शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व मंगलाचरण
शिवसूत्र-विमर्श
कश्मीर शैवदर्शन के आद्य-आचार्य श्री वसुगुप्त के
शिवसूत्रों की नवीनतम हिन्दी व्याख्या
जानकीनाथ कौल 'कमल'
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शिवसूत्र-विमर्श
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श्री ईश्वरस्वरूप लक्ष्मण जू महाराज
आविर्भावदिवस महासमाधिदिवस
9-5-1907 27-9-1991
शिवसूत्र-विमर्श
कश्मीर शैवदर्शन के आद्य-आचार्य श्री वसुगुप्त के
शिवसूत्रों की नवीनतम हिन्दी व्याख्या
आशीर्वाद
शैवाचार्य श्रीस्वामी लक्ष्मणजू
व्याख्याकार
जानकीनाथ कौल 'कमल'
मोतीलाल बनारसीदास
दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, बंगलौर,
वाराणसी, पुणे, पटना
पुनर्मुद्रण : दिल्ली, २००२, २००५
प्रथम संस्करण : वाराणसी, १९८४
© मोतीलाल बनारसीदास
ISBN: 81-208-2769-4
मोतीलाल बनारसीदास
४१ यू०ए० बंगलो रोड, जवाहर नगर, दिल्ली ११० ००७
८ महालक्ष्मी चैम्बर, २२ भुलाभाई देसाई रोड, मुम्बई ४०० ०२६
२३६ नाइंथ मेन III ब्लाक, जयनगर, बंगलौर ५६० ०११
सनाज प्लाजा, १३०२ बाजीराव रोड, पुणे ४११ ००२
२०३ रायपेट्टा हाई रोड, मैलापुर, चेन्नई ६०० ००४
८ केमेक स्ट्रीट, कोलकाता ७०० ०१७
अशोक राजपथ, पटना ८०० ००४
चौक, वाराणसी २२१ ००१
नरेन्द्रप्रकाश जैन, मोतीलाल बनारसीदास, बंगलो रोड, दिल्ली ११० ००७
द्वारा प्रकाशित तथा जैनेन्द्रप्रकाश जैन, श्री जैनेन्द्र प्रेस,
ए-४५ नारायणा, फेज-१, नई दिल्ली ११० ०२८ द्वारा मुद्रित
आशीर्वाद के दो शब्द
प्राचीन शिवसूत्रों पर आज सम्भवतः प्रथम बार, जनता के हितार्थ, यह अनुपम
हिन्दी व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है । शिव सूत्रों की यह व्याख्या श्रीजानकीनाथ जी
कौल ने बड़े परिश्रम से की है । उन्होंने इन सूत्रों का तात्पर्यार्थ पहले मेरे से प्राप्त
किया था ।
काश्मीर का त्रिक-शास्त्र सम्प्रदाय चार शाखाओं में विभक्त हुआ है—१. प्रत्यभिज्ञा-
शाखा, २. कुल-शाखा, ३. स्पन्द-शाखा, और ४. क्रम-शाखा । शिव सूत्रों का रहस्यार्थ
त्रिकशास्त्र की स्पन्द-शाखा पर ही आधारित है, जिसका प्रादुर्भाव प्राचीन गुरु
श्रीवसुगुप्ताचार्य द्वारा हुआ । यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि स्पन्द-शाखा उपाय-
मण्डल के तीन उपायों में से शाक्तोपाय के सम्प्रदाय में ही निहित है । यद्यपि शिव-सूत्र
शाम्भवोपाय, शाक्तोपाय और आणवोपाय के आधार पर ही क्रम से तीन विकासों में
बांटे गये हैं तथापि साधकजन के उपयोग की सम्भावना शाक्तोपाय पर ही निर्भर है ।
कारण यह है कि शाम्भवोपाय केवल उच्च कोटि के साधक के लिए है जो अपने
शिवत्व का चिन्तन करते करत परम शिवभाव को प्राप्त करता है और आणवोपाय के
अनुसार भक्त साधना, अनुशासन तथा शास्त्रीयविधि द्वारा ही आत्मसाक्षात्कार की
ओर आगे बढ़ता है, जबकि शाक्तोपाय में साधक-भक्त अपनी आन्तरिक वृत्तियों का
मन्त्र-शक्ति द्वारा ही दमन करके समावेश का लाभ प्राप्त करता है जो सर्वसाधारण
साधक के लिए अन्य दो उपायों की अपेक्षा सुलभ है । अतः स्पन्द-शाखा शाक्तोपाय
के अन्तर्गत ही मानी गयी है । शास्त्र की आज्ञा है कि शाक्तोपाय से ही मन्त्र-नियोजन
होना चाहिए, यथा—
'न पुंसि न परे तत्त्वे शक्तौ मन्त्रं नियोजयेत् ।
पुंस्तत्त्वे जडतामेति परतत्त्वे तु निष्फलः ।।'
इस व्याख्या में शिवसूत्रों के अर्थ प्राचीन शैवाचार्यों के अनुभव के आधार पर
प्रस्तुत किये गये हैं । मैं आशा करता हूँ कि काश्मीर के शैव-शास्त्रों का मर्म जानने की
इच्छा रखने वाले सज्जन यदि यह व्याख्या पढ़ें और इसे अभ्यास का आधार लेकर
समझ लें तो अवश्य ही उन्हें पारमार्थिक लाभ होगा और विश्वव्यापी कल्याण के
भाजन बनेंगे । 'शिव-सूत्र विमर्श' यथार्थ ही साधकों के लाभ की पुस्तक है ।
मुझे आशा है कि भविष्य में भी श्रीजानकीनाथ जी कौल अपने प्रयत्न से अन्य
रहस्यमय शिव-शास्त्रों का इसी प्रकार प्रकाशन करेंगे । यदि ऐसा होगा तो मैं अपने
आप को कृतकृत्य समझूंगा ।
ईश्वर-आश्रम, निशात, शिवभक्तों का सेवक
श्रीनगर (काश्मीर) लक्ष्मण
दिसम्बर १, १९७९
[यह पृष्ठ रिक्त अथवा अत्यधिक क्षीण/अपाठ्य है।]
भूमिका
कश्मीर में त्रिक-शासन का आविर्भाव लगभग आठवीं शताब्दी (ई०) से माना
जाता है । उपलब्ध शैव-ग्रन्थों के अनुसार त्रिक-शासन को शैव-शासन या शैवागम भी
कहते हैं । यह शासन उतना ही प्राचीन माना गया है जितना वेद । सम्भवतः वेद-
विस्तार के साथ ही शैवागम का भी आविर्भाव हुआ हो । अतः जैसे वेद अनादि
माने जाते हैं वैसे ही शैवागम को भी अनादि मानना युक्ति-युक्त दीख पड़ता है ।
कश्मीर के त्रिक-शासन के अनुयायियों की भी यही धारणा है । उनके विश्वास
तथा मान्यता के अनुसार शैवागम का इतिहास तन्त्रालोक तथा इसकी टीका के आधार
पर इस प्रकार है—
प्रथमतः परमशिव की परसंवित्तिरूपा परावाणी में समस्त शास्त्र परबोधरूपता
से विकसित हुआ ही ठहरा रहता है, फिर पश्यन्ती दशा में अहंपरामर्शरूपता से ही
उदय करता है— इस पश्यन्ती दशा में भी वाच्य-वाचकरूपता का भेद प्रतीत नहीं
होता । तत्पश्चात् वही शास्त्र मध्यमा वाणी में अवतरित होकर अपने में ही वाच्य-
वाचक भाव को प्रकट करके उदय करता है और अन्त में वही शास्त्र वैखरी दशा में
आकर तथा वाच्य-वाचक भाव को प्रकट करके बाहर जगत् में अवतरित हो जाता है
और स्फुटरूपता को प्राप्त होता है ।
शैवागम के अनुसार मुख्य रूप से यह शास्त्र पाँच प्रवाहों में प्रसारित होता है ।
यही पाँच प्रवाह शिव की पाँच शक्तियों का विकास है । ये पाँच शक्तियाँ चित्,
आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया कहलाती हैं । इनको क्रमशः ईशान, तत्पुरुष,
सद्योजात, वामदेव और अघोरवक्त्र कहते हैं । इस प्रकार अगाध विश्वव्यापी शिव के
पाँच मुखों से प्रवाहित हुई शैव-शास्त्र रूप सरिताएँ मूलतः बयानवे धाराओं में बह
निकलीं । यह धाराएँ भिन्न-भिन्न प्रवृत्ति वाले जीवों की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं
के अनुसार ही बहीं । ये ही अभेदरूप भैरव-शास्त्र, भेदाभेदरूप रुद्रशास्त्र और भेद-रूप
शिवशास्त्र के रूप में प्रकट हुए ।
इस प्रकार ये सब शास्त्र तीन श्रेणियों में बाँटे जा सकते हैं—
१. अभेद या अद्वैत—जगद्रूप नानाता में एकता के अनुभव का प्रत्यभिज्ञान । इन
शास्त्रों को भैरव-शास्त्र कहते हैं ।
२. भेदाभेद—एकता और अनेकता के दोनों दृष्टिकोणों के अनुसार सिद्धान्तों का
कथन । इन शास्त्रों को रुद्र-शास्त्र कहते हैं ।
viii
३. भेद—नानाता में ही इस सिद्धान्त के सार का अवलोकन होना। इन शास्त्रों
को शिव-शास्त्र कहते हैं।
कलियुग के पूर्व ऋषि-मुनि इन शैव-सिद्धान्तों का प्रवचन तथा प्रचार मौखिक
रूप में ही किया करते थे। अतः यह दर्शन शिष्य-प्रशिष्यों द्वारा कथन-श्रवण से ही
संसार के जीवों का उद्धार करता रहा। परन्तु कलियुग का आविर्भाव होते ही वे
ऋषि-मुनि गुफाओं और गिरि-कन्दराओं में छिप गए; सम्भवतः इसलिए कि वे अपने
शान्त वातावरण में ही रहा करते थे और कलियुग में होने वाले अन्यायों तथा विक्षेपों
से दूर रहकर ही परम-तत्त्व के अभ्यास में रहना चाहते थे। परिणाम यह हुआ कि
कलियुगीय वातावरण के बढ़ने के साथ-साथ कालान्तर में इस क्रम का लोप हो
गया।
ऐसी दशा में भगवान् शिव पीड़ित जनता पर दया करते हुए कैलाश पर्वत पर
श्रीकण्ठ के रूप में प्रकट हुए और ऋषि दुर्वासा को शैव-शास्त्रों का उपदेश किया।
श्रीकण्ठनाथ ने दुर्वासा को पृथ्वीतल पर जीवों का पुनरुत्थान करने के लिए इसी त्रिक-
शासन का फिर से प्रचार करने को कहा। इस प्रकार त्रिक-शासन की प्रणाली फिर से
आगे बढ़ने लगी।
ऋषि दुर्वासा त्रिक-शासन के विज्ञाता थे। उन्होंने प्रचार कार्य को आगे बढ़ाने के
लिए अपनी अलौकिक मानसिक शक्ति से तीन मानसिक पुत्रों को जन्म दिया। उनके
नाम त्र्यम्बक, आमर्दक और श्रीनाथ हुए। इन तीनों मानसिक पुत्रों को क्रमशः अभेद,
भेद और भेदाभेद शाखाओं में प्रचार द्वारा जनता का आध्यात्मिक जीवन-स्तर उन्नत
करने का आदेश मिला। त्र्यम्बक ने स्त्री-समुदाय के शिक्षार्थ अपनी ध्यान-शक्ति से
एक कन्या को उत्पन्न किया। इससे अर्ध-त्र्यम्बक शाखा आरम्भ हुई। अतः साढ़े तीन
मठिकाओं में त्रिक-दर्शन जगत् में फिर से आरम्भ हुआ और इसे सर्वश्रेष्ठ माना गया।
जैसे तन्त्रालोक की टीका में कहा है—
वेदाच्छैवं ततो वामं ततो दक्षं ततः कुलम्।
ततो मतं ततश्चापि त्रिकं सर्वोत्तमं परम्॥
अद्वैत शैव-शासन का प्रचार त्र्यम्बक और अर्धत्र्यम्बक से हुआ। यह परम्परा
चौदह पीढ़ियों तक चलती रही। इन शिष्यों को सिद्ध कहा जाता था। आमर्दक की
भेद शाखा तथा श्रीनाथ की भेदाभेद शाखा के बारे में कोई परिचय प्राप्त नहीं होता
है। सम्भवतः यह दोनों शाखाएँ कुछ अनावश्यक प्रतीत हुई हों जिससे इनका आगे
प्रचार होना रुक गया हो।
पन्द्रहवीं पीढ़ी में मानसिक पुत्रों द्वारा गुरु-शिष्य क्रम भंग हुआ। इस पीढ़ी का प्रति-
निधि, जिसके नाम का पता नहीं चलता है, मानसिक पुत्र को उत्पन्न करने में असफल
रहा। उसने एक ब्राह्मण की कन्या से विवाह किया जिससे एक पुत्र का जन्म हुआ।
उसका नाम संगमादित्य था। यह पहला पुत्र था जिसका जन्म इस शाखा में माता
के गर्भ से हुआ। संगमादित्य को पिता ने उपदेश किया। आगे पिता-पुत्र के रूप से ही
गुरु-शिष्य क्रम जारी रहा।
संगमादित्य अपनी यात्रा के क्रम से कश्मीर आया और शान्त तथा सात्त्विक
वातावरण में रहने की इच्छा से बाद में यहीं निवास करने लगा। उसने वर्षादित्य
को जन्म दिया। वर्षादित्य से अरुणादित्य, उससे आनन्द और आनन्द से सोमानन्द
का जन्म हुआ। आगे भौतिक रूप में पिता-पुत्र द्वारा गुरु-शिष्य क्रम नहीं रहा। अब
यह परम्परा गुरु-शिष्य क्रम से ही चलने लगी, जो इस प्रकार रही —
सोमानन्द → उत्पलदेव → लक्ष्मणगुप्त → अभिनव गुप्त → क्षेमराज आदि ।
संगमादित्य कश्मीर में उस समय आये थे जिस समय महाराजा ललितादित्य यहाँ
राज्य करते थे। ललितादित्य एक धर्मनिष्ठ, कर्त्तव्य-परायण तथा योग्य शासक थे।
वह अपने कल्याण के साथ-साथ जनता के कल्याण का भी ध्यान रखते थे। प्रजा में
धर्म-प्रेरणा के भाव जगाने में उन्होंने श्लाघनीय योग-दान दिया। कश्मीर में शैव-शासन
के प्रचार का कारण बनने का श्रेय इसी प्रजावत्सल तथा प्रसिद्ध महाराजा को प्राप्त
हुआ।
भारतवर्ष में गंगा-जमुना के बीच में एक सुन्दर स्थान अन्तर्वेदी में अत्रिगुप्त नाम
से एक शैवाचार्य रहा करते थे। वह एक सद्गृहस्थ थे और शैव-शासन के उत्तम
अभ्यास में ही अपने जीवन को दिव्य तथा धन्य बनाने में व्यस्त थे। एक बार महाराजा
ललितादित्य भ्रमण करते हुए इस उत्तम स्थान अन्तर्वेदी में गये। वहाँ उनका सम्पर्क
शैव-आचार्य श्री अत्रिगुप्त के साथ हुआ। महाराजा उनके ज्ञान तथा प्रतिभा से प्रभा-
वित हुए। उन्होंने आचार्य को कश्मीर आने की प्रार्थना की। इसे ऋषि ने स्वीकार
किया।
अत्रिगुप्त कश्मीर आये। महाराजा ने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया और यहाँ
ही निवास करने की प्रार्थना की। उस समय महाराजा का राज्य-भवन श्रीनगर से
कुछ पांच मील दूर दक्षिण-पूर्व में ल्यतपुर के स्थान पर था। वहाँ से आगे दो-तीन
मील (सम्भवतः पाम्पोर में) राजा प्रवरसेन का पुराना राज्य-भवन था। इसी राज्य-
भवन को अत्रिगुप्त और उनके गृहस्थ के रहने के योग्य बनाने के लिए मरम्मत किया
गया। शैवाचार्य ने यहीं रहकर कश्मीर में शैव-शास्त्र का प्रचार किया और शेष जीवन
यहीं बिताया। आगे लगभग चार पीढ़ियों की इसी परम्परा में वराहगुप्त को एक
पुत्र-रत्न प्राप्त हुआ जिसका नाम नरसिंह गुप्त था। इनसे ही तन्त्रालोक के रचयिता
स्वनामधन्य अभिनवगुप्तपाद का जन्म हुआ। उनके तर्क-गुरु श्रीलक्ष्मणगुप्ताचार्य थे।