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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 558 में से

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पृष्ठ 491

परिशिष्ट २ ३७९
१३.१२ औदारिक-वैक्रियिकाहारकलक्षणत्रयस्य षट्-
पर्याप्तीनां च योग्यपुद्गलादानं नोकर्म ।
१३. १४. आविष्टः परिणतः ।
१३. १५. अप्रकृतनिराकरणाय अप्रकृतस्याप्रस्तुतस्य
मुख्यजीवादेर्निराकरणाय । प्रकृतस्य प्रस्तुतस्य नाम-
स्थापनाजीवादेर्निरूपणाय ।
§. २३
प्रमाणनयैः....॥६॥
§. २४
१५. ४ प्रगृह्य-परिच्छिद्य । प्रमाणतः - प्रमाणेनार्थं,
पश्चात् स्वरूपादिचतुष्टयापेक्षया सत्त्वमेव पररूपादि-
चतुष्टयापेक्षयाऽसत्त्वमेवेत्यादिरूपतया, परिणतिविशेषात्
प्रवीणताविशेषात् । यदि वा परिणतिविशेषात्
सत्त्वासत्त्वनित्यत्वानित्यत्वादिलक्षणमर्थगतं परिणाम-
विशेषमाश्रित्य ।
निर्देशस्वामित्व...॥७॥
§. २६
१६. ६ नरकगतौ पूर्वं बद्धायुष्कस्य पश्चाद् गृहीत-
क्षायिकक्षायोपशमिकसम्यक्त्वस्याधः पृथिव्यामुत्पादा-
भावात् । प्रथमपृथिव्यां पर्याप्तिकापर्याप्तिकानां क्षायिकं
क्षायोपशमिकं चास्ति । ननु वेदकयुक्तस्य तिर्यङ्नरकेष्व्-
१त्पादाभावात् कथमपर्याप्तिकानां तेषां क्षायोपशमिक-
मिति । तदयुक्तं, सप्तप्रकृतीनां क्षपणाप्रारम्भकवेदक-
युक्तस्य कृतकरणस्य जीवस्यान्तर्मुहूर्ते सति क्षायिकाभि-
मुखस्य तत्रोत्पादे विरोधाभावात् । एवं तिरश्चामप्य-
पर्याप्तिकानां क्षायोपशमिकं ज्ञेयम् ।
[ जिसने पहले नरकगतिकी आयुका बन्ध किया है
और पीछे क्षायिक या क्षायोपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण
किया है वह जीव नीचे के नरकोंमें उत्पन्न नहीं होता ।
अतः पहले नरकमें पर्याप्तिक और अपर्याप्तिक नारकियों
के क्षायिक और क्षायोपशमिक सम्यक्त्व होते हैं ।
शंका- वेदक सम्यक्त्व सहित जीव तिर्यंचोंमें नरकों-
में उत्पन्न नहीं होता । तब कैसे उनके अपर्याप्त
अवस्थामें क्षायोपशमिक सम्यक्त्व सम्भव है ?
उत्तर- ऐसा कहना उचित नहीं है, क्योंकि सात
प्रकृतियोंकी क्षपणाके प्रारम्भक वेदकसम्यक्त्वसे युक्त
जीव कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि होकर जब क्षायिक-
सम्यक्त्वके अभिमुख होता है तब यदि वह मरता है
तो कृतकृत्य वेदक कालके अन्तर्मुहूर्त प्रमाण चार
भागोंमें-से यदि प्रथम भागमें मरता है तो देवोंमें
उत्पन्न होता है, दूसरे भागमें मरनेपर देव या मनुष्यों-
में उत्पन्न होता है, तीसरे भागमें मरनेपर देव मनुष्य
या तिर्यंचोंमें उत्पन्न होता है और चतुर्थ भागमें मरने-
पर चारोंमें-से किसी भी गतिमें उत्पन्न होता है, अतः
वेदक सम्यग्दृष्टिके तिर्यंचगति और नरक गतिमें उत्पन्न
होनेमें कोई विरोध नहीं है, इसी तरह तिर्यंच
अपर्याप्तिकोंके भी क्षायोपशमिक सम्यक्त्व जानना
चाहिए ] ।
१७.१ तिरश्चीनां क्षायिकं नास्ति । कुत इति चेदु-
च्यते-कर्मभूमिजो मनुष्य एव दर्शनमोहक्षपणप्रारम्भ-
को भवति । क्षपणप्रारम्भकालात्पूर्वं तिर्यक्षु बद्धायुष्को-
ऽप्युत्कृष्टभोगभूमिजतिर्यक्पुरुषेष्वेवोत्पद्यते न तिर्यक्-
स्त्रीषु । तदुक्तम्-
'दंसणमोहक्खवणो पट्ठवगो कम्मभूमिजादो दु ।
णियमा मणुसगदीए णिट्ठवगो चावि सव्वत्थ ॥'
( कसायपा० १०६ )
पट्ठवगो प्रारम्भकः । णिट्ठवगो स्फोटिकः ।
[ तिर्यंचियोंके क्षायिक सम्यक्त्व नहीं होता, क्योंकि
कर्मभूमिमें जन्मा हुआ मनुष्य ही दर्शन मोहके क्षपण-
का प्रारम्भ करता है । क्षपण प्रारम्भ करनेसे पहले
तिर्यंचोंकी आयु बाँध लेनेपर भी वह मरकर उत्कृष्ट
भोगभूमिके तिर्यंच पुरुषोंमें ही उत्पन्न होता है
तिर्यंचस्त्रियोंमें नहीं । कहा भी है 'दर्शन मोहकी
क्षपणाका प्रारम्भक नियमसे मनुष्य गतिमें कर्म-
भूमिमें जन्मा जीव ही होता है । और निष्ठापक सब
गतियोंमें होता है।' गाथामें 'आये पट्ठवगो' शब्द का
अर्थ प्रारम्भक है और 'णिट्ठवगो'का अर्थ पूरक है । ]
१७.३ मानुषीणां भाववेदस्त्रीणां न द्रव्यवेदस्त्रीणां
तासां क्षायिकासंभवात् ।
[ मानुषीका अर्थ भाववेदी स्त्री है द्रव्यवेदी स्त्री नहीं,
क्योंकि द्रव्यवेदी स्त्रियोंके क्षायिक सम्यक्त्व संभव नहीं
है ] ।
१. उत्पद्यते हि वेदकदृष्टिः स्वमरेषु कर्मभूमिषु ।
कृतकृत्यः क्षायिकदृग् बद्धायुष्कश्चतुर्गतिषु ॥'