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सर्वकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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तृतीय विकास : ७१
स्वरूप-विमर्शमान रहता है। यही उसकी निर्व्युत्थान समाधि है जिसे पर-समाधि भी
कहते हैं। सामान्य जीवों की अपेक्षा योगी की विशेषता 'विज्ञानभैरव' में कही है :
ग्राह्यग्राहकसंविन्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् ।
योगिनां तु विशेषोऽयं सम्बन्धे सावधानता ॥
अर्थ—सदाशिव से कीट तक सब देहधारियों में प्रमाता-प्रमेय भाव सामान्य है परन्तु
योगी में विशेषता है कि वह इनकी सन्धि में सावधान रहता है—वह परप्रमातृभाव में
स्थिति रखता है।
सार यह है कि सिद्ध योगी के लिए ध्यान, धारणा और समाधि की कोई आवश्य-
कता नहीं है। वह इन तीनों में प्रधान अन्तरतम मध्यधाम में संविन्निष्ठ होता१ है।
वह व्युत्थान दशा में भी समाधि-दशा की तरह स्वरूप में समाहित रहता है। यही
उसकी निर्व्युत्थान समाधि है ॥४२॥
सम्बन्ध—अब इस परमयोगी के योग का फल बताते हुए इस प्रकरण का उपसंहार
करते हैं।
भूयः स्यात्प्रतिमीलनम् ॥४५॥
भूयः—फिर (इस शिवयोगी की)
प्रतिमीलनम्—अन्तर्मुख रूप निमीलन और बहिर्मुख रूप उन्मीलन अथवा
दोनों में स्थिति
स्यात्—निरन्तर होती है।
व्याख्या—अब यह शिवयोगी चेतनता का ही स्वरूप है (चैतन्यमात्मा—१-१)।
उसे स्वरूप में सदा सावधान रहने से ज्ञानरूप क्रिया में स्वातन्त्र्य है। चैतन्य आत्मा के
स्वरूप से उदित विश्व के भेद-संस्कार के विगलन से इस परमयोगी का चैतन्य से ही
निमीलन और चैतन्य से ही उन्मीलन होता है। इसे प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में 'क्रम-मुद्रा'
कहते हैं। योगी को अब संसारभाव कोई बाधा नहीं करता। समना से पर यही उन्मना
दशा है। स्वच्छन्द तन्त्र में कहा है :
उद्बोधितो यथा वह्निर्निर्मलोऽतीव भास्वरः ।
न भूयः प्रविशेत्काष्ठे तथात्माध्वन उद्धृतः ॥
मलकर्मकलाद्यैस्तु निर्मलो विगतक्लमः ।
तत्रस्थोऽपि न बाध्यते यतोऽतीव सुनिर्मलः ॥
१. 'त्रयमेकत्र संयमः'—तीनों एक ही में स्थित हैं।
—(योगसूत्र : विभूतिपाद ४)