सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 154

४२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ ६ ९६ –
न्द्रियेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण
सागरोपमसहस्रं पूर्वकोटीपृथक्त्वैरभ्यधिकम् । शेषाणां सामान्योक्तः कालः ।
§ ९६. कायानुवादेन पृथिव्यप्तेजोवायुकायिकानां नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं
प्रति जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणम् । उत्कर्षेणासंख्येया लोकाः । वनस्पतिकायिकानामेकेन्द्रियवत् ।
त्रसकायिकेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण
द्वे सागरोपमसहस्रे पूर्वकोटीपृथक्त्वैरभ्यधिके । शेषाणां पञ्चेन्द्रियवत् ।
§ ९७. योगानुवादेन वाङ्मनसयोगिषु मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्त-
सयोगकेवलिनां नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्क-
र्षेणान्तर्मुहूर्तः । सासादनसम्यग्दृष्टेः सामान्योक्तः कालः । सम्यङ्मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया
जघन्येनैकसमयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं प्रति जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षे-
णान्तर्मुहूर्तः । चतुर्णामुपशमकानां क्षपकाणां च नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च जघन्ये-
नैकसमयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः । काययोगिषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं
प्रति जघन्येनैकसमयः । उत्कर्षेणानन्तः कालोऽसंख्येयाः पुद्गलपरिवर्त्ताः । शेषाणां मनोयोगिवत् ।
अयोगिनां सामान्यवत् ।
१५ में मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवको अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त
है और उत्कृष्ट काल पूर्वकोटि पृथक्त्वसे अधिक हजार सागर है । तथा शेष गुणस्थानोंका काल
ओघके समान है ।
§ ९६. काय मार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक और वायु-
कायिकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवको अपेक्षा जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण
प्रमाण और उत्कृष्ट काल असंख्यात लोक प्रमाण है । वनस्पतिकायिकोंका एकेन्द्रियोंके समान काल
२० है। त्रसकायिकोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल पूर्वकोटीपृथक्त्व अधिक दो हजार सागर है। इनके शेष
गुणस्थानोंका काल पंचेन्द्रियोंके समान है।
§ ९७. योग मार्गणाके अनुवादसे वचनयोगी और मनोयोगियोंमें मिथ्यादृष्टि, असंयत-
सम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत और सयोगकेवलियोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा
२५ सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ।
सासादनसम्यग्दृष्टिका सामान्योक्त काल है। सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य
काल एक समय है और उत्कृष्ट काल पल्यका असंख्यातवां भाग है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । चारों उपशमक और चारों क्षपकोंका नाना
जीव और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है।
३० काययोगियोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
काल एक समय है और उत्कृष्ट अनन्त काल है जिसका प्रमाण असंख्यात पुद्गल परिवर्तन है ।
१. –ख्येयाः कालः । वन-मु० । २. मनोयोग, वचनयोग और काययोगका जघन्य काल एक समय योग-
परावृत्ति, गुणपरावृत्ति, मरण और व्याघात इस तरह चार प्रकारसे बन जाता है । इनमें-से मिथ्यादृष्टि,
असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और प्रमत्तसंयत यहाँ पर चारों प्रकार सम्भव हैं । अप्रमत्तसंयतके व्याघातके
३५ बिना तीन प्रकार सम्भव हैं, क्योंकि व्याघात और अप्रमत्तभावका परस्परमें विरोध है और सयोगिकेवलीके
एक योगपरावृत्तिसे ही जघन्य काल एक समय प्राप्त होना सम्भव है । ३. मरणके बिना शेष तीन प्रकारसे
यहाँ जघन्य काल एक समय घटित कर लेना चाहिए । ४. उपशमकोंके व्याघातके बिना तीन प्रकारसे और
क्षपकोंके मरण और व्याघातके बिना दो प्रकारसे जघन्य काल एक समय प्राप्त होता है ।