सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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[बायाँ स्तम्भ]
एकत्र हुए जीवोंकी संख्या संख्यात अर्थात् एक-एक
गुणस्थानमें २९९ होती है । कहा भी है—'एक गुण-
स्थानमें २९९ उपशमक होते हैं ।'
विशेषाथं—उपशम श्रेणीके प्रत्येक गुणस्थानमें एक
समयमें चारित्रमोहनीयका उपशम करता हुआ
जघन्यसे एक जीव प्रवेश करता है और उत्कृष्टसे
चौवन जीव प्रवेश करते हैं । यह कथन सामान्यसे
है । विशेषकी अपेक्षा तो आठ समय अधिक वर्ष
पृथक्त्व कालमें उपशम श्रेणीके योग्य लगातार आठ
समय होते हैं । उनमें से प्रथम समयमें एक जीवको
आदि लेकर उत्कृष्ट रूपसे सोलह जीव तक उपशम
श्रेणीपर चढ़ते हैं। दूसरे समयमें एक जीवको आदि
लेकर उत्कृष्ट रूपसे चौबीस जीव तक चढ़ते हैं ।
तीसरे समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्ट रूपसे
तीस जीव तक चढ़ते हैं; चौथे समयमें एक जीवको
आदि लेकर उत्कृष्ट रूपसे छत्तीस जीव तक चढ़ते
हैं । पांचवें समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्ट
रूपसे बयालीस जीव तक चढ़ते हैं। इसी तरह छठे
समयमें अड़तालीस जीव तक और सातवें तथा आठवें
समयमें एक जीवको आदि लेकर उत्कृष्टसे चौवन-
चौवन जीव तक उपशम श्रेणीपर चढ़ते हैं । इन
सबका जोड़ ३०४ होता है किन्तु कितने ही आचार्य
उसमें पांच कम करके २९९ कहते हैं । धवलामें
वीरसेन स्वामीने २९९ के प्रमाणको ही आचार्य-
परम्परागत कहा है देखो पु० ३, पृ० ९२ ।
ननु चाष्टसमयेषु षोडशादीनां समुदितानां चतुर-
धिकशतत्रयं प्राप्नोति; तद्युक्तम्, अष्टसमयेषूप-
शामका निरन्तरं भवन्तः परिपूर्णा न लभ्यन्ते ।
किं तर्हि ? पञ्चहीना भवन्तीति चतुर्गुणस्थानवर्ति-
नामप्युपशमकानां समुदितानां षण्णवत्यधिकान्येका-
दशशतानि भवन्ति ॥११९६॥
[ शंका—आठ समयोंमें सोलह आदि संख्याओंका
जोड़ तीन सौ चार प्राप्त होता है ? समाधान—
ऐसा कहना युक्त नहीं है आठ समयोंमें उपशामक
निरन्तर होते हुए भी पूर्ण नहीं होते हैं किन्तु पांच
कम होते हैं । इसलिए आठवेंसे ग्यारहवें तक चार
गुणस्थानवर्ती उपशमकोंका जोड़ ग्यारह सौ छियानबे
होता है । ]
[दायाँ स्तम्भ]
२४. १४—चतुर्णां क्षपकाणामयोगकेवलिनां चाष्टा
समयक्रमः पूर्ववद् द्रष्टव्यः । केवलं तेषामुपशामकेभ्यो
द्विगुणा संख्या प्रतिपत्तव्या । तद्युक्तं—
'बत्तीसं अडदालं सट्ठी बाहत्तरी य चुलसीदि ।
छण्णऊदी अट्ठुत्तर सयमहट्ठुत्तरसयं च बोधव्वा ॥'
[ गो० जी०, ६२७ ]
३२, ४८, ६०, ७२, ८४, ९६, १०८, १०८ । अत्राप्येको
वा द्वौ वा इत्याद्युत्कृष्टाष्टमसमयप्रवेशापेक्षया प्रोक्तम् ।
स्वकालेन समुदिताः प्रत्येक मष्टानवत्युत्तरपञ्चशत-
परिमाणा भवन्ति । ५९८। गुणस्थानपञ्चकवर्तिनां
क्षपकाणां समुदितानां दशोनानि त्रीणि सहस्राणि
भवन्ति । तद्युक्तम्—
'खीणकसायाण पुणो तिण्णि सहस्सा दसूणया
मणिया ।' ॥२९९०॥
[ चारों क्षपकोंका और अयोगकेवलियोंका आठ रूप
समयक्रम उपशमकोंकी तरह जानना चाहिए । अन्तर
केवल इतना है कि उनकी संख्या उपशमकोंसे दूनी
जाननी चाहिए, कहा है—'बत्तीस, अड़तालीस,
साठ, बहत्तर, चौरासी, छियानबे, एक सौ आठ, एक
सौ आठ जानना चाहिए ।।'
यहाँ भी एक, दो या तीन आदिसे लेकर उत्कृष्टसे
आठवें समयमें प्रवेश तक उक्त संख्या कही है । अपने
कालमें एकत्र हुए प्रत्येक क्षपकका परिमाण ५९८
होता है । और चारों क्षपक तथा पाँचवें अयोग-
केवलि गुणस्थानवर्ति जीवोंका परिमाण दस कम
तीन हजार होता है । कहा भी है—क्षीण कषायोंका
परिमाण दस कम तीन हजार अर्थात् दो हजार नौ
सौ नब्बे होता है । ]
२४. १५—सयोगकेवलिनामप्युपशमकेभ्यो द्विगुण-
त्वादष्टसमयेषु प्रथमादिसमयक्रमेणैको वा द्वौ वेत्यादि
द्वात्रिंशदाद्युत्कृष्टसंख्या यावत् संख्याभेदः प्रतिपत्तव्यः ।
नन्वेवमुदाहृतक्षपकेभ्यो भेदेनाभिधानमेषामनर्थक-
मिति चेत् न, स्वकालसमुदितसंख्यापेक्षया तेषां
तेभ्यो विशेषसंभवात् । सयोगकेवलिनो हि स्वकाले
समुदिताः शतसहस्रपृथक्त्वसंख्याः अष्टलक्षाष्ट-
नवतिसहस्राण्यधिकपञ्चशतपरिमाणाः ८९८५०२।
उक्तं च—