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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 511 में से

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पृष्ठ 402

४०२ ] [ श्री शारदा तिलक
हो जाने पर मन्त्र को धारण करने वाला पुरुष दोनों प्रकार के विषों
का शीघ्र ही नाश कर देता है और वह दूसरा नीलकण्ठ जैसा ही हो
जाता है ।५२।
नाशयेदचिरादेव नीलकण्ठ इवापरः ।
मनुनानेन सञ्जप्तैः कुम्भस्थैः सलिलैः शुभैः ।५३
अभिषिञ्चेद्विषाक्रान्तं स विषान्मुच्यते ध्रुवम् ।
स्पृष्ट्वा जपेद्विषाक्रान्तं तत्क्षणं निर्विषो भवेत् ।५४
बीजाभ्यां प्रथमान्ताभ्यां पार्श्वयोर्विषमाहरेत् ।
मध्येन मध्यगं सर्वं मनुनानेन संहरेत् ।५५
बहुना किमिहोक्तेन मन्त्रेणानेन मन्त्रवित् ।
कालकूटविषं साक्षाद्भुक्तं स्यात्परमामृतम् ।५६
इस मन्त्र के द्वारा भली-भाँति जपे हुए कुम्भ में स्थित शुभ जल से
विष से आक्रान्त व्यक्ति का अभिषिंचन करे तो निश्चित रूप से विष
से युक्त हो जाया करता है । विष से आक्रान्त व्यक्ति का स्पर्श करके
जप करे तो व्यक्ति उसी क्षण में विष से रहित हो जाया करता है ।
५३।५४। प्रथम और अन्त के बीजों से पार्श्वों के विष का हरण करना
चाहिए । मध्य बीज से मध्य में रहने वाले समस्त विष का इस मन्त्र के
द्वारा संहार करे ।५५। यहाँ पर इस मन्त्र के विषय में बहुत अधिक
कहना व्यर्थ है । मन्त्र का ज्ञाता पुरुष इस मन्त्र के द्वारा कालकूट
विष से भी साक्षात् मुक्त कर देता है । यह परम अमृत के समान माना
गया है ।५६।
अग्निःसंवर्तकादित्यरानिलौषष्ठबिन्दुमत् ।
चिन्तामणिरितिख्यातं बीजं सर्वसमृद्धिदम् ।५७
काश्यपोमुनिराख्यातश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ।
अर्द्धनारीश्वरः प्रोक्तो देवता जगतां पतिः ।५८
रेफादिव्यञ्जनैः षड्भिः कुर्यादङ्गानि षट् क्रमात् ।५६