शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
३६२ ] [ श्री शारदा तिलक
अभिषेकोऽयमाख्यातः कीर्तिलक्ष्मीं जयप्रदः ।१३५
मध्ये साध्याक्षराढ्यं ध्रुवमभिविलिखेन्मध्यमं दिग्दलस्थम् ।
कोणेष्वन्त्यं मनोस्तत्क्षितिभुवनमथोदिक्षुच द्रं विदिक्षु ।
टान्तं यन्त्रं तदुक्तं सकलभयहरं क्ष्वेडभूतापमृत्यु-
व्याधिव्यामोहदुःखप्रशमनमुदितं श्रीप्रदं कीर्तिदायि ।१३६
परम विनम्र और दी हुई दक्षिणा वाले साध्य का इसके जल से
अभिषेक नित्य ही करे तो अभिषिंचत समस्त आधियाँ-व्याधियाँ-
महान् रोग और कृत्या के द्रोह का विनाश करने वाला हुआ करता
है ।१३४। यह इस प्रकार से किया हुआ अभिषेक कीर्ति-लक्ष्मी और
विजयके प्रदान करने वाला कहा गया है ।१३५। अब एक यंत्र बतलाया
जाता है-मध्य में साध्य के अक्षरों से युक्त ध्रुवको लिखे । मध्य का
अभिप्राय कर्णिका होता है । मध्यम दिग्दलों में स्थित करे और कर्णोंमें
मन्त्र का अन्त्य लिखे । दिशाओं में क्षितिभुवन और विदिशाओंमें चंद्र
लिखे । वह मंत्र टांत कहा गया है । यह सब प्रकार के भयों के हरण
करने वाला है । इस यंत्र को क्ष्वेड-भूत-अपमृत्यु-व्याधि व्यामोह
दुःखों का शमन करने वाला तथा श्री का प्रदाता और कीर्ति का देने
वाला बताया गया है ।१३५-१३६।
—x—
सप्तदश पटल
पुरुषार्थ मन्त्र
अथ वक्ष्ये मन्त्ररत्नं समस्तपुरुषार्थदम् ।
अवापुर्येन जप्तेन दिव्यं ज्ञान मुनीश्वराः ।१
दक्षिणामूर्तये पूर्वं तुभ्य पदमनन्तरम् ।
वटमूलपदस्यान्ते पदं पश्चान्निवासिने ।२
सप्तदश पटल ] [ ३६३
ध्यानेकनिरयाङ्गाय पश्चाद्ब्रूयान्नमः पदम्।
रुद्राय शम्भवे तारशक्तिरुद्धोऽयमीरितः। ३
षट्त्रिंशदक्षरोमन्त्रः सर्वकामफलप्रदः।
मुनिः शुकः समुद्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुप्समीरितम्। ४
दक्षिणामूर्त्तिनामास्य देवता शम्भुरीरितः।
षड्भिर्वर्णैर्हृदाख्यातं द्वाभ्यां शिर उदीरितम्। ५
शिखाष्टभिः समुद्दिष्टा वस्वर्णैः कवचं मतम्।
पञ्चभिर्नेत्रमाख्यातं त्रिभिरस्त्रमुदाहृतम्। ६
षडेते मारशब्दाद्या ह्लाड्यन्ताः सजातयः।
अङ्गमन्त्राः समुद्दिष्टा यथावद्देशिकोत्तमैः। ७
इसके अनन्तर समस्त पुरुषार्थों के प्रदान करने वाले मन्त्र रत्न को
बतलाया जाता है जिसके जप करने से मुनीश्वरों ने दिव्य ज्ञान को
प्राप्त कर लिया था। १। मन्त्र का जोकि श्लोक के स्वरूप वाला है अब
उसका उद्धार बतलाया जाता है—पूर्व में दक्षिणामूर्त्ति में यह पद
होता है। इसके अनन्तर 'तुभ्यंम्प्रह' पद होता है। वट मूल-इस पद के
अन्त में पीछे निवासिने—यह पद होता है। २। इसके पश्चात् 'ध्यांनैक
निरताय'—यह पद है और अन्त में 'ममः' पद होता है। 'रुद्राय शम्भ-
वे'—ये पद हैं। यह तार शक्ति से अवरुद्ध कहा गया है। ३। यह मन्त्र
चौबीस अक्षरों वाला होता है। यह मन्त्र समस्त कामनाओं के फलका
प्रदान करने वाला होता है। इस मन्त्र के ऋषि शुक बतलाये गये हैं
और इसका छन्द अनुष्टुप् बताया गया है। इसका देवता दक्षिणा मूर्त्ति
शम्भु कहे गये हैं। छै वर्णों से इसका हृदय कहा गया है और दो से
शिर कहा है । ४।५। आठ से शिखा कही गयी है और आठ वर्णों से
कवच माना गया है। पांच वर्णों से नेत्र बताया है और तीन वर्णों से
इसका अस्त्र उदाहृत किया गया है। ६। ये छे मार शब्द आद्य है और
ह्लाङादि अन्त वाले से सजाति हैं। आचार्यों ने यथावत् अङ्ग मन्त्र
बनाये हैं। ७।
३६४ ] [ श्री शारदा तिलक
मूर्द्धिन भाले दृशोः श्रोत्रे गण्डयुग्मे सनासिके ।
आस्ये दोः सन्धिषु गले स्तयहृन्नाभिमण्डले ।८
कट्यां गुह्ये पुनः पादसन्धिष्वर्णान्न्यसेत्क्रमात् ।
व्यापकं तारशक्तिभ्यां कुर्याद्देहे ततःपरम् ।६
हेमाचलतटे रम्ये सिद्धकिन्नरसेविते ।
विविधद्रुमशाखाभिः सर्वतोवारितामपे ।१९०
सुपुष्पितैर्लताजालैराश्लिष्टकुसुमद्रुमैः ।
शिलाविवरनिर्गच्छन्निर्झरानिलसेविते ।१९१
गायद्भृङ्गाङ्गनासङ्घैर्नृत्यद्बर्हिकदम्बके ।
कूजत्कोकिलसङ्घेन मुखरीकृतदिङ्मुखे ।१९२
परस्परविनिर्मुक्तमात्सर्यमृगसेविते ।
आद्यैः शुकाद्यैर्मुनिभिरजस्रं समुपस्थिते ।१९३
पुरन्दरमुखैर्देवैः सेवायातैर्विलोकितम् ।
वटवृक्षं महोच्छ्रायं पद्मरागफलोज्ज्वलम् ।१९४
मूर्धा में—ललाट में, नेत्रों में, श्रोत्र में, दोनों गण्ड स्थलों में,
नासिका में, मुख में, बाहुओं की सन्धियों में, कण्ठ में, स्तर, हृदय में,
नाभि मण्डल में, कटि में, गुह्य में, पादों की सन्धियों में क्रम से वर्णों
का न्यास करना चाहिए। इसके पश्चात् तार और शक्ति से देह में
व्यापक न्यास करे ।८-६। सिद्धों और किन्नरों के द्वारा सेवित सुरम्य
हिमालय पर्वत के तट में जो अनेक द्रुमों की शाखाओंसे आतपके ताप
को निवारित करने वाला है—जो सुपुष्पितलताओं के समुदाय से समा-
श्लिष्ट कुसुमों वाले वृक्षों के द्वारा संयुत शिलाओं के विवरों से निकलने
वाले निर्झरों से समन्वित वायु से सेवित हैं, जिसमें गान करने वाले
भौंरियों का समुदाय विद्यमान हैं और नाचते हुये मयूरों का संघ है,
वहां पर कूजन करने वाली कोयलों के समूह से दिशाओं का मुख
शब्दायमान है, जहाँ पर आपसी मत्सरता का त्याग कर मृगगण
विचरण कर रहे हैं, जहाँ आदि में होने वाले शुक आदि मुनिगण
सप्तदश पटल ] [ ३६५
निरन्तर समुपस्थित रहा करते हैं, जिसको सेवा के लिये समायात,
इन्द्रादि देवों के द्वारा देखा गया है ऐसा एक बहुत बड़े उच्छ्राय वाला
और पद्म राग के समान फलों से उज्ज्वल वट का वृक्ष है ।६-१४।
गार्ुत्मतमयैः पत्रै र्निवडैरुपशोभितम् ।
नवरत्नमयाक पैर्लम्बमानैरलङ्कृतम् ।१५
जलजैः स्थलजैः पुष्पैरामादिभिरलङ्कृतम् ।
शृण्वद्भिर्वेदशास्त्राणि शुकवृन्दैर्निषेवितम् ।१६
संसारतापविच्छेदकुशलच्छायमद्भुतम् ।
विचिन्त्य तस्य मूलस्थे रत्नसिंहासने शुभे ।१७
आसीनममिताकल्पं शरच्चन्द्रनिभाननम् ।
स्तूयमानं मुनिगणैर्दिव्यज्ञानाभिलाषिभिः ।१८
संस्मरेज्जगतामाद्यं दक्षिणामूर्तिमव्ययम् ।१६
वह वट वृक्ष घने गारुत्मतमय पत्रों से उपशोभित हैं । नौ रत्नों
से परिपूर्ण भूषणों से जो लटके हुए हैं यह समलंकृत है । यह वेद
और शास्त्रों के श्रवण करने वाले शुकों के समुदायों के द्वारा निषेवित
है और जल में स्थित तथा स्थल में स्थित सुगन्धित्व पुष्पों से अलंकृत
है ।१५-१६। सांसारिक ताप के विच्छेद करने में कुशल छाया वाला
अत्यन्त अद्भुत वह वट वृक्ष है । ऐसे वट वृक्ष का भली-भांति ध्यान
करे और उसके मूल में स्थित एक परम शुभ रत्नों से निर्मित सिंहासन
है ।१७। उस सिंहासन पर अपरिमित आभूषणोंसे समन्वित—शरत्काल
में उदित होने वाले चन्द्र के समान मुख वाले—दिव्य ज्ञान के अभि-
लाषी मुनिगणों के द्वारा स्तवन किये हुए जगत के आद्य-दक्षिणा मूर्ति
अविनाशी का स्मरण करना चाहिए ।१८-१६।
कैलासाद्रिनिभं शशाङ्कशकलस्फूर्जज्जटामण्डितम् ।
नासालोकनतत्परं त्रिनयनं वीरासनाध्यासितम् ।
मुद्राटङ्ककुरङ्गजानुविलसत्पाणि प्रसन्नाननम् ।
कक्षाबद्धभुजङ्गमं मुनिवृतं बन्दे महेशं परम् ।२०
३६६ ] [ श्री शारदा तिलक
अयुतद्वयसंयुक्तं गुणलक्षं जपेन्मनुम ।
तद्दशांशन्तिलैः शुद्धैर्जुहुयात् क्षीवसंयुक्तैः ।२१
पञ्चाक्षरोदिते पीठे विधानेन प्रपूजयेत् ।
उपचारैः सयुत्पन्नैः पाद्याद्यैः परमेश्वरम् ।२२
एवं कृतपुरश्चर्यः सिद्धमन्त्रीभवेत्सुधीः ।
भिक्षाहारो जपेन्मासं मनुमेनं जितेन्द्रियः ।२३
नित्यं सहस्रमष्टाढूर्धं परं विन्दति वाङ् मयम् ।
त्रिवार जप्तमेतेन मनुना सलिलं पिबेत् ।२४
अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है कैलाश गिरि
के सदृश—चन्द्र के खण्ड से स्फूर्यमाण जटाओं से मण्डित—ध्यान की
अवस्था में अपनों नासिका के अग्रभाग को देखनेमें परायण—तीन नेत्रों
से समन्वित—वीरासन पर संस्थित, मुद्रा, टंक, कुरङ्ग और जानुपर
अपना कर रखे हुए परम शोभित—प्रसन्न मुख वाले—कक्षोंमें आबद्ध
सर्प से युक्त तथा मुनिगणों से परिवृत परम महेश की मैं वन्दना करता
हूँ ।२०। इस मन्त्रका तीन लाख बीस सहस्र जप करना चाहिए इस जप
का दशांश भाग क्षीर से संयुत शुद्ध तिलों से हवन करना चाहिए ।
पंचाक्षर—उदित पीठ पर विधि-विधान के साथ अभ्यर्चन करे । जो
भी उस अवसर पर पूजाके उपचार उपस्थित होवे उनसे और पाद्यादिक
के द्वारा परमेश्वर प्रभु का यजन करे ।२२। इस रीति से पुरश्चरण
किये जाने पर सुधी मन्त्र को सिद्ध करने वाला हो जाया करता है ।
अपनी समस्त इन्द्रियों को जीत लेने वाला तथा भिक्षान्न द्वारा अशन
क्रिया के सम्पादन करने वाला पुरुष इस मन्त्र का एक मास तक जप
करे ।२३। जो नित्य ही एक सहस्र चार सौ बार मन्त्र का जप करता
है वह परम वाङ्मय का लाभ किया करता है । इस मन्त्रसे तीन वार
अभिमन्त्रित करके जल का पान करे ।२४।
नित्यशो दक्षिणामूर्ति ध्यायन्साधकत्तमः ।
शास्त्रव्याख्यानसामर्थ्यं लभते वत्सरान्तरे ।२५
सप्तदश पटल ] [ ३६७
ब्राह्मीसैन्धवसिद्धार्थवचाकुष्ठकणोत्पलैः ।
सुगन्धिसंयुतैः कल्कैः शृतं ब्राह्मी रसे घृतम् ।२६
मनुनानेन सञ्जप्रेमयुतं साधुसाधितम् ।
निपीतं कविताकान्तिरक्षायुः श्रीधृतिप्रदम् ।२७
प्रणवो हृदयं पश्चात्ततो भगवते पदम् ।
ङेयुतो दक्षिणामतिर्मह्यं मेधामूदीरयेत् ।२८
प्रयच्छ ठद्वयान्तोऽय द्वाविंशत्यक्षरो मनुः ।
मुनिश्चतुर्मुखश्छन्दो गायत्री देवता मनोः ।२६
दक्षिणामूर्तिराख्यातो वेदव्याख्यानतत्परः ।
ताररुद्धैः स्वरैर्दीर्घैः षडभिरङ्गानि कल्पयेत् ।३०
अथवा मनुसम्भूतैः पदैर्वा कल्पयेत्क्रमात् ।
पूर्वोक्तवतमूलस्थं चिन्तयेन्मन्त्रनायकम् ।३१
साधकों में श्रेष्ठ नित्य ही दक्षिणा मूर्त्ति का ध्यान करता हुआ
एक वर्ष के अन्दर में ही शास्त्रोंके व्याख्यान करने की क्षमता प्राप्त कर
लिया करता है ।२५। ब्राह्मी-सैन्धव-सिद्धार्थ-वच-कुष्ठ-कणोत्पल
के सुगन्धियुत कल्कों को ब्राह्मी से ही रसयुक्त करके घृत को सिद्ध करे
और इस मन्त्र से उसको अभिमंत्रित करे जो दश हजार वार जप करके
करना चाहिए । ऐसे साधुतया साधित करे । इसका पान करे तो यह
कविता की रचना करने की शक्ति-कान्ति-सुरक्षा आयु-श्री-
और धृति के प्रदान करने वाला हुआ करता है ।२६-२७। अब अन्य
मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है—प्रणव—ओंकार, हृदयं नमः
यह पद फिर 'भगवते'—यह पद होता है । पीछे चतुर्थ्यन्तः दक्षिणा
मूर्त्ति पद है । इसके अनन्तर 'मह्य' मेधा प्रयच्छ'—यह पद है । अन्तमें
दो ठकार हैं—यह मन्त्र बाईस अक्षरों का होता है । इसका ऋषि
चतुर्मुख है और छन्द गायत्री तथा देवता इस मन्त्र का दक्षिणामूर्ति
कहे गये हैं, जो वेदों के व्याख्यान करने में तत्पर हैं । तार अर्थात् प्रणव
से रुद्ध दीर्घ स्वरों से षट् अङ्गों की कल्पना करे ।२८-३०। अथवा
३६८ ] [ श्री शारदा तिलक
मन्त्र से समुद्भूत पदों के द्वारा क्रम से करे। पूर्व में वर्णित विशाल
एवं सुरम्य वट के मूल में विराजमान मन्त्र नायक का ध्यान करना
चाहिए। ३१।
स्फटिकरजतवर्णं मौक्तिकीमक्षमाला-
ममृतकलशविद्याज्ञानमुद्राः कराग्रैः ।
दधतमुरगकक्षं चन्द्रचूडं त्रिनेत्र
विधृतविविधभूषन्दक्षिणामूर्तिमीडे। ३२
लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
जुहुयात्सघृतैः पद्मैर्दशांशं संस्कृतेऽनले । ३३
पूर्वोदिते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणेन वर्त्मना ।
अङ्गानभ्यर्चयेद्बाह्ये पत्रेष्वष्टसु पूजयेत् । ३४
सरस्वती वाचयन्तीं पुस्तकं सस्मिताननाम् ।
ब्रह्माणं सनकं पश्चात्सनन्दनमतः परम् । ३५
सनत्कुमारनामानं शुकं व्यास गणेश्रवरम् ।
सिद्धगन्धर्वयोगीन्द्रविद्याधरगणान्वहिः । ३६
अब ध्यान बतलाया जाता है—स्फटिकमणि और रजत (चांदी)
के समान वर्ण वाले हैं अर्थात् एकदम श्वेत वर्णसे युक्त हैं—कर-कमलों
के अग्रभागों के द्वारा मौक्तिकों की अक्षमाला-अमृतका परिपूर्ण कलश
विद्या और ज्ञान मुद्रा धारण करने वाले—अपनी कक्ष में उरग को
रखते हुए—चूड़ा में चन्द्र के धारी तीन नेत्रों से समन्वित अनेक.
भूषणों को धारण किये हुए भगवान् दक्षिणा मूर्त्ति का मैं ध्यान करता
हूँ । ३२। ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित रहकर इस मन्त्र का एक लाख जप
करना चाहिए। जप का दशांश भाग संस्कार किये हुए अग्नि में घृत
के सहित पद्मों के द्वारा होम करना चाहिए। पूर्व में वर्णित पीठ पर
कहे जाने वाले मार्ग से यजन करे। अङ्गों का वाहर में अभ्यर्चन करे
और आठ पत्रों में पूजन करना चाहिए ।३३-३४। पुस्तक का वाचन
करती हुई सरस्वती देवीका, जिसके मुख पर मन्द हास्य क्रीड़ा कर रहा
ससदश पटल ] [ ३६६
है, ब्रह्माजी का—सनक और पीछे सनन्दन—सनत्कुमार नामधारी का
शुक मुनिका व्यासदेव का—गणेश्वर का और बाहर सिद्ध, गन्धर्व,
योगीन्द्र, विद्याधर गणों का अर्चन करना चाहिए ।३५-३६।
बाह्ये लोकेश्वरा नर्चेद्वज्राद्यायुधसंयुतान् ।
इत्थं पूजादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्साधकोत्तमः ॥३७
वल्लभोजायते वाचां वाचस्पतिरिवापरः ।
मन्त्रेणानेन सञ्जप्तै विशुद्धैः सलिलैः सुधीः ॥३८
अभिषिञ्चेत्स्वशिरसि श्रियमारोग्यमाप्नुयात् ।
कण्ठमात्रे जले स्थित्वा जपेन्मन्त्रं सहस्रकम् ॥३९
प्रत्यहं मण्डलादर्वाक्कवीनामग्रणीर्भवेत् ।
गौर्या पार्श्वस्थया सार्द्धं श्रीकामी चिन्तयन्विभुम् ॥४०
अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं भूयसीं श्रियमाप्नुयात् ।
भुञ्जानः प्रयतो मन्त्री गोमूत्रं शृतमोदनम् ॥४१
भिक्षान्नंमथवा मन्त्रमयुतद्वितयं जपेत् ।
अथ तान्वेदशास्त्रादीन् व्याचष्टे नात्र संशयः ॥४२
इसके बाहर मन्त्र आदि अपने आयुधों से समन्वित लोकेश्वरों
का पूजन करे । इस प्रकार से पूजा आदि के द्वारा इस मन्त्र के सिद्ध
हो जाने पर साधकों में परम श्रेष्ठ वाणी का प्रिय हो जाता है अर्थात्
सरस्वती देवी का प्यारा बन जाया करता है और वह दूसरा वृहस्पति
ही हो जाया करता है । सुधी पुरुष इस मन्त्र के द्वारा भली भाँति जाप
किए हुए विशुद्ध जल से अपने मस्तक में अभिषिञ्चन करे तो श्री और
आरोग्य की प्राप्ति कर लेता है । कण्ठ पर्यन्त किसी जलाशय अथवा
तीर्थोदक में खड़े होकर इस मन्त्र का एक सहस्र जप करे और ऐसा
जप प्रतिदिन किया करे तो मण्डल से पूर्व ही ऋषियों का अग्रणी
अर्थात् नायक हो जाया करता है । श्री की कामना रखने वाला पुरुष
पार्श्व में विराजमाना गौरी के साथ विभुका चिन्तन करे ।३७-४०। मंत्र
धारण करने वाला यदि दश सहस्र मन्त्र का जप करे तो बहुत अधिक
४०० ] [ श्री शारदा तिलक
श्रीका लाभ किया करता है। मन्त्रधारी प्रयत होकर रहे और गो मूत्र
में पकाये हुए ओदन का अशन करे अथवा भिक्षा के अन्न का आहार
करे और बीस हजार मन्त्र का जप करे तो वह पुरुष बिना सुने हुए वेद
शास्त्र आदि की व्याख्या करने की क्षमता प्राप्त कर लिया करता है—
इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।४१-४२।
सिद्धगन्धर्वमुनिभिर्योगोन्द्रै रपिसेविते ।
ज्ञानवार्गाथनां प्रीतयै कथितौ मन्त्रनायकौ ।४३
लौहितोग्न्यासनः सद्यबिन्दुमान्प्रथमं ततः ।
द्वितीयं वहिनबीज स्याद्दीर्घा शान्तीन्दुभूषिता ।४४
तृतीयं लाङ्गली सर्गी मन्त्रोबीजत्रयान्वितः ।
नीलकण्ठात्मकः प्रोक्तोविषद्वयहरः परः ।४५
हरद्वयं वह्निजाया हृदयं परिकीर्तितम् ।
कपर्दिने ठयुगलं शिरोमन्त्र उदाहृतः ।४६
नीलकण्ठाय ठद्वन्द्वं शिखामन्त्र उदाहृतः ।
कालकूटपदस्यान्ते विषभक्षणङेयुतम् ।४७
सिद्ध, गन्धर्व, मुनियों के द्वारा तथा योगीन्द्रों के द्वारा सेवित
ज्ञानयोग के अर्थियों की प्रीति के लिए ये मन्त्र नायक कहे गये हैं ।४३।
अब भगवान् नीलकण्ठ के मन्त्र को बतलाते हैं—लोहित—पः, अग्नि—
रेफ के आसन वाला, सद्य, ओ और विन्दु—अनुस्वार से युक्त होवे ।
फिर प्रथमं—तः वह्निबीज—रेफ, दीर्घा—णकार, शान्ति—ई, और
बिंदु—अनुस्वार से संयुक्त होवे । लाङ्गली—टकार, सर्ग—विसर्ग से
संयुक्त होवे । यह तीन बीजों से अन्वित मन्त्र हैं । नीलकण्ठ के स्वरूप
वाला दोनों (स्थावर-जङ्गम) विषों के परम हरण करने वाला कहा
गया है ।४४-४५। दोनों हर् और वह्निजाया (स्वाहा) इसका हृदय
कीर्त्तित किये गये हैं । 'कपर्दिद ने युगल ठकार' शिरो मन्त्र उदाहृत
किया है ।४६। नीलकण्ठाय–दो ठकार, शिखा मंत्र बताया है । कालकूट
इस पद के अन्त में चतुर्थ्यन्त विष भक्षण है ।४७।
सप्तदश पटल ] [ ४०१
हुँ फट् कवचमादिष्टं विद्वद्भिर्नीलकण्ठिने ।
स्वाहान्तमस्तमेतानि पञ्चांगानि मनीर्विदुः ।४८
मूर्द्धिन कण्ठे हृदयम्भोझे क्रमाद्वीजत्रयं न्यसेत् ।
ततः समाहितोभूत्वा नीलकण्ठं विचिन्तयेत् ।४६
वालाकार्यततेजसन्धृतजटाजूटेन्दुखण्डोज्ज्वलम् ।
नागेन्द्रैः कृतभूषणं जपवटी शूलं कपालङ्करैः ॥
खट्वांगं दधतं त्रिनेत्रविलसत्पञ्चाननं सुन्दरम् ।
व्याघ्रत्वक्परिधानमब्जनिलयं श्रीनीलकण्ठं भजे ।५०
लक्षत्रयं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं ससर्पिषा ।
हविषा जुहुयात्सम्यक् संस्कृते हव्यवाहने ।५१
शैवे पीठे यजेदेनं मृत्युञ्जयविधानतः ।
एवं पूजादिभिः सिद्धे मनौ मन्त्रीविषद्वयम् ।५२
हुँफट्—इसका विद्वानों ने कवच समादिष्ट किया है। लीलकंठिने
से स्वाहा के अन्त तक इसका अस्त्र बताया गया है । ये इस मन्त्र के
पाँच अंग जानने चाहिए ।४८। मूर्धा में—कण्ठ में और हृदय कमल में
क्रम से तीनों बीजों का न्यास करना चाहिए। इसके अनन्तर परम
सावधान होकर वे भगवान् नीलकण्ठ प्रभु का ध्यान करना चाहिए
।४६। अब ध्यान करने की रीति बतलाई जाती है—बालसूर्य के सहित
तेजयुक्त भली भाँति धारण की हुई जटा जूट में चन्द्र के खण्ड से
समुज्ज्वल—नागेन्द्रोंके द्वारा भूषणों की रचना किये हुए—करकमलोंमें
शूल—कपाल और खट्वांग को धारण करने वाले—तीन नेत्रों से
शोभित पाँच मुखों से संयुत, सुंदर, व्याघ्र के चर्म का परिधान करने
वाले—अब्ज में निवास करते हुए श्री नीलकण्ठ का मैं भजन करता हूँ
।५०। इस मंत्र का तीन लाख जप करे और जप का दशांश घृत युक्त
हवि से हवन करना चाहिए जो कि सुसंस्कृत अग्नि में भली भाँति किया
जावे ।५१। मृत्युञ्जय के विधान से शैव पीठ पर इनका यजन करना
चाहिए । इस रीति से पूजन आदि के द्वारा मंत्र के सिद्ध
४०२ ] [ श्री शारदा तिलक
हो जाने पर मन्त्र को धारण करने वाला पुरुष दोनों प्रकार के विषों
का शीघ्र ही नाश कर देता है और वह दूसरा नीलकण्ठ जैसा ही हो
जाता है ।५२।
नाशयेदचिरादेव नीलकण्ठ इवापरः ।
मनुनानेन सञ्जप्तैः कुम्भस्थैः सलिलैः शुभैः ।५३
अभिषिञ्चेद्विषाक्रान्तं स विषान्मुच्यते ध्रुवम् ।
स्पृष्ट्वा जपेद्विषाक्रान्तं तत्क्षणं निर्विषो भवेत् ।५४
बीजाभ्यां प्रथमान्ताभ्यां पार्श्वयोर्विषमाहरेत् ।
मध्येन मध्यगं सर्वं मनुनानेन संहरेत् ।५५
बहुना किमिहोक्तेन मन्त्रेणानेन मन्त्रवित् ।
कालकूटविषं साक्षाद्भुक्तं स्यात्परमामृतम् ।५६
इस मन्त्र के द्वारा भली-भाँति जपे हुए कुम्भ में स्थित शुभ जल से
विष से आक्रान्त व्यक्ति का अभिषिंचन करे तो निश्चित रूप से विष
से युक्त हो जाया करता है । विष से आक्रान्त व्यक्ति का स्पर्श करके
जप करे तो व्यक्ति उसी क्षण में विष से रहित हो जाया करता है ।
५३।५४। प्रथम और अन्त के बीजों से पार्श्वों के विष का हरण करना
चाहिए । मध्य बीज से मध्य में रहने वाले समस्त विष का इस मन्त्र के
द्वारा संहार करे ।५५। यहाँ पर इस मन्त्र के विषय में बहुत अधिक
कहना व्यर्थ है । मन्त्र का ज्ञाता पुरुष इस मन्त्र के द्वारा कालकूट
विष से भी साक्षात् मुक्त कर देता है । यह परम अमृत के समान माना
गया है ।५६।
अग्निःसंवर्तकादित्यरानिलौषष्ठबिन्दुमत् ।
चिन्तामणिरितिख्यातं बीजं सर्वसमृद्धिदम् ।५७
काश्यपोमुनिराख्यातश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ।
अर्द्धनारीश्वरः प्रोक्तो देवता जगतां पतिः ।५८
रेफादिव्यञ्जनैः षड्भिः कुर्यादङ्गानि षट् क्रमात् ।५६
सप्तदश पटल ] [ ४०३
नीलप्रवालरुचिरं विलसच्चिनेत्रं पाशारुणोत्पलत्रिशूलहस्तम् ।
अर्द्धाम्बिकेशमनिशं प्रविभक्तभूषं ।
बालेन्दुबद्धमुकुट प्रणमापि रूपम् ।६०
एकलक्षं जपेद्बीजमित्थ मन्त्री विचिन्तयेत् ।
अयुतं मधुना सिक्तैज्जुहुयात्तिलतण्डुलैः ।६१
अब चिन्तामणि मन्त्र का उद्धार करके बतलाया जाता है—
अग्नि—रेफ, सम्वर्त्तक क्षः, आदित्य—मः र—स्वरूप, अनिल—यः,
ओ-स्वरूप है । षष्ठ—ऊः, बिन्दु—अनुस्वार से युक्त होता है । यह
चिन्तामणि—इस नाम से मन्त्र विख्यात है । यह बीज सब प्रकार की
समृद्धि से युक्त होता है । ५७। अर्थात् सम्पूर्ण समृद्धि का दाता है ।
इसका ऋषि कश्यप है, छन्द अनुष्टुप् है—और इस मन्त्र का देवता
जगतों के स्वामी भगवान् अर्द्धनारीश्वर कहे गये हैं । ५८। रेफादि छै
व्यंजनों से इसके छै अङ्गों को क्रम से ही करना चाहिए ।५६। अब
ध्यान बतलाया जाता है—नील प्रवाल के समान रुचिर तीन लोचनों
से शोभित—करों में पाश—अरुणोत्पल, कपाल और त्रिशूल को धारण
करने वाले-प्रकर्ष रूप से विभक्त भूषा से संयुत-बालचंद्र से बद्ध मुकट
वाले, अम्बिका के स्वामी के रूप को निरन्तर प्रणाम करता हूँ । इस
बीज का एक लाख जाप करे और मन्त्रधारी को इस प्रकार से ही
ध्यान करना चाहिए । मधुसे सिक्त तिलों और तण्डुलोंके द्वारा इसकी
दस हजार आहुतियाँ देकर होम करना चाहिए ।६१
शैवोदिते यजेत्पीठे प्रागङ्गैः षड्भिरीरितैः ।
वृषाद्यै र्मातृभिः पश्चाल्लोकपालैस्तदायुधैः ।६२
एवमभ्यर्चयेद्देवमर्द्ध नारीश्वरम् परम् ।
तेजः कान्तियशोलक्ष्मींवाचां भवति वल्लभः ।६३
प्रासादाद्यं जपेन्मन्त्रमयुतं रोगशान्तये ।
स्वरावृतमिदं बीज विगलत्परमामृतम् ।६४
४०४ ] [ श्री शारदा तिलक
चन्द्रविस्थितं मूर्द्धिन ध्यातं श्वेडगदापहम् ।
प्रतिलोमस्वरावीतं बीजं वहिनगृहे स्थितम् ॥६५
रेफादिव्यञ्जकोल्लासिषट्कोणाभिवृतं वहिः ।
भूतार्त्तन्य स्मृतं मूर्द्धिन भूतमाशु विनाशयेत् ॥६६
पूर्वोक्त शैव पीठ पर पूर्व में कथित छे अङ्गों के द्वारा यजन करे ।
इसके पश्चात् वृषादि मातृकाओं तथा आयुधों के सहित लोकपालों का
अर्चन करे ।६२। इसी रीति से परम भगवान अर्द्धनारीश्वर का
देवेश्वर का यजन करना चाहिये । ऐसा अर्चन करने वाला साधक तेज
कान्ति, यश, लक्ष्मी और वाणी का वल्लभ हो जाया करता है ।६३।
प्रासादय मन्त्र का दश हजार जाप रोगों की शान्ति के लिये करना
चाहिये । यह वीज स्वरों से आवृत है और इस से परमामृत विगलत
होता है ।६४। मूर्धा में चन्द्र विम्व को धारण करने वाले का ध्यान करे
तो श्वेत गद का अपहरण करने वाला होता है । प्रतिलोम स्वरों से
आवत बीज वहिनगृह मे स्थित है । ६५। रेफादि व्यञ्जनों से शोभित
षट्को से बाहर अभिवृत होता है । जो भूतों से आर्त्त होवे उसके मूर्धा
में स्मृत किये जाने पर बहुत शीघ्र ही भूत का यह विनाश कर दिया
करता है ।६६।
बीजं चन्द्रगतं वीत स्वरैः षोडशभिः क्रमात् ।
गलत्परसुधापूर्णे नेत्रे ध्यातं रुजं हरेत् ॥६७
एवमेवस्मृतं बीजं कुक्षौ शूलादिरोगहृत् ।
स्फोटे विषज्वरे दाहे मोहे शीर्षगदे भ्रमे ॥६८
बीजमेत्तथाध्यातं तत्तत्क्लेशान्विनाशयेत् ।
कुङ्क माभमिदं वीज त्रिकोणगतमुज्जगलम् ॥६६
यस्य मूर्द्धिन स्मरेन्मन्त्री स वश्यो जायतेऽचिरात ।
ऊर्ध्वरेफस्थसाध्याख्यं वीजं वहिनगृहे स्थितम् ॥७०
वहिनगेहद्वयेनागियुक्तकोणेन संवृतम् ।
प्रतिलोमस्वरावीतं चुल्लीस्थाने निवेशितम॥७१
सप्तदश पटल ] [ ४०५
चन्द्रगत बीज क्रम से सोलह स्वरों से वीत होवे तो गलत्पर सुधा
से पूर्ण नेत्र में ध्यान किये जाने पर यह नेत्र के रोग का हरण किया
करता है ।६७। इस रीति से स्मरण किया हुआ बीज जो कि कुक्षि में
किया जावे तो यह शूल आदि रोगों का हरण करने वाला हुआ करता
है । स्फोट में, विष ज्वर में, दाह में, मोह में, शीर्ष के रोग में, भ्रम
में इस बीज का ठीक उसी भाँति से ध्यान किया जाने पर उन-उन
सम्पूर्ण क्लेशों का विनाश कर दिया करता है। यह बीज कुंकुम की
समान आभा वाला त्रिकोण में गत उज्ज्वल है ।६८।६६। मन्त्रधारी
पुरुष जिसके ही मूर्धा में इसका स्मरण अर्थात् ध्यान करे वही पुरुष
थोड़े ही समय में वश्य हो जाया करता है। यहाँ हर ६७ वे श्लोक
में जो चन्द्रगत है उसका आशय ठकार गत होता है। ऊर्ध्व रेफ गत
साध्य के नाम वाली बीज वह्निगृह में स्थित हैं ।७०। दो वह्निगेह से
युक्त अग्नि युक्त कोण से संवृत तथा प्रतिलोम स्वरों से आवृत को
चूल्हे के स्थान में निवेशित कर देवे ।७१।
वशीकरोति रमणमचिरेणैव दासवत् ।
मधुरत्रययुक्तेन शालिपिष्टेन पुत्तलीम ।७२
कृत्वा प्रतिष्ठितप्राणां विभज्य जुहुयाद्धशी ।
त्रिवासरमनेनैव साध्यस्तस्य वशी भवेत् ।७३
मकारगतसाध्याख्यमनलस्थगदाह्वयम् ।
चन्द्रगञ्चतुरस्रेण तान्तकोणेन वेष्टितम् ।७४
बीजं ताम्बूलपत्रस्थं प्रजप्तं मनुनामुना ।
भक्षितं नाशयेत्सम्यक् शिरोरोगं न संशयः ।७५
लिखित्वा बन्धुजीवेन त्रिकोणं बीजगर्भितम् ।
अत्र वह्निं समाधाय सम्यगाराध्य देवताम् ।७६
इसका ऐसा अद्भुत प्रभाव हो ताकि यह रमण को अपने दास की
ही भाँति थोड़े समय में वश में कर दिया करता है। तीन मधुरों से
युक्त शाली के चून से पुतला बनावे और उसमें पुष्पों की प्रतिष्ठा करे
४०६ ] [ श्री शारदा तिलक
और वशी विभाग करके उसमें हवन करे तो इसी के द्वारा तीन दिन
में ही साध्य उसके वश गत हो जाया करता है ।७२।७३। मकार गत
साध्य के नाम को अनलस्थ गद नाम वाले चन्द्रगत को चतुरस्र (चौकोर)
टान्त कोण से वेष्टित करे ।७४। बीज को ताम्बूल के पत्ते में स्थित कर
के इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करे। फिर इसका भक्षण करे तो यह
शिर के रोग का अच्छी तरह से विनाश कर दिया करता है-इसमें
कुछ भी संशय नहीं है ।७५। बन्धु जीव के द्वारा बीज से गर्भित त्रिकोण
लिखकर इसमें वह्नि का समाधान करे और अच्छी रीति से देवता
की अराधना करनी चाहिए ।७६।
जुहुयात्कृतसंपातं सर्पिषाष्टोत्तरं शतम् ।
संपाताज्येन संसिक्ता त्रिलोहकृतमुद्रिका ।७७
विधृता भूतवेतालकृत्यारोगविनाशिनी ।७८
ऊर्ध्ववह्निदहितं मनुमेनं वह्निगेहयुगलोपरि लिखितम् ।
अग्निमस्त्रिषु महीपुरवीतं यन्त्रमेतदुदितं ग्रहगौरि ।७९
अग्निबीजलत्कोणत्रिकोणलिखिते ध्रुवे ।
शरावे कपिलाज्यान्वज्सूत्रदीपं प्रविन््यसेत् ।८०
घटेनैनं पिधायास्य पृष्ठे यन्त्रमिदं लिखेत् ।
भूतार्तमत्र संस्थाप्य चिन्तामणिमनुं जपेत् ।८१
फिर घृत से अष्टोत्तर शत कृत सम्पात आहुतियां देवे । उस
सम्पात किये हुए घृत से संसिक्त करके तीनों लोहों की मुद्रिका बनावे ।
इस मुद्रिका को धारण करने से यह भूत, वेताल, कृत्या के द्वारा हुए
रोगों का विनाश हो जाता है ।७८। अब एक यन्त्र बतलाया जाता है-
ऊर्ध्व वह्नि से रहित इस मन्त्र को वह्नि गेह युगल के ऊपर लिखे
षट्कोणों में अग्नि को भूपुर से वीत करे । यह मन्त्र ग्रह गौरि नाम
वाला कहा गया है ।७९। अग्नि बीज से शोभित कोण त्रिकोण में ध्रुव
के लिखने पर मिट्टी के दिये में कपिला गौ के घृत में अब्ज सूत्र वाले
सप्तदश पटल । [ ४०७
दीप का विन्यास करना चाहिए ।८०। इसको घट से ढककर इसके पृष्ठ
भाग पर इस मन्त्र को लिखे । जो भूतों से आत्तं होवे उसको यहाँ पर
संस्थापित करके चिन्तामणि मन्त्र का जाप करना चाहिए ।८१।
तमाविश्य क्षणान्नश्येद्ग्रहः क्रूरोऽपिसर्वथा ।८२
कृशानुभवनद्वये मनुमिमं लिखित्वा पुन—
स्तदस्त्रिषु हलोलिखेत्स्वरयुग ततः सन्धिषु ।
ध्रुवेण परिवेष्ठितं धरणिगेहमध्यस्थितम् ।
मनोरथफलप्रदं भवति यन्त्रमेतन्नृणाम् ।८३
षट्कोणान्तस्त्रिकोणे लिखतु मनुमिमं साध्यनामाक्षराढ्यम् ।
षट्कोणेष्वङ्गमन्त्रान्वसुदलविवरेष्वष्टमन्त्राक्षराणि ।
वीतं बाह्यं कलाभिस्तदनु परिवृत कादिभिर्यादिभिस्त ।
त्क्षोणीबिम्बेन युक्तं नृहरिमनुयुजा यन्त्रमापद्ग्रहघ्नम् ।८४
अस्मिन्यन्त्रे प्रतिष्ठाप्य कलशं प्रोक्तवर्त्मना ।
कृताभिषेकः स्यात्कृत्याभूतद्रोहादिशान्तिदः ।८५
उसमें अविष्ट होकर ग्रह चाहे वह सर्वथा क्रूर होवे एक ही क्षण
में नष्ट हो जाया करता है ।८२। अग्नि के दोनों गृहों में इस मन्त्र को
लिखकर फिर उसके षट्कोण में हलो लिखे । फिर सन्धियों में दो
स्वर लिखने चाहिए । ध्रुव से अर्थात् प्रणव से परिवेष्टित करे और
धरणी के गेह के मध्य में स्थित करे । यह मन्त्र मानवों के मनोरथों
के फल का प्रदान करने वाला होता है ।८३। इस मन्त्र को षट्कोण के
अन्दर त्रिकोण में साध्य के नाम के अक्षरों से युक्त लिखे । षट्कोणों
में अङ्गभूत मन्त्रों को लिखे और आठ दलों के विवरों में आठ मन्त्रों
के अक्षरों का लेखन करना चाहिए । बाहर में कलाओं में वीत करे
और इसके अनन्तर आदि और यादि से परिवृत करे तथा क्षोणी विम्ब
से युक्त करे । यह नृसिंह मन्त्र से युक्त होवे तो यह यन्त्र आपदा और
ग्रहों के नाश करने वाला होता है ।८४। इस मन्त्र में कहे हुए मार्ग
४०० ] [ श्री शारदा तिलक
से कलश को प्रतिष्ठापित करे । फिर इससे अभिषेक करे तो कृत्या
और भूत द्रोह आदि को शान्ति प्रदाता होता है ।८५।
स्वरावृतमयुङ् मनुं लिखतु टान्तमध्ये ततः ।
षडस्रिषु हुताशनं तदनु कादिवर्णैर्वृतम् ।
धरापुरयुगेन तन्नृहरिबीजयुक्तास्रिणा ।
प्रवेष्टितमुदाहृतं दुरितरोगकृत्यापहम् ।८६
क्षकारोमाग्निपवनवामकर्णार्द्धचन्द्रवान् ।
उक्तं तुम्बुरुबीज तद्येन सिध्यन्ति साधकाः ।८७
षड्दीर्घभाजा बीजेन ऽङ्गानिप्रकल्पयेत् ।
क्षकाररहितं बीजं क्रमाज्जभसहान्वितम् ।८८
चत्वारि देवीबीजानि देव्यो ज्ञेया इमाः क्रमात् ।
जयाख्या विजया पश्चादजितर चापराजिता ।८९
बीजमंगुलिषु न्यस्य करयोर्व्यापकंततः ।
कनिष्ठादिषु विन्यस्येत्षडङ्गानि तलावधि ।६०
फिर टान्त के मध्य में स्वरों से आवृत अयुक् मन्त्र को लिखे ।
षट्कोण में हुताशन को लिखे फिर इसके अनन्तर कादिद वर्णों से इसको
वृत करे । फिर दो भूपुरों से तथा नृसिंह के बीज से युक्त षट्कोण से
इसको परिवेष्टित करे। यह दुरित रोग और कृत्या के दोषों का अप-
हरण करने वाला उदामृत किया गया है ।८६। क्षकार, अग्नि, पवन,
वाम, कर्ण अर्ध चन्द्र वाला—यह तुम्बुरु बीज कहा गया है जिसके
द्वारा साधकगण सिद्ध होते हैं ।८७। छै दीर्घों से युक्त बीज के द्वारा छै
अङ्गों की कल्पना करनी चाहिए । क्षकार से रहित बीज से क्रम से
ज—भ—स—ह से अन्वित होता है ।८८। चार देवी के बीज होते हैं ।
उनको क्रम से जान लेने चाहिए । जया—विजया—अजिता—अपरा-
जिता है । बीज का अँगुलियों में न्यास करके पीछे दोनों करों में
व्यापक न्यास करना चाहिए । फिर कनिष्ठा आदि में तल की अवधि
पर्यन्त षडङ्गों का न्यास करे ।८६।६०।
सप्तदश पटल ] [ ४०६
देवं देवीः स्वबीजादि कनिष्ठादिषु विन्यसेत् ।
पादान्मूर्द्धाविधि न्यस्येन मुष्टिनावयवेषु तत् ।६१
तलाभ्यां व्यापकं कुर्यान्मूर्धादि चरणावधि ।
षडङ्गानि ततोन्यस्येद्यस्थानं विशालधीः ।६२
देवं देवी यथापूर्वं मूर्द्धास्यहृदयाम्बुजे ।
नाभौ गुह्ये क्रमान्न्यस्येतपश्चाद्देव विचिन्तयेत् ।६३
रक्ताभमिन्दुसकलाभरणं त्रिनेत्रं खट्वाङ्गपाशसृणिशूलकपालहस्तम्
वेदाननं चिपिटनासमनर्घ्यभूषं रक्ताङ्गरागकुसुमांशुकमीशमीडे ।६४
लक्षमानं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्सर्पिषाऽयतम् ।
वक्ष्यमाणे यजेत्पीठे देवमावरणैः सह ।६५
देव का–देवी का और स्वबीजादि का कनिष्ठ का आदि में न्यास
करे । पाद से मूर्धा की अवधि तक मुष्टि से अवयवी में उनका न्यास
करे ।६१। मूर्धा से आदि लेकर चरणों की अवधि पर्यन्त तलों से व्यापक
न्यास करना चाहिए । विशाल बुद्धि वाले पुरुष को चाहिए कि वह
इसके अनन्तर स्थान के अनुसार षट् अङ्गों का न्यास करे ।६२। देव
का और देवी पूर्व की ही तरह से मूर्धा, मुख, हृदय कमल, नाभि;
गुह्य क्रम से न्यास करना चाहिए । इसके पश्चात् इस प्रकार से चिन्तन
करे ।६३। अब ध्यान बतलाया जाता है—रक्त आभा से युक्त, चन्द्रखंड
के आभरण से भूषित—तीन नेत्रों वाले—करों में खट्वाङ्ग—पाश—सृणि—
शूल और कपाल को धारण करने वाले—चार मुखों से समन्वित—
चिपिटनासिका से युत—श्रेष्ठ वेषभूषा से भूषित—रक्त अङ्गराज से
युत—कुसुमों के वस्त्रधारी ईश का स्तवन करता हूँ ।६४। एक लाख
मान में इस मन्त्र का जप करे और जप का दशांश भाग दश सहस्र
घृत से होम करे । आगे कहे जाने वाले पीठ पर आवरणों के साथ देव
का यजन करे ।६५।
नपुंसकस्वरैर्विद्वान्स्वराद्यन्तद्वयेन च ।
धर्मादिकानधर्माद्यान्पादगात्राणि विन्यसेत् ।६६
४१० ] [ श्री शारदा तिलक
इकारेण न्यसेत्पश्चात्तत्त्वरूपान्गुणानथ ।
शान्त्या तत्परवर्णेन मायाविद्यामजे क्रमात् ।६७
अधऊर्ध्वच्छन्दे न्यस्येदधीशेन ततोऽम्बुजम् ।
सन्ध्यक्षरैर्यजेन्मन्त्रों शक्तीर्वामादिकाः क्रमात् ।६८
वामां ज्येष्ठां तथा रौद्रीमिच्छां ज्वालास्वरूपिणीः ।
एवं प्रकल्पित पीठे मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।६६
आवाह्य पूजयेद्देवं तस्यामावरणैः सह ।
अङ्गावृत्तेर्बहिर्देवीं दिक्पत्रेषु समर्च्चयेत् ।१००
विद्वानों को उचित है कि नपुंसक स्वरों से और स्वराद्यन्त दो से
धर्मादि काम धर्मियों तथा पादगात्रों का विन्यास करे ।६६। ईकार से
न्यास करे और पीछे तत्व रूप गुणों को, शान्ति से तत्पर वर्ण के द्वारा
क्रम से माया विद्यमय में नीचे ऊपर के छन्द में न्यास करे । अर्धीश
से अम्बुज को करे । मन्त्रधारी शक्तियों और वामदिक का क्रम से
यजन करे ।६७।६८। उन शक्तियों नामों का परिगणन करके बताया
जाता है—वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, इच्छा, ज्वाला स्वरूपिणी हैं । इस
प्रकार से प्रकल्पित पीठ पर मूल मन्त्र के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी
चाहिए ।६६। उस मूर्त्ति में देव का आवाहन करके आवरणों के सहित
पूजन करे । अङ्गावृत्ति के बाहर दिक् पत्रों में देवी का अर्चन करना
चाहिए ।१००।
जयाद्याः स्वस्वबीजेन रक्ता रक्तानुलेपनाः ।
अरुणांशुकपुष्पाढ्यस्ताम्बूलाऽऽपूरिताननाः ।१०१
बल्लकीवादनपरा मदमन्मथपीडिताः ।
ईशादिकोणेष्वभ्यचेद्दूतीबीजादिकाः क्रमात् ।१०२
दुर्भगां सुभगां भूयः करालीं मोहिनीमिमाः ।
बद्धाञ्जलिपुटाः किचिदानम्रवदनाम्बुजाः ।१०३
देवीः सदृशभूषाडया दूतीमन्त्राविदुः क्रमात् ।
चतुरः शादिकान्वर्णानिद्धेन्दुकृतशेरान् ।१०४
सप्तदश पटल ] [ ४११
लोकपालान्यजेद्वाह्ये वज्राद्यायुधसंयुतान् ।
एव यो भजते भक्त्या देवमुक्तेन वर्त्मना ।१०५
जपाद्या स्वस्थ बीज से रक्ता है और रक्त अनुलेपन वाली है।
अरुण वर्ण के वस्त्र और पुष्प से आढ्य है। उनका मुख ताम्बूल से परि-
पूरित रहता है। ये सब वल्लकी वाद्य के वादन करने में परायण हैं
और मद तथा मन्मथ (कामदेव) से पीड़ित हैं ईशादि कोणों में बीजा-
दिक दूतियों का क्रम से अभ्यर्चन करे ।१०१।१०२। दूतियों के नामों
का परिगणन किया जाता है—दुर्भगा, सुभगा, कराली, मोहिनी—ये
हैं। ये सब अपनी अंजलिपुटों को बाँधे हुए हैं और इनका मुख कमल
नम्रता से कुछ नीचे की ओर हो रहा है ।१०३। ये सब देवी के ही
समान भूषणों से समन्वित हैं। अब दूतियों के मन्त्रों को क्रम से जान
लेवे। चार शाकादि वर्ण अर्थात् शषसह, अर्धेन्दु—बिन्दु से शेखरों
वाली हैं ।१०४। बाहर लोकपालों का यजन करे तथा वज्र आदि उनके
आयुधों का अर्चन करे। इस प्रकार से उक्त मार्ग के द्वारा जो भक्ति
की भावना से देव का अर्चन किया करता है ।१०५।
न तस्य दुर्लभं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
वायुवह्निपरान्तस्थं बीजं स्मृत्वा जपेत्सुधीः ।१०६
ज्वरभूतमहारोगानश्यन्ति तेन तत्क्षणात् ।
क्रुद्धस्य हृदये ध्यात्वां जपेद्वीजमनन्यधीः ।१०७
स वश्यो जायते शीघ्रं मन्त्रस्यास्य प्रभावतः ।
हृद्रोगे कामला रोगे विष्टम्भि श्वासकासयोः ।१०८
एतज्जप्तं जलं प्रातः पिबेत्तद्रोगशान्तये ।
कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं तत्र शोभनम् ।१०६
कलशांस्थापयेन्मन्त्री नव पूर्वोक्तलक्षणान् ।
मध्यदेवं यजेत्सम्यक् देवीः पूर्वांदिकुम्भगाः ।११०
इष्ट्वा कोणस्थिता दूतीरभिषिञ्चेत्पतिव्रता ।
नारी सा लभते पुत्रं वन्ध्यापि किमुतापरा ।१११