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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 415 में से

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पृष्ठ 200

१५० सौन्दर्य लहरी
समनी और उन्मनी ९ स्तर हैं। इनमें प्रथम चार स्तरों की
पांच २ कलायें ५ महाभूतों के अनुसार हैं। नादान्त में वाच्य
वाचक का भेद लीन हो जाता है। नाद को वाचक अर्थात्
शब्दात्मक समझना चाहिये, उसके ५ स्तर ५ तत्वों के योग से
उत्पन्न होने वाले शब्द कहे जा सकते हैं। नीचे के ३ स्तर रूपात्मक
हैं, निरोधिका में रूप का निरोध हो जाता है। शक्ति स्तर पर
तीव्र आनन्द लहरी का अनुभव होता है, व्यापिका पर शून्य स्थान
है, इसका वेध दिव्यकरण की विशेष क्रिया द्वारा होता है। समनी
में सास्मिता समाधि होती है, और उन्मनी में उन्मनी अवस्था।
इन स्तरों को पातञ्जल योग दर्शन के अनुसार निरोधिका पर
निर्वितर्क, नादान्त पर निर्विचार, व्यापिका पर सानन्द, और समनी
पर सास्मिता संप्रज्ञात समाधियों का स्तर समझा जा सकता है।
सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्र मण्डलात्
मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्तै चिदात्मने। यो. शि. (६,३)
सुषुम्ना शांभवी शक्तिः शेषास्त्वन्ये निरर्थकाः ।
*हृल्लेखे परमानन्दे तालुमूले व्यवस्थिते ॥ (६, १९)
अत उर्ध्वं *निरोधेतु मध्यमं मध्यमध्यमं ।
उच्चारयेत्पराशक्तिं ब्रह्मरंध्र निवासिनीम् ॥ (६, १९)
गमागमस्थं गगनादि शून्यं
चिद्रूपदीपं तिमिरन्धनाशम् ।
*नोट:—हृल्लेखा और निरोधिका स्त्रीवाचक पद हैं, परन्तु यहां
पुरुष वाचक प्रयुक्त किये गये हैं ये छान्दस प्रयोग हैं।