शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
१०७ शालिहोत्रम् ।
पीसकर दे। एक दिन तक लगावै, ऊपर से अंजीर के पत्तों की
तह बांध दे, ।
इक्कीसवां नुसखां-जो घोडेका दम चढाना चाहे अर्थात् ऐसा
करना चाहे कि साठ सत्तर कोस चलकर भी घोडा न थके तौ
यह उपाय करें कि एक काले सर्पको अधमरा करले किन्तु इस
तरह से करै कि न तौ उसका रुधिर निकलै और न जहर बाहर
आवै, फिर उस सर्प के मुंह में सौ या कुछ कम चने भर एक
घडे में रखकर उसका मुख बन्द करदे और फिर उस घडे को
पृथ्वी में गाढ दे, चालीस दिन पीछे चनोंका निकाल कर साफ
रखले और जब दूर जाना हो तब उनमें से एक चना सत्तू या
रातिब में मिलाकर घोडे को खिलावै ।
इति अश्वचिकित्सा समाप्त ।
❀ श्रीहरिः ❀
रामायण की पुस्तकें
तर्ज
राधेश्याम
--:( ❀ ):--
नारद मोह ८) राम सुग्रीव मिलाप =)
राम जन्म =) अशोक वाटिका में सीता =)
पुष्प वाटिका =) हनुमान लङ्का दहन =)
धनुष यज्ञ =) विभीषण की शरणागति =)
परशुराम सम्बाद =) अंगद रावण सम्बाद =)
राम विवाह =) मेघनाद की शक्ति =)
दशरथ प्रतिज्ञा =) कुम्भकरण मेघनाद वध =)
कौशिल्या मातासे विदाई =) सुलोचना सती =)
राम वन गवन केवट सम्वाद =) रावण वध =)
दशरथ मरण =) राम रावण युद्ध =)
चित्रकूट में भरत आगमन =) राज तिलक =)
पंचवटी =) सीता वनवास =)
सीता हरण =) रामाश्वमेध =)
पुस्तक मिलने का पता—
किशनलाल द्वारकाप्रसाद,
बम्बई भूषणप्रेस, मथुरा
२६ अठवां भाग । १४१:
एक हफ्ते अन्दर जो तुम नहीं आओगी ॥
तो राहत को फिर जिन्दा नहीं पाओगी ॥
॥ कहना बांदी का ॥
लावनी--नाहकको रंज इस क़दर आप करती हो ॥
समझाने पर भी धीर नहीं धरती हो ॥
सब सखी सहेली संग की आप बुलाओ ॥
दो घड़ी साथ उनके तुम मन बहलाओ ॥
लो सलाम मेरा जाती हूं मैं प्यारी ॥
भगवान करै रहे तबियत शाद तुम्हारी ॥
रतनकुमारी बोली सुनो प्यारे बांदी इस तरह समझा
बुझाकर राहतजान के महलों से रुखसत हुई और अपने घर
जाकर जोगन का भेष बना लिया सींगी सेली गले में डाल
बड़े बड़े दानोंकी माला पहन सुन्दर लंबे लंबे वाले छोड सि-
तार हाथमें ले रातके बारह बजेके बाद अपने घरसे निकलशा-
ही बाग के दरवाज़े पर जो नीमक दरख्त लहलहा रहे थे उनके
नीचे मृगछाला बिछा लेटरही सितार को दरख्त से लटका
दिया सुबह होतेही बाग के माली ने फाटक खोला यह वहांसे
उठ बाग के अन्दर गई और जहां वादशाह आन कर बैठते
थे उनके सामनेही एक दरख्तों का बन था वहां आसन
लगादिया और सितार की गतें निकालने लगी सुबह के वक्त
जो यहां दस बीस रईस शहरके आया करतेथे आये और सितार
की गत सुनकर और इसके रूपको देखकर सब पास आन
कर हाथ जोर सिर नवा बैठ गये इनको बैठा देख जोगिन ने
ये ग़ज़ल गाना शुरू किया ॥
॥ तरजी अबंद ॥
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है।
कफस में कब तलक तडफूं निहायत बेकरारी है ॥
दोहा-विरह रोग तनमन दहै, कल न पड़े दिनरैन ।
विधना काहूके कहीं, लागें हाय न नैन ॥
नहीं ज़खमी बचा इसका यह वह पैनी कटारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है ॥
दोहा--प्रीत रीत तुम अगली, सबै दई बिसराय ।
ऐसी कोऊ करत है, जैसी तुम की हाय ॥
नहीं मालूम क्या हम से हुई तकसीर भारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है ॥
दोहा-प्रीतम प्रीत लगाय तुम, छिपे कौन से देश ।
विरह रोग तनमें बसा, जटा जूट भये केश ॥
तरस आता है देखे से कि जो हालत हमारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है।
दोहा-हमतौ तज कुलकान सब, कीनी तुमसंग प्रीत ।
तुम निर मोही निठुरहो, करन लगे विपरीत ॥
इसीका नाम उल्फत है यही क्या शर्ते यारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है ॥४॥
दोहा-कहा न माना किसीका, कीनी तुनसन प्रीत ।
सोई फल पायो हमन, दैनलगे दुख मीत ॥
न कुछ तकसीर है उनकी ये सब किस्मतहमारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है ॥५॥
दोहा-प्रीत करी सुख के लिये, तन मन धन बिसराय ।
सो लागी दुख दैन अब, कीजे कौन उपाय ॥
निहायत ऐसे जीने से हमारी जान आरी है।
... २४७
वक्त मौजूद हुये और वजीर लोग जोगनजी को लिवाने ग-
ये और कहा जोगनजी महाराज आपको बादशाह सलामत-
ने याद किया है ।।
जोगन-बाबा हम फकीर लोगों से बादशाह को क्या काम
अटका है ?
वजीर-काम की कोई बात नहीं है आपके मुख से कुछ गाना
सुनने की दरकार है ।।
जोगन-हम लोग गाना बजाना क्या समझें योंही अपनेतन-
ना रीरी कर दो घड़ी दिल बहलाते हैं
वजीर-आप का कहना दुरुस्त है मगर हमारी खादिमी पर
भी नजर करना चाहिये ।
जब इस कदर वजीर अहल्करों ने अर्ज गुजारिश की तौ
जोगनजी उनके साथ चलने को तयार हुईं और सवारी में बै-
ठ शाही बाग में जो कदम दिया तो वही खलकत बल्कि उ-
स से जियादह आलम पाया यह अपने आसन पर जा बैठी
अहलकारों ने यथोचित आदर सत्कार किया बाद आदरहो-
ने के इसने अपना सितार मिलाना शुरू किया कुछ बाजापखा-
वज किनारी वगैरा शाही भी मौजूद हुआ पहले तो जोगनजी
ने सितारमेंही वहगत निकाली कि अच्छे २ जो कामिल उस्ताद
लोग बैठेथे सब चकित होगये पखावज और किन्नारी इस कदर
मिली हुई बज रही थी कि अजब समां दरस रहाथा फिर जोगन
जीने यह राग गाना शुरू किया ॥
(खेमटा)
मोहन प्यारे आन दिखा दीदार ॥ तेरे कारन घर दर छांडा
छोड दिया परिवार । अब मोहन प्यारे आन दिखा दीदार ॥