ ९ ३४
    ३३. नाडीसंहार-भूतजय-भूतकैवल्य-भूतपृथक्त्वानि ३ ५ २९
    ३४. नासिकान्तर्मध्यसंयमात् किमत्र सव्यापसव्यसौषुम्नेषु ३ ४४ ७०
    ३५. नैसर्गिकः प्राणसंबन्धः ३ ४३ ६८
    ३६. प्रयत्नः साधकः २ २ १४
    ३७. प्राणसमाचारे समदर्शनम् ३ २२ ४३
    ३८. प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि ३ ११ ३५
    ३९. बीजावधानम् ३ १५ ३७
    ४०. भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः ३ ४२ ६७
    ४१. भूतसंधान-भूतपृथक्त्व-विश्वसंघट्टाः १ २० १२
    ४२. भूयः स्यात् प्रतिमीलनम् ३ ४५ ७१
    ४३. भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् ३ ३६ ५७
    ४४. मग्नः स्वचित्तेन प्रविशेत् ३ २१ ४१
    ४५. मध्येऽवरप्रसवः ३ २३ ४३
    ४६. महाह्रदानुसंधानान्मन्त्रवीर्यानुभवः १ २२ १३
    ४७. मातृकाचक्रसंबोधः २ ७ २०
    ४८. मात्रास्वरूप्रत्यसंधाने नष्टस्य पुनरुत्थानम् ३ २४ ४४
    ४९. मोहजयादनन्ताभोगात् सहजविद्याजयः ३ ७ ३३
    ५०. मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा ३ ३५ ५६
    ५१. मोहावरणात् सिद्धिः ३ ६ ३१
    ५२. यथा तत्र तथान्यत्र ३ १४ ३७
    ५३. योनिवर्गः कलाशरीरम् १ ३ ३
    ५४. योऽविपस्थो ज्ञाहेतुश्च ३ २९ ५०
    ५५. रङ्गोऽन्तरात्मा ३ १० ३५
    ५६. लोकानन्दः समाधिसुखम् १ १८ ११
    ५७. वितर्क आत्मज्ञानम् १ १७ ११
    ५८. विद्याविनाशे जन्मविनाशः ३ १८ ३९
    ५९. विद्याशरीरसत्ता मन्त्ररहस्यम् २ ३ १५
  • ७५ -
    वि० सू० सं० पृ०
    ६०. विद्यासंहारे तदुत्थस्वप्नदर्शनम् २ १० २३
    ६१. विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था २ ५ १८
    ६२. विस्मयो योगभूमिकाः १ १२ ७
    ६३. शक्तिचक्रसंधाने विश्वसंहारः १ ६ ५
    ६४. शक्तिसंधाने शरीरोत्पत्तिः १ १९ ११
    ६५. शरीरं हविः २ ८ २१
    ६६. शरीरवृत्तिर्व्रतम् ३ २६ ४७
    ६७. शरीरे संहारः कलानाम् ३ ४ २७
    ६८. शिवतुल्यो जायते ३ २५ ४६
    ६९. शुद्धतत्त्वसंधानाद्वाऽपशुशक्तिः १ १६ १०
    ७०. शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः १ २१ १३
    ७१. सिद्धः स्वतन्त्रभावः ३ १३ ३६
    ७२. सुखासुखयोर्बहिर्मननम् ३ ३३ ५४
    ७३. स्थितिलयौ ३ ३१ ५२
    ७४. स्वमात्रानिर्माणमापादयति ३ १७ ३९
    ७५. स्वप्नो विकल्पाः १ ९ ६
    ७६. स्वशक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम् ३ ३० ५१
    ७७. हृदये चित्तसंघट्टाद् दृश्यस्वापदर्शनम् १ १५ ९
    परिशिष्ट (ख)
    शिवसूत्र विमर्श में प्रामाणिक ग्रन्थों से उद्धृत प्रमाणों का यथाक्रम संचय।
    १. अष्टावक्रगीता
    पृष्ठ
    अनिच्छन्नपि धीरो हि (प्र० १८ श्लो० ३७) ४
    निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं (प्र० १ श्लो० १६) १०
    निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा (प्र० १८ श्लो० ४६, ४७) ३८, ५५
    निर्वासनो निरालम्बः (प्र० १८ श्लो० २१) ५५
    मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म (प्र० १८ श्लो० ३७) ४
    २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा
    अत एव यथाभीष्ट० (अ० १, आ० ६, का० ११) ५८
    ३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी (टीका—अभिनवगुप्तपाद)
    संसारनाट्यप्रवर्त्तयिता सुप्ते जगति० ३४
  • ७६ -
    पृष्ठ
    ४. एकादश स्कन्ध श्रीमद्भागवत
    देहं च नश्वरमवस्थित० (अ० १३, श्लो० ३६) ६९
    ५. कालिकाक्रम
    अतथ्यां कल्पनां कृत्वा० ६५
    तस्मान्नित्यमसंदिग्धं ०
    तस्य देवादिदेवस्य० ७०
    नाशेऽविद्याप्रपंचस्य० ५३
    मायामयैः सदा भावैः० ६५
    यथास्वप्नानुभूतार्था० ६६
    सर्वशुद्धं निरालम्बम् ५३
    सुखदुःखादिविज्ञान० ५६
    ६. कुलरत्नमाला
    यदा गुरुवरः सम्यक्० ६७
    ७. कठोपनिषद्
    कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत्० (२-१-११) ३५
    ८. कैवल्योपनिषद्
    त्रिषु धामसु यद्भोग्यं० (खं० १ मन्त्र १८) ७
    ९. ज्ञानगर्भस्तोत्र
    विहाय सकला क्रिया० ४२
    १०. तत्त्वार्थचिन्तामणि
    प्राक् संवित्प्रमाणे परिणता० ६८
    ११. तन्त्रालोक (अभिनवगुप्तपाद)
    यत्र कोऽपि व्यवच्छेदो नास्ति० (आह्नि० ५ श्लो०५०-५१) १९
    १२. त्रिकसार
    देहोत्थिताभिर्मुद्राभिः० ४८
    १३. त्रिकहृदय
    स्वपदास्वशिरश्छाया० २
    १४. नेत्र तन्त्र (मृत्युजिद्भट्टारक कथित)
    प्राणादिस्थूलभावं तु० (अ० ८, श्लो० १२) ४१
    प्रविशेतत्स्वचेतसा० (अ० ८, श्लो० २४) ४२
  • ७७ -
    पृष्ठ
    मध्यमं प्राणमाश्रित्य० (अ० ८, श्लो० ११-१८) ३१
    मध्यमं प्राणमाश्रित्य० (अ० ८, श्लो० ११) ३८
    १५. पातञ्जल योगसूत्र
    ततः पुनः शान्तोदितौ (वि० पा० सू० १२) ६४
    ते समाधावुपसर्गा (वि० पा० सू० ३७) १८
    त्रयमेकत्र संयमः (वि० पा० सू० ४) ७१
    १६. प्रबोधसुधाकर (आद्यशंकराचार्यरचित)
    यद्भावानुभवः स्यान्निद्राद्रौ० (श्लो० १६०) १५, ५९
    १७. बृहदारण्यकोपनिषद्
    पूर्णमदः पूर्णमिदं० (५-१-१) ६४
    १८. भगवद्गीता
    तस्मात्सर्वेषु कालेषु० (अ० ८ श्लो० ७) ३९
    बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो० (अ० १८ श्लो० ५१-५३) २१
    १९. भर्गशिखा
    मृत्युं च कालं त० २२
    २०. मालिनीविजयोत्तरतन्त्र
    अकिञ्चिच्चिन्तकस्यैव (अ० २ श्लो० २३) १
    उच्चाररहितं वस्तु (अ० २ श्लो० २२) १४
    उच्चारकरणध्यान (अ० २ श्लो० २१) २९
    वासनामात्राभेऽपि ४४
    २१. योगबीज
    सकारेण बहिर्याति हकारेण० ४९
    २२. योग वाशिष्ठ
    यो जागर्ति सुषुप्तिस्थो० (उत्प० प्र० स० ९ श्लो० ७) ५२
    यैव चित् गगनाभोगे० (स्थि० प्र० स० ६१ श्लो० १६) ५८
    व्यस्तेन च समस्तेन० (नि० प्र० पू० स० १२८ श्लो० १६) २८
    शान्तसंसारकलना० (उत्प० प्र० स० ९ श्लो० १२) ५२
    समाधिमथकर्माणि० (स्थि० प्र० स० ५७ श्लो० २६) १०
  • ७८ -
    पृष्ठ
    २३. योगवासिष्ठ-सार (पं० केशवभट्ट ज्योतिषी)
    निद्रादौ जागरस्यान्ते० (प्र० १० श्लो० ११) ५९
    २४. रामगोता (अध्यात्मरामायणान्तर्गत)
    यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं (श्लो० ५८) ४
    २५. वाजसनेया
    या सा शक्तिः परा सूक्ष्म० ६७
    २६. विज्ञान भैरव
    आनन्दे महति प्राप्ते० (श्लो० ७१) ६१
    अन्तः स्वानुभवानन्दा० (श्लो० १५) ६२
    कालाग्निना कालपदादुत्थितेन० (श्लो० ५२) २८
    गीतादिविषयास्वादा० (श्लो० ७३) ६०
    ज्ञानप्रकाशकं सर्वं० (श्लो० १३७) ३७
    ग्राह्यग्राहकसं वित्ति सामान्या० (श्लो० १०६) ७१
    जग्धिपानकृतोल्लास० (श्लो० ७२) ६१
    भुवनाध्वादिरूपेण० (श्लो० ५६) २८
    भूयोभूयः परे भावे० (श्लो० १४५) ४९
    मानसं चेतनाशक्तिरात्मा० (श्लो० १३८) ४२
    यत्र यत्राक्षमार्गेण० (श्लो० ११७) ३४
    लेहनामन्थनाकोटैः० (श्लो० ७०) ६०
    शक्तिसंगमसंक्षुब्ध० (श्लो० ६९) ६०
    षट्शतानि दिवारात्रौ० (श्ल० १५६) ४९
    सर्वं जगत् स्वदेहं वा० (श्लो० ६५) ६४
    २७. विवेक चूडामणि (शंकरभगवत्पादकृत)
    उपाधिसम्बन्धवशात्परात्मा० (श्लो० १९३) ४७
    संसिद्धस्य फलं त्वेतत्० (श्लो० ४१९) ४८
    २८. वेदान्त सिद्धान्तमुक्तावली
    स्नातं तेन समस्ततीर्थसलिले० (श्लो० ९२) ६८
    २९. शतश्लोकी (शंकरभगवत्पाद)
    आदौ ब्रह्माहमस्मीत्यनुभव० (श्लो० ३) ६१
  • ७९ -
    पृष्ठ
    ३०. शिवमहिम्नस्तुति (श्रीपुष्पदन्तप्रणीत)
    नृणामेको गम्यः ० (श्लो० ७) ४
    ३१. शिवस्तोत्रावली (उत्पलदेवकृत)
    अन्तरप्यतितरामणीयसी० (स्तोत्र १३ श्लो० २) ६२
    अन्तरुल्लसदच्छाच्छ० (स्तोत्र १७ श्लो० २६) ४८
    त्वद्विलोकनसमुत्कचेतसो० (स्त्रोत्र १२ श्लो० ६) १९
    यद्यदा'स्थितपदार्थदर्शनं० (स्तोत्र १३ श्लो० ७) ४८
    ३२. शिवसूत्र (वसुगुप्तकृत)
    आत्मा चित्तं (वि० ३ सू० १) २५
    उद्यमो भैरवः (वि० १ सू० ५) ५
    कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः० (वि० ३ सू० १९)
    ज्ञानाधिष्ठानं मातृका (वि० १ सू० ४) ४०
    चित्तं मन्त्रः (वि० २ सू० १) २५
    चैतन्यमात्मा (वि० १ सू० १) ७१
    जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु (वि० १ सू० ७) ४१
    त्रितयभोक्ता वीरेशः (वि० १ सू० ११) ४१
    त्रिषु चतुर्थं तैलवत् आसेच्यम् (वि० ३ सू० २०) ५९
    दानमात्मज्ञानं (वि० ३ सू० २८)
    भूतसंधानभूतपृथक्त्वं (वि० १ सू० २०) ३०
    विद्यासंहारे तदुत्थ० (वि० २ सू० १०) .
    शरीरवृत्तिवृत्तम् (वि० ३ सू० २६) ६७
    ३३. शिवसूत्रवार्त्तिक (भट्टभास्करविरचित)
    चैतन्यमात्मनो रूपं (१६।१।१) १
    ३४. सर्वमङ्गलातन्त्र
    शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव० ३४
    ३५. स्पन्दकारिका (भट्टकल्लट)
    अवस्थायुगलं चात्र० (सू० १४) ५३
    कार्योन्मुखः प्रयत्नोऽयं० (सू० १५, १६) ५४
    तेन शब्दार्थचिन्तासु० (सू० १९) २
    न दुःखं न सुखं यत्र० (सू० ५) ५५
    प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत् ० (सू० ३८) २२
  • ८० -
    पृष्ठ
    भोक्तैव भोग्यभावेन० (सू० २९) ५४
    यदा क्षोभः प्रलीयेत० (सू० ९) २१
    ३५. स्वच्छन्द तन्त्र
    अहमेवपरो हंसः ४९
    उद्बोधितो यथा वह्निः० (१० प० ३७१ श्लो०) ७१
    त्रिगुणेन तु जप्तेन० (६ प० ५४ श्लो०) ५७
    पाशावलोकनं त्यक्त्वा० (४ प० ४३४ श्लो०) ३३
    यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव० (४ प० ३१३ श्लो०) ४५
    यस्य ज्ञेयमयो भावः० (४ पू० ३१२ श्लो०) ४५
    विषयेषु च सर्वेषु इन्द्रियार्थेषु० (४ प० ३१४ श्लो०) ४५
    समनान्तं वरारोहे० (४ प० ४३२ श्लो०) ३३
    सर्वतत्वानि भूतानि० (७ प० २४५ श्लो०) ३६
    सुप्रदीप्ते यथा वह्नौ० (४ प० ३९८ श्लो०) ४७
    ३७. श्रीमत् स्वामी लक्ष्मण जू
    There is a point twixt sleep and waking. ६३
    ३८. श्रुति वाक्य
    तत्सृष्ट्वा तस्मिन्नेव प्राविशत् ५४
    न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति० (छां० उ० ४-४-६) २५
    प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः ४६
    शरवत्संहितो भवेत् १९
    सर्वमिदमहं च ब्रह्मैव
    ३९. विविध
    अज्ञानैकघनो नित्यं० ५६
    अयं रसो येन मनागवाप्तः०
    तावद्वै ब्रह्मवेगेन न० ४
    दर्शनात्स्पर्शनाद्वापि०
    ....न तु ऋजुत्वं शुष्कवृक्षवत् ० ३८
    यत्र यत्र मिलिता मरीचयः० ३५
    यैवचित् गगनाभोगे ५८
    शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं ५१
    सुखे दुःखे विमोहे च स्थितः० ८

सूत्र के अनुसार

शिवसूत्र-विमर्श
शुद्धि-अशुद्धि पत्र
पृष्ठ पंक्ति शब्द शुद्ध अशुद्ध
७ १४ ६ठा कैवल्योपनिषद् कठोपनिषद्
८ २९ ३रा होकर हाकर
१० १९ १ला देहादि देहाहि
१५ ३ ३रा वह बह
१८ ३३ १ला विद्यासमुत्थान वद्यासमुत्थान
१९ ९ ३रा (१२-६) (२२-६)
१९ १४ ८वां अनुकरण अनुसरण
२० २१ ८वां " .,
२१ २१ ३रा १८ २८
२१ २२ ६ठा निर्मुक्त विमुक्त
२७ ३० ७वां युक्तियों व्यक्तियों
२८ ५ १३वां शक्ति व्यक्ति
२८ १५ ४था योगी योगो
२८ १९ ५वां १२८ २२८
२८ १९ ७वां १६-१९ २६-२९
२९ ४ ४था पंच प्रवाहों पंच
३३ २० ३रा हेतुरूपिणी सेतुरूपिणी
३७ २६ ४था विभाव्यते विभाज्यते
४१ ९ १३वां द्वार द्वारा
४४ ५ १५वां 'विद्यासंहारे तदुत्थ- उसे... तुर्यावस्था
स्वप्नदर्शनम्' (२-
१०)—शुद्ध विद्या के
लोप होने पर उस से
उत्पन्न भेदमय प्रपञ्च
में डूबता है—इस
सूत्र के अनुसार

  • ८२ -
    पृष्ठ पंक्ति शब्द शुद्ध अशुद्ध
    ४६ ४ ७वां भली भला
    ५१ ४ ७वां समर्थ) (समर्थ)
    ५७ २६ ६ठा गुणता का गुणता
    ६० २६ ६ठा को का
    ६० २८ १ला लेहनामन्थनाकोटैः लेहनामन्थनाकोटौ
    ६० २९ १ला शक्त्याभावेऽपि शक्ताभावेऽपि
    ६२ १३ ९वां मल— मल-
    ६२ १५ १ला हटने हटाने
    ६२ २१ २रा × आप
    ६२ २१ ५वां आप चित्स्वरूप चित्स्वरूप
    ६३ (नोट १.)४ ९वां hideous hidepus
    ६३ ( ,, )६ ८वां throttle toeerate
    ६३ ( ,, )७ Missing All those shalt. —
    thou toierate
    ६५ ३० ९वां × जैसे
    ६७ १ ७वां सद्गुरु सद्गुण
    ६८ (नोट १)४ ३रा स्वपितराः स्वपितरः
    ७१ नोट १ के साथ यह प्रमाण श्लोक जोड़ लेना चाहिए—
    अयं रसो येन मनागवाप्तः स्वच्छन्दचेष्टानिरतस्य तस्य ।
    समाधियोगव्रतमन्त्रमुद्रा जपादिचर्या विषवद्विभाति ॥
    अर्थ—वह परम-शिव भाव में रस-रत्ता मगन-मत्ता रहता है । इस निरपेक्ष
    भाव में अब चिन्तन के लिए बैठना, नौरात्रादिव्रत, नियन्त्रणार्थ मुद्राएँ तथा
    प्रार्थनादि उसे विष जैसे लगते हैं।
    ७२ ३० १०वां चैतन्यमात्मा चैत्यमात्मा
    ७३ ११ सूत्र ८ स्वतोऽनुभवात् स्वतोऽनुवात्
    ७३ १७ सूत्र १४ चित्तस्थितिवच्छरीर चित्तस्थितिवच्छरो
    ७४ ६ सूत्र ३१ सत्त्व-सिद्धिः सहैव-सिद्धिः
    ७४ २३ सूत्र ४८ मात्रस्वप्रत्ययसंधाने मात्रास्वरूपप्रत्यसंधाने
    ७६ ४१ १ला प्रविशेत्तत्स्वचेतसा प्रविशोत्तत्स्वचेतसा

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