सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

The provided image appears to be entirely blank/white with no visible text to transcribe. Please upload or provide an image containing the text you would like transcribed.

सौन्दर्य लहरी १३९
चक्रों और सहस्रार का सविस्तार वर्णन
स्थूल देह सप्त धातुओं का बना है । जो अन्न जल खाया
पिया जाता है, वह जठराग्नि से पचकर रस बनाता है, रस से रुधिर,
रुधिर से मांस, मांस से मेदा, मेदा से स्नायु, स्नायु से अस्थि,
अस्थि से मज्जा, और मज्जा से शुक्र । रुधिर, मांस, मेदा ( चर्बी, )
स्नायु, अस्थि, मज्जा, और शुक्र ( वीर्य ) सप्त धातु कहलाती हैं ।
रक्त को अंग प्रत्यंग में पहुंचाने के लिये रक्त वाहिनी ( arteries )
नलिकाओं सदृश नाडियां हैं, जब वह रक्त दूषित होकर नीला हो
जाता है तब उसको स्वच्छ करने के लिये हृदय में खेंचकर फुफुसों
में पहुंचाया जाता है, वहां श्वास द्वारा वह फिर स्वच्छ हो जाने
पर हृदय में खेंच लिया जाता है और रक्त वाहिनी नाडियों में भेज
दिया जाता है । हृदय पंप का कार्य करता रहता है, जिसका एक
ओर फुफुसों से संबंध है दूसरी ओर रक्त को लाने और ले जाने
वाली नलिकाओं से । नीले रंग के दूषित रक्त को हृदय में
खेंचने वाली नलिकायें पित्त नाडियां ( veins ) कहलाती हैं ।
इसी प्रकार मेदस् ( चर्बी ) बनाने वाले द्रव्य की भी नलिकायें
होती हैं जिनको कफ वाहिनी (Lymphs) नाडियां कहते हैं ।
मेदा से स्नायु की उत्पत्ति बताई जाती है । ये स्नायु वात, अर्थात्
प्राण वाहिनी नाडियां ( nerves ) कहलाती हैं । मज्जा अस्थियों
की नलिकाओं में होती है और शुक्र, शुक्राशय में अण्डकोषों
द्वारा बनता है । यहां हम स्नायुओं को ही नाडी नाम से संबोधित
करते हैं । ये नाडियां सुषुम्ना नाडी के द्वारा आनख शिख देह का
मस्तिष्क से संबंध जोडती हैं । इनकी सख्या ७२ हजार कही

१४० सौंदर्य लहरी
जाती है। सुषुम्ना नाडी मेरु दण्ड के भीतर सुरक्षित है। जिसकी
आकृति ∞ के सदृश मिलती हुई सी समझनी चाहिये। किसी
पदार्थ के ऐसे पुर्जों को एक दूसरे पर रखकर और दोनों ओर के
बड़े छिद्रों में दोनों ओर बारीक तारों के गुच्छों को पिरोकर सब
पुर्जों को ग्रथित कर लिया जाय तो वह सर्पाकार सुषुम्ना का ढांचा सा
दिखने लगेगा। सुषुम्ना में तारों के स्थान पर वे स्नायु हैं जो
मस्तिष्क को देह में फैले हुए समस्त नाडी जाल से संबंधित करते
हैं। और बीच के छिद्र से बनी नलिका में एक द्रव्य पदार्थ
भरा रहता है जिसको चन्द्र मण्डल से निकलने वाला अमृत कहते
हैं, इसे सुषुम्ना मानों पान कर के पुष्ट होती है। अंग्रेजी में इसे
(cerebro spinal fluid) अर्थात् मास्तिष्क सौष्मन द्रव्य
कहते हैं। सुषुम्ना के अन्दर गुदा, उपस्थ, नाभि, वक्षस्, ग्रीवा के
५ प्रदेशों से संबंधित ५ चक्र हैं, जिनको विभिन्न अंगों की नाडियों
से सुषुम्ना का संबंध होता है। सुषुम्ना के दोनों तरफ के स्नायु
भ्रूमध्य प्रदेश में एक बिन्दु पर मिलकर दक्षिण भाग से वाम ओर
और वाम भाग से दक्षिण ओर होकर सहस्रार में चढ जाते हैं, इस
भ्रूमध्य स्थान को आज्ञा चक्र कहते हैं। ग्रीवा प्रदेश के चक्र को
विशुद्ध, वक्षस् के चक्र को अनाहत्, नाभि प्रदेश के चक्र को
मणिपुर, उपस्थ देश के चक्र को स्वाधिष्ठान और गुदा प्रदेश के
चक्र को मूलाधार कहते हैं। भ्रूमध्य से ऊपर कपाल संपुट में सुषुम्ना
का ऊर्ध्व भाग चार रूपों में परिणत हो जाता है। सब से नीचे का
भ्रूमध्यस्थ अधोभाग (modula oblangata) कहलाता है,
उसके ऊपर छोटा मस्तिष्क (cerebellum or hind brain)
कहलाता है, इसको कपाल कंद कहते हैं, यहां पर पांचों ज्ञानेंद्रियों

सौंदर्य लहरी १४१
और स्वप्न की नाडियों का स्थान है, इसी को मनश्चक्र भी कहते
हैं। इसके ऊपर एक अति सूक्ष्म नलिका है जो सुषुम्ना के मध्यवर्ती
विल का वह भाग है जो छोटे दिमाग अर्थात् कपाल कंद को
सहस्रार (cerebrum) के मध्यवर्ती ब्रह्मरंध्र (Third Vent-
rical) से जोडता है। इस भाग के नीचे कपाल कंद के
सामने भी एक त्रिकोणाकृति कपाल रंध्र (Fourth ventrical)
है। (Third Ventrical) ब्रह्म रंध्र भी त्रिकोणा कृति ही है जो
पीछे से सामने की ओर फैला हुआ है। ब्रह्मरंध्र पर एक पुलसा
बना हुआ है, जिस पर सुषुम्ना पथ से आने वाले स्नायु समूह स्पर्श
कर के फिर सारे मस्तिष्क (cerebrum) के विभिन्न केन्द्रों को फैल
जाते हैं। इसलिये इस स्नायु समूह के प्रसार को सहस्रार कहते है।
गुदा के पीछे एक मांस पेशी है, जिसे कंद कहते हैं। वह
९ अंगुल लंबी और ४ अंगुल मोटी कही जाती है। इसके मध्य-
वर्ती नाभिवत् केन्द्र पर कुण्डलिनी के सोने का स्थान है। उस
स्थान को विषु चक्र भी कहते हैं, क्योंकि यहां शक्ति निष्क्रिय
सुप्तवत् रहती है, अथवा वह ईडा और पिंगला का एक स्थानीय
उद्गम स्थान होने के कारण, वहां चन्द्रमा और सूर्य दोनों का अभाव
सा रहता है अर्थात् दिन रात्रि एक समान गति रहित रहते हैं। विषु
दिन रात्रि के एक समान होने के समय को कहते हैं। कुण्डलिनी
को नाभि में धारण करने वाली मांस पेशी का कंद अधः सहस्रार
कहलाता है। क्योंकि योगियों के समष्टि प्राण देह की सब नाडियों
से खिंचकर पहिले यहां एकत्रित होते हैं और फिर सुषुम्ना में प्रवेश
करते हैं।

१५२ सौन्दर्यलहरी
ग्रीवा के ऊपर तालु का अन्तिम भाग नीचे की ओर लटका
करता है, उसे लंबिका ( काग ) कहते हैं। वह भी एक चक्र माना
जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद् के छठे अनुवाक् में इसको इन्द्रयोनि
नाम दिया गया है, जिसका शीर्षकपाल से संबंध है। और नीचे
उसका हृदयाकाश से भी संबंध है। इस प्रकार अहंवृत्ति को हृदया-
काश से ब्रह्म रंध्र में ले जाने का लंबिका द्वारा सुषुम्ना से बाहर भी
एक मार्ग है, जिसका कपाल कंद से सीधा संबंध है, अर्थात् वह
हृदय के अष्टदल पद्म का सीधा मनश्चक्र से संबंध जोडता है।
इसीलिये हृदय के इस चक्र को सुषुम्नागत षट् चक्रों से पृथक चक्र
माना जाता है।
ऊपर कहा जा चुका है कि कपाल कंद से पांचों ज्ञानेन्द्रियों
और उनके गोलकों से संबंध रखने वाली नाडियों का निकास है।
उनमें से एक नाडी ग्रीवा से नीचे उतरकर वक्षस्, उदर, कटि भाग
में गुदा तक नीचे उतरती है, उसे अंग्रेजी में Vagus nerve
कहते हैं, योग के आचार्यों ने उस के विभिन्न स्तरों पर विभिन्न
नाम दिये हैं, जैसे कूर्म, विश्वोदरी, कुहू इत्यादि। इस नाडी की
वाम शाखा निरर्थक सी है, परन्तु दक्षिण शाखा के तीन विभाग हैं,
अर्थात् वक्ष, उदर और कटि देश के भाग। वक्ष के भाग में प्राण,
उदर के भाग में समान और नीचे के भाग में अपान के स्थान हैं।
इस नाडी का संबंध ईडा और पिंगला की मुख्य नाडियों
(sympathetic columns) से भी है, और उनका संबंध
सुषुम्ना के चक्रों से है। इसलिये यह प्राण समान अपान की नाडी

सौंदर्य लहरी १४३
स्वतंत्र है और मन के आधीन कार्य नहीं करती । इसको स्वतंत्र
नाडीविभाग (autonomous system) कहते हैं ।
सुषुम्ना के तीन परत होते हैं ऊपर के परत वाले भाग को
वज्रा कहते हैं, उसके नीचे का परत चित्रा कहलाता है जिसके बीच
में एक नलिका है । सुषुम्नागत छः चक्र अथवा कमल चित्रा में होते
हैं और बीच वाली नलिका को पुष्प के बीच वाली नलिका सदृश
समझना चाहिये, उसे ही ब्रह्म नाडी या विरजा कहते हैं ।
इस श्लोक में जिन छः पद्मों के ऊपर महापद्मावटी में भगवती
की कला की स्थिति कही गई, वे चित्रास्थित छः चक्र अथवा पद्म
हैं ! छओं चक्रों के छः अधिदेवता हैं । मूलाधार के ब्रह्मा, स्वाधि-
ष्ठान के विष्णु, मणिपूर के रुद्र, अनाहत के ईश्वर, विशुद्ध के
सदाशिव और आज्ञा के पर शिव । इनके अरों अथवा दलों की
संख्या तत्वों की कला के अनुसार है । अग्नि की १०, सूर्य की
१२, चन्द्रमा की १६, कलाएं क्रमशः मणिपूर अनाहत और
विशुद्ध के दलों के बराबर हैं । ब्रह्मा विष्णु और रुद्र प्रत्येक की
दस २ कलायें हैं, ईश्वर की चार और सदाशिव की १६ कलायें हैं ।
मूलाधार की ४, स्वाधिष्ठान की ६, और आज्ञा की दो शिराओं
को भी कला कहें तो सब का योग पूरा १०० होता है । आज्ञा
में परशिव निष्कल है, जिसकी शक्ति की ही ये सब कलाए कही
जा सकी हैं, अर्थात् सहस्रार स्थित भगवती की कला के ये सब
अवान्तर भेद हैं, अथवा वे निम्न स्तरों पर चमकने वाली प्रतिबिंब
सदृश कही जा सकती हैं । कलाओं के नाम नीचे दिये जायेंगे ।

१४४ सौंदर्य लहरी
ऊपर कहा जा चुका है कि अनाहत चक्रस्थ सूर्य उन्मुख होकर
[चन्द्र सूर्य] आज्ञा के ऊपर स्थित अधोमुख चन्द्रमा पर
अपना प्रकाश डालता है तब दोनों के योग
से चन्द्रमा में से अमृत स्रवने लगता है, जिसका प्रमाण कलाओं के
अनुसार समझना चाहिये । अनाहत चक्र के १२ पत्रों पर १२
आदित्य हैं और विशुद्ध चक्र के १६ पत्रों पर चन्द्र की १६ कलायें ।
चन्द्रमा का संबंध मन से है और सूर्य का संबंध प्राण
से । कहा है 'चन्द्रमा मनसो जातः' 'आदित्यो वै प्राणः'
'आत्मन एषः प्राणो जायते' । चन्द्रमा ईश्वर के मन से उत्पन्न हुआ
है, और आदित्य स्वयं समष्टि ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने
वाला प्राण है । प्राण का उदय सीधा आत्मा से होता है । शरीर
में मुख्यतः दो प्रकार की नाड़ियों के विभाग हैं । एक प्रकार की
नाडियां वे हैं जो मेरु दण्ड के मध्य में स्थित सहस्रार से नीचे
उतरने वाली सुषुम्ना से निकल कर सारे शरीर में फैलती हैं और
सुषुम्नागत छवों चक्र, जिनके स्थान ग्रीवा, वक्षः स्थल, कटि, मूत्र
और अधो भाग हैं, उनके निकास के केन्द्र हैं । इन नाड़ियों का
मन और प्राण दोनों से संबंध है । और दूसरे प्रकार की वे नाडियां
हैं जो आज्ञा चक्र के पास के मनश्चक्र (hind brain) से निकल
कर श्रोत्र, नेत्र, मुख, जिह्वा में फैल जाती हैं, और उनमें से एक
कूर्म (विश्वोदरी) (Vagus nerve) नीचे उतर कर गुदा तक
फैली हुई है । इसका वाम भाग छोटा है और कुछ विशेष कार्य
नहीं करता, परन्तु दक्षिण भाग फेफडों, और हृदय में श्वास प्रश्वास
का कार्य, उदर में पाचन और रस वितरण का कार्य और अधो भाग

AUTONOMIC NERVOUS SYSTEM
PARASYMPATHETIC      SYMPATHETIC

(हस्ताक्षर / Signature:)
C.R. WANKAR
1937


PARASYMPATHETIC SYSTEM

1- Optical, 2- Other sensory nerves.
3. Right Vagus nerve, 4. Coccygeal
connections.


SYMPATHETIC SYSTEM

Different connections of the symp
thetic columns (Ida & Pingala) with spin
cord on one side and different limbs on
the other.

The provided image appears to be completely blank/white, and there is no visible text or content to transcribe.

Please re-upload or share the correct image of the page containing the text.

सौंदर्य लहरी १४५
में मलविसर्जन का कार्य करती है। पंच प्राणों की क्रियायें
इसही नाडी से संबंध रखने वाली क्रियायें है। जो मन के
आधीन नहीं हैं और सोते जागते सदा अपना कार्य किया
करती हैं। क्योंकि प्राण कभी सोता नहीं, मन सोता जागता
है। इस दक्षिण वैगस नाडी का संबंध सुषुम्ना के दक्षिण पार्श्व की
पिंगला से है, ईडा से नहीं है। इसलिये चन्द्रमा का संबंध ईडा से,
सूर्य का संबंध पिंगला से रहता है और ईडा को चन्द्र नाडी और
पिंगला को सूर्य नाडी कहते हैं।
सूर्य की किरणों में प्रकाश, उष्णता और प्राण शक्ति अर्थात्
जीवन प्रद शक्ति की त्रिधा शक्ति होती है। उनमें उष्णता विष
का कार्य करती है, परन्तु विष भी अल्प मात्रा में अमृत का कार्य
करता है, इसलिये सूर्य की उष्णता एक परिमित ताप मान की अवधि
में जीवन की रक्षा के लिये सहायक होती है और उस अवधि के
बाहर मारक सिद्ध हो जाती है। चन्द्रमा सूर्य की उष्णता को स्वयं पान
कर लेता है और प्रकाश और प्राण शक्ति को अमृत के रूप में भूमि
पर अपनी कलाओं द्वारा बरसाया करता है। यह बाह्य क्रिया प्राणि
मात्र के शरीर पर ईडा और पिंगला नाडियों द्वारा प्रभाव डालती है।
शुक्ल पक्ष में अमृत की वृद्धि होती है और कृष्ण पक्ष में कमी।
साधारण प्राणियों में अमृत का संचय नहीं होने पाता, अधोमुख
अनाहत चक्र अपनी उष्णता से सब अमृत को सुखाता रहता है।
इसलिये उसको विष की वर्षा करने वाला माना गया है।
कुण्डलिनी के जागने पर उसके उद्ध्व मुख होने पर उसकी क्रिया

१४६ सौन्दर्य लहरी
चन्द्र मण्डल पर होने लगती है और चन्द्र मण्डल से प्रसवित अमृत
सब नाडियों को सींचने लगता है।
इस विषय पर विशेष जानकारी के लिये लेखक की Divine
Power नाम की अंग्रेजी पुस्तक देखें।
श्रीमद् भागवत के प्रथम स्कन्द के १५ वें अध्याय में ४१,
४२ श्लोक संपूर्ण योग मार्ग के अनुष्ठान का बडा सुन्दर वर्णन करते
हैं। जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान के परम धाम चले जाने का
समाचार जाना तो उन्होंने जिस क्रम से ब्रह्मात्मैक्य कर के
उत्तरा खण्ड की ओर प्रस्थान किया था। उक्त श्लोक इस प्रकार हैं।
वाचं जुहाव मनसि तत्प्राणे इतरे च तं ।
मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वेह्यजोहवीत् ॥ ४१
त्रित्वे हुत्वाथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः ।
सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ४२
अर्थः— उस मुनि (युधिष्ठिर) ने बाणि की मन में आहुति
दी, और मन की प्राण में, प्राण की अपान में और उत्सर्ग सहित
अपान की मृत्यु में और मृत्यु की आहुति पञ्चत्व में दी, फिर
पञ्चत्व की त्रित्व में आहुति देकर, उस (त्रित्व) की एकत्व में
आहुति दी, इस प्रकार सब की आत्मा में आहुति देकर आत्मा की
आहुति अव्यय ब्रह्म में दी। अर्थात मौन धारण कर के और मन
को संकल्प विकल्प रहित एकाग्र कर के बाणि को मन में लीन कर
लिया, फिर मन का प्राण से और प्राण का अपान से योग किया,

सौंदर्य लहरी १४७
और तीनों को सुषुम्ना द्वार में प्रवेश कर के मृत्यु को जीत लिया,
मानों मृत्यु को षट् चक्र वेध द्वारा पांचों तत्वों के वेध में लीन कर
दिया, फिर पांचों तत्वों को तीनों ब्रह्म, विष्णु और रुद्र ग्रंथियों के
वेध द्वारा तीनों गुणों में लीन कर दिया और तीनों गुणों को उनके
एक कारणभूत महत् तत्व में लीन कर दिया, इस प्रकार सब को
आत्मा में और आत्मा को परमात्मा अक्षर ब्रह्म में लीन कर दिया ।
तत्पश्चात् 'अहं ब्रह्मास्मि' के ज्ञान में निदिध्यासन द्वारा स्थिति
रखते हुए सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति की ।
मणिपूर में अग्नि की दस कलाएं सारे शरीर के व्यापार को
[तत्वों और चक्रों] धारण किये हुए हैं। अग्नि का स्थान योनि
[के अधि देवों की] स्थान में बताया जा चुका है उसकी दस कलाएं
[कलाओं के नाम] मणिपूर में उठा करती हैं। मणिपूर के दस दलों
का प्रत्येक दल इन कलाओं का एक २ दल
है। अग्नि की कलाओं के नाम ये हैं:—
धूम्राचि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिंगी, सुश्रिया,
सुरूपा, कपिला, हव्यवाहिनी और कव्यवाहिनी ।
अनाहत् चक्र के १२ दल सूर्य की १२ कलायें हैं, उनके
नाम ये हैं—तपिनी, तापिनी, धूम्रा, मरीची, ज्वालिनी, रुची,
सुषुम्ना, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी और क्षमा ।
विशुद्ध चक्र के १६ दल चन्द्रमा की १६ कलायें हैं, उनके
नाम ये हैं—अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टी, पुष्टी, रती, धृति,

१४८ सौंदर्य लहरी
शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीति, अङ्गदा,
पूर्णा और पूर्णामृता ।
आज्ञाचक्र के नीचे वायु और आकाश में रुद्रग्रन्थि है, रुद्रकी
१० कलायें हैं, जिनके नाम ये हैं—तीक्ष्णा, रौद्री, भया, निद्रा,
तन्द्रा, क्षुधा, क्रोधिनी, क्रिया, उद्गारी, और मृत्यु ।
मणिपूर के ऊपर अग्नि और सूर्य मण्डलों में विष्णुग्रन्थि है, विष्णु
की भी १० कलायें हैं, जिनके नाम ये हैं। जरा, पालिनी, शान्ति,
ईश्वरी, रति, कामिका, वरदा, ह्लादिनी, प्रीति, और दीर्घा ।
मूलाधार और स्वाधिष्ठान में पृथिवी और जलकी ब्रह्मग्रन्थि है,
ब्रह्माकी १० कलायें ये हैं।—सृष्टि, ऋद्धि, स्मृति, मेधा, कान्ति,
लक्ष्मी, द्युति, स्थिरा, स्थिति, और सिद्धि । तीनों के मध्य चार
रंग की दीप शिखा तुल्य ईश्वर कला है, जिसके रंग पीत, श्वेत,
अरुण और कृष्ण ( असित ) हैं । इसका स्थान हृदय में है । शिखा
के ऊपर उसीका अग्रभागवत् सदाशिव कला है । जो विद्युत्
सदृश कही जाती है ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ।
नलितोयद मध्यस्थाद्विद्युल्लेखेव भास्वरा ॥
नीवारशूकवत्तन्वी पीताभास्वत्यणूपमा ।
तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः ॥
सब्रह्मा सशिवः सहरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
नारायणोपनिषद् खण्ड (१३-२)

सौंदर्य लहरी १४२
अर्थः—उसके मध्य अग्नि की शिखा, पतली ऊपर को
उठी हुई खड़ी है। जो नीले मेघों में विद्युत् रेखा के सदृश
चमकती है, वह नीवारशूक के सदृश पतली, पीत वर्णा,
अणु के सदृश चमकती है। उसकी शिखा के मध्य में
परमात्मा विराजता है, वह ही ब्रह्मा, शिव, हरि, इन्द्र और
परम स्वराट् अक्षर ब्रह्म है।
इसी को सदाख्य कला समझना चाहिये। सदाख्य तत्व की
१६ कलायें नीचे दी जाती हैं। निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति,
इन्धिका, दीपिका, रेचिका, मोचिका, परा, सूक्ष्मा, सूक्ष्मामृता,
ज्ञाना, ज्ञानामृता, आप्यायिनी, व्यापिनी और व्योमरूपा।
सब कलाओं का योग ८८ होता है, इनमें मूलाधारस्थ पृथिवी
की ४, जल की छः और आज्ञाचक्र की ईडा, पिंगला अथवा
सहस्रार की ओर बहनेवाली वरणा और असी दो कलायें मिलाने से
सब की संख्या पूरी १०० होती है। ये सब भगवती कुण्डलिनी
देवी की ही कलायें हैं। मूलाधार से उठकर सारे कुलपथ में उक्त
कलाओं के विविध रूपों में प्रकाशित होती हुई, कुण्डलिनी शक्ति
सहस्रार में अपने पति शिवजी से मिलने जब जाती है तब मानों
अनेक शृंगारों को धारण करती है।
मूलाधार से नीचे विषु संज्ञक और अधः सहस्रार दो चक्र और
भी माने जाते हैं और आज्ञा के ऊपर बिन्दु
आज्ञा के ऊपर अर्धेन्दु अथवा अर्धचन्द्रिका, निरोधिका, नाद,
९ स्तर महानाद अथवा नादान्त, शक्ति, व्यापिका,

१५० सौन्दर्य लहरी
समनी और उन्मनी ९ स्तर हैं। इनमें प्रथम चार स्तरों की
पांच २ कलायें ५ महाभूतों के अनुसार हैं। नादान्त में वाच्य
वाचक का भेद लीन हो जाता है। नाद को वाचक अर्थात्
शब्दात्मक समझना चाहिये, उसके ५ स्तर ५ तत्वों के योग से
उत्पन्न होने वाले शब्द कहे जा सकते हैं। नीचे के ३ स्तर रूपात्मक
हैं, निरोधिका में रूप का निरोध हो जाता है। शक्ति स्तर पर
तीव्र आनन्द लहरी का अनुभव होता है, व्यापिका पर शून्य स्थान
है, इसका वेध दिव्यकरण की विशेष क्रिया द्वारा होता है। समनी
में सास्मिता समाधि होती है, और उन्मनी में उन्मनी अवस्था।
इन स्तरों को पातञ्जल योग दर्शन के अनुसार निरोधिका पर
निर्वितर्क, नादान्त पर निर्विचार, व्यापिका पर सानन्द, और समनी
पर सास्मिता संप्रज्ञात समाधियों का स्तर समझा जा सकता है।
सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्र मण्डलात्
मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्तै चिदात्मने। यो. शि. (६,३)
सुषुम्ना शांभवी शक्तिः शेषास्त्वन्ये निरर्थकाः ।
*हृल्लेखे परमानन्दे तालुमूले व्यवस्थिते ॥ (६, १९)
अत उर्ध्वं *निरोधेतु मध्यमं मध्यमध्यमं ।
उच्चारयेत्पराशक्तिं ब्रह्मरंध्र निवासिनीम् ॥ (६, १९)
गमागमस्थं गगनादि शून्यं
चिद्रूपदीपं तिमिरन्धनाशम् ।
*नोट:—हृल्लेखा और निरोधिका स्त्रीवाचक पद हैं, परन्तु यहां
पुरुष वाचक प्रयुक्त किये गये हैं ये छान्दस प्रयोग हैं।

सौन्दर्य लहरी १५१
पश्यामि तं सर्व जनान्तरस्थं
नमामि हंसं परमात्मरूपम् ॥ ( ६, २० )
अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनिः ।
ध्वनेरन्तर्गतं ज्योतिर्ज्योतिषोऽन्तर्गतं मनः ॥ ( ६, २१ )
तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ।
तस्मात्सर्व प्रयत्नेन गुरुपादं समाश्रयेत् ॥ ( ६, २२ )
आधार शक्ति निद्रायां विश्वं भवति निद्रया ।
तस्यां शक्ति प्रबोधेतु त्रैलोक्यं प्रतिबुध्यते ॥ ( ६, २३ )
ब्रह्मरंध्रे महास्थाने वर्तते सततं शिवा ।
चिच्छक्तिः परमा देवी मध्यमे सुप्रतिष्ठिता ॥ ( ६,४७ )
माया शक्ति र्ललाटाग्रभागे व्योमाम्बुजे तथा ।
नादरूपा पराशक्तिर्ललाटस्यतु मध्यमे ॥ ( ६, ४८ )
भागे बिन्दुमयी शक्तिर्ललाटस्या परांशके ।
बिन्दु मध्ये च जीवात्मा सूक्ष्मरूपेण वर्तते ॥ ( ६, ४९ )
हृदये स्थूल रूपेण मध्यमेन त मध्यमे ।
अर्थः— सुषुम्ना, कुण्डलिनी, चन्द्र मण्डल से टपकने वाली
सुधा और मनोन्मनी के रूपों में प्रकट होने वाली चिदात्मिका
महाशक्ति को नमस्कार है । सुषुम्ना शांभवी शक्ति है, और शेष अन्य
सब नाडियां निरर्थका हैं । तालु मूल अर्थात् ६टे लंबिका स्थान पर
परमानन्द स्वरूपिणी हृल्लेखा (ह्रीं) शक्ति व्यवस्थित है । वहां पर

१५२ सौन्दर्य लहरी
ब्रह्मरंध्र में निवास करने वाली पराशक्ति का उच्चारण करना चाहिये ।
फिर उसके ऊपर निरोधिका के ( १० वें स्थान ) के मध्य होते
हुए मध्य २, जहां गमनागमन की स्थिरता है, गमनादि से शून्य
है और तिमिरांध का नाश करने वाला चिद्रूप दीपक का स्थान है,
जाना चाहिये । सब मनुष्यों के अन्तर में विराजने वाले उस परमात्म-
रूप हंस कला को नमस्कार है । अनाहत् ( ४ थे ) चक्र से उदय होने
वाले शब्द, और उस शब्द में जो ध्वनि ( ११ वें और १२ वें स्तर
पर ), उस ध्वनि के अन्तर्गत जो ज्योति ( १३ वां स्तर ) है, उस
ज्योति में मन लगाकर जहां मन का लय हो जाता है वहां ( १४ वें )
से सहस्रार तक का स्तर विष्णु का परम पद है । उसके लिये पूर्ण
प्रयत्न के साथ श्री गुरु की शरण में जाना चाहिये । ( क्योंकि
१४ वें स्तर का बेध बिना दिव्य करण के नहीं होता ।) कहा
है कि मूलाधार शक्ति के सोते रहने पर सारा विश्व मोह निद्रा में
सोता रहता है, और उस शक्ति के प्रबुद्ध होने पर त्रिलोकी की
शक्तियां जाग उठती हैं। ब्रह्मरंध्र रूपी महास्थान ( सहस्रार ) में
शिवा शक्ति सदा रहती है, वहां ही परमा चिति शक्ति देवी मध्य में
सुप्रतिष्ठित है, विशुद्ध ( ५ वें ) व्योम चक्र में और ललाट के अग्र
भाग में माया शक्ति है । नाद रूपा परा शक्ति ललाट के मध्य
भाग ( ११ ) में है और विन्दुमयी शक्ति ( ८ वें स्तर पर ) ललाट
के अपरांश भाग में है। बिन्दु में जीवात्मा सूक्ष्म रूप से रहता है,
हृदय में स्थूल रूप से रहता है और दोनों के मध्य में मध्य
रूप से रहता है ।

सौंदर्य लहरी १५३
पूर्वोक्त अनुभव प्राप्त योगी को महा वाक्यों के ज्ञान का उदय
'अहं ब्रह्मास्मि' होता है, इसलिये अगले श्लोक में 'भवानि त्वं'
ज्ञान का उदय पद से ज्ञान की भूमिका का उल्लेख किया
गया है ।
[ २२ ]
भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणा
मिति स्तोतुं वाञ्छन् कथयति भवानि त्वमिति यः ।
तदैव त्वं तस्मै दिशसि निजसायुज्यपदवीं
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रस्फुटमकुटनीराजितपदाम् ॥
कठिन शब्दः—भवानि=हे भवानि; और मैं हो जाऊं । नीरा-
जित पदां=जिस पद की आरती उतारी जाती है ।
अर्थः—'हे भवानि ! तू मुझ इस दास पर भी अपनी
करुणामयी दृष्टि डाल, इस प्रकार कोई मुमुक्षु स्तुति करते समय
भवानि त्वं' (मैं तू हो जाऊं) इस पद का ही उच्चारण कर
पाता है, उस ही समय तू उसे निज सायुज्य पद प्रदान कर
देती है, जिस पद की ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र भी अपने मुकुटों
के प्रकाश से आरती उतारा करते हैं । अर्थात् (प्रणाम करते
रहते हैं) ।
सं० टि०:—भाष्यकार डिंडिम का मत है कि बाह्याभ्यन्तर
यागों का वर्णन करके शंकर भगवत्पाद इस श्लोक में प्रेमरूपा भक्ति

१५४ सौंदर्य लहरी
की उत्कृष्टता दिखाते हैं, जिससे सायुज्यमोक्ष की प्राप्ति अविलंब
भगवती के अनुग्रह मात्र से प्राप्त हो जाती है ।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्वतोज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥
गीता० (१८, ५५)
व्याख्याः- भाव यह है कि जो ईश्वरी सकाम अनुष्ठान
करने वालों को उनके सुकृतों का फल देती है, वह मुमुक्षुओं को
ज्ञान का फलस्वरूपे सायुज्य पदवी भी देती है।
'प्रज्ञानंब्रह्म', 'अहम्ब्रह्मास्मि', 'तत्वमसि' और 'अयमात्माब्रह्म'
ऋक् यजुर् साम और अर्थबेदों के क्रमशः चार महावाक्य जीव-
ब्रह्मैक्य का लक्ष्य कराते हैं। गुरु शिष्य को पहिले प्रज्ञानात्मा का
स्वरूप दिखाता है और फिर उपदेश करता है कि यह आत्मा ब्रह्म
है और वह तू है। फिर शिष्य 'मैं ब्रह्म हूं' का अपरोक्ष अनुभव
करके उस पद में अपनी स्थिति रखता है। जिसको निदिध्यासन
कहते है। उपदेश के श्रवण के पश्चात् युक्तियों द्वारा समझने को
मनन कहते हैं, और तत्पश्चात् नित्य आत्मस्थिति में रहने कों
निदिध्यासन कहते हैं।
इंद्रियों द्वारा विषयों के जानने को आज्ञान कहते हैं, भिन्न-
भिन्न पदार्थों के ज्ञान को नामरूपात्मक भेद से पहचानने को संज्ञान
कहते हैं और ध्यान पूर्वक समझ कर प्राप्त किये जाने वाले विशेष-
ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। परन्तु ये सब ज्ञान जिस एक निरपेक्ष

ज्ञान के सापेक्षिक भेद है उसको प्रज्ञान कहते हैं। वह सबका आधार
स्वरूप प्रज्ञानात्मा ही ब्रह्म है। ब्रह्मात्मैक्य की उपलब्धि श्रवण मनन
निदिध्यासन के द्वारा कालान्तर में होती है। परन्तु शंकर भगवत्पाद
इस श्लोक में कहते हैं कि जाने बिना जाने भगवती की स्तुति करते
समय जो कोई इस श्लोक की प्रथम पंक्ति के 'भवानि त्वं' इतने मात्र
पद का उच्चारण कर पाता है, तो भगवती उसे सायुज्य मोक्ष दे देती
है। क्योंकि 'भवानि त्वं' पद का यह भी अर्थ होता है
कि मैं तू बन जाऊं। क्योंकि भगवती यह मान क्र कि यह मेरा
भक्त मुझ में लीन होकर मेरे सायुज्य पद की प्राप्ति के लिये प्रार्थना
करता है, ऐसा समझा जाने से 'दासे मयि इत्यादि' उच्चारण होने के
पूर्व ही वह सायुज्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
समाधि में समनीस्तर पर पहुंच कर योगी जो इच्छा करता है
उसकी वह कामना पूर्ण हो जाती है, इसलिये अहंब्रह्मास्मि का ध्यान
करने वाला ज्ञानी भी उस स्तर पर ब्रह्मात्मैक्य की अपरोक्षानुभूति
प्राप्त कर सकता है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं।
सायुज्य मोक्ष अन्य सालोक, सामीप्य और सारूप्य मोक्षों से
ऊंची है अर्थात् सगुण ब्रह्म के लोकों से ब्रह्मभाव ऊंचा है और
इंद्रलोक, ब्रह्मलोक, एवं विष्णुलोक उस पद के नीचे ही रह जाते
हैं। जैसा कि भगवान कहते हैं
तमेवचाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्ति प्रसृता पुराणी।
और (गीता १५, ४)
ततोमांतत्वतोज्ञात्वा विशते तदनंतरम् ॥
(१८, ५५)